Go to content Go to menu
 


Nahjul Balagha Hindi Khat 69-79 नहजुल बलाग़ा हिन्दी 69-79 ख़त

69-आपका मकतूबे गिरामी
(हारिस हमदानी के नाम)


क़ुरान की रीसमाने हिदायत से वाबस्ता रहो और उससे नसीहत हासिल करो, उसके हलाल को हलाल क़रार दो और हराम को हराम, हक़ की गुज़िश्ता बातों की तस्दीक़ करो और दुनिया के माज़ी से उसके मुस्तक़बिल के लिये इबरत हासिल करो के इसका एक हिस्सा दूसरे से मुशाबेहत रखता है और आखि़र अव्वल से मुलहक़ होने वाला है और सबका सब ज़ाएल होने वाला और जुदा हो जाने वाला है, नामे ख़ुदा को इस क़द्र अज़ीम क़रार दो के सिवाए हक़ के किसी मौक़े पर इस्तेमाल न करो, मौत और उसके बाद के हालात को बराबर याद करते रहो और उसकी आरज़ू उस वक़्त तक न करो जब तक मुस्तहकम असबाब न फ़राहम हो जाएं, हर उस काम से परहेज़ करो जिसे आदमी अपने लिये पसन्द करता हो और आम मुसलमानों के लिये नापसन्द करता हो और हर उस काम से बचते रहो जो तन्हाई में किया जा सकता हो और अलल एलान अन्जाम देने में ‘ार्म महसूस की जाती हो और इसी तरह हर उस काम से परहेज़ करो जिसके करने वाले से पूछ लिया जाए तो या इन्कार कर दे या माज़ेरत करे, अपनी आबरू का लोगों के तीरे मलामत का निशाना न बनाओ और हर सुनी हुई बात को बयान न कर दो के यह हरकत भी झूठ होने के लिये काफ़ी है और इसी तरह लोगों की हर बात की तरदीद भी न कर दो के यह अम्र जेहालत के लिये काफ़ी है, ग़ुस्से को ज़ब्त करो, ताक़त रखने के बावजूद लोगों को माफ़ करो, ग़ज़ब में हिल्म का मुज़ाहेरा करो, इक़्तेदार पाकर दरगुज़र करना सीखो ताके अन्जामकार तुम्हारे लिये रहे अल्लाह ने जो नेमतें दी हैं उन्हें दुरूस्त रखने की कोशिश करो और उसकी किसी नेमत को बरबाद न करना बल्कि उन नेमतों के आसार तुम्हारी ज़िन्दगी में वाज़ेह तौर पर नज़र आएं।


और याद रखो के तमाम मोमेनीन में सबसे बेहतर इन्सान वह है जो अपने नफ़्स, अपने अहल व अयाल और अपने माल की तरफ़ से ख़ैरात करे के यही पहले जाने वाला ख़ैर वहां जाकर ज़ख़ीरा हो जाता है और तुम हो कुछ छोड़ कर चले जाओगे वह तुम्हारे ग़ैर के काम आएगा, ऐसे ‘ाख़्स की सोहबत इख़्तेयार न करना जिसकी राय कमज़ोर और उसके आमाल नापसन्दीदा हों के हर सााथी का क़यास उसके साथी पर किया जाता है, सुकूनत के लिये बड़े ‘ाहरों का इन्तेख़ाब करो के वहां मुसलमानों का इज्तेमाअ ज़्यादा होता है और उन जगहों से परहेज़ करो जो जो ग़फ़लत, बेवफ़ाई और इताअते ख़ुदा में मददगारों की क़िल्लत के मरकज़ हों, अपनी फ़िक्र को सिर्फ़ काम की बातों में इस्तेमाल करो और ख़बरदार बाज़ारी अड़डों पर मत बैठना के यह ‘ौतान की हाज़िरी की जगहें और फ़ितनों के मरकज़ हैं, ज़्यादा हिस्सा उन अफ़राद पर निगाह रखो जिनसे परवरदिगार ने तुम्हें बेहतर क़रार दिया है के यह भी ‘ाुक्रे ख़ुदा का एक रास्ता है, जुमे के दिन नमाज़ पढ़े बग़ैर सफ़र न करना मगर यह के राहे ख़ुदा में जा रहे हो या किसी ऐसे काम में जो तुम्हारे लिये उज़्र बन जाए और तमाम उमूर में परवरदिगार की इताअत करते रहना के इताअते ख़ुदा दुनिया के तमाम कामों से अफ़ज़ल और बेहतर है।


