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Nahjul Balagha Hindi Khat 41-44 नहजुल बलाग़ा हिन्दी 41-44 ख़त

41- आपका मकतूबे गिरामी
(बाज़ अमाल (आमिल) के नाम )


अम्माबाद, मैंने तुमको अपनी अमानत में ‘ारीककार बनाया था और ज़ाहिर व बातिन में अपना क़रार दिया था और हमदर्दी और मददगारी और अमानतदारी के एतबार से मेरे घरवालों में तुमसे ज़्यादा मोतबर कोई नहीं था, लेकिन जब तुमने देखा के ज़माना तुम्हारे इब्ने उम पर हमलावर है और दुश्मन आमादाए जंग है और लोगों की अमानत रूसवा हो रही है और उम्मत बेराह आौर लावारिस हो गई है तो तुमने भी अपने इब्ने उम से मुंह मोड़ लिया और जुदा होने वालों के साथ मुझसे जुदा हो गए और साथ छोड़ने वालों के साथ अलग हो गए और ख़यानतकारों के साथ ख़ाइन हो गए, न अपने इब्ने उम का साथ दिया और न अमानतदारी का ख़याल किया, गोया के तुमने अपने जेहाद से ख़ुदा का इरादा भी नहीं किया था।


(((-यह बात तो वाज़ेह है के हज़रत ने यह ख़त अपने किसी चचाज़ाद भाई के नाम लिखा है लेकिन उससे कौन मुराद है? इसमें ‘ादीद इख़्तेलाफ़ पाया जाता है, बाज़ हज़रात का ख़याल है के अब्दुल्लाह बिन अब्बास मुराद हैं वह बसरा के आमिल थे लेकिन जब मिस्र में मोहम्मद बिन अबीबक्र का हश्र देख लिया तो बैतुलमाल का सारा माल लेकर मक्के चले गए और वहीं ज़िन्दगी गुज़ारने लगे जिस पर हज़रत ने अपनी ‘ादीद नाराज़गी का इज़हार फ़रमाया और इब्ने अब्बास के तमाम कारनामों पर ख़ते नस्ख़ खींच दिया और बाज़ हज़रात का कहना है के इब्ने अब्बास जैसे जब्र अलामता और मुफ़स्सिरे क़ुरान के बारे में इस तरह के किरदार का इमकान नहीं है लेहाज़ा इससे मुराद उनके भाई उबैदुल्लाह बिन अब्बास हैं जो यमन में हज़रत के आमिल थे लेकिन बाज़ हज़रात ने इस पर भी एतराज़ किया है के यमन के हालात में इनकी ख़यानतकारी का कोई तज़किरा नहीं है तो एक भाई को बचाने के लिये दूसरे को निशानाए रूस्तम क्यों बनाया जा रहा है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास लाख आालिम व फ़ाज़िल व मुफ़स्सिरे क़ुरान क्यों न हों, इमामे मासूम नहीं हैं और बाज़ मामलात में इमाम या मुकम्मल पैरो इमाम के अलावा कोई साबित क़दम नहीं रह सकता है चाहे मर्दे आमी हो या मुफ़स्सिरे क़ुरान!-))))


और गोया तुम्हारे पास परवरदिगार की तरफ़ से कोई हुज्जत नहीं थी और गोया के तुम इस उम्मत को धोका देकर उसकी दुनिया पर क़ब्ज़ा करना चाहते थे और तुम्हारी नीयत थी के इनकी ग़फ़लत से फ़ायदा उठाकर उनके अमवाल पर क़ब्ज़ा कर लें। चुनान्चे जैसे ही उम्मत से ख़यानत करने की ताक़त पैदा हो गई तुमने तेज़ी से हमला कर दिया और फ़ौरन कूद पड़े और इनत माम अमवाल को उचक लिया जो यतीमों और बेवाओं के लिये महफ़ूज़ किये गये थे जैसे कोई तेज़ रफ़्तार भेड़िया शिकस्ता या ज़ख़्मी बकरियों पर हमला कर देता है, फिर तुम उन अमवाल को हेजाज़ की तरफ़ उठा ले गए और इस हरकत से बेहद मुमतईन और ख़ुश थे और इसके लेने में किसी गुनाह का एहसास भी न था जैसे (ख़ुदा तुम्हारे दुश्मनों का बुरा करे) अपने घर की तरफ़ अपने मां बाप की मीरास का माल ला रहे हो।
 

ऐ सुबहान अल्लाह, क्या तुम्हारा आखि़रत पर ईमान ही नहीं है और क्या रोज़े क़यामत के ‘ादीद हिसाब का ख़ौफ़ भी ख़त्म हो गया हैं, ऐ वह ‘ाख़्स जो कल हमारे नज़दीक साहेबाने अक़्ल में ‘ाुमार होता था, तुम्हारे यह खाना पीना किस तरह गवारा होता है जबके तुम्हें मालूम है के तुम माले हराम खा रहे हो और हराम ही पी रहे हो और फिर अयताम (यतीमों) मसाकीन, मोमेनीन और मुजाहेदीन जिन्हें अल्लाह ने यह माल दिया है और जिनके ज़रिये उन ‘ाहरों का तहफ़्फ़ुज़ किया है, उनके अमवाल से कनीज़ें ख़रीद रहे हो और ‘ाादियां रचा रहे हो।


