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Nahjul Balagha Hindi Aqwal 1-20 नहजुल बलाग़ा हिन्दी अक़वाल 1-20

अमीरूल मोमेनीन अलैहिस्सलाम के मुन्तख़ब हुक्म व मवाएज़ का बाब (अक़वाल)

1. फ़ित्ना व फ़साद में उस तरह रहो जिस तरह ऊंट का वह बच्चा जिसने अभी अपनी उम्र के दो साल ख़त्म किये हैं के न तो उसकी पीठ पर सवारी की जा सकती है और न उसके थनों से दूध दोहा जा सकता है।

 

2. जिसने तमअ को अपना ‘ाोआर बनाया, उसने अपने को सुबुक किया और जिसने अपनी परेशान हाली का इज़हार किया वह ज़िल्लत पर आमादा हो गया, और जिसने अपनी ज़बान को क़ाबू में न रखा उसने ख़ुद अपनी बेवक़अती का सामान कर लिया।


3. बुख़ल नंग व आर है, और बुज़दिली नुक़्स व ऐब है, और ग़ुरबत मर्दे ज़ीरक व दाना की ज़बान को दलाएल की क़ूवत दिखाने से आजिज़ बना देती है और मुफ़लिस अपने ‘ाहर में रह कर भी ग़रीबुल वतन होता है और इज्ज़ व दरमान्दगी मुसीबत है और सब्र व ‘ाकीबाई ‘ाुजाअत है और दुनिया से बेताल्लुक़ बड़ी दौलत है और परहेज़गारी एक बड़ी सिपर है।


4. तस्लीम व रज़ा बेहतरीन मसाहेब और इल्म ‘ारीफ़ तरीन मीरास है और अमली दमली औसाफ़े नौ बनू खि़लअत हैं और फ़िक्र साफ़ व ‘ाफ़्फ़ाफ़ आईना है।


5. अक़्लमन्द का सीना उसके भेदों का मख़ज़न होता है, और कुशादा रूई मोहब्बत व दोस्ती का फन्दा है और तहम्मुल व बुर्दबारी ऐबों का मदफ़न है (या इस फ़िक़रे के बजाए हज़रत ने यह फ़रमाया) सुलह व सफ़ाई ऐबों को ढांपने का ज़रिया है।


6. जो ‘ाख़्स अपने को बहुत पसन्द करता है वह दूसरों को नापसन्द हो जाता है और सदक़ा कामयाब दवा है और दुनिया में बन्दों के जो आमाल हैं वह आख़ेरत में उनकी आंखों के सामने होंगे।

((( क़ुरान में इरशादे इलाही यूं है उस दिन लोग गिरोह गिरोह (क़ब्रों से) उठ खड़े होंगे ताके वह अपने आमाल को देखें तो जिसने ज़र्रा बराबर भी नेकी की होगी उसे देख लेगा और जिसने ज़र्रा बराबर भी बुराई की होगी वह उसे देख लेगाा)))


7. यह इन्सान ताअज्जुब के क़ाबिल है के वह चर्बी से देखता है, और गोश्त के लोथड़े से बोलता है और हड्डी से सुनता है और एक सूराख़ से सांस लेता है।


8. जब दुनिया किसी की तरफ़ मुतवज्जेह हो जाती है तो यह दूसरे के महासिन भी उसके हवाले कर देती है और जब उससे मुंह फिराती है तो उसके महासिन भी सल्ब कर लेती है।


(((-यह इल्मुल इज्तेमाअ का नुक्ता है जहां इस हक़ीक़त की तरफ़ तवज्जो दिलाई गई है के ज़माना ऐबदार को बेऐब भी बना देताा है और बेऐब को ऐबदार भी बना देता है और दोनों का फ़र्क़ दुनिया की तवज्जो है जिसका हुसूल बहरहाल ज़रूरी है।)))


9. लोगों के साथ ऐसा मेल-जोल रखो के मर जाओ तो लोग गिरया करें और ज़िन्दा रहो तो तुम्हारे मुश्ताक़ रहें।


((( यह भी बेहतरीन इज्तेमाई नुक्ता है जिसकी तरफ़ हर इन्सान को मुतवज्जो रहना चाहिये)))
 

10. जब दुश्मन पर क़ुदरत हासिल हो जाए तो मुआफ़ कर देने ही को इस क़ुदरत का ‘ाुक्रिया क़रार दो।


(((यह एख़लाक़ी तरबीयत है के इन्सान में ताक़त का ग़ुरूर नहीं होना चाहिये )))


11. आजिज़ तरीन इन्सान वह है जो दोस्त बनाने से भी आजिज़ हाो और उससे ज़्यादा आजिज़ वह है जो रहे सहे दोस्तों को भी बरबाद कर दे।