(((-वाज़ेह रहे के जुमे के दिन तातील कोई इस्लामी क़ानून नहीं है, सिर्फ़ मुसलमानों का एक तरीक़ा है, वरना इस्लाम ने सिर्फ़ बक़द्रे नमाज़ कारोबार बन्द करने का हुक्म दिया है और इसके बाद फ़ौरन यह हुक्म दिया है के ज़मीन में मुन्तशिर हो जाओ और रिज़्क़े ख़ुदा तलाश करो, मगर अफ़सोस के जुमे की तातील के बेहतरीन रोज़े इबादत को भी अय्याशियों और बदकारियों का दिन बना दिया गया और इन्सान सबसे ज़्यादा निकम्मा और नाकारा उसी दिन होता है, इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन-)))
 

अपने नफ़्स को बहाने करके इबादत की तरफ़ ले आओ और उसके साथ नर्मी बरतो, जब्र न करो और उसी की फ़ुर्सत और फ़ारिग़ुलबाली से फ़ायदा उठाओ, मगर जिन फ़राएज़ को परवरदिगार ने तुम्हारे ज़िम्मे लिख दिया है उन्हें बहरहाल अन्जाम देना है और उनका ख़याल रखना है और देखो ख़बरदार ऐसा न हो के तुम्हे इस हाल में मौत आ जाए के तुम तलबे दुनिया में परवरदिगार से भाग रहे हो, और ख़बरदार फ़ासिक़ों की सोहबत इख़्तेयार न करना के ‘ार बालाआखि़र ‘ार से मिल जाता है, अल्लाह की अज़मत का एतराफ़ करो और उसके महबूब बन्दों से मोहब्बत करो और ग़ुस्से से इजतेनाब करो के यह ‘ौतान के लश्करों में सबसे अज़ीमतर लश्कर है, वस्सलाम।
 


70-आपका मकतूबे गिरामी
(आमिले मदीना सहल बिन हनीफ़ अन्सारी के नाम, जब आपको ख़बर मिली के एक क़ौम माविया से जा मिली है)
 

अम्माबाद! मुझे यह ख़बर मिली है के तुम्हारे यहाँ के कुछ लोग चुपके से माविया की तरफ़ खिसक गए हैं तो ख़बरदार तुम इस अदद के कम हो जाने और इस ताक़त के चले जाने पर हरगिज़ अफ़सोस न करना के इन लोगांे की गुमराही और तुम्हारे सुकूने नफ़्स के लिये यही काफ़ी है के वह लोग हक़ व हिदायत से भागे हैं और गुमराही और जेहालत की तरफ़ दौड़ पड़े हैं यह अहले दुनिया हैं लेहाज़ा इसी की तरफ़ मुतवज्जेह हैं और दौड़ लगा रहे हैं, हालांके उन्होंने इन्साफ़ को पहचाना भी है, सुना भी है और समझे भी हैं और उन्हें मालूम है के हक़ के मामले में हमारे यहाँ तमाम लोग बराबर की हैसियत रखते हैं इसीलिये यह लोग ख़ुदग़र्ज़ी की तरफ़ भाग निकले, ख़ुदा उन्हें ग़ारत करे और तबाह कर दे।
 

