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Nahjul Balagha Hindi Khat 6-24 नहजुल बलाग़ा हिन्दी 6-24 ख़त

मकतूब-6
माविया के नाम


देख मेरी बैअत उसी क़ौम ने की है जिसने अबूबकर व उमर व उस्मान की बैअत की थी और उसी तरह की है जिस तरह उनकी बैअत की थी, के न किसी हाज़िर को नज़रेसानी का हक़ था और न किसी ग़ायब को रद कर देने का इख़्तेयार था।
‘ाूरा का इख़्तेयार भी सिर्फ महाजेरीन व अन्सार को होता है लेहाज़ा वह किसी ‘ाख़्स पर इत्तेफ़ाक़ कर लें और उसे इमाम नामज़द कर दे ंतो गोया के इसी में रिज़ाए इलाही है और अगर कोई ‘ाख़्स तन्क़ीद करके या बिदअत की बुनियाद पर इस अम्र से बाहर निकल जाए तो लोगों का फ़र्ज़ है के इसे वापस दे दें और अगर इन्कार कर दे तो उससे जंग करें के इसने मोमेनीन के रास्ते से हट कर राह निकाली है और अल्लाह भी उसे उधर ही फेर देगा जिधर वह फिर गया है।
 

माविया! मेरी जान की क़सम, अगर तू ख़्वाहिशात को छोड़कर अक़्ल की निगाहों में देखोगा तो मुझे सबसे ज़्यादा ख़ूने उस्मान से में इस सिलसिले मसले से पाक दामन (बरी) पाएगा और तुझे मालूम हो जाएगा के मैं इस मसले से बिल्कुल अलग थलग था। मगर यह के तू हक़ाएक़ की परदा पोशी करके इल्ज़ाम ही लगाना चाहे तो तुझे मुकम्मल इख़्तेयार है, (यह गुजिश्ता बैअतों की सूरते हाल की तरफ़ इशारा है वरना इस्लाम में खि़लाफ़त ‘ाूरा से तै नहीं होती है-- जवादी)
 


मकतूब - 7
 

अम्माबाद! मेरे पास तेरी बेजोड़ नसीहतों का मजमुआ और तेरा ख़ूबसूरत सजाया बनाया हुआ ख़त वारिद हुआ है जिसे तेरे गुमराही के क़लम ने लिखा है और इस पर तेरी बेअक़्ली ने इमज़ा किया है, यह एक ऐसे ‘ाख़्स का ख़त है जिसके पास न हिदायत देने वाली बसीरत है और न रास्ता बताने वाली क़यादत, उसे ख़्वाहिशात ने पुकारा तो उसने लब्बैक कह दी और गुमराही ने खींचा तो उसके पीछे चल पड़ा और इसके नतीजे में औल-फ़ौल बकने लगा और रास्ता भूलकर गुमराह हो गया।
देख यह बैअत एक मरतबा होती है जिसके बाद न किसी को नज़रे सानी का हक़ होता है और न दोबारा इख़्तेयार करने का। इससे बाहर निकल जाने वाला इस्लामी निज़ाम पर मोतरज़ ‘ाुमार किया जाता है और इसमें सोच विचार करने वाला मुनाफ़िक़ कहा जाता है।
 

(((-अब्बास महमूद एक़ाद ने अबक़रीतुल इमाम (अ0) में इस हक़ीक़त का एलान किया है के ख़ूने उस्मान की तमामतर ज़िम्मेदारी ख़ुद माविया पर है के वह उनका तहफ़्फ़ुज़ करना चाहता तो उसके पास तमामतर इमकानात मौजूद थे, वह ‘ााम का हाकिम था और उसके पास एक अज़ीमतरीन फ़ौज मौजूद थी जिससे  किसी तरह का काम लिया जा सकता था।
इमाम अली (अ0) की यह हैसियत नहीं थी - आप पर दोनों तरफ़ से दबाव पड़ रहा था, इन्क़ेलाबियों का ख़याल था के अगर आप बैअत क़ुबूल कर लें तो उस्मान को ब-आसानी माज़ूल किया जा सकता है और उस्मान का ख़याल था के आप चाहें तो इन्क़ेलाबियों को हटाकर मेरे मन्सब का तहफ़्फ़ुज़ कर सकते हैं और मेरी जान बचा सकते हैं। ऐसे हालात में हज़रत ने जिस ईमानी फ़रासत और इरफ़ानी हिकमत का मुज़ाहिरा किया है उससे ज़्यादा किसी फ़र्दे बशर के इमकान में नहीं था।-)))
 


मकतूब-8
(जरीर बिन अब्दुल्लाह बजली के नाम जब उन्हें माविया की फ़हमाइश के लिये रवाना फ़रमाया)
 

अम्माबाद- जब तुम्हें यह मेरा ख़त मिल जाए तो माविया से हतमी फ़ैसले का मुतालेबा कर देना (उसे दो टूक फ़ैसले पर आमादा करो, और उसे किसी आखि़री और क़तई राय का पाबन्द बनाओ और दो बातों में से किसी एक के इख़्तेयार करने पर मजबूर करो), के घर से बेघर कर देने वाली जंग या रूसवा करने वाली सुलह, अगर वह जंग को इख़्तेयार करे तो तमाम ताल्लुक़ात और गफ़्त व ‘ानीद ख़तम कर दो और अगर सुलह चाहे तो उससे बैअत ले लो।
 


मकतूब - 9
(माविया के नाम)


