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Nahjul Balagha Hindi Khat 54-68 नहजुल बलाग़ा हिन्दी 54-68 ख़त

54-आपका मकतूबे गिरामी
(तल्हा व ज़ुबैर के नाम जिसे अम्र बिन अलहुसैन अलख़ज़ाई के ज़रिये भेजा था और जिसका ज़िक्र अबूजाफ़र इसकाफ़ी ने किताबुल मक़ामात में किया है)


अम्माबाद! अगरचे तुम दोनों छिपा रहे हो लेकिन तुम्हें बहरहाल मालूम है के मैंने खि़लाफ़त की ख़्वाहिश नहीं की, लोगों ने मुझसे ख़्वाहिश की है और मैंने बैअत के लिये एक़दाम नहीं किया है। जब तक उन्होंने बैअत करने का इरादा ज़ाहिर नहीं किया है तुम दोनों भी उन्हीं अफ़राद में ‘ाामिल हो जिन्होंने मुझे चाहा था और मेरी बैअत की थी और आम लोगाों ने भी मेरी बैअत न किसी सल्तनत के रोब दाब से की है और न किसी माल व दुनिया की लालच में की है।
 

(((- अबूजाफ़र इसकाफ़ी मोतजे़लह के ‘ाुयूख़ में ‘ाुमार होते थे और उनकी सत्तर तसनीफ़ात थीं जिनमें एक ‘‘किताबुल मक़ामात’’ भी थी, इसी किताब में अमीरूल मोमेनीन (अ0) के इस मकतूबे गिरामी का तज़किरा किया है और यह बताया है के हज़रत ने इसे इमरान के ज़रिये भेजा था जो फ़ोक़हाए सहाबा में ‘ाुमार होते थे और जंगे ख़ैबर के साल इस्लाम लाए थे और अहदे मावियाा में इन्तेक़ाल किया था।-
इसकाफ़ी जाहज़ के मआसिरों में थे और उन्हें इस्काफ़ की निस्बत से इस्काफ़ी कहा जाता है जो नहरवान और बसरा के दरम्यान एक ‘ाहर है)))


पस अगर तुम दोनों ने मेरी बैअत अपनी ख़ुशी से की थी तो अब ख़ुदा की तरफ़ रूजू करो और फ़ौरन तौबा कर लो। और अगर मजबूरन की थी तो तुमने अपने ऊपर मेरा हक़ साबित कर दिया के तुमने इताअत का इज़हार किया था और नाफ़रमानी को दिल में छिपाकर रखा था और मेरी जान की क़सम दोनों इस राज़दारी और दिल की बातों को छिपाने में महाजेरीन से ज़्यादा सज़ावार नहीं थे और तुम्हारे लिये बैअत से निकलने और इसके इक़रार के बाद इन्कार कर देने से ज़्यादा आसान रोज़े अव्वल ही इसका इन्कार कर देना था, तुम लोगों का एक ख़याल यह भी है के मैंने उस्मान को क़त्ल किया है तो मेरे और तुम्हारे दरम्यान वह अहले मदीना मौजूद हैं जिन्होंने हम दोनों से अलाहेदगी इख़्तेयार कर ली है, इसके बाद हर ‘ाख़्स इसी का ज़िम्मेदार है जो उसने ज़िम्मेदारी क़ुबूल की है। बुज़ुर्गवारों! मौक़ा ग़नीमत है अपनी राय से बाज़ आ जाओ के आज तो सिर्फ़ जंग व आर का ख़तरा है लेकिन इसके बाद आर व नार दोनों जमा हो जाएंगे, वस्सलाम।
 


55-आपका मकतूबे गिरामी
(माविया के नाम)


अम्माबाद! ख़ुदाए बुज़ुर्ग व बरतर ने दुनिया को आखि़रत का मुक़दमा क़रार दिया है और उसे आज़माइश का ज़रिया बनाया है ताके यह वाज़ेह हो जाए के बेहतरीन अमल करने वाला कौन है, हम न इस दुनिया के लिये पैदा किये गये हैं और न हमें इसके लिये दौड़-धूप का हुक्म दिया गया है, हम यहाँ फ़क़त इसलिये रखे गए हैं के हमारा इम्तेहान लिया जाए और अल्लाह ने तुम्हारे ज़रिये हमारा और हमारे ज़रिये तुम्हारा इम्तेहान ले लिया है और एक को दूसरे पर हुज्जत क़रार दे दिया है लेकिन तुमने तावीले क़ुरान का सहारा लेकर दुनिया पर धावा बोल दिया और मुझसे ऐसे जुर्म का मुहासेबा कर दिया जिसका न मेरे हाथ से कोई ताल्लुक़ था और न ज़बान से, सिर्फ़ अहले ‘ााम ने मेरे सर डाल दिया था और तुम्हारे जानने वालों ने जाहिलों को और क़याम करने वालों ने ख़ाना नशीनों को उकसा दिया था लेहाज़ा अब भी ग़नीमत है के अपने नफ़्स के बारे में अल्लाह से डरो और ‘ौतान से अपनी ज़माम छुड़ा लो और आखि़रत की तरफ़ रूख़ कर लो के वही हमारी और तुम्हारी आखि़री मन्ज़िल है, उस वक़्त से डरो के इस दुनिया में परवरदिगार कोई ऐसी मुसीबत नाज़िल कर दे के असल भी ख़त्म हो जाए और नस्ल का भी ख़ात्मा हो जाए, मैं परवरदिगार की ऐसी क़सम खाकर कहता हूं जिसके ग़लत होने का इमकान नहीं है के अगर मुक़द्दर ने मुझे और तुम्हें एक मैदान में जमा कर दिया तो मैं उस वक़्त तक मैदान न छोड़ूंगा जब तक मेरे और तुम्हारे दरम्यान फ़ैसला न हो जाए।