ख़ुदारा, ख़ुदा से डरो और उन लोगों के अमवाल वापस कर दो के अगर ऐसा न करोगे और ख़ुदा ने कभी तुम पर इख़्तेयार दे दिया तो तुम्हारे बारे में वह फ़ैसला करूंगा जो मुझे माज़ूर बना सके और तुम्हारा ख़ातेमा इसी तलवार से करूंगा जिसके मारे हुए का कोई ठिकाना जहन्नुम के अलावा नहीं है।
ख़ुदा की क़सम, अगर यही काम हसन (अ0) व हुसैन (अ0) ने किया होता तो उनके लिये भी मेरे पास किसी नर्मी का इमकान नहीं था और न वह मेरे इरादे पर क़ाबू पा सकते थे जब तक के उनसे हक़ हासिल न कर लूँ और उनके ज़ुल्म के आसार को मिटा न दूं।


ख़ुदाए रब्बुल आलमीन की क़सम मेरे लिये यह बात हरगिज़ ख़ुशकुन नहीं थी अगर यह सारे अमवाल मेरे लिये हलाल होते और मैं बाद वालों के लिये मीरास बनाकर छोड़ जाता, ज़रा होश में आओ के अब तुम ज़िन्दगी की आखि़री हदों तक पहुंच चुके हो और गोया के ज़ेरे ख़ाक दफ़्न हो चुके हो और तुम पर तुम्हारे आमाल पेश कर दिये गए हैं। इस मन्ज़िल पर जहां ज़ालिम हसरत से आवाज़ देंगे, और ज़िन्दगी बरबाद करने वाले वापसी की आरज़ू कर रहे होंगे और छुटकारे का कोई इमकान न होगा।


(((-हज़रत अली (अ0) के मुजाहिदात के इम्तियाज़ात में से एक इम्तियाज़ यह भी है के जिसकी तलवार आप पर चल जाए वह भी जहन्नमी है और जिस पर आपकी तलवार चल जाए वह भी जहन्नमी है इसलिये के आप इमामे मासूम और यदुल्लाह हैं और इमामे मासूम से किसी ग़लती का इमकान नहीं है और अल्लाह का हाथ किसी बेगुनाह और बेख़ता पर नहीं उठ सकता है। काश मौलाए कायनात के मुक़ाबले में आने वाले जमल व सिफ़्फ़ीन के फ़ौजी या सरबराह इस हक़ीक़त से बाख़बर होते और उन्हें इस नुक्ते का होश रह जाता तो कभी नफ़्से पैग़म्बर (स0) से मुक़ाबला करने की हिम्मत न करते।


यह किसी ज़ाती इम्तियाज़ का एलान नहीं है, यही बात परवरदिगार ने पैग़म्बर (स0) से कही के तुम शिर्क इख़्तेयार कर लोगे तो तुम्हारे आमाल भी बरबाद कर दिये जाएंगे और यही बात पैग़म्बरे इस्लाम (स0) ने अपनी दुख़्तरे नेक अख़्तर के बारे में फ़रमाई थी और यही बात मौलाए कायनात (अ0) ने इमाम हसन और इमाम हुसैन (अ0) के बारे में फ़रमाई है, गोया के यह एक सही इस्लामी किरदार है जो सिर्फ़ उन्हीं बन्दगाने ख़ुदा में पाया जाता है जो मशीयते इलाही के तर्जुमान और एहकामे इलाही की तमसील हैं वरना इस तरह के किरदार का पेश करना हर इन्सान के बस का काम नहीं है।-)))


42-आपका मकतूबे गिरामी
(बहरीन के आमिल अम्र बिन अबी सलमा मख़जू़मी के नाम जिन्हें माज़ूल करके नोमान बिन अजलान अज़्ज़रक़ी को मोअय्यन किया था)


अम्माबाद! मैंनंे नोमान बिन अजलान अज़्ज़र्क़ी को बहरीन का आमिल बना दिया है और तुम्हें उससे बेदख़ल कर दिया है लेकिन न इसमें तुम्हारी कोई बुराई है और न मलामत, तुमने हुकूमत का काम बहुत ठीक तरीक़े से चलाया है और अमानत को अदा कर दिया है लेकिन अब वापस चले आओ न तुम्हारे बारे में कोई बदगुमानी है न मलामत, न इल्ज़ाम है न गुनाह, असल में मेरा इरादा ‘ााम के ज़ालिमों से मुक़ाबला करने का है लेहाज़ा मैं चाहता हूं के तुम मेरे साथ रहो के मैं तुम जैसे अफ़राद से दुश्मन से जंग करने और सुतूने दीम क़ायम करने में मदद लेना चाहता हूँ, इन्शाअल्लाह।