हमारी क़ौम (क़ुरैश) का इरादा था के हमारे पैग़म्बर (स0) को क़त्ल कर दे और हमें जड़ से उखाड़ कर फेंक दे, उन्होंने हमारे बारे में रंजो ग़म के असबाब फ़राहम किये और हमसे तरह-तरह के बरताव किये, हमें राहत व आराम से रोक दिया और हमारे लिये मुख़्तलिफ़ क़िस्म के हौफ़ का इन्तेज़ाम किया। कभी हमें नाहमवार पहाड़ों में पनाह लेने पर मजबूर किया और कभी हमारे लिये जंग की आग भड़का दी, लेकिन परवरदिगार ने हमें ताक़त दी के हम उनके दीन की हिफ़ाज़त करें और उनकी हुरमत से हर तरह से दिफ़ाअ करें। हममें साहेबे ईमान अज्रे आखि़रत के तलबगार थे और कुफ़्फ़ार अपनी अस्ल की हिमायत कर रहे थे। क़ुरैश में जो लोग मुसलमान हो गए थे वह इन मुश्किलात से आज़ाद थे या इसलिये के उन्होंने कोई हिफ़ाज़ती मुआहेदा कर लिया था या उनके पास क़बीला था जो उनके सामने खड़ा हो जाता था और वह क़त्ल से महफ़ूज़ रहते थे।
और रसूले अकरम (स0) का यह आलम था के जब जंग के ‘ाोले भड़क उठते थे और लोग पीछे हटने लगते थे तो आप अपने अहलेबैत (अ0) को आगे बढ़ा देते थे और वह अपने को सिपर बनाकर असहाब को तलवार और नैज़ों की गरमी से महफ़ूज़ रखते थे। चुनांचे बद्र के दिन जनाबे उबैदा बिन अलहारिस मार दिये गए, ओहद के दिन हमज़ा ‘ाहीद हुए और मौतह में जाफ़र काम आ गए। एक ‘ाख़्स ने जिसका नाम मैं बता सकता हूँ उन्हीं लोगाों जैसी ‘ाहादत का क़स्द किया था लेकिन उन सब की मौत जल्दी आ गई और उसकी मौत पीछे टाल दी गई।
 

किस क़द्र ताज्जुबख़ेज़ है जमाने का यह हाल के मेरा मुक़ाबला ऐसे अफराद से होता है जो कभी मेरे साथ क़दम मिलाकर नहीं चले और न इस दीन में उनका कोई कारनामा है जो मुझसे मवाज़ना किया जा सके मगर यह के कोई मुद्दई किसी ऐसे ‘ारफ़ का दावा करे जिसको न मैं जानता हूँ या ‘‘‘ाायद‘‘ ख़ुदा ही जानता है (यानी कुछ हो तो वह जाने) मगर हर हाल में ख़ुदा का ‘ाुक्र है।
रह गया तुम्हारा यह मुतालेबा के मैं क़ातिलाने उस्मान को तुम्हारे हवाले कर दूं तो मैंने इस मसले में काफ़ी ग़ौर किया है। मेरे इमकान में उन्हें तुम्हारे हवाले करना है और न किसी और के, मेरी जान की क़सम अगर तुम अपनी गुमराही और अदावत से बाज़ न आए तो अनक़रीब उन्हें देखोगे के वह ख़ुद तुम्हें ढूंढ लेंगे और इस बात की ज़हमत न देंगे के तुम उन्हें ख़ुश्की या तरी, पहाड़ या सहरा में तलाश करो, अलबत्ता यह तलब होगी के जिसका हुसूल तुम्हारे लिये बाइसे मसर्रत न होगा (नागवारी का बाएस होगा) और वह मुलाक़ात होगी जिससे किसी तरह की ख़ुशी न होगी और सलाम उसके अहल पर।
 

(((-क़ुरैश की ज़िन्दगी का सारा इन्तेज़ाम क़बाइली बुनियादों पर चल रहा था और हर क़बीले को कोई न कोई हैसियत हासिल थी लेकिन इस्लाम के आने के बाद इन तमाम हैसियतों का ख़ातेमा हो गया और इसके नतीजे में सबने इस्लाम के खि़लाफ़ इत्तेहाद कर लिया और मुख़्तलिफ़ मारके भी सामने आ गए लेकिन परवरदिगारे आलम ने रसूले अकरम (स0) के घराने  के ज़रिये अपने दीन को बचा लिया और इसमें कोई क़बीला भी इनका ‘ारीक नहीं है और न किसी को यह ‘ारफ़ हासिल है, न किसी क़बीले में कोई अबूतालिब जैसा मुहाफ़िज़ पैदा हुआ है और न उबैदा जैसा मुजाहिद, न किसी क़बीले ने हमज़ा जैसा सय्यदुश ‘ाोहदा पैदा किया है और न जाफ़र जैसा तय्यार यह सिर्फ़ बनी हाशिम का ‘ारफ़ है और इस्लाम की गरदन पर उनके अलावा किसी का कोई एहसान नहीं है।-)))
 


मकतूब-10
(माविया ही के नाम)
 

 तुम उस वक़्त क्या करोगे जब दुनिया के यह लिबास जिनमें लिपटे हुए हो तुमसे उतर जाएंगे, यह दुनिया जो अपनी सज-धज की झलक दिखाती और अपने हज़ व कैफ़ से वरग़लाती है जिसने तुम्हें पुकारा तो तुमने लब्बैक कही, उसने तुम्हें खींचा तो तुम उसके पीछे हो लिये और उसने तुम्हें हुक्म दिया तो तुमने उसकी पैरवी की, वह वक़्त दूर नही ंके बताने वाला तुम्हें उन चीज़ों से आगाह करे के जिनसे कोई सिपर तुम्हें बचा न सकेगी, लेहाज़ा मुनासिब है के इस दावे से बाज़ आ जाओ और हिसाब व किताब का सामान तैयार कर लो, आने वाली मुसीबतों के लिये आरास्ता (तैयार) हो जाओ और गुमराहों को अपनी समाअत पर हावी न बनाओ वरना ऐसा न किया तो मैं तुम्हें इन तमाम चीज़ों से बाख़बर कर दूंगा जिनसे तुम ग़ाफ़िल हो, तुम ऐश व इशरत के दिलदादह हो ‘ौतान ने तुम्हें अपनी गिरफ़्त में ले लिया है और अपनी उम्मीदों को हासिल कर लिया है और तुम्हारे रग व पै में रूह और ख़ून की तरह सरायत कर गया है।
 