12. जब नेमतों का रूख तुम्हारी तरफ़ हो तो नाशुक्री के ज़रिये उन्हें अपने तक पहुंचने से भगा न दो।


(((परवरदिगारे आलम ने यह एख़तेलाफ़ी निज़ाम बना दिया है के नेमतों की तकमील ‘ाुक्रिया ही के ज़रिये हो सकती है लेहाज़ा जिसे भी इसकी तकमील दरकार है उसे ‘ाुक्रिया का पाबन्द होना चाहिये)))
 

13. जिसे क़रीबी छोड़ दें उसे बेगाने मिल जाएंगे।


14. हर फ़ित्ने में पड़ जाने वाला क़ाबिले इताब नहीं होता।
 

(((जब साद बिन अबी वक़ास, मोहम्मद इब्ने मुसल्लेम और अब्दुल्लाह इब्ने उमर ने असहाबे जमल के मुक़ाबले में आपका साथ देने से इन्कार किया तो इस मौक़े पर यह जुमला फ़रमाया, मतलब यह है के यह लोग मुझसे ऐसे मुनहरिफ़ हो चुके हैं के उन पर न मेरी बात का कुछ असर होता है और न उन पर मेरी इताब व सरज़न्श कारगर साबित होती है)))
 

15. सब मुआमले तक़दीर के आगे सरनिगूँ हैं यहाँ तक के कभी तदबीर के नतीजे में मौत हो जाती है।
 

16. पैग़म्बर सल्लल्लाहो अजलैहे वआलेही वसल्लम की हदीस के मुताल्लिक़ के ‘‘बुढ़ापे को (खि़ज़ाब के ज़रिये) बदल दो, और यहूद से मुशाबेहत इख़्तेयार न करो’’ आप (अ0) से सवाल किया गया तो आपने फ़रमाया के पैग़म्बर पैग़म्बर सल्लल्लाहो अजलैहे वआलेही वसल्लम ने यह उस मौक़े के लिये फ़रमाया था जबके दीनन (वाले) कम थे और अब जबके इसका दामन फै़ल चुका है, और सीना टेक कर जम चुका है तो हर ‘ाख़्स को इख़्तेयार है।
 

(((मक़सद यह है के चूंके इब्तिदाए इस्लाम में मुसलमानों की तादाद कम थी इसलिये ज़रूरत थी के मुसलमानों की जमाअती हैसियत को बरक़रार रखने के लिये उन्हें यहूदियों से मुमताज़ रखना जाए, इसलिये आँहज़रत ने खि़ज़ाब का हुक्म दिया के जो यहूदियों के हाँ मरसूम नहीं है, इसके अलावा यह मक़सद भी था के वह दुश्मन के मुक़ाबले में ज़ईफ़ व सिन रसीदा दिखाई न दें)))


17-उन लोगों के बारे में के जो आपके हमराह होकर लड़ने से किनाराकश रहे, फ़रमाया उन लोगों ने हक़ को छोड़ दिया और बातिल की भी नुसरत नहीं की।
 

(((यह इरशाद उन लोगों के मुताल्लुक़ है के जो अपने को ग़ैर जानिबदार ज़ाहिर करते थे जैसे अब्दुल्लाह बिन उमर, साद इब्ने अबी वक़ास, अबू मूसा अशअरी, अहनफ़ इब्ने क़ैस, और अन्स इब्ने मालिक वग़ैरह, बेशक इन लोगों ने खुल कर बातिल की हिमायत नहीं की, मगर हक़ की नुसरत से हाथ उठा लेना भी एक तरह से बातिल को तक़वीयत पहुंचाना है इसलिये इनका ‘ाुमार मुख़ालेफ़ीने हक़ के गिरोह ही में होगा।)))
 

18- जो ‘ाख़्स उम्मीद की राह में बगटूट दौड़ता है वह मौत से ठोकर खाता है।


19- ब-मुरव्वत लोगों की लग्ज़िशों से दरगुज़र करो (क्योंके) इनमें से जो भी लग्ज़िश खाकर गिरता है तो अल्लाह उसके हाथ में हाथ देकर उसे ऊपर उठा लेता है।


20- ख़ौफ़ का नतीजा नाकामी और ‘ार्म का नतीजा महरूमी है और फ़ुर्सत की घड़ियां (तेज़रौ) अब्र की तरह गुज़र जाती हैं, लेहाज़ा भलाई कंे मिले हुए मौक़ों को ग़नीमत जानो।


(((जो बिला वजजह ख़ौफ़ज़दा हाो जाएगा वह मक़सद को हासिल नहीं कर सकता है और जो बिला वजह ‘ार्माता रहेगा वह हमेशा महरूम रहेगा। इन्सान हर मौक़े पर ‘ार्माता ही रहता ताो नस्ले इन्सानी वजूद में न आती।)))