43-आपका मकतूबे गिरामी
(मुस्क़ला बिन हबीरा अलशीबानी के नाम जो अर्द ‘ाीर ख़ुर्रह में आपके आमिल थे)


मुझे तुम्हारे बारे में एक ख़बर मिली जो अगर वाक़ेअन सही है तो तुमने अपने परवरदिगाार को नाराज़ किया है और अपने इमाम की नाफ़रमानी की है, ख़बर यह है के मुसलमानों के माले ग़नीमत को जिसे उनके नैज़ों और घोड़ों ने जमा किया है और जिसकी राह में इनका ख़ून बहाया गया है, अपनी क़ौम के उन बद्दुओं में तक़सीम कर रहे हो जो तुम्हारे हवाख़्वाह हैं। क़सम उस ज़ात की जिसने दाने को शिगाफ़्ता किया है और जानदारों को पैदा किया है। अगर यह बातसही है तो तुम मेरी नज़रों में इन्तेहाई ज़लील हो गए हो और तुम्हारे आमाल का पल्ला हल्का हो जाएगा, लेहाज़ा ख़बरदार अपने रब के हुक़ूक़ को मामूली मत समझना और अपने दीन को बरबाद करके दुनिया आरास्ता करने की फ़िक्र न करना के तुम्हारा ‘ाुमार उन लोगों मेें हो जाए जिनके आमाल में ख़सारे के अलावा कुछ नहीं है।


याद रखो! जो मुसलमान तुम्हारे पास या मेरे पास हैं उन सबका हिस्सा उस माले ग़नीमत एक ही जैसा है और इसी ऐतबार से वह मेरे पास वारिद होते हैं और अपना हक़ लेकर चले जाते हैं।


44-आपका मकतूबे गिरामी
(ज़ियाद बिन अबिया के नाम जब आपको ख़बर मिली के माविया उसे अपने नसब में ‘ाामिल करके धोका देना चाहता है)


मुझे मालूम हुआ है के माविया ने तुम्हें ख़त लिखकर तुम्हारी अक़्ल को फ़िसलाना चाहा है और तुम्हारी धार को कुन्द बनाने का इरादा कर लिया है, लेहाज़ा ख़बरदार होशियार रहना, यह ‘ौतान है जो इन्सान के पास आगे, पीछे, दाहिने बायें हर तरफ़ से आता है ताके उसे ग़ाफ़िल पाकर उस पर टूट पड़े और ग़फ़लत की हालत में उसकी अक़्ल सल्ब कर ले।


(((-अमीरूल मोमेनीन (अ0) का उसूले हूकूमत था के अमाल पर हमेशा कड़ी निगाह रखते थे और उनके तसर्रूफ़ात की निगारानी किया करते थे और जहां किसी ने हुदूदे इस्लामिया से तजावुज़ किया, फ़ौरन तम्बीही ख़त तहरीर फ़रमा दिया करते थे और यही वह तजेऱ् अमल था जिसकी बिना पर बहुत से अफ़राद टूट कर माविया के साथ चले गए और दीन व दुनिया दोनों को बरबाद कर लिया, हबीरह उन्हीं अफ़राद में था और जब हज़रत ने उसके तसर्रूफ़ात पर  तन्क़ीद फ़रमाई तो मुनहरिफ़ होकर ‘ााम चला गया और माविया से मुलहक़ हो गया लेकिन आपका किरदार ‘ााम के अन्धेरे में चमकता रहा और आज तक दुनिया को इस्लाम की रौशनी दिखला रहा है।-)))


वाक़ेया यह है के अबू सुफ़ियान ने अम्र बिन अलख़त्ताब के ज़मााने में एक बेसमझी बूझी बात कह दी थी जो ‘ौतानी वसवसों में से एक वसवसे की हैसियत रखती थी जिससे न कोई नसब साबित होता है और न किसी मीरास का इसतेहक़ाक़ पैदा होता है और इससे तमस्सुक करने वाला एक बिन बुलाया ‘ाराबी है जिसे धक्के देकर निकाल दिया जाए या प्याला है जो ज़ीने फ़रस में लटका दिया जाए और इधर-उधर ढलकता रहे।


सय्यद रज़ी- इस ख़त को पढ़ने के बाद ज़ियाद ने कहा के रब्बे काबा की क़सम अली (अ0) ने उस अम्र की गवाही दे दी और यह बात उसके दिल से लगी रही यहां तक के माविया ने उसके भाई होने का इदआ कर दिया।


वाग़ल उस ‘ाख़्स को कहा जाता है जो बज़्मे ‘ाराब में बिन बुलाए दाखि़़ल हो जाए और धक्के देकर निकाल दिया जाए। और नूत मजबेज़ब  वह प्याला वग़ैरा है जो मुसाफ़िर के सामान से बान्ध कर लटका दिया जाता है और वह मुसलसल इधर उधर ढलकता  रहता है।