माविया! आखि़र तुम लोग कब रिआया की निगरानी के क़ाबिल और उम्मत के मसाएल के वाली थे जबके तुम्हारे पास न कोई साबेक़ा ‘ारफ़ था और न कोई बलन्द व बाला इज़्ज़त हम अल्लाह से तमाम दीरीना बदबख़्ितयों से पनाह मांगते हैं और तुम्हें बाख़बर करते हैं के ख़बरदार उम्मीदों के धोखे में और ज़ाहिर व बातिन के इख़्तेलाफ़ में मुब्तिला होकर गुमराही में दूर तक मत चले जाओ।
तुमने मुझे जंग की दावत दी है तो बेहतर यह है के लोगों को अलग कर दो और बज़ाते ख़ुद मैदान में आ जाओ, फ़रीक़ैन को जंग से माफ़ कर दो और हम तुम बराहे रास्त मुक़ाबला कर लें ताके तुम्हें मालूम हो जाए के किस के दिल पर रंग लग गया है और किस की आंखों पर परदे पड़े हुए हैं।
मैं वही अबुलहसन हूँ जिसने रोज़्रे बद्र तुम्हारे नाना (उतबा) मामू (वलीद बिन उतबा) और भाई हन्ज़ला का सर तोड़कर ख़ात्मा कर दिया है।
 

(((-इस मुक़ाम पर सियासत से मुराद सियासते आदिला और आयते कामेला है के इस काम का अन्जाम देना हर कस व नाकस के बस का नहीं है वरना सियासत से मक्कारी, दग़ाबाज़ी और ग़द्दारी मुराद ली जाए तो बनी उमय्या हमेशा से सियासत के मुराद थे और अबू सुफ़यान ने हर महाज़ पर इस्लाम के खि़लाफ़ लश्करकशी की है और इस राह में किसी भी मौक़े को नज़र अन्दाज़ नहीं किया है। कभी मैदानों में मुक़ाबला किया है और कभी बैअत करके इस्लाम का सफ़ाया किया है।
हज़रत का यह वह मुतालेबा था जिसकी अम्र व आस ने भी ताईद कर दी थी लेकिन माविया फ़ौरन ताड़ गया और उसने कहा के तू खि़लाफ़त का उम्मीदवार दिखाई दे रहा है और फिर मैदान का रूख़ करने का इरादा भी नहीं किया के अली की तलवार से बच कर निकल जाना मुहालात में से है।-)))
 

अभी वह तलवार मेरे पास है और मैं उसी हिम्म्मते क़ल्ब के साथ दुश्मन का मुक़ाबला करूंगा,  मैंने न दीन तब्दील किया है और न नया नबी खड़ा किया है और मैं बिला ‘ाुबह उसी ‘ााहेराह पर हूँ जिसे तुमने अपने इख़्तेयार से  छोड़ रखा था और फिर ब-मजबूरी इसमें दाखि़ल हुए और तुम ऐसा ज़ाहिर करते हो के तुम ख़ूने उस्मान का बदला लेने को उठे हो हालांके तुम्हें अच्छी तरह मालूम है के उनका ख़ून किसके सर है, अगर वाक़ई बदला ही लेना मन्ज़ूर है तो उन्हंीं से लो।
मुझे तो  यह मन्ज़र नज़र आ रहा है के जंग तुम्हें दांतों से काट रही है और तुम इस तरह फ़रयाद कर रहे हो जिस तरह  ऊंट भारी बोझ से बिलबिलाने लगते हैं और तुम्हारी जमाअत मुसलसल तलवार की ज़र्ब और मौत की गर्म बाज़ारी और क़ज़ा और कश्तों के पुश्ते लग जाने की बिना पर मुझे किताबे ख़ुदा की  तरफ़ दावत दे रही होगी, हालांके वह ऐसे लोग हैं जो काफ़िर और हक़ के मुनकिर हैं या बैअत के बाद उसे तोड़ देने वाले हैं।
 


मकतूब-11
(दुश्मन की तरफ़ भेजे हुए एक लश्कर को यह हिदायतें फ़रमाईं)
 

जब तुम दुश्मन की तरफ़ बढ़ो या दुश्मन तुम्हारी तरफ़ बढ़े तो तुम्हारा पड़ाव टीलों के आगे या पहाड़ के दामन में या नहरों के मोड़ में होना चाहिये ताके यह चीज़ तुम्हारे लिये पुश्त पनाही और रोक का काम दे और जंग बस एक तरफ़ या (ज़ाएद से ज़ाएद दो तरफ़ से हो) और पहाड़ों की चोटियों और टीलों की  बलन्द सतहों पर दीदबानों को बिठा दो ताके दुश्मन किसी खटके की जगह से या इत्मीनान वाली जगह से (अचानक) न आ पड़े और उसको जाने रहो के फ़ौज का हर अव्वल दस्ता फ़ौज का ख़बर रसाँ होता है और हर अव्वल दस्ते को इत्तेलाआत उन मुख़बिरों से हासिल होती है  (लोग आगे बढ़ कर सुराग़ लगाते हैं) देखो तितर-बितर होने से बचे रहो, उतरो तो एक साथ उतरो, और कूच करो तो एक साथ करो और जब रात तुम पर छा जाए तो नैज़ों को (अपने गिर्द) गाड़कर एक  दाएरा सा बना लो और सिर्फ़ ऊंघ लेने और एक-आध झपकी ले  लेने के सिवा नीन्द का मज़ा न चखो।
 