56-आपकी वसीयत
(जो ‘ारीह बिन हानी को उस वक़्त फ़रमाई जब उन्हें ‘ााम जाने वाले हर अव्वल दस्ते का सरदार मुक़र्रर फ़रमाया)


सुबह व ‘ााम अल्लाह से डरते रहो और अपने नफ़्स को इस धोकेबाज़ दुनिया से बचाए रहो और इस पर किसी हाल में एतबार न करना और यह याद रखना के अगर तुमने किसी नागवारी के ख़ौफ़ से अपने नफ़्स को बहुत सी पसन्दीदा चीज़ों से न रोका तो ख़्वाहिशात तुमको बहुत से नुक़सानदेह उमूर तक पहुंचा देंगी लेहाज़ा अपने नफ़्स को रोकते टोकते रहो और ग़ुस्से में अपने ग़ैज़ व ग़ज़ब को दबाते और कुचलते रहो।


(((-यह अमीरूलमोमेनीन (अ0) के जलीलुलक़द्र सहाबी थे, अबू मिक़दाद कुन्नीयत थी और आपके साथ तमाम मारेकों में ‘ारीक रहे, यहां तक के हज्जाज के ज़माने में ‘ाहीद हुए, हज़रत (अ0) ने उन्हें ‘ााम जाने वाले हर अव्वल दस्ते का अमीर मुक़र्रर किया तो मज़कूरा हिदायात से सरफ़राज़ फ़रमाया ताके कोई ‘ाख़्स इस्लामी पाबन्दी से आज़ादी का तसव्वुर न कर सके।-)))



57-आपका मकतूबे गिरामी
(अहले कूफ़ा के नाम- मदीने से बसरा रवाना होते वक़्त)


अम्माबाद! मैं क़बीले से निकल रहा हूँ या ज़ालिम की हैसियत से या मज़लूम की हैसियत से, या मैंने बग़ावत की है या मेरे खि़लाफ़ बग़ावत हुई है, मैं तुम्हें ख़ुदा का वास्ता देकर कहता हूँ के जहां तक मेरा यह ख़त पहुंच जाए तुम सब निकल कर आ जाओ, इसके बाद मुझे नेकी पर पाओ तो मेरी इमदाद करो और ग़लती पर देखो तो मुझे रज़ा के रास्ते पर लगा दो।



58-आपका मकतूबे गिरामी
(तमाम ‘ाहरों के नाम - जिसमें सिफ़्फ़ीन की हक़ीक़त का इज़हार किया गया है)


हमारे मामले की इब्तिदा यह है के हम ‘ााम के लश्कर के साथ एक मैदान में जमा हुए जब बज़ाहिर दोनों का ख़ुदा एक था, रसूल एक था, पैग़ाम एक था, न हम अपने ईमान व तस्दीक़ में इज़ाफ़े के तलबगार थे, न वह अपने ईमान को बढ़ाना चाहते थे। मामला बिल्कुल एक था सिर्फ़ इख़्तेलाफ़ ख़ूने उस्मान के बारे में था जिससे हम बिलकुल बरी थे और हमने यह हल पेश किया के जो मक़सद आज नहीं हासिल हो सकता है उसका वक़्ती इलाज यह किया जाए के आतिशे जंग को ख़ामोश कर दिया जाए और लोगों के जज़्बात को पुरसूकून बना दिया जाए, इसके बाद जब हुकूमत को इस्तेहकाम हो जाएगा और हालात साज़गार हो जाएंगे तो हम हक़ को उसकी मन्ज़िल तक लाने की ताक़त पैदा कर लेंगे। लेकिन क़ौम का इसरार था के इसका इलाज सिर्फ़ जंग व जेदाल है जिसका नतीजा यह हुआ के जंग ने अपने पांव फेला दिये और जम कर खड़ी हो गई, ‘ाोले भड़क उठे और ठहर गए और क़ौम ने देखा के जंग ने दोनों के दांत काटना ‘ाुरू कर दिया है और फ़रीक़ैन में अपने पन्जे गाड़ दिये हैं तो वह मेरी बात मानने पर आमादा हो गए और मैंने भी उनकी बात को मान लिया और तेज़ी से बढ़ कर उनके मुतालबए सुलह को क़ुबूल कर लिया यहां तक के उन पर हुज्जत वाज़ेह हो गई और हर तरह का उज्ऱ ख़त्म हो गया। अब इसके बाद कोई इस हक़ पर क़ायम रह गया तो गोया अपने नफ़्स को हलाकत से निकाल लिया वरना इसी गुमराही में पड़ा रह गया तो ऐसा अहद शिकन होगा जिसके दिल पर अल्लाह ने मोहर लगा दी है और ज़माने के हवादिस उसके सर पर मण्डला रहे हैं।