ख़ुदा की क़सम उन लोगों ने ज़ुल्म से फ़रार नहीं किया है और न अद्ल से मुलहक़ हुए हैं, और हमारी ख़्वाहिश सिर्फ़ यह है के परवरदिगार इस मामले में दुश्वारियों को आसान बना दे और नाहमवारी को हमवार कर दे।



71-आपका मकतूबे गिरामी
(मन्ज़र बिन जारुद अबदी के नाम जिसने बाज़ आमाल में ख़यानत से काम लिया)


अम्माबाद! तेरे बाप की ‘ाराफ़त ने मुझे तेरे बारे में धोके में रखा और मैं समझा के तू उसी के रास्ते पर चल रहा है और उसी के तरीक़े पर गामज़न है, लेकिन ताज़ा तरीन अख़बार से अन्दाज़ा होता है के तूने ख़्वाहिशात की पैरवी में कोई कसर नहीं उठा रखी है और आख़ेरत के लिये कोई ज़ख़ीरा नहीं किया है, आखे़रत को बरबाद करके दुनिया को आबाद कर रहा है और दीन से रिश्ता तोड़कर क़बीले से रिश्ता जोड़ रहा है। अगर मेरे पास आने वाली ख़बरें सही हैं तो तेरे घरवालों का ऊंट और तेरे जूते का तस्मा भी तुझसे बेहतर है और जो तेरा जैसा हो उसके ज़रिये न रख़्ने को बन्द किया जा सकता है न किसी अम्र को नाफ़िज़ किया जा सकता है और न उसके मरतबे को बलन्द किया जा सकता है न उसे किसी अमानत में ‘ारीक किया जा सकता है, न माल की जमाआवरी पर अमीन समझा जाऐ लेहाज़ा जैसे ही मेरा यह ख़त मिले फ़ौरन मेरी तरफ़ चल पड़ो, इन्शाअल्लाह।


सय्यद रज़ी- मन्ज़र बिन अलजारूदः यह वही ‘ाख़्स है जिसके बारे में अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने फ़रमाया था के यह अपने बाज़ुओं को बराकर देखता रहता है और अपनी चादरों में झूम कर चलता है और जूती के तस्मों को फूंकता रहता है (यानी इन्तेहाई मग़रूर और मुतकब्बिर क़िस्म का आदमी है)
 


72-आपका मकतूबे गिरामी
(अब्दुल्लाह बिन अब्बास के नाम)


अम्माबाद! न तुम अपनी मुद्दते हयात से आगे बढ़ सकते हो और न अपने रिज़्क़ से ज़्यादा हासिल कर सकते हो, और याद रखो के ज़माने के दो दिन होते हैं, एक तुम्हारे हक़ में और एक तुम्हारे खि़लाफ़ और यह दुनिया हमेशा करवटें बदलती रहती है लेहाज़ा जो तुम्हारे हक़ में है वह कमज़ोरी के बावजूद तुम तक आ जाएगा और जो तुम्हारे खि़लाफ़ है उसे ताक़त के बावजूद तुम नहीं टाल सकते हो।



73-आपका मकतूबे गिरामी
(माविया के नाम)


अम्माबाद! मैं तुमसे ख़त व किताबत करने और तुम्हारी बात सुनने में अपनी राय की कमज़ोरी और अपनी दानिशमन्दी की ग़लती का एहसास कर रहा हूँ और तुम बार-बार मुझसे अपनी बात मनवाने और ख़त व किताबत जारी रखने की कोशिश करने में ऐसे ही हो जैसे कोई बिस्तर पर लेटा ख़्वाब देख रहा हो और उसका ख़्वाब ग़लत साबित हो या कोई हैरतज़दा मुंह उठाए खड़ा हो और यह क़याम भी उसे महंगा पड़े और यही न मालूम हो के आने वाली चीज़ इसके हक़ में मुफ़ीद है या मुज़िर, तुम बिलकुल यही ‘ाख़्स नहीं हो लेकिन इसी के जैसे हो और ख़ुदा की क़सम के अगर किसी हद तक बाक़ी रखना मेरी मसलेहत न होता तो तुम तक ऐसे हवादिस आते जो हड्डियों को तोड़ देते और गोश्त का नाम तक न छोड़ते और याद रखो के यह ‘ौतान ने तुम्हें बेहतरीन उमूर की तरफ़ रूजू करने और उमदा तरीन नसीहतों के सुनने से रोक रखा है और सलाम इसके अहल पर।