12- आपकी नसीहत
(जो माक़ल बिन क़ैस रियाही को उस वक़्त फ़रमाई है जब उन्हें तीन हज़ार का लश्कर देकर ‘ााम की तरफ़ रवाना फ़रमाया है)


उस अल्लाह से डरते रहना जिसकी बारगाह में बहरहाल हाज़िर होना है और जिसके अलावा कोई आखि़री मन्ज़िल नहीं है, जंग उसी से करना जो तुमसे जंग करे, ठण्डे औक़ात में सुबह व ‘ााम सफ़र करना और गरमी के वक़्त में क़ाफ़िले को रोक कर लोगों को आराम करने देना।
 

(((-यह वह हिदायात हैं जो हर दौर में काम आने वाली हैं और क़ाएदे  इस्लाम का फ़र्ज़ है के जिस दौर में जिस तरह का मैदान और जिस तरह के असलहे हों उन सब की तन्ज़ीम इन्हीं उसूलों की बुनियाद पर करे जिनकी तरफ़ अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने दौरे नैज़ा व ‘ामशीर में इशारा फ़रमाया है।  हालात और असलहों के बदल जाने से उसूले हर्ब व ज़र्ब और क़वानीने जेहाद व क़ेताल में फ़र्क़ नहीं हो सकता है-)))
 

आहिस्ता सफ़र करना और अव्वले ‘ाब में सफ़र मत करना के परवरदिगार ने रात को सुकून के  लिये बनाया है और उसे  क़याम के लिये क़रार दिया है, सफ़र के लिये नहीं, लेहाज़ा रात में अपने बदन को आराम देना और अपनी सवारी के लिये सूकून फ़राहम करना, उसके बाद जब देख लेना के सहर तुलूअ हो रही है और सुबह रौशन हो रही है तो बरकते ख़ुदा के सहारे उठ खड़े होना और जब दुश्मन का सामना हो जाए तो अपने असहाब के दरम्यान ठहरना और न दुश्मन से इस क़दर क़रीब हो जाना के जैसे जंग छेड़ना चाहते हो और न इस क़द्र दूर हो जाना के जैसे जंग से ख़ौफ़ज़दा हो, यहां तक के मेरा हुक्म आ जाए और देखो ख़बरदार दुश्मन की दुश्मनी तुम्हें इस बात पर आमादा न कर दे के उसे हक़ की दावत देने और हुज्जत तमाम करने से पहले जंग का आग़ाज़ कर दो।
 


13-आपकी नसीहत


मैंने तुम पर और तुम्हारे मातहत लश्कर पर मालिक बिन अलहारिस अल अ‘ातर को सरदार क़रार दे दिया है लेहाज़ा उनकी बातों पर तवज्जोह देना और उनकी इताअत करना और उन्हीं को अपनी ज़िरह और सिपर क़रार देना के मालिक उन लोगों में हैं जिनकी कमज़ोरी और लग़्िज़श का कोई ख़तरा नहीं है और न वह इस मौक़े पर सुस्ती कर सकते हैं जहां तेज़ी ज़्यादा मुनासिब हो, और न वहां तेज़ी कर सकते हैं जहां सुस्स्ती उमदा क़रीने अक़्ल हो।


(((-यह सारी हिदायात माक़ल  बिन क़ैस के बारे में हैं जिन्हें  आपने तीन हज़ार अफ़राद का सरदारे लश्कर बनाकर भेजा था और ऐसे हिदायात से मसलेह फ़रमा दिया था जो सुबहे क़यामत तक काम आने वाली हों और हर दौर का इन्सान उनसे इस्तेफ़ाज़ा कर सके।
मालिके अश्तर उन लोगों में हैं जिन्होंने अबूज़र के ग़ुस्ल व कफ़न का इन्तेज़ाम किया था जिनके  बारे में रसूले अकरम (स0) ने फ़रमाया था के मेरा एक सहाबी आलमे ग़ुरबत में इन्तेक़ाल करेगा और साहेबाने ईमान की एक जमाअत इसकी तजहीज़ व तकफ़ीन का इन्तेज़ाम करेगी।-)))


हिदायत - 14
(अपने लश्कर के नाम सिफ़्फ़ीन की जंग के आग़ाज़ से पहले)


ख़बरदार! उस वक़्त तक जंग ‘ाुरू न करना जब तक वह लोग पहल न कर दें के तुम बेहम्दे अल्लाह अपनी दलील रखते हो और उन्हें उस वक़्त तक का मौक़ा देना जब तक पहल न कर दें, एक दूसरी हुज्जत हो जाए, इसके बाद जब हुक्मे ख़ुदा से दुश्मन को शिकस्त हो जाए तो किसी भागने वाले को क़त्ल न करना और किसी आजिज़ को हलाक न करना और किसी ज़ख़्मी पर क़ातिलाना हमला न करना और औरतों को अज़ीयत मत देना चाहे वह तुम्हें गालियां ही क्यों न दें और तुम्हारे हुकाम को बुरा भला ही क्यों न कहें के यह क़ूवते नफ़्स और अक़्ल के एतबार से कमज़ोर हैं और हम पैग़म्बर (स0) के ज़माने में भी उनके बारे में हाथ रोक लेने पर मामूर थे। जबके वह मुशरिक थीं और उस वक़्त भी अगर कोई ‘ाख़्स औरतों से पत्थर या लकड़ी के ज़रिये तारज़ करता था तो उसे और उसकी नस्लों को मतऊन किया जाता था।
 

(((-यह दलील सूरए हिजरात की आयत नम्बर 9 है जिसमें बाग़ी से क़ेताल का हुक्म दिया गया है और इसमें कोई ‘ाक नहीं है के माविया और उसकी जमाअत बाग़ी थी जिसकी तसदीक़ जनाबे अम्मारे यासिर की ‘ाहादत से हो गई, जिनके क़ातिल को सरकारे दो आलम (स0) ने बाग़ी क़रार दिया था-)))
 


