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क़ुरआन नहजुल बलाग़ा के आईने में-7 quraan nahjul balagha k aaine me-7

(7) क़ुरआने करीम के पैरोकार के लिये इस्लाह सआदत :

यह ज़िन्दगी क्योंकि आख़िरत की खेती है लिहाज़ा इन्सान का तमाम हम्म ग़म आख़िरत की सआदत होना चाहिये। बस इन्सान अपने आमाल किरदार को क़ुरआने करीम और अहले बैत (..) के मआरिफ़ उलूम के मुताबिक़ बनाए तो दुनिया आख़िरत की इज़्ज़त सर बलन्दी हासिल कर सकता।

ईमाम (..) ख़ुत्ब 176 में इर्शाद फ़रमाते हैं :

तर्जुमा : अल्लाह तअला से क़ुरआन के ज़रिए सवाल करो और परवरदिगार की तरफ़ उस की मुहब्बत के ज़रिए से मुतवज्जेह हो जाओ और मख़लूक़े ख़ुदा से मांगने के लिए क़ुरआन को ज़रिए क़रार दो क्योंकि इन्सान भी अपने और ख़ुदा के माबैन क़ुरआन जैसा वास्ता नहीं रखते। यक़ीन के साथ जान लो कि क़ुरआन ऐसा शिफ़ाअत करने वाला है जिस की शिफ़ाअत क़ुबूल शुदा है यह ऐसा बोलने वाला है जिस की तस्दीक़ की जाती है। क़यामत के दिन जिस की शिफ़ाअत क़ुरआन ने की तो यह शिफ़ाअत उस के हक़ में क़ुबूल की जाएगी और क़यामत के दिन जिस की मज़म्मत क़ुरआन ने की तो मुआमिला उस के नुक़्सान में होगा।

(8) क़ुरआन ख़ैरख्वाह और नसीहत करने वाला है :

ईमाम अली (..) फ़रमाते हैं :

लोगों! क़ुरआन के जमा करने वालों और पैरोकारों में से हो जाओ और उस को अपने परवरदिगार के लिये दलील क़रार दो।

अल्लाह को उस के कलाम के पहचानों। परवरदिगार के औसाफ़ को क़ुरआन के ज़रिए पहचानों क़ुरआन ऐसा राहनुमा है जो तुम्हें अल्लाह की तरफ़ राहनुमाई करता है। उस राहनुमाई के ज़रिए उस के भेजे हुए रसूल की मअरिफ़त हासिल करो और उस अल्लाह पर ईमान ले आओ जिस का तआरुफ़ क़ुरआन करता है।वस्तन्साहू अला अन्फ़ोसेकुम

क़ुरआन को अपना नासेह क़रार दो और उस की ख़ैरख्वाहना नसीहतों पर अमल करो क्योंकि तुम इन्सान एक दिल सोज़, ख़ैरख्वाह के मोहताज हो जो तुम्हें ज़रूरी मक़ामात पर नसीहत करे।

तर्जुमा : बेशक यह क़ुरआन तुम्हें इन्तेहाई मुस्तहकम पाएदार रास्ते की तरफ़ राहनुमाई करता है और जो मोमिनीन अअमाले सालेह बजा लाते हैं उन को बशारत देदो कि उन के लिये यक़ीनन बहुत बड़ा अज्र है।

यहाँ सब से अहम नुक्ता इस आयते मुबारका पर क़ल्बी ऐतेक़ाद है क्योंकि इन्सान जब तक यह अक़ीदा रखता हो, अपने आप को ख़ुदा के हवाले कर दे और ख़ुद को ख़्वाहिशाते नफ़सानी से पाक करे तो हर वक़्त यह ख़तरा मौजूद है कि शैतानी वस्वसे का शिकार हो जाए। क़ुरआने करीम का कोई भी हुक्म इन्सानी हैवानी नफ़्सानी ख़्वाहिशात से साज़गार नहीं है जो शख़्स अपनी ही ख़्वाहिशात को मद्दे नज़र रखता है उस की ख़्वाहिश होती है कि क़ुरआन भी उस के रुजहानात, ख़्वाहिशात के मुताबिक कलाम करे और जैसे ही कोई आयत उस की ख़्वाहिशात तरग़ीबात के मुताबिक़ नज़र आए तो उस का भर पूर इस्तिक़बाल करता है पस अक़्ल का तक़ाज़ा है कि इन्सान ख़ाली ज़हन और ख़ाली दामन हो कर फ़क़्त इश्क़े इलाही का जज़्बा लेकर क़ुरआन की बारगाह में हाज़िरी दें।