(((-यह इस अम्र की तरफ़ इशारा है के हज़रत ने माविया और उसके साथियों के इस्लाम व ईमान का इक़रार नहीं किया है बल्कि सूरतेहाल का तज़किरा किया है।
हक़ीक़ते अम्र यह है के माविया को ख़ूने उस्मान से कोई दिलचस्पी नहीं थी, वह ‘ााम की हुकूमत और आलमे इस्लाम की खि़लाफ़त का तमाअ था लेहाज़ा कोई सन्जीदा गुफ़्तगू क़ुबूल नहीं कर सकता था, हज़रत ने भी इमामे हुज्जत का हक़ अदा कर दिया और इसके बाद मैदाने जेहाद में क़दम जमा दिये ताके दुनिया पर वाज़ेह हो जाए के जेहादे राहे ख़ुदा फ़रज़न्दे अबूतालिब (अ0) का काम है, अबू सुफ़ियान के बेटे का नहीं है।-)))
 


59-आपका मकतूबे गिरामी
(असवद बिन क़तबा वालीए हलवान के नाम)


अम्माबाद! देखो अगर वाली के ख़्वाहिशात मुख़्तलिफ़ क़िस्म के होंगे तो यह बात उसे अक्सर औक़ात इन्साफ़ से रोक देगी लेकिन तुम्हारी निगाह में तमाम अफ़राद के मामलात को एक जैसा होना चाहिये के ज़ुल्म कभी अद्ल का बदल नहीं हो सकता है। जिस चीज़ को दूसरों के लिये बुरा समझते हो उससे ख़ुद भी इजतेनाब करो और अपने नफ़्स को उन कामों में लगा दो जिन्हें ख़ुदा ने तुम पर वाजिब किया है और इसके सवाब की उम्मीद रखो और अज़ाब से डरते रहो।
और याद रखो के दुनिया दारे आज़माइश है यहां इन्सान की एक घड़ी भी ख़ाली नहीं जाती है मगर यह के यह बेकारी रोज़े क़यामत हसरत का सबब बन जाती है और तुमको कोई ‘ौ हक़ से बेनियाज़ नहीं बना सकती है और तुम्हारे ऊपर सबसे बड़ा हक़ यह है के अपने नफ़्स को महफ़ूज़ रखो और अपने इमकान भर रिआया का एहतेसाब करते रहो के इस तरह जो फ़ायदा तुम्हें पहुंचेगा वह उससे कहीं ज़्यादा बेहतर होगा जो फ़ायदा लोगांे को तुमसे पहुंचेगा, वस्सलाम।



60-आपका मकतूबे गिरामी
(उन अमाल के नाम जिनका इलाक़ा फ़ौज के रास्ते में पड़ता था)


बन्दए ख़ुदा अमीरूल मोमेनीन अली (अ0) की तरफ़ से इन ख़ेराज जमा करने वालों और इलाक़ों के वालियों के नाम जिनके इलाक़े से लश्करों का गुज़र होता है।
अम्माबाद! मैंने कुछ फ़ौजें रवाना की हैं जो अनक़रीब तुम्हारे इलाक़े से गुज़रने वाली हैं और मैंने उन्हें उन तमाम बातों की नसीहत कर दी है जो उन पर वाजिब हैं के किसी को अज़ीयत न दें और तकलीफ़ को दूर रखें और मैं तुम्हें और तुम्हारे अहले ज़िम्मा को बता देना चाहता हूँ के फ़ौज वाले कोई दस्त दराज़ी करेंगे, तो मैं उनसे बेज़ार रहूंगा मगर यह के कोई ‘ाख़्स भूक से मुज़तर हो और उसके पास पेट भरने का कोई रास्ता न हो, उसके अलावा कोई ज़ालिमाना अन्दाज़ से हाथ लगाए तो उसको सज़ा देना तुम्हारा फ़र्ज़ है, लेकिन अपने सरफिरों को समझा देना के जिन हालात को मैंने मुस्तशना क़रार दिया है उनमें कोई ‘ाख़्स किसी चीज़ को हाथ लगाना चाहे तो उससे मुक़ाबला न न करें और टोकें नहीं, फिर उसके बाद मैं लश्कर के अन्दर मौजूद हूँ अपने ऊपर होने वाली ज़्यादतियों और सख़्ितयों की फ़रयाद मुझसे करो अगर तुम दिफ़ाअ करने के क़ाबिल नहीं हो जब तक अल्लाह की मदद और मेरी इमदाद ‘ाामिल न हो, मैं इन्शाअल्लाह अल्लाह की मदद से हालात को बदल दूँगा।


(((-इस ख़त में हज़रत ने दो तरह के मसाएल का तज़किरा फ़रमाया है, एक का ताल्लुक़ लश्कर से है और दूसरे का उस इलाक़े से जहां से लश्कर गुज़रने वाला है। लश्करवालों को तवज्जो दिलाई है के ख़बरदार रिआया पर ज़ुल्म न होने पाए के तुम्हारा काम ज़ुल्म व जौर का मुक़ाबला करना है, ज़ुल्म करना नहीं है और रास्ते के अवाम को मुतवज्जो किया है के अगर लश्कर में कोई ‘ाख़्स बर बिनाए इज़तेरार किसी चीज़ को इस्तेमाल कर ले तो ख़बरदार उसे मना न करना के यह उसका ‘ारई हक़ है और इस्लाम में किसी ‘ाख़्स को उसके हक़ से महरूम नहीं किया जा सकता है। इसके बाद लश्कर की ज़िम्मेदारी है के अगर कोई मसला पेश आ जाए तो मेरी तरफ़ रूजू करे और अवाम की भी ज़िम्मेदारी है के अपने मसाएल की फ़रियाद मेरे पस पेश करें और सारे मुआमलात को ख़ुद तय करने की कोशिश न करें।-)))


