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क़ुरआन नहजुल बलाग़ा के आईने में-5 quraan nahjul balagha k aaine me-5

(4) क़ुरआने करीम से वाबस्तगी बेनियाज़ी का बाइस है।

इसी ख़ुत्बे में हज़रत (..) इर्शाद फ़रमाते हैं>: “यक़ीन करो क़ुरआने करीम ऐसा नसीहत करने वाला और मौऐज़ा करने वाला है जो अपने पैरोंकारों से ख़्यानत नहीं करता ऐसा हादी है जो गुमराह नहीं करता ऐसा कलाम करने वाला है जो झूट नहीं बोलता और जो कोई क़ुरआन का हम नशीन हुआ और उस में तदब्बुर तफ़क्कुर करे तो जब उठेगा तो उस की हिदायत सआदत में इज़ाफ़ा हो जब कि उस की गुमराही में कमी वाक़े हो गई

इस के बाद इर्शाद फ़रमाते हैं :

तर्जुमा: यक़ीन के साथ जान लो कि कोई भी क़ुरआन के बाद फ़ाक़ा कशी नहीं और इस से क़ब्ल कोई ग़नी नहीं पस अपने अमराज़ की शफ़ा उस से तलब करो और अपने ठिकानों और पनाह गाहों के लिये उस से मदद तलब करो पस यक़ीनन उस में सब से बड़े अमराज़ की शफ़ा है और वह क़ुफ़्र, निफ़ाक़, जहालत, और ज़लालत गुमराही है। मआशिरे में क़ुरआन की हाकिमीयत के होते हुए इन्सान की कोई ऐसी ज़रूरत नहीं जो पूरी हो क्योंकि ख़ुदा वन्दे मुतआल ने तौहीद परस्तों की दुनिया आख़िरत में सआदत की ज़मानत दी है। पस क़ुरआन को नमुना अमल क़रार देने से इस्लामी मअशिरा हर चीज़ और हर कस नाकस से बेनियाज़ हो जाएगा।

इस के साथ ही साथ हज़रत (..) एक संजीदा मतलब की तरफ़ इशारा फ़रमाते हैं: “वला हद्दे क़ब्लल क़ुर्आन मिन ग़नीयानी कोई भी क़ुरआन के बग़ैर बेनियाज़ नहीं हो सकता। मतलब यह है कि अगर इन्सान के उलूम तजुर्बे में कितना ही इज़ाफ़ा हो जाए मआशिरती मुश्किलात और कमियां दूर करने के जितने भी फ़ारमूले तैयार कर ले, अदल इन्साफ़ के तक़ाज़ों को जितना भी पूरा कर ले और अख़्लाक़ी इन्सानी इक़्तिदार को राएज करे लेकिन क़ुरआन के बग़ैर उन उमूर से उहदा बरआ नहीं हो सकता यानी यह कि इन्सान क़ुरआन से बेनियाज़ नहीं हो सकता हर आक़िल उस का इक़रार करता है कि इन्सान की तमाम तर इल्मी तरक़्क़ी उसके मजहूलात के समन्दर के मुक़ाबिले में क़तरे से ज़्यादा नहीं।