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क़ुरआन नहजुल बलाग़ा के आईने में-3 quraan nahjul balagha k aaine me-3

(3) मुफ़स्सेरीने वहीए इलाही की ज़रूरत :--

पैग़म्बरे इसलाम (.) की एक ज़िम्मे दारी उम्मते मुस्लेमा के लिये आयाते इलाही की तफ़सीर तशरीह है जैसा कि इर्शाद होता है : “ अन्ज़लना अलेइका ज़िक्रा लेतबीना लिन्नासे मा नज़ाला अलेहिमनेहल 44>

तर्जुमा : हम ने आप की तरफ़ क़ुरआन नाज़िल किया ताकि आप लोगों की तरफ़ जो कुछ नाज़िल हुआ है बयान करें। पस क़ुर्आने करीम के अज़ीम मआरिफ़ के बयान की ज़िम्मेदारी पैग़म्बरे इसलाम () पर है क्योंकि इस के मआरिफ़ इस क़द्र अमीक़ गहरे हैं कि तमाम लोग इसका इदराक नहीं कर सकते।

हज़रत ख़ुत्ब 158 में इर्शाद फ़रमाते हैं : ख़ुत्बा लिख लेना

तर्जुमा : इस क़ुरआन से चाहो कि तुम से कलाम करे और यह हरगिज़ तुम से हम कलाम नहीं होगा लेकिन मैं तुम्हें इस से आगाह करूँगा याद रखो यक़ीनन इस में मुस्तक़बिल के उलूम और माज़ी के हालात हैं और तुम्हारे अमराज़ की दवा है और जो कुछ तुम्हारे माबैन है उसके बारे में नज़मो ज़ब्त की राहनुमाई पाई जाती है।

पस मासूमीन (..) की ज़बाने मुबारक से इस के बारे में आशनाई हासिल करनी चाहिये। उलूमे क़ुरआन को उन से हासिल करना चाहिये। क़ुरआने करीम इलाही मआरिफ़ का समन्दर है इस बहरे बेकराँ में ग़ोता ज़नी और इन्सान साज़ी के नायाब गौहरों की तलाश करना इन हस्तियों के बस की बात है जो आलमे ग़ैब से दाइमी तौर पर इर्तेबात में हैं। ख़ुदा वन्दे आलम ने भी यही चाहा है कि इन हस्तीयों से राबेता और तवस्सुल के ज़रिए और इन की राहनुमाई के तवस्सुत से क़ुरआनी उलूम मआरिफ़ से राहनुमाई हासिल करो।

(2) क़ुरआने करीम का मअिरती ज़िन्दगी में अहम किरदार :

(1) क़ुरआने करीम हर दौर की दवा है :

हज़रत तमाम मुशकिलात के हल के लिये क़ुरआने करीम का तआरुफ़ फ़रमाते हैं। क़ुरआन ही वह शफ़ा बख़्श दवा है जो तमाम दर्दों का दरमान और परेशानियों के लिये मरहम है। अलबत्ता यह वाज़ेह है कि दर्द की शिनाख्त और अहसास के बग़ैर इलाज या दरमान की बात करना बे फ़ाएदा है। पस इब्तेदाई तौर पर ज़रूरी है कि क़ुरआने करीम की आयात में गहरे ग़ौरो फ़िक्र के साथ इन्फ़ेरादी तौर और मआशिरती दर्दों की शिनाख़्त और मुतालेआ किया जाए इस के बाद इस शिफ़ा बख़्श नुस्खे कीमीया पर अमल किया जाए।

ख़ुत्बा 198 में फ़रमाते हैं: “ दवाओ लेसा बादहू दायअनी क़ुरआने मजीद ऐसी दवा है कि जिस के बाद कोई दर्द रह नहीं जाता यह दवा भी यक़ीनन उस वक्त अपना असर दिखाएगी जब हज़रत (..) के इस फ़रमान और क़ुरआने हकीम के शफ़ा बख़्श होने पर ईमान हो बाअल्फ़ाज़े दीगर हमे अपने पूरे वुजूद के साथ बावर करना चाहिये कि हमारा तमाम तर इन्फ़िरादी इज्तेमाई दर्दों और मुश्किलात का हक़ीक़ी इलाज क़ुरआने हकीम में है। शायद हमारे मआशरे की सब से बड़ी मुशकिल यही ईमान की कमज़ोरी है कि अभी तक बहुत सारी मुश्किलात बाक़ी हैं।