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क़ुरआन नहजुल बलाग़ा के आईने में-6 quraan nahjul balagha k aaine me-6

(5) क़ुरआने करीम आफ़ताब की तरह आलमताब है

ख़ुत्बए : 198 में इस्लाम और पैग़म्बरे इसलाम (.) के औसाफ़ बयान करने के बाद फ़रमाते हैं :

तर्जुमा : परवरदिगार ने क़ुरआन को उस सूरत में अपने हबीब पर नाज़िल फ़रमाया कि यह एक नूर है जिसके चिराग़ हर गिज़ बुझने वाला नहीं, ऐसा आफ़ताब है जिसकी रौशनी कभी ख़त्म होने वाली नहीं और एक ऐसा गेहरा समन्दर जिस की गहराई को कोई पा नहीं सकता। इस ख़ुत्बे में क़ुरआने करीम के लिये आप ने तीन तशबीहात इस्तेमाल फ़रमाई हैं सब से पहले तो क़ुरआन की अज़मत से मुसलमानों के क़ुलूब को आशना फ़रमाते हैं फ़िर उस अज़ीम सरमाय इलाही की तरफ़ मुतावज्जेह फ़रमाते हैं जो मुसलमानों के पास के फ़रमाते हैं दरआँ हालांकि क़ुरआन नूर है अल्लाह ताला ने पैग़म्बर (.) पर नाज़िल फ़रमाया लाकिन यह नूर बाक़ी अनवार से मुख़्तलिफ़ है इस ख़ुसूसियत के साथ कि इस के नूर फ़ैलाने वाले चराग़ हरगिज़ बुझेंगे। इस की ताबिश कभी ख़त्म होगी जो इन्सानों को, इन्सानी समाज, मुतालाशीयों को ख़ुशबख़्ती के राहियों को मुन्हरिफ़ रास्तों, सुक़ूत हौलनाक दरों से निजात दिलाई है। पस राहे हक़ हमेशा के लिये मुस्तक़ीम रौशन है। एक और मक़ाम पर हज़रत फ़रामाते हैं कि तारीकी उस के मुक़ाबिले में ठहर नहीं सकती क्योंकि उस के चिराग़ हमेशा राहे सआदत हिदायत को रौशन रखते हैं यह चराग़ और मुफ़स्सीराने वही इलाही आइम्मा अतहार (..) हैं।

 

 

 

 

(6) क़ुरआनी आईने और चराग़ :

हदीसे सक़लैन की रौशनी मेंक़ुरआन और इतरतऐसे दो इलाही अतिये हैं जो एक दूसरे की तकमील करने वाले हैं। हिकमत रविशे इलाही इस तरह क़रार पाई है कि लोग अहले बैत (..) के ज़रीए से मआरिफ़े क़ुरआन से आशना हों। बिनाबर ईन अल्लाह ने तालिबाने सआदत के लिये इमामत का एक दाइमी रास्ता मुक़र्रर फ़रमाया। क़ुरआनी मआरिफ़ इस क़द्र गहरे वसीअ अमीक़ हैं इन्सान जिस क़द्र अहले बैत (..) के उलूम में तफ़क्कुर तदब्बुर करे इतना ही क़ुरआन की अज़मत और मारिफ़त इरफ़ान के चश्मे फ़ूटने शुरु हो जाते हैं। तौहीद के इस समुन्दर से जितना पीते जाएं तो सैराब होने के बजाए इन्सान तिशनातर होता जाता है।