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Nahjul Balagha Hindi Khutba 110-114, नहजुल बलाग़ा हिन्दी ख़ुत्बा 110-114

2011-04-02

110-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(अरकाने इस्लाम के बारे में)


अल्लाह वालों के लिये उसकी बारगाह ते पहुंचने का बेहतरीन वसीला अल्लाह और उसके रसूल (स0) पर ईमान और राहे ख़ुदा मेें जेहाद है के जेहाद इस्लाम की सरबलन्दी है, और कलमए इख़लास है के यह फ़ितरते इलाहिया है और नमाज़ का क़याम है के ऐन दीन है और ज़कात की अदायगी है के यह फ़रीज़ाए वाजिब है और माहे रमज़ान का रोज़ा है के यह अज़ाब से बचने का सिपर है और हज बैतुल्लाह है और उमरा है के यह फ़क्ऱ को दूर कर देता है और गुनाहों को धो देता है और सिलए रहम है के यह माल में इज़ाफ़ा और अजल के टालने का ज़रिया है और पोषीदा तरीक़े से ख़ैरात है के यह गुनाहों का कफ़्फ़ारा है और अलल एलान सदक़ा है के यह बदतरीन मौत के दफ़ा करने का ज़रिया है और अक़रेबा के साथ नेक सुलूक है के यह ज़िल्लत के मक़ामात से बचाने का वसीला है।
ज़िक्रे ख़ुदा की राह में आगे बढ़ते रहो के यह बेहतरीन ज़िक्र है और ख़ुदा ने मुत्तक़ीन से जो वादा किया है उसकी तरफ़ रग़बत पैदा करो के इसका वादा सच्चा है। अपने पैग़म्बर की हिदायत के रास्ते पर चलो के यह बेहतरीन हिदायत है और उनकी सुन्नत को इख़्तेयार करो के यह सबसे बेहतर हिदायत करने वाली है। (क़ुराने करीम) क़ुराने मजीद का इल्म हासिल करो के यह बेहतरीन कलाम है और इसमें ग़ौर व फ़िक्र करो के यह दिलों की बहार है। इसके नूर से षिफ़ा हासिल करो के यह दिलों के लिये षिफ़ा है और इसकी बाक़ायदा तिलावत करो के यह मुफ़ीदतरीन क़िस्सों का मरकज़ है, और याद रखो के अपने इल्म के खि़लाफ़ अमल करने वाला आलिम भी हैरान व सरगर्दां जाहिल जैसा है जिसे जेहालत से कभी ओफ़ाक़ा नहीं होता है बल्कि इस पर हुज्जते ख़ुदा ज़्यादा अज़ीमतर होती है और इसके लिये हसरत व अन्दोह भी ज़्यादा लाज़िम होता है और वह बारगाहे इलाही में ज़्यादा क़ाबिले मलामत होता है।


111- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(मज़म्मते दुनिया के बारे में)


अम्माबाद! मैं तुम लोगों को दुनिया से होषियार कर रहा हूँ के यह “ाीरीं और “ाादाब है लेकिन ख़्वाहिषात में घिरी हुई है। अपनी जल्द मिल जाने वाली नेमतों की बिना पर महबूब बन जाती है और थोड़ी सी ज़ीनत से ख़ूबसूरत बन जाती है। यह उम्मीदों से आरास्ता है और धोके से मुज़य्यन है। न इसकी ख़ुषी दाएमी है और न इसकी मुसीबत से कोई महफ़ूज़ रहने वाला है यह धोकेबाज़ नुक़सान रसां, बदल जाने वाली, फ़ना हो जाने वाली, ज़वाल पज़ीर और हलाक हो जाने वाली है। यह लोगों को खा भी जाती है और मिटा भी देती है।


(((- बाज़ नादानों का ख़यल है के जब दुनिया बाक़ी रहने वाली नहीं है और इसके “ाबो रोज़ का एतबार नहीं है तो बेहतरीन बात यह है के जिस क़द्र हासिल हो जाए इन्सान हासिल कर ले और इसकी नेमतों से लुत्फ़ अन्दोज़ हो जाए के कहीं दूसरे दिन हाथ से निकल न जाए। लेकिन यह ख़याल उन्हीं लोगों का है जो आख़ेरत की तरफ़ से यकसर ग़ाफ़िल हैं और उन्हें इस लुत्फ़ अन्दोज़ी के अन्जाम की ख़बर नहीं है वरना इस नुक्ते की तरफ़ मुतवज्जे हो जाते तो मारगुज़ीदा की तरह तड़पने को बिस्तरे हरीर पर आराम करने से ज़्यादा पसन्द करते और मुफ़लिसतरीन ज़िन्दगी गुज़ारने ही को आफ़ियत व आराम तसव्वुर करते।-)))


