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क़ुरआन नहजुल बलाग़ा के आईने में-4 quraan nahjul balagha k aaine me-4

(2) मआशिरती मुश्किलात का बेहतरीन हल :

इस सिलसिले में हज़रत (..) पैग़म्बरे इस्लाम (.) का क़ौल नक़्ल फ़रमाते हैं कि आप फ़रमाते हैं : हदीस लिख लेना

तर्जुमा : जब कभी सियाह रात की मान्निद तुम्हें फ़ितने घेर लें तो क़ुरआन का दामन थामना।

पस इज़्तिराब, परेशान, मुश्किलात, नाहम आहंगियाँ और बे सरो सामानियाँ तुम्हारे मआशिरे पर जब स्याह रात की मान्निद साया फ़ेग़न हों तो इन के हल के लिये कहीं और जाना बल्कि क़ुरआन से रुजू करना इसकी निजात बख्श राहनुमाई को मेआर कसौटी क़रार देना। क़ुरआन के उम्मीद बख्श फ़रामीन मुश्किलात पर क़ाबू पाने और दिलों में ख़ुशबख़्ती सआदत की उम्मीद को ज़िन्दा करते हैं। अलबत्ता यह वाज़ेह है कि हर कामयाबी के पीछे इन्सान की कोशिश और जिद्दो जहद का बुनियादी किरदार है। पस अगर हम चाहते हैं कि अपनी आज़ादी और इस्तक़्लाल की हिफ़ाज़त करें और ख़ुदाए ज़ुल जलाल के साया रहमत पनाह में हर साज़िश से महफ़ूज़ रहें तो चारा ही नही कि अपने खालिक़ और क़ुरआने करीम के निजात बख्श अहकाम की तरफ़ लौट जाएँ इस सिलसिले में आज तक जिस नाशुक्री और बे ऐहतेरामी के मुरतकिब हुए हैं इस पर तवज्जो निदामत की राह लें।

(3) मआशिरती उमूर में नज़्मो ज़ब्त :

हज़रत फ़रमाते हैं : “नज़्मो माबैनाकुमयानी मुसलमानों के माबैन रवाबित नज़्मो ज़ब्त को सरोसामान बख़्शने वाला क़ुरआने हकीम है हर सियासी नज़्मो ज़ब्त में बड़ा हदफ़ मआशिरती नज़्मो ज़ब्त और अमनो आमान का क़ाएम करना होता है और यह बात क़तअन क़ाबिले इन्कार नहीं है। अलबत्ता समाजी मआशिरती ज़िन्दगी में हदफ़ की अहमियत भी असासी है क्योंकि यही हदफ़ है जो ख़ास तरह के आमाल किरदार का तक़ाज़ा करता है। हर मआशिरे के अफ़राद अपने आमाल किरदार से इसी हदफ़ को पाना चाहते हैं। यह अम्र भी निहायत रौशन है कि हदफ़ का सरचश्मा इस मआशिरे के तमद्दुन, सक़ाफ़त, तारीख़ और लोगों के अक़ाएद होते हैं। यही सबब है कि इस्तेअमारी ताक़तें मिल्लतों के असली हक़ीक़ी सक़ाफ़त तमद्दुन को छीन कर या ख़ोखला कर के इन को अपने अहदाफ़ अग़राज़ और अपने मफ़ादात की तरफ़ धकेल देती हैं।

दीनी सक़ाफ़त या तमद्दुन का सरचश्मा क़ुरआने हकीम और तौहीदी नज़रिया काएनात है यह तमद्दुन एक ऐसे नज़्मो सियासत का तक़ाज़ा करता है जिस में ख़िलक़त के हदफ़ का हसूल और इन्सान की दुनिया आख़िरत में सआदत ख़ुशबख्ती कार फ़रमा है।

बाइसे अफ़सोस है बाज़ मग़रिब ज़दा रौशन फ़िक्र मुसलमान मआशिरती नज़्म को फ़क़्त मग़रिबी जमहुरियत में देखते हैं जब कि उस की बुनियाद ला दीनीयत का अक़ीदा है पस दीनी और क़ुरआनी तमद्दुन में इन्सान की फ़क़्त माद्दी रफ़ाह और फ़लाह शामिल बल्कि उखर्वी सआदत तआमुल भी मौरिदे तवज्जोह अहमियत है इस अम्र की तरफ़ तवज्जोह बहुत ज़रूरी है कि क़ुरआने करीम उस सूरत में शिफ़ा बख़्श है जब उस की हिदायत और फ़रामीन को महज़ अख़्लाक़ी नसीहतें तसव्वुर किया जाए बल्कि तमाम तर मआशिरे और हुकूमत की कुल्ली सियासत, अमल और प्रग्रोमों में क़ुरआने करीम की हिदायात की हिदायत को नाफ़ेज़ुल अमल किया जाए।