15-आपकी दुआ
(जिसे दुश्मन के मुक़ाबले के वक़्त दोहराया करते थे)


ख़ुदाया तेरी ही तरफ़ दिल खिंच रहे हैं और गर्दनें उठी हुई हैं और आंखें लगी हुई हैं और क़दम आगे बढ़ रहे हैं और बदन लाग़र हो चुके हैं।
ख़ुदाया छिपे हुए कीने सामने आ गए हैं और अदावतों की देगें जोश खाने लगी हैं।
ख़ुदाया हम तेरी बारगाह में अपने रसूल की ग़ैबत और दुश्मनों की कसरत की और ख़्वाहिशात के तफ़रिक़े की फ़रयाद कर रहे हैं। ख़ुदाया हमारे और दुश्मनों के दरम्यान हक़ के साथ फ़ैसला कर दे के तू बेहतरीन फ़ैसला करने वाला है।


16- आपका इरशादे गिरामी
(जो जंग के वक़्त अपने असहाब से फ़रमाया करते थे)


ख़बरदार तुम पर वह फ़रार गराँ न गुज़रे जिसके बाद हमला करने का इमकान हो और वह पसपाई परेशान कुन न हो जिसके बाद दोबारा वापसी का इमकान हो, तलवारों को उनका हक़ दे दो और पहलू के भल गिरने वाले दुश्मनों के लिये मक़तल तैयार रखो, अपने नफ़्स को ‘ादीद नैज़ाबाज़ी और सख़्त तरीन ‘ामशीरज़नी के लिये आमादा रखो और आवाज़ों को मुर्दा बना दो के इससे कमज़ोरी दूर हो जाती है, क़सम है उस ज़ात की जिसने दाने को शिगाफ़ता किया है और जानदार चीज़ों को पैदा किया है के यह लोग इस्लाम नहीं लाए हैं बल्कि हालात के सामने सिपर अन्दाख़्ता हो गए हैं और अपने कुफ्ऱ को छिपाए हुए हैं और जैसे ही मददगार मिल गए वैसे ही इज़हार कर दिया।
 

(((-इसमें कोई ‘ाक नहीं के मैदाने जंग में ऐसे हालात आ जाते हैं जब सिपाही को अपनी जगह छोड़ना पड़ती है और एक तरह से फ़रार का रास्ता इख़्तेयार करना पड़ता है, लेकिन इसमें कोई इश्काल नहीं है बशर्ते के हौसलाए जेहाद बरक़रार रहे और जज़्बाए क़ुरबानी में फ़र्क़ न आए।
मैदाने ओहद का सबसे बड़ा ऐब यही था के ‘‘सहाबाए कराम’’ जज़्बाए क़ुरबानी से आरी हो गए थे और रसूले अकरम (स0) के पुकारने के बावजूद पलट कर आने के लिये तैयार न थे ऐसी सूरते हाल यक़ीनन इस क़ाबिल है के उसकी मज़म्मत की जाए और यह नंग व आर नस्लों में बाक़ी रह जाए वरना फ़रार के बाद हमला या पस्पाई के बाद वापसी कोई ऐसी बात नहीं है जिस पर मज़म्मत या मलामत की जाए।-)))
 


17-आपका मकतूबे गिरामी
(माविया के नाम उसके एक ख़त के जवाब में)


तुम्हारा यह मुतालबा के मैं ‘ााम का इलाक़ा तुम्हारे हवाले कर दूँ, तो जिस चीज़ से कल इनकार कर चुका हूँ वह आज अता नहीं कर सकता हूं और तुम्हारा यह कहना के जंग ने अरब का ख़ातेमा कर दिया है और चन्द एक अफ़राद के अलावा कुछ नहीं बाक़ी रह गया है तो याद रखो के जिसका ख़ात्मा हक़ पर हुआ है उसका अन्जाम जन्नत है और जिसे बातिल खा गया है उसका अन्जाम जहन्नम है।
रह गया हम दोनों का जंग और ‘ाख़्िसयात के बारे में बराबर होना, तो तुम ‘ाक में इस तरह तेज़ रफ़्तारी से काम नहीं कर सकते हो जितना मैं यक़ीन में कर सकता हूँ और अहले ‘ााम दुनिया के बारे में इतने हरीस नहीं हैं जिस क़द्र अहले इराक़ आखि़रत के बारे में फ़िक्रमन्द हैं।
 

और तुम्हारा यह कहना के हम सब अब्दे मुनाफ़ की औलाद हैं तो यह बात सही है लेकिन न उमय्या हाशिम जैसा हो सकता है और न हर्ब अब्दुलमुत्तलिब जैसा, न अबू सुफ़ियान अबूतालिब का हमसर हो सकता है और न राहे ख़ुदा में हिजरत करने वाला आज़ाद कर्दा अफ़राद जैसा। न वाज़ेह नसब वाले का क़यास ‘ाजरे से चिपकाए जाने वाले पर हो सकता है और न हक़दार को बातिल नवाज़ जैसा क़रार दिया जा सकता है। मोमिन कभी मुनाफ़िक़ के बराबर नहीं रखा जा सकता है, बदतरीन औलाद तो वह है जो इस सल्फ़ के नक़्शे क़दम पर चले जो जहन्नम में गिर चुका है।
इसके बाद हमारे हाथों में नबूवत का ‘ारफ़ है जिसके ज़रिये हमने बातिल के इज़्ज़तदारों को ज़लील बनाया है और हक़ के कमज़ोरों को ऊपर उठाया है और जब परवरदिगार ने अरब को अपने दीन में फ़ौज दर फ़ौज दाखि़ल किया है और यह क़ौम बख़ुशी या ब-कराहत (नाख़ुशी से) मुसलमान हुई है तो तुम उन्हें दीन के दायरे में दाखि़ल होने वालों में थे या ब-रग़बत (लालच से) या ब-ख़ौफ़ जबके सबक़त हासिल करने वाले सबक़त हासिल कर चुके थे और मुहाजेरीन अव्वलीन अपनी फ़ज़ीलत पा चुके थे, देखो ख़बरदार ‘ौतान को अपनी ज़िन्दगी का हिस्सेदार मत बनाओ और उसे अपने नफ़्स पर राह मत दो, वस्सलाम।
 