61-आपका मकतूबे गिरामी
(कुमैल बिन ज़ियाद के नाम जो बैतुलमाल के आमिल थे और उन्होंने फ़ौजे दुश्मन को लूटमार से मना नहीं किया)


अम्माबाद! इन्सान का उस काम को नज़र अन्दाज़ कर देना जिसका ज़िम्मेदार बनाया गया है और उस काम में लग जाना जो उसके फ़राएज़ में ‘ाामिल नहीं है एक वाज़ेह कमज़ोरी और तबाहकुन फ़िक्र है।
और देखो तुम्हारा अहले क़िरक़िसया पर हमला कर देना और ख़ुद अपनी सरहदों को मोअत्तल छोड़ देना जिनका तुमको ज़िम्मेदार बनाया गया था। इस आलम में के उनका कोई दिफ़ाअ करने वाला और उनसे लश्करों को हटाने वाला नहीं था एक इन्तेहाई परागन्दा राय है और इस तरह तुम दोस्तों पर हमला करने वाले दुश्मनों के लिये एक वसीला बन गए जहां न तुम्हारे कान्धे मज़बूत थे और न तुम्हारी कोई हैबत थी, न तुमने दुश्मन का रास्ता रोका और न इसकी ‘ाौकत को तोड़ा, न अहले ‘ाहर के काम आए और न अपने अमीर के फ़र्ज़ को अन्जाम दिया।



62-आपका मकतूबे गिरामी
(अहले मिस्र के नाम, मालिके अश्तर के ज़रिये जब उनको वालीए मिस्र बनाकर रवाना किया)


अम्माबाद! परवरदिगार ने हज़रत मोहम्मद (स0) को आलमीन के लिये अज़ाबे इलाही से डराने वाला और मुरसलीन के लिये गवाह और निगरां बनाकर भेजा था लेकिन उनके जाने के बाद ही मुसलमानों ने उनकी खि़लाफ़त में झगड़ा ‘ाुरू कर दिया, ख़ुदा गवाह है के यह बात मेरे ख़याल में भी न थी और न मेरे दिल से गुज़री थी के अरब इस मन्सब को उनके अहलेबैत (अ0) से इस तरह मोड़ देंगे और मुझसे इस तरह दूर कर देंगे के मैंने अचानक यह देखा के लोग फ़लाँ ‘ाख़्स की बैअत के लिये टूटे पड़े हैं तो मैंने अपने हाथ को रोक लिया यहाँ तक के यह देखा के लोग दीने इस्लाम से वापस जा रहे हैं और पैग़म्बर के क़ानून को बरबाद कर देना चाहते हैं, तो मुझे यह ख़ौफ़ पैदा हो गया के अगर इस रख़्ने और बरबादी को देखने के बाद भी मैंने इस्लाम और मुसलमानों की मदद न की तो इसकी मुसीबत रोज़े क़यामत उससे ज़्यादा अज़ीम होगी जो आज इस हुकूमत के चले जाने से सामने आ रही है जो सिर्फ़ चन्द दिन रहने वाली है और एक दिन उसी तरह ख़त्म हो जाएगी जिस तरह सराब की चमक दमक ख़त्म हो जाती है या आसमान के बादल फट जाते हैं तो मैंने इन हालात में क़याम किया यहां तक के बातिल ज़ाएल हो गया और दीन मुतमइन होकर अपनी जगह पर साबित हो गया।
 

(((-जनाबे कुमैल मौलाए कायनात के मख़सूस असहाब में थे और बड़े पाये के आलिम व फ़ाज़िल थे लेकिन बहरहाल बशर थे और उन्होंने माविया के मज़ालिम के जवाब में यही मुनासिब समझा के जिस तरह वह हमारे इलाक़े में फ़साद फेला रहा है, हम भी उसके इलाक़े पर हमला कर दें ताके फ़ौजों का रूख़ उधर मुड़ जाए मगर यह बात इमामत के मिज़ाज के खि़लाफ़ थी लेहाज़ा हज़रत ने फ़ौरन तम्बीह कर दी और कुमैल ने भी अपने एक़दाम के नामुनासिब होने का एहसास कर लिया और यही इन्सान का कमाले किरदार है के ग़लती पर इसरार न करे वरना ग़लती न करना ‘ााने इस्मत है ‘ााने इस्लाम व ईमान नहीं है।
जनाबे कुमैल की ग़ैरतदारी का यह आलम था के जब हज्जाज ने उन्हें तलाश करना ‘ाुरू किया और गिरफ़्तार न कर सका तो उनकी क़ौम पर दाना, पानी बन्द कर दिया, कुमैल को इस अम्र की इत्तेलाअ मिली तो फ़ौरन हज्जाज के दरबार में पहुंच गए और फ़रमाया के मैं अपनी ज़ात की हिफ़ाज़त की ख़ातिर सारी क़ौम को ख़तरे में नहीं डाल सकता हूँ और ख़ुद मोहब्बते अहलेबैत (अ0) से दस्तबरदार भी नहीं हो सकता हूँ लेहाज़ा मुनासिब यह है के अपनी सज़ा ख़ुद बरदाश्त करूं जिसके नतीजे में हज्जाज ने उनकी ज़िन्दगी का ख़ात्मा करा दिया।-)))