74- आपका मुआहेदा
(जिसे रंबीया और अहले यमन के दरम्यान तहरीर फ़रमाया है और यह हश्शाम की तहरीर से नक़्ल किया गया है)


यह वह अहद है जिस पर अहले यमन के ‘ाहरी और देहाती और क़बीलए रंबीया के ‘ाहरी और देहाती सबने इत्तेफ़ाक़ किया है के सबके सब किताबे ख़ुदा पर साबित रहेंगे और उसी की दावत देंगे, जो उसकी तरफ़ दावत देगा और उसके ज़रिये हुक्म देगा उसकी दावत पर लब्बैक कहेंगे, न उसको किसी क़ीमत पर फ़रोख़्त करेंगे और न उसके किसी बदल पर राज़ी होंगे।
 

(((-अरब के वह क़बाएल जिनका सिलसिलाए नसब क़हतान बिन आमिर तक पहुंचता है उन्हें यमन से ताबीर किया जाता है और जिन का सिलसिला रंबीया बिन नज़ार से मिलता है उन्हें रंबीया के नाम से याद किया जाता है, दौरे जाहेलीयत में दोनों में ‘ादीद इख़्तेलाफ़ात थे लेकिन इस्लाम लाने के बाद दोनों मुत्तहिद हो गए, वलहम्दो लिल्लाह।-)))
 

इस अम्र के मुख़ालिफ़ और इसके नज़र अन्दाज़ करने वाले के खि़लाफ़ मुत्तहिद रहेंगे और किसी सरज़न्श करने वाले की सरज़न्श पर इस अहद को तोड़ेंगे और न किसी  ग़ैज़ व ग़ज़ब से राह में मुतासिर होंगे, और न किसी क़ौम को ज़लील करने या गाली देने का वसीला क़रार देंगे, इसी बात पर हाज़ेरीन भी क़ायम रहेंगे और ग़ायबीन भी इसी पर कम अक़्ल भी कारबन्द रहेंगे और आलिम भी, इसी की पाबन्दी साहेबाने दानिश भी करेंगे और जाहिल भी, फिर इसके बाद उनके ज़िम्मे अहदे इलाही और मीसाक़े परवरदिगार की पाबन्दी भी लाज़िम हो गई है और अहदे इलाही के बारे में रोज़े क़यामत भी सवाल किया जाएगा- कातिब अली (अ0) बिन अबी तालिब|
 


75-आपका मकतूबे गिरामी
(माविया के नाम, अपनी बैअत के इब्तेदाई दौर में जिसका ज़िक्र वाक़दी ने किताबुल जमल में किया है)


बन्दए ख़ुदा, अमीरूल मोमेनीन अली (अ0) की तरफ़ से माविया बिन अबी सुफ़ियान के नाम
अम्माबाद! तुम्हें मालूम है के मैंने अपनी तरफ़ से हुज्जत तमाम कर दी है और तुमसे किनारा कशी कर ली है मगर फिर भी वह बात होकर रही जिसे होना था और जिसे टाला नहीं जा सकता था, यह बात बहुत लम्बी है और इसमें गुफ़्तगू बहुत तवील है लेकिन अब जिसे गुज़रना था वह गुज़र गया और जिसे आना था वह आ गया। अब मुनासिब यही है के अपने यहां के लोगों से मेरी बैअत ले लो और सबको लेकर मेरे पास हाज़िर हो जाओ, वस्सलाम।