(((-माविया ने अपने ख़त में चार नुक्ते उठाए थे और हज़रत ने सबके अलग-अलग जवाबात दिये हैं और हक़ व बातिल का अबदी फ़ैसला कर दिया है और आखि़र में यह भी वाज़ेह कर दिया है के तमाम मुआमलात में मसावात फ़र्ज़ कर लेने के बाद भी ‘ारफ़े नबूवत का कोई मुक़ाबला नहीं हो सकता है जो परवरदिगार ने बनी हाशिम को अता किया है है और इसका बनी उमय्या से कोई ताल्लुक़ नहीं है। और ज़ाती किरदार के एतबार से भी बनी हाशिम इस्लाम की मन्ज़िल पर फ़ाएज़ थे और बनी उमय्या ने फतहे मक्का के मौक़े पर मजबूरन कलमा पढ़ लिया था और ज़ाहिर है के अस्तसलाम इस्लाम के मानिन्द नहीं हो सकता है-)))
 


18- हज़रत का मकतूबे गिरामी
(बसरा के आमिल अब्दुल्लाह बिन अब्बास के नाम)


याद रखो के यह बसरा इबलीस के उतरने और फ़ितनों के उभरने की जगह का नाम है लेहाज़ा यहाँ के लोगों के साथ अच्छा बरताव करना और उनके दिलों से ख़ौफ़ की गिरह खोल देना।
मुझे यह ख़बर मिली है के तुम बनी तमीम के साथ सख़्ती से पेश आते हो और उनसे सख़्त क़िस्म का बरताव करते हो तो याद रखो के बनी तमीम वह लोग हैं के जब उनका कोई सितारा डूबता है तो दूसरा उभर आता है, यह जंग के मामले में जाहेलीयत या इस्लाम कभी किसी से पीछे नहीं रहे हैं और फिर हमारा उनसे रिश्तेदारी और क़राबतदारी का ताल्लुक़ भी है के अगर हम इसका ख़याल रखेंगे तो अज्र पाएंगे अैर क़तअ ताल्लुक़ करेंगे तो गुनहगार होंगे, लेहाज़ा इब्ने अब्बास ख़ुदा तुम पर रहमत नाज़िल करे, उनके साथ अपनी ज़बान या हाथ पर जारी होने वाली अच्छाई या बुराई में सोच-समझ कर क़दम उठाना के हम दोनों इन ज़िम्मेदारियों में ‘ारीक हैं, और देखो तुम्हारे बारे में हमारा हुस्ने ज़न बरक़रार रहे और मेरी राय ग़लत न साबित होने पाए।
 


19- आपका मकतूबे गिरामी
(अपने बाज़ आमिल के नाम)


अम्माबाद! तुम्हारे ‘ाहर के ज़मीनदारों ने तुम्हारे बारे में सख़्ती, संगदिली, तहक़ीर व तज़लील और तशद्दुद की शिकायत की है और मैंने उनके बारे में ग़ौर कर लिया है, वह अपने शिर्क की बिना पर क़रीब करने के क़ाबिल तो नहीं हैं लेकिन अहद व पैमान की बिना पर उन्हें दूर भी नहीं किया जा सकता है और उन पर ज़्यादती भी नहीं की जा सकती है लेहाज़ा तुम नके बारे में ऐसी नरमी का ‘ाोआर इख़्तेयार करो जिसमें क़द्र से (कहीं-कहीं) सख़्ती भी ‘ाामिल हो और उनके साथ सख़्ती और नर्मी के दरम्यान का बरताव करो के कभी क़रीब कर लो, कभी दूर कर दो, कभी नज़दीक बुला लो और कभी अलग रखो, इन्शाअल्लाह।
 


20-आपका मकतूबे गिरामी


ज़ियाद बिन अबिया के नाम जो बसरा के आमिल अब्दुल्लाह बिन अब्बास का नायब हो गया था और इब्ने अब्बास बसरा और अहवाज़ के तमाम एतराफ़ के आमिल थे)
मैं अल्लाह की सच्ची क़सम खाकर कहता हूँ के अगर मुझे ख़बर मिल गई के तुमने मुसलमानों के माले ग़नीमत में छोटी या बड़ी क़सम की ख़यानत की है तो मैं तुम पर ऐसी सख़्ती करूंगा के तुम नादार, बोझिल पीठ वाले और बेनंग व नाम (बेआबरू) होकर रह जाओगे। वस्सलाम।
 