ख़ुदा की क़सम अगर मैं तनो तन्हा उनके मुक़ाबले पर निकल पड़ूं और उनसे ज़मीन छलक रही हो तो भी मुझे फ़िक्र और दहशत न होगी के मैं उनकी गुमराही के बारे में भी और अपने हिदायत याफ़्ता होने के बारे में भी बसीरत रखता हूँ और परवरदिगार की तरफ़ से मन्ज़िले यक़ीन पर भी हूं और मैं लक़ाए इलाही का इश्तियाक़ भी रखता हूं और इसके बेहतरीन अज्र व सवाब का मुन्तज़िर और उम्मीदवार हूँ। लेकिन मुझे दुख इस बात का है के उम्मत की ज़माम अहमक़ों और फ़ाजिरों के हाथ में चली जाए और वह माले ख़ुदा को अपनी इमलाक और बन्दगाने ख़ुदा को अपना ग़ुलाम बना लें, नेक किरदारों से जंग करें और फ़ासिक़ों को अपनी जमाअत में ‘ाामिल कर लें, जिनमें वह भी ‘ाामिल हैं जिन्होंने तुम्हारे सामने ‘ाराब पी है और उन पर इस्लाम में हद जारी हो चुकी है और बाज़ वह भी हैं के जो उस वक़्त तक इस्लाम नहीं लाए जब तक उन्हें फ़वाएद नहीं पेश कर दिये गए, अगर ऐसा न होता तो मैं तुम्हें इस तरह जेहाद की दावत न देता और सरज़न्श न करता और क़याम पर आमादा न करता बल्कि तुम्हें तुम्हारे हाल पर छोड़ देता के तुम सरताबी भी करते हो और सुस्त भी हो।


क्या तुम ख़ुद नहीं देखते हो के तुम्हारे एतराफ़ कम होते जा रहे हैं और तुम्हारे ‘ाहरों पर क़ब्ज़ा हुआ जा रहा है, तुम्हारे मुमालिक को छीना जा रहा है और तुम्हारे इलाक़ों पर धावा बोला जा रहा है। ख़ुदा तुम पर रहम करे अब दुश्मन से जंग के लिये निकल पड़ो और ज़मीन से चिपक कर न रह जाओ वरना यूँ ही ज़िल्लत का शिकार होगे, ज़ुल्म सहते रहोगे और तुम्हारा हिस्सा इन्तेहाई पस्त होगा, और याद रखो के जंग आज़मा इन्सान हमेशा बेदार रहता है और अगर कोई ‘ाख़्स सो जाता है तो उसका दुश्मन हरगिज़ ग़ाफ़िल नहीं होता है, वस्सलाम।



63-आपका मकतूबे गिरामी
(कूफ़े के आमिल अबूमूसा अशअरी के नाम, जब यह ख़बर मिली के आप लोगों को जंगे जमल की दावत दे रहे हैं और वह रोक रहा है)
 

बन्दए ख़ुदा, अमीरूल मोमेनीन अली (अ0) का ख़त अब्दुल्लाह बिन क़ैस के नाम-
अम्माबाद! मुझे एक ऐसे कलाम की ख़बर मिली है जो तुम्हारे हक़ में भी हो सकता है और तुम्हारे खि़लाफ़ भी, लेहाज़ा अब मुनासिब यही है के मेरे क़ासिद के पहुंचते ही दामन समेट लो और कमर कस लो और फ़ौरन बिल से बाहर निकल आओ और अपने साथियों को भी बुला लो।
 

(((-सूरते हाल यह थी के उम्मत ने पैग़म्बर (स0) के बताए हुए रास्ते को नज़रअन्दाज़ कर दिया और अबू बक्र के हाथ पर बैअत कर ली लेकिन अमीरूल मोमेनीन (अ0) की मुश्किल यह थी के अगर मुसलमानों में जंग व जेदाल का सिलसिला ‘ाुरू कर देते हैं तो मसीलमा कज़्ज़ाब और तलीहा जैसे बदअयान को मौक़ा मिल जाएगाा और वह लोगों को गुमराह करके इस्लाम से  मुनहरिफ़ कर देंगे इसलिये आपने सुकूत इख़्तेयार फ़रमाया और खि़लाफ़त के बारे में कोई बहस नहीं की लेकिन मुरतदों के हाथों इस्लाम की तबाही का मन्ज़र देख लिया तो मजबूरन बाहर निकल आए के बाला आखि़र अपने हक़ की बरबादी पर सुकूत इख़्तेयार किया जा  सकता है, इस्लाम की बरबादी पर सब्र नहीं किया जा सकता है-)))


इसके बाद हक़ साबित हो जाए तो खड़े हो जाओ और कमज़ोरी दिखलाना है तो नज़रों से दूर हो जाओ, ख़ुदा की क़सम तुम जहां रहोगे घेरकर लाए जाओगे और छोड़े नहीं जाओगे यहां तक के दूध मक्खी के साथ और पिघला हुआ मुनजमिद के साथ मख़लूत हो जाए और तुम्हें इत्मीनान से बैठना नसीब न होगा और सामने से इस तरह डरोगे जिस तरह अपने पीछे से डरते हो, और यह काम इस क़द्र आसान नहीं है जैसा तुम समझ रहे हो, यह एक मुसीबत कुबरा है जिसके ऊँट पर बहरहाल सवार होना पड़ेगा और इसकी दुश्वारियों को हमवार करना पड़ेगा और इसके पहाड़ को सर करना पड़ेगा लेहाज़ा होश के नाखन लो और हालात पर क़ाबू रखो और अपना हिस्सा हासिल कर लो और अगर यह बात पसन्द नहीं है तो उधर चले जाओ जिधर न कोई आव भगत है और न छुटकारे की सूरत, और अब मुनासिब यही है के तुम्हें बेकार समझकर छोड़ दिया जाए के सोते रहो और कोई यह भी न दरयाफ़्तत करे के फ़लां ‘ाख़्स किधर चला गया, ख़ुदा की क़सम यह हक़ परस्त का वाक़ई इक़दाम है और मुझे बेदीनों के आमाल की कोई परवाह नहीं  है, वस्सलाम।
 