जब अपनी तरफ़ रग़बत रखने वालों और अपने से ख़ुष हो जाने वालों को ख़्वाहिषात की इन्तेहा को पहुंच जाती है तो बिलकुल परवरदिगार के इस इरषाद के मुताबिक़ हो जाती है ‘‘जैसे आसमान से पानी नाज़िल होकर ज़मीन के नबातात में “ाामिल हो जाए और फिर इसके बाद वह सब्ज़ा सूखकर ऐसा तिनका हो जाए जिसे हवाएं उड़ा ले जाएं और ख़ुदा हर “ौ पर क़ुदरत रखने वाला है’’ इस दुनिया में कोई “ाख़्स ख़ुष नहीं होता है मगर यह के उसे बाद में आँसू बहाना पड़ें और कोई “ाख़्स ख़ुषी को आते नहीं देखता है मगर यह के वह मुसीमत में डालकर पीठ दिखला देती है और कहीं राहत व आराम की हल्की-हल्की बारिष नहीं होती है मगर यह के बलाओं का दोगड़ा करने लगता है। इसकी “ाान ही यह है के अगर सुबह को किसी तरफ़ से बदला लेने के लिये आती है तो “ााम होते-होते अन्जान बन जाती है और अगर एक तरफ़ से “ाीरीं और ख़ुष गवार नज़र आती है तो दूसरे रूख़ से तल्ख़ और बलाख़ेज़ होती है। कोई इन्सान इसकी ताज़गी से अपनी ख़्वाहिष पूूरी नहीं करता है मगर यह के इसके पै-दर-पै मसाएब की बिना पर रन्ज व ताब का षिकार हो जाता है और कोई “ाख़्स को अम्न व अमान के परों पर नहीं रहता है मगर यह के सुबह होते होते ख़ौफ़ के बालोपर पर लाद दिया जाता है। यह दुनिया धोके बाज़ है और इसके अन्दर जो कुछ है सब धोका है यह फ़ानी है और इसमें जो कुछ है सब फ़ना होने वाला है। इसके किसी ज़ादे राह में कोई ख़ैर नहीं है सिवाए तक़वा के। इसमें से जो कम हासिल करता है उसी को राहत ज़्यादा नसीब होती है और जो ज़्यादा से चक्कर में पड़ जाता है उसके मोहलकात भी ज़्यादा हो जाते हैं और यह बहुत जल्द उससे अलग हो जाती है। कितने इस पर एतबार करने वाले हैं जिन्हें अचानक मुसीबतों में डाल दिया गया और कितने इस पर इत्मीनान करने वाले हैं जिन्हें हलाक कर दिया गया और कितने साहेबाने हैसियत थे जिन्हें ज़लील बना दिया गया और कितने अकड़ने वाले थे जिन्हें हिक़ारत के साथ पलटा दिया गया। इसकी बादषाही पलटा खाने वाली, इसका ऐष मुकद्दर, इसका “ाीरीं “ाूर, इसका मीठा कड़वा, इसकी ग़िज़ा ज़हर आलूद और इसके असबाब सब बोसीदा हैं। इसका ज़िन्दा मारिज़ हलाकत में है और इसका सेहतमन्द बीमारियों की ज़द पर है। इसका मुल्क छिनने वाला है और इसका साहेबे इज़्ज़त मग़लूब होने वाला है। इसका मालदार बदबख़्ितयों का षिकार होने वाला है और इसका हमाया लुटने वाला है। क्या तुम इन्हीं के घरों में नहीं हो जो तुमसे पहले तवीले उम्र, पाएदार आसार और दूर रस उम्मीदों वाले थे, बेपनाह सामान मुहय्या कया, बड़े-बड़े लष्कर तैयार किये और जी भरकर दुनिया की परस्तिष की और उसे हर चीज़ पर मुक़द्दम रखा लेकिन इसके बाद यूँ रवाना हो गए के न मन्ज़िल तक पहुँचाने वाला ज़ादे राह साथ था और न रास्ता तय करने वाली सवारी। क्या तुम तक कोई ख़बर पहुँची है के इस दुनिया ने इनको बचाने के लिये कोई फ़िदया पेष किया हो या इनकी कोई मदद की हो या इनके साथ्ज्ञ अच्छा वक़्त गुज़ारा हो?


(((-दुनिया से इबरत हासिल करने का बेहतरीन ज़रिया ख़ुद इसकी तारीख़ है के इसने आज तक किसी से वफ़ा नहीं की है। इसका एक पेषा भी उस वक़्त तक काम नहीं आता है जब तक मालिक से जुदा नहीं हो जाता है और इसकी सल्तनत भी अपने सुलतान को फ़िषारे क़ब्र से निजात देने वाली नहीं है। ऐसे हालात में तारीख़ी हवादिस से आंख बन्द कर लेना जेहालत के मासेवा कुछ नहीं है और साहबे इल्म व अक़्ल वही है जो माज़ी के तजुर्बात से फ़ायदा उठाए।-)))