(((-वाज़ेह रहे के किसी का क़रीब कर लेना और है और उसके साथ आदिलाना और मुनसिफ़ाना बरताव करना और है, इस्लाम आदिलाना बरताव का हुक्म हर एक के बारे में देता है लेकिन क़ुरबत का जवाज़ सिर्फ़ साहिबाने ईमान व किरदार के लिये है) कुफ़्फ़ार व मुशरेकीन को तो उसने हरमे ख़ुदा से भी दूर कर दिया है और उनका दाखि़ला हुदूदे हरम में बन्द कर दिया है, यह और बात है के आज आलमे इस्लाम में कुफ़्फ़ार व मुशरेकीन ही क़रीब बनाए जाने के क़ाबिल हैं और कलमागो मुसलमान इस लाएक़ नहीं रह गए हैं और उनसे सुबह व ‘ााम सर्द जंग सिर्फ़ कुफ़्फ़ार व मुशरेकीन से क़ुरबत पैदा करने या बरक़रार रखने की बुनियाद पर की जा रही है, अल्लाह इस इस्लाम पर रहम करे और इस उम्मत को अक़्ले सलीम इनायत फ़रमाए।
वाज़ेह रहे के हज़रत इख़्तेयारी तौर पर किसी ऐसे ‘ाख़्स को ओहदा नहीं दे सकते हैं जिसका नसब मशकूक हो, यह काम इब्ने अब्बास ने ज़ाती तौर पर किया था, इसीलिये हज़रत ने नेहायत ही सख़्त लहजे में खि़ताब फ़रमाया है-)))


21-आपका मकतूबे गिरामी
(ज़ियाद इब्ने अबिया के नाम)


इसराफ़ को छोड़कर मयानारवी इख़्तेयार करो और आज के दिन कल को याद रखो, बक़द्रे ज़रूरत माल रोक कर बाक़ी रोज़े हाजत (मोहताजी के दिन) के लिये आगे बढ़ा दो (फ़ुज़ूल ख़र्ची से बाज़ आओ)।
क्या तुम्हारा ख़याल यह है के तुम मुतकब्बिरों में रहोगे और ख़ुदा तुम्हें मुतवाज़ेह अफ़राद जैसा अज्र देगा या तुम्हारे वास्ते सदक़ा व ख़ैरात करने वालों का सवाब लाज़िम क़रार देगा और तुम नेमतों में करवटें बदलते रहोगे, न किसी कमज़ोर का ख़याल करोगे और न किसी बेवा का जबके इन्सान को उसी का अज्र मिलता है जो उसने अन्जाम दिया है और वह उसी पर वारिद होता है जो उसने पहले भेज दिया है, वस्सलाम।


22-आपका मकतूबे गिरामी
(अब्दुल्लाह बिन अब्बास के नाम, जिसके बारे में ख़ुद इब्ने अब्बास का मक़ैला था के मैंने रसूले अकरम (स0) के बाद किसी कलाम से इस क़द्र इस्तेफ़ादा नहीं किया है जिस क़द्र इस कलाम से किया है)


अम्माबाद! कभी कभी ऐसा होता है के इन्सान उस चीज़ को पाकर भी ख़ुश हो जाता है जो उसके हाथ से जाने वाली नहीं थी और उस चीज़ के चले जाने से भी रन्जीदा हो जाता है जो उसे मिलने वाली नहीं थी लेहाज़ा तुम्हारा फ़र्ज़ है के उस आखि़रत पर ख़ुशी मनाओ जो हासिल हो जाए और उस पर अफ़सोस करो जो इसमें से हासिल न हो सके, दुनिया हासिल हो जाए तो इस पर ज़्यादा ख़ुशी का इज़हार न करो और हाथ से निकल जाए तो बेक़रार होकर अफ़सोस न करो, तुम्हारी तमामतर फ़िक्र मौत के बाद के बारे में होनी चाहिये।
 


23- आपका इरशादे गिरामी
(जिसे अपनी ‘ाहादत से पहले बतौर वसीयत फ़रमाया है)

तुम सबके लिये मेरी वसीयत यह है के ख़बरदार ख़ुदा के बारे में किसी तरह का शिर्क न करना और हज़रत मोहम्मद (स0) की सुन्नत को ज़ाया और बरबाद न करना इन दोनों को क़ायम रखो और इन दोनों पर चिराग़ों को रौशन रखो, इसके बाद किसी मज़म्मत का कोई अन्देशा नहीं है।
मैं कल तुम्हारे साथ था और आज तुम्हारे लिये इबरत बन गया हूँ और कल तुमसे जुदा हो जाऊंगा, इसके बाद मैं बाक़ी रह गया तो अपने ख़ून का साहबे इख़्तेयार मैं ख़ुद हूँ वरना अगर मेरी मुद्दते हयात पूरी हो गई तो मैं दुनिया से चला जाऊंगा। मैं अगर माफ़ कर दूँ तो यह मेरे लिये क़ुरबते इलाही का ज़रिया होगा और तुम्हारे हक़ में भी एक नेकी होगी लेहाज़ा तुम भी माफ़ कर देना ‘‘क्या तुम नहीं चाहते हो के अल्लाह तुम्हें बख़्श दे’’
ख़ुदा की क़सम यह अचानक मौत ऐसी नहीं है जिसे मैं नापसन्द करता हूँ और न ऐसा सानेहा है जिसे मैं बुरा समझता हूँ, मैं उस ‘ाख़्स के मानिन्द हूँ जो रात भर पानी की जुस्तजू में रहे और सुबह को चश्मे पर वारिद हो जाए और तलाश के बाद अपने मक़सद को पा ले और फ़िर ‘‘ख़ुदा की बारगाह में जो कुछ भी है वह नेक किरदारों के लिये बेहतर ही है।’’
सय्यद रज़ी- इस कलाम का एक हिस्सा पहले गुज़र चुका है लेकिन यहाँ कुछ इज़ाफ़ात थे लेहाज़ा मुनासिब मालूम हुआ के उसे दोबारा नक़्ल कर दिया जाए।
 