64-आपका मकतूबे गिरामी
(माविया के जवाब में)


अम्माबाद! यक़ीनन हम और तुम इस्लाम से पहले एक साथ ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे लेकिन कल यह तफ़रिक़ा पैदा हो गया के हमने ईमान का रास्ता इख़्तेयार कर लिया और तुम काफ़िर रह गए और आज यह इख़्तेलाफ़ है के हम राहे हक़ पर क़ायम हैं और तुम फ़ित्ना में मुब्तिला हो, तुम्हारा मुसलमान भी उस वक़्त मुसलमान हुआ है जब मजबूरी पेश आ गई और सारे अशराफ़े अरब इस्लाम में दाखि़ल होकर रसूले अकरम (स0) की जमाअत में ‘ाामिल हो गए।
 

तुम्हारा यह कहना के मैंने तल्हा व ज़ुबैर को क़त्ल किया है और आइशा को घर से बाहर निकाल दिया है और मदीना छोड़कर कूफ़े और बसरा में क़याम किया है तो इसका तुमसे कोई ताल्लुक़ नहीं है, न तुम पर कोई ज़ुल्म हुआ है और न तुमसे माज़ेरत की कोई ज़रूरत है।
और तुम्हारा यह कहना के  तुम महाजेरीन व अन्सार के साथ मेरे मुक़ाबले पर आ रहे हो तो हिजरत तो उसी दिन ख़त्म हो गई जब तुम्हाारा भाई गिरफ़्तार हुआ था और अगर कोई जल्दी है तो ज़रा इन्तेज़ार कर लो के मैं तुमसे ख़ुद मुलाक़ात कर लूं और यही ज़्यादा मुनासिब भी है के इस तरह परवरदिगार मुझे  तुम्हें सज़ा देने के लिये भेजेगा और अगर तुम ख़ुद भी आ गए तो इसका अन्जाम वैसा ही होगा जैसा के बनी असद के ‘ााएर ने कहा थाः
‘‘वह मौसमे गरमा की ऐसी हवाओं का सामना करने वाले हैं जो नशेबों और चट्टानों पर संगरेज़ों की बारिश कर रही हैं’’
 

(((-माविया ने हस्बे आदत अपने इस ख़त में चन्द मसाएल उठाए थे, एक मसला यह था के हम दोनों एक ख़ानदान के हैं तो इख़्तेलाफ़ की क्या वजह है? हज़रत ने इसका जवाब यह दिया यह इख़्तेलााफ़ उसी दिन ‘ाुरू हो गया था जब हम दाएराए इस्लााम में थे और तुम कुफ्ऱ की ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे।
दूसरा मसला यह था के जंगे जमल की सारी ज़िम्मेदारी अमीरूल मोमेनीन (अ0) पर है? इसका जवाब यह है के इस मसले का तुमसे कोई ताल्लुक़ नहीं है लेहाज़ा इसके उठाने की ज़रूरत नहीं है।
तीसरा मसला अपने लश्कर के मुहाजेरीन व अन्सार में होने का था? इसका जवाब यह दिया गया के हिजरत फ़तहे मक्का के बाद ख़त्म हाो गई और फ़तहे मक्का में तेरा भाई गिरफ़्तार हो चुका है जिसके बाद तेरे साथी औलााद तलक़ा तो हाो सकते हैं महाजेरीन कहे जाने के क़ाबिल नहीं हैं।-)))
 

और मेरे पास वही तलवार है जिससे तुम्हारे नाना, मामू और भाई को एक ठिकाने तक पहुंचा चुका हूँ और तुम ख़ुदा की क़सम मेरे इल्म के मुताबिक़ वह ‘ाख़्स जिसके दिल पर ग़िलाफ़ चढ़ा हुआ है और जिसकी अक़्ल कमज़ोर है और तुम्हारे हक़ में मुनासिब यह है के इस तरह कहा जाए के तुम ऐसी सीढ़ी चढ़ गए हो जहां से बदतरीन मन्ज़र ही नज़र आताा है के तुमने दूसरे के गुमशुदा की जुस्तजू की है और दूसरे के जानवर को चराना चाहा है और ऐसे अम्र को तलब किया है जिसके न अहल हो और न उससे तुम्हारा कोई बुनियादी लगाव है। तुम्हारे क़ौल व फ़ेल में किस क़द्र फ़ासला  पाया जाता है और तुम अपने चचा और मामूं से किस क़द्र  मुशाबेह हो जिनको बदबख़्ती और बातिल की तमन्ना ने पैग़म्बर (स0) के इनकार पर आमादा किया और उसके नतीजे में अपने अपने मक़तल में मर-मरकर गिरे जैसा के तुम्हें मालूम है, न किसी मुसीबत को दिफ़ाअ कर सके और न किसी हरीम की हिफ़ाज़त कर सके, उन तलवारों की मार की बिना पर जिनसे कोई मैदाने जंग ख़ाली नहीं होता और जिनमें सुस्ती का गुज़र नहीं है।
 