76-आपकी वसीयत
(अब्दुल्लाह बिन अब्बास के लिये, जब उन्हें बसरा का वाली क़रार दिया)


लोगों से मुलाक़ात करने में उन्हें अपनी बज़्म में जगह देने में और उनके दरम्यान फ़ैसला करने में वुसअत से काम लो और ख़बरदार ग़ैज़ व ग़ज़ब से काम न लेना के यह ‘ौतान की तरफ़ से हलकेपन का नतीजा है और याद रखो के जो चीज़ अल्लाह से क़रीब बनाती है वही जहन्नम से दूर करती है और जो चीज़ अल्लाह से दूर करती है वही जहन्नम से क़रीब बनाती है।



77-आपकी वसीयत
(अब्दुल्लाह बिन अब्बास के नाम- जब उन्हें ख़वारिज के मुक़ाबले में एतमामे हुज्जत के लिये इरसाल फ़रमाया)


देखो उनसे क़ुरान के बारे में बहस न करना के उसके बहुत से वुजूह व एहतेमालात होते हैं और इस तरह तुम अपनी कहते रहोगे और वह अपनी कहते रहेंगे, बल्कि उनसे सुन्नत के ज़रिये बहस करो के इससे बच कर निकल जाने का कोई रास्ता न होगा।



78-आपका मकतूबे गिरामी
(अबू मूसा अशअरी के नाम)

-हकमीन के सिलसिले में इसके एक ख़त के जवाब में जिसका तज़़़किरा सईद बिन यहया ने ‘‘मग़ाज़ी’’ में किया है)
कितने ही लोग ऐसे हैं जो आखे़रत की बहुत सी सआदतों से महरूम हो गए हैं, दुनिया की तरफ़ झुक गए हैं और ख़्वाहिशात के मुताबिक़ बोलने लगे हैं मैं उस अम्र की वजह से एक हैरत व इस्तेजाब की मन्ज़िल में हँू जहां ऐसे लोग जमा हो गए हैं जिन्हें अपनी ही बात अच्छी लगती है, मैं उनके ज़ख़्म का मदावा तो कर रहा हूँ लेकिन डर रहा हूँ के कहीं यह मुनजमिद ख़ून की ‘ाक्ल न इख़्तेयार कर ले।
 

और याद रखो के उम्मते पैग़म्बर (स0) की ‘ाीराज़ाबन्दी और उसके इत्तेहाद के लिये समझ से ज़्यादा ख़्वाहिशमन्द कोई नहीं है जिसके ज़रिये मैं बेहतरीन सवाब और सरफ़राज़ी आखि़रत चाहता हूँ और मैं बहरहाल अपने अहद को पूरा करूंगा चाहे तुम इस बात से पलट जाओ जो आखि़री मुलाक़ात तक तुम्हारी ज़बान पर थी, यक़ीनन बदबख़्त वह है जो अक़्ल व तजुर्बे के होते हुए भी इसके फ़वाएद से महरूम रहे, मैं तो इस बात पर नाराज़ हूँ के कोई ‘ाख़्स हर्फ़े बातिल ज़बान पर जारी करे या किसी ऐसे अम्र को फ़़ासिद कर दे जिसकी ख़ुदा ने इस्लाह कर दी है लेहाज़ा जिस बात को तुम नहीं जानते हो उसको नज़रअन्दाज़ कर दो के ‘ारीर लोग बड़ी बातें तुम तक पहुंचाने के लिये उड़कर पहुंचा करेंगे, वस्सलाम।



79-आपका मकतूबे गिरामी
(खि़लाफ़त के बाद, रूसाए लश्कर के नाम)
 

अम्माबाद! तुमसे पहले वाले सिर्फ़ इस बात से हलाक हो गए के उन्होंने लोगों के हक़ रोक लिये और उन्हें रिश्वत देकर ख़रीद लिया और उन्हें बातिल का पाबन्द बनाया तो सब उन्हीं के रास्तों पर चल पड़े।
 

--------------