(((-वाज़ेह रहे के इस माफ़ी से मुराद दुनिया में इन्तेक़ाम न लेना है के क़ातिल के जुर्म की दो हैसियतें होती हैं- वह इन्सानी दुनिया में एक ख़ून का ज़िम्मेदार होता है जिसके नतीजे में क़सास का क़ानून सामने आता है और मज़हबी दुनिया में हुक्मे इलाही की मुख़ालेफ़त का मुजरिम होता है जिसका अन्जाम आतिशे जहन्नम है। दुनिया के क़सास व इन्तेक़ाम में फ़सादात के अन्देशे होते हैं और अदावतों के ‘ाोले मज़ीद भड़क उठते हैं लेकिन आखि़रत के अज़ाब में कोई ख़तरा नहीं होता है। इसलिये साहेबाने अक़्ल व दानिश यहाँ के इन्तेक़ाम को नज़रअन्दाज़ कर देते हैं ताके मज़ीद फ़साद न पैदा हो सके और इस बात से मुतमईन रहते हैं के मुजरिम के लिये अज़ाबे जहन्नम ही काफ़ी है और ख़ुदा से बेहतर इन्तेक़ाम लेने वाला कौन है?-)))


24- आपकी वसीयत
(अपने अमवाल के बारे में जिसे जंगे सिफ़्फ़ीन की वापसी पर तहरीर फ़रमाया है)


यह बन्दए ख़ुदा, अली बिन अबीतालिब (अ0) अमीरूलमोमेनीन का हुक्म है अपने अमवाल के बारे में जिसका मक़सद रिज़ाए परवरदिगार है ताके उसके ज़रिये जन्नत में दाखि़ल हो सके और रोज़े महशर के हौल से अमान पा सके।
इन अमवाल की निगरानी हसन (अ0) बिन अली करेंगे, बक़द्रे ज़रूरत इस्तेमाल करेंगे और बक़द्रे मुनासिब अनफ़ाक़ करेंगे। इसके बाद अगर उन्हें कोई हादसा पेश आ गया और हुसैन (अ0) बाक़ी रह गए तो ज़िम्मेदार वह होंगे और इसी अन्दाज़ पर काम करेंगे।
औलादे फ़ातेमा (अ0) का हक़ अली (अ0) के सदक़ात में वही है जो दीगर औलादे अली (अ0) का है, मैंने निगरानी का काम औलादे फ़ातेमा (अ0) को सिर्फ़ रिज़ाए इलाही और क़ुरबते पैग़म्बर (स0) के ख़याल से सौंप दिया है के इस तरह हज़रत की हुरमत का एहतेराम भी हो आएगा और आपकी क़राबत का एज़ाज़ भी बरक़रार रहेगा।
लेकिन इसके बाद भी वाली के लिये यह ‘ार्त है के माल की असल को बाक़ी रखे और सिर्फ़ इसके समरात को ख़र्च करे, वह भी उन राहों में जिनका हुक्म दिया गया है और जिनकी हिदायत दी गई है और ख़बरदार इस क़रिया के नख़लिस्तान में से एक पौदा भी फ़रोख़्त न करे यहां तक के वह ज़मीन में दोबारा बोने के लाएक़ न रह जाए।
मेरी वह कनीज़ें जिनसे मेरा ताल्लुक़ रह चुका है और उनकी औलाद भी मौजूद है या वह हामेला हैं, उनको उनकी औलाद के हिसाब से (बच्चे के हक़ में) रोक लिया जाए और उन्हीं का हिस्सा क़रार दे दिया जाए (वह उसके हिस्से में ‘ाुमार होगी)। इसके बाद अगर बच्चा मर जाए और कनीज़ ज़िन्दा रह जाए तो उसे आज़ाद कर दिया जाए के गोया इसकी ग़ुलामी ख़त्म हो चुकी है और आज़ादी हासिल हो चुकी है।
सय्यद रज़ी- इस वसीयत में हज़रत का इरशाद ‘‘वदिया भी फ़रोख़्त न किया जाए’’ इसमें वदिया से मुराद ख़ुर्मा के छोटे दरख़्त हैं जिसकी जमा वदी होती है और ‘‘हती तशकल अरज़हा ग़रासा’’ एक फ़सीहतरीन कलाम है जिसका मक़सद यह है के ज़मीन में खजूर की दरख़्तकारी इतनी ज़्यादा हो जाए के देखने वाला इसकी असल हैसियत का अन्दाज़ा न कर सके और इसके लिये मसलए मुश्तबा हो जाए के ‘ाायद यह कोई दूसरी ज़मीन है।
 

(((-मोअर्रेख़ीन के बयान के मुताबिक़ अमीरूलमोमेनीन (अ0) ने अपनी ज़िन्दगी में सिर्फ़ अरवाह व नुफ़ूस की सरज़मीनों को ज़िन्दा करने का काम अन्जाम नहीं दिया है, बल्कि माद्दी ज़मीनों में भी मुसलसल काम करते रहे हैं, ज़मीनों को क़ाबिले काश्त बनाया है, चश्मों को जारी किया है, दरख़्तों की सिंचाई की है और एक मज़दूर जैसी ज़िन्दगी गुज़ारी है और फिर अपनी सारी ज़हमतों और मेहनतों के नतीजे को राहे ख़ुदा में वक़्फ़ कर दिया है ताके बन्दगाने ख़ुदा इस्तेफ़ादा कर सकें और औलादे अली (अ0) भी सिर्फ़ बक़द्रे ज़रूरत फ़ायदा उठा सके, ऐसा किरदार अब सिर्फ़ काग़ज़ात पर रह गया है वरना इसका वजूद दुनिया से अनक़ा हो चुका है अली (अ0) वालों में देखने में नहीं आता है। सरबराहाने ममलिकत फोटो खींचवाने के लिये हाथ में फावड़ा और कुदाल ले लेते हैं वरना उन्हें ज़राअत से क्या ताल्लुक़ है, ज़मीनों का ज़िन्दा रखना अबूतुराब का काम था और उन्होंने इसका हक़ अदा कर दिया। बाक़ी सब दास्तानें हैं जो सफ़हे क़रतास पर महफ़ूज़ कर दी गई हैं और उनमें रोशनाई की चमक है, किरदार और हक़ीक़त की रोशनी नहीं है।-)))