और तुमने जो बार बार उस्मान के क़ातिलों का ज़िक्र किया है तो उसका आसान हल यह है के जिस तरह सबने बैअत की है पहले मेरी बैअत करो उसके बाद मेरे पास मुक़दमा लेकर आओ, मैं तुम्हें और ततुम्हारे मुद्दआ अलैहम को किताबे ख़ुदा के फ़ैसले पर आमादा करूंगा लेकिन इसके अलावा जो तुम्हारा मुद्दआ है वह एक धोका है जो बच्चे को दूध छुड़ाते वक़्त दिया जाता है, और सलाम हो उसके अहल पर।
 


65-आपका मकतूबे गिरामी
(माविया ही के नाम)


अम्माबाद! अब वक़्त आ गया है के तुम उमूर का मुशाहेदा करने के बाद उनसे फ़ायदा उठा लो के तुमने बातिल दावा करने, झूठ और ग़लत बयानी के फ़रेब में कूद पड़ने, जो चीज़ तुम्हारी औक़ात से बलन्द है उसे इख़्तेयार करने और जो तुम्हारे लिये ममनूअ है उसको हथिया लेने में अपने इस्लाफ़ का रास्ता इख़्तेयार कर लिया है और इस तरह हक़ से फ़रार और जो चीज़ गोश्त व ख़ून से ज़्यादा तुमसे चिमटी हुई है उसका इनकार करना चाहते हो जिसे तुम्हारे कानों से  सुना है और तुम्हारे सीने में भरी हुई है, तो अब हक़ के बाद खुली हुई गुमराही के अलावा क्या बाक़ी रह जाता है। और वज़ाहत के बाद धोका के अलावा क्या है?


(((-इब्ने अबी अल हदीद का बयान है के माविया रोज़े ग़दीर मौजूद था जब सरकारे दो आलम (स0) ने हज़रत अली (अ0) के मौलाए कायनात होने का एलान किया था और उसने अपने कानों से सुना था और इसी तरह रोज़े तबूक भी मौजूद था जब हज़रत ने ऐलान किया था के अली (अ0) का मरतबा वही है जो हारून का मूसा के साथ है और उसे मालूम था के हुज़ूर ने अली (अ0) की सुलह को अपनी सुलह और उनकी जंग को अपनी जंग क़रार दिया है, मगर इसके बावजूद उसकी सेहत पर कोई असर नहीं हुआ के इसका रास्ता उसकी फूफी उम्मे हबील और उसके मामू ख़ालिद बिन वलीद जैसे अफ़राद का था जिनके दिल व दिमाग़ में न इस्लाम दाखि़ल हुआ था और न दाखि़ल होने का कोई इमकान था।-)))


लेहाज़ा ‘ाुबह और उसके दसीसेकारी पर मुश्तमिल होने से डरो के फ़ित्ना एक मुद्दत से अपने दामन फैलाए हुए है और उसकी तारीकी ने आंखों को अन्धा बना रखा है।
मेरे पास तुम्हारा वह ख़त आया है जिसमें तरह-तरह की बेजोड़ बातें पाई जाती हैं और उनसे किसी सुलह व आश्ती को तक़वीयत नहीं मिल सकती है और इसमें वह ख़ुराफ़ात हैं जिनके ताने-बाने न इल्म से तैयार हुए हैं और न हिल्म से, इस सिलसिले में तुम्हारी मिसाल उस ‘ाख़्स की है जिसका हुसूल मुश्किल है और जिसके निशानात गुम हो गए हैं और जहां तक उक़ाब परवाज़ नहीं कर सकता है और उसकी बलन्दी सिताराए उयूक़ से टक्कर ले रही है।


हाशा वकला यह कहां मुमकिन है के तुम मेरे इक़तेदार के बाद मुसलमानों के हल व उक़द के मालिक बन जाओ या मैं तुम्हें किसी एक ‘ाख़्स पर भी हुकूमत करने का परवाना या दस्तावेज़ दे दूं लेहाज़ा अभी ग़नीमत है के अपने नफ़्स का तदारूक करो और उसके बारे में ग़ौरो फ़िक्र करो के अगर तुमने उस वक़्त तक कोताही से काम लिया जब अल्लाह के बन्दे उठ खड़े हों तो ततुम्हारे सारे रास्ते बन्द हो जाएंगे और फिर इस बात का भी मौक़ा न दिया जाएगा जो आज क़ाबिले क़ुबूल है, वस्सलाम।


(((-माविया ने हज़रत से मुतालबा किया था के अगर उसे वलीअहदी का ओहदा दे दिया जाए तो वह बैअत करने के लिये तैयार है और फ़िर ख़ूने उस्मान कोई मसला न रह जाएगा। आपने बिलकुल वाज़ेह तौर पर इस मुतालबे को ठुकरा दिया है और माविया पर रौशन कर दिया है के मेरी हुकूमत में तेरे जैसे अफ़राद की कोई जगह नहीं है और तूने जिस मक़ाम का इरादा किया है वह तेरी परवाज़ से बहुत बलन्द है और वहां तक जाना तेरे इमकान में नहीं है। बेहतर यह है के अपनी औक़ात का इदराक कर ले और राहे रास्त पर आ जाए।-)))



66-आपका मकतूबे गिरामी
(अब्दुल्लाह बिन अब्बास के नाम, जिसका तज़किरा पहले भी दूसरे अलफ़ाज़ में हो चुका है)


अम्माबाद! इन्सान कभी-कभी ऐसी चीज़ को पाकर भी ख़ुश नहीं होता है जो जाने वाली नहीं थी और ऐसी चीज़ को खोकर भी रन्जीदा हो जाता है जो मिलने वाली नहीं थी लेहाज़ा ख़बरदार तुम्हारे लिये दुनिया की सबसे बड़ी नेमत किसी लज़्ज़त का हुसूल या जज़्बाए इन्तेक़ाम ही न बन जाए बल्कि बेहतरीन नेमत बातिल के मिटाने और हक़ के ज़िन्दा करने को समझो और  तुम्हारा सुरूर उन आमाल से हो जिन्हें पहले भेज दिया है और तुम्हारा अफ़सोस उन उमूर पर हो जिसे छोड़कर चले गए हो और तमामतर फ़िक्र मौत के बाद के मरहले के बारे में होनी चाहिये।



67-आपका मकतूबे गिरामी
(मक्के के आमिल क़ुसम बिन अलअबास के नाम)


अम्माबाद! लोगों के लिये हज के क़याम का इन्तेज़ार करो और उन्हें अल्लाह के यादगार दिनों को याद दिलाओ, सुबह व ‘ााम उमूमी जलसे रखो, सवाल करने वालों के सवालात के जवाबात दो, जाहिल को इल्म दो और ओलमा से तज़किरा करो, लोगों तक तुम्हारा कोई तर्जुमान तुम्हारी ज़बान के अलावा न हो और तुम्हारा काई दरबान तुम्हारे चेहरे के अलावा न हो, किसी ज़रूरतमन्द को मुलाक़ात से मत रोकना के अगर पहली ही मरतबा उसे वापस कर दिया गया तो उसके बाद काम कर भी दोगे तो तुम्हारी तारीफ़ न होगी, जो अमवाल  तुम्हारे पास जमा हो जाएं उन पर नज़र रखो और तुम्हारे यहां जो अयालदार और भूके प्यासे लोग हैं उन पर सर्फ़ कर दो बशर्ते के उन्हें वाक़ई मोहताजों और ज़रूरतमन्दों तक पहुंचा दो और उसके बाद जो बच जाए वह मेरे पास भेज दो ताके यहाँ के मोहताजों पर तक़सीम कर दिया जाए।
अहले मक्का से कहो के ख़बरदार मकानात का किराया न लें के परवरदिगार ने मक्के को मुक़ीम और मुसाफ़िर दोनों के लिये बराबर क़रार दिया है। (आकिफ़ मुक़ीम को कहा जाता है और यादी जो बाहर से हज करने के लिये आता है) अल्लाह हमें और तुम्हें अपपने पसन्दीदा आमाल की तौफ़ीक़ दे, वस्सलाम।
 

(((-खुली हुई बात है के यह अम्रे वजूबी नहीं है और सिर्फ़ इस्तेहबाबी और एहतेरामी है वरना हज़रत (अ0) ने जिस आयते करीमा से इस्तेदलाल फ़रमाया है उसका ताल्लुक़ मस्जिदुल हराम से है, सारे मक्के से नहीं है और मक्के को मस्जिदुल हरामम मिजाज़न कहा जाता है जिस तरह के आयते मेराज में जनाबे उम हानी के मकान को मस्जिदुल हराम क़रार दिया गया है वैसे यह मसला ओलमाए इस्लाम में इख़्तेलाफ़ी हैसियत रखता है और अबू हनीफ़ा ने सारे मक्के के मकानात को किराये पर देने को हराम क़रार दिया है और इसकी दलील अब्दुल्लाह बिन अम्रो बिनअल आस की रिवायत को क़रार दिया गया है जो ओलमाए शिया के नज़दीक क़तअन मोतबर नहीं है और हैरत अंगेज़ बात यह है के जो अहले मक्का अपने को हनफ़ी कहने में फ़ख़्र महसूस करते हैं वह भी अय्यामे हज के दौरान दुगना चैगना बल्कि दस गुना किरायाा वसूल करने ही को इस्लाम व हरमे इलाही की खि़दमत तसव्वुर करते हैं, और हज्जाजे कराम को ‘‘ज़यूफ़ल रहमान’’ क़रार देकर उन्हें ‘‘अर्ज़ुल रहमान’’ पर क़याम करने का हक़ नहीं देते हैं।-)))



68-आपका मकतूबे गिरामी
(जनाबे सलमान फ़ारसी के नाम-अपने दौरे खि़लाफ़त से पहले)


अम्माबाद! इस दुनिया की मिसाल सिर्फ़ सांप जैसी है जो छूने में इन्तेहाई नर्म होता है लेकिन इसका ज़हर इन्तेहाई क़ातिल होता है, इसमें जो चीज़ अच्छी लगे उससे भी किनाराकशी करो के इसमें से साथ जाने वाला बहुत कम है, इसके हम्म व ग़म को अपने से दूर रखो के इससे जुदा होना यक़ीनी है और इसके हालात बदलते ही रहते हैं। इससे जिस वक़्त ज़्यादा इन्स महसूस करो उस वक़्त ज़्यादा होशियार रहो के इसका साथी जब भी किसी ख़ुशी की तरफ़ से मुतमईन होता है यह उसे किसी नाख़ुशगवार के हवाले कर देती है और उन्स से निकाल कर वहशत के हालात तक पहुंचा देती है, वस्सलाम।