हरगिज़ नहीं- बल्कि उन्हें मुसीबतों में गिरफ़्तार कर दिया और आफ़तों से आजिज़ व बेबस बना दिया। पै-दर-पै ज़हमतों ने उन्हें झिन्झोड़ कर रख दिया और इनकी नाक रकड़ दी और उन्हें अपने सुमों से रोन्द डाला और फिर हवादिस रोज़गार को भी सहारा दे दिया और तुमने देख लिया के यह अपने इताअत गुज़ारों, चाहने वालों और चिपकने वालों के लिये भी ऐसी अन्जान बन गई के जब उन्होंने यहाँ से हमेषा के लिये कूच किया तो उन्हें सिवाए भूक के कोई ज़ादे राह और तंगी-ए लहद के कोई मकान नहीं दिया। ज़ुल्मत ही इनकी रोषनी क़रार पाई और निदामत ही इनका अन्जाम ठहरा। तो क्या तुम इसी दुनिया को इख़्तेयार कर रहे हो और इसी पर भरोसा कर रहे हो और इसी की लालच में मुब्तिला हो। यह अपने से बदज़नी न रखने वालों और एहतियात न करने वालों के लिये बदतरीन मकान है। लेहाज़ा याद रखो और तुम्हें मालूम भी है के तुम उसे छोड़ने वाले हो और इससे कूच करने वाले हो। उन लोगों से नसीहत हासिल करो जिन्होंने यह दावा किया था के ‘‘हमसे ज़्यादा ताक़तवर कौन है’’ और फिर वह भी अपनी क़ब्रों की तरफ़ इस तरह पहुँचाए गए के उन्हें सवारी भी नसीब नहीं हुई और क़ब्रों में इस तरह उतार दिया गया के उन्हें मेहमान भी नहीं कहा गया। पत्थरों से इनकी क़ब्रें चुन दी गईं और मिट्टी से उन्हें कफ़न दे दिया गया। सड़ी गली हड्डियाँ इनकी हमसाया बन गई और अब यह सब ऐसे हमसाये हैं के किसी पुकारने वाले की आवाज़ पर लब्बैक नहीं कहते हैं और न किसी ज़्यादती को रोक सकते हैं और न किसी रोने वाले की परवाह करते हैं। अगर इनपर मूसलाधार बारिष हो तो उन्हें ख़ुषी नहीं होती है और अगर क़हत पड़ जाए तो मायूसी का षिकार नहीं होते हैं। यह सब एक मुक़ाम पर जमा हैं मगर अकेले हैं और हमसाये हैं मगर दूर-दूर हैं। ऐसे एक-दूसरे से क़रीब के मुलाक़ात तक नहीं करते हैं और ऐसे नज़दीक के मिलते भी नहीं हैं। अब ऐसे बरबाद हो गए हैं के सारा कीना ख़त्म हो गया है और ऐसे बेख़बर हैं के सारा बाज़ व अनाद मिट गया है। न इनसे किसी ज़रर का अन्देषा है और न किसी दिफ़ाअ की उम्मीद है। उन्होंने ज़मीन के ज़ाहिर के बजाए बातिन को और वुसअत के बजाए तंगी को और साथियों के बदले ग़ुरबत को और नूर के बदले ज़ुल्मत को इख़्तेयार कर लिया है। इसकी गोद में वैसे ही आ गए हैं जैसे पहले अलग हुए थे पा-बरहना और नंगे। अपने आमाल समेत दाएमी ज़िन्दगी और अबदी मकान की तरफ़ कूच कर गए हैं जैसा के मालिके कायनात ने फ़रमाया है ‘‘जिस तरह हमने पहले बनाया था वैसे ही वापस ले आएंगे, यह हमारा वादा है और हम उसे बहरहाल अन्जाम देने वाले हैं।


112- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें मलकुल मौत इनके क़ब्ज़े रूह और मख़लूक़ात के तौसीफ़े इलाही से आजिज़ी का ज़िक्र किया गया है।)


क्या जिस वक़्त मलकुल मौत घर में दाखि़ल होते हैं तुम्हें कोई एहसास होता है और क्या उन्हें रूह क़ब्ज़ करते हुए तुमने कभी देखा है? भला वह षिकमे मादर में बच्चे को किस तरह मारते हैं। क्या किसी तरफ़ से अन्दर दाखि़ल हो जाते हैं या रूह ही इनकी आवाज़ पर लब्बैक कहती हुई निकल आती है या पहले से बच्चे के पहलू में रहते हैं। सोचो! जो “ाख़्स एक मख़लूक़ के कमालात को न समझ सकता हो वह ख़ालिक़ के औसाफ़ को क्या बयान कर सकेगा।


113- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(मज़म्मते दुनिया)


मैं तुम्हें इस दुनिया से होषियार कर रहा हूँ के यह कूच की जगह है। आबो दाना की मन्ज़िल नहीं है, यह धोके ही से आरास्ता हो गई है और अपनी आराइष ही से धोका देती है। इसका घर परवरदिगार की निगाह में बिल्कुल बे अर्ज़िष है इसीलिये उसने इसके हलाल के साथ हराम, ख़ैर के साथ्ज्ञ “ार, ज़िन्दगी के साथ मौत, और “ाीरीं के साथ तल्ख़ को रख दिया है और न उसे अपने औलिया के लिये मख़सुस किया है और न अपने दुष्मनों को उससे महरूम रखा है। इसका ख़ैर बहुत कम है और इसका “ार हर वक़्त हाज़िर है। इसका जमा किया हुआ ख़त्म हो जाने वाला है और इसका मुल्क छिन जाने वाला है और इसके आबाद को एक दिन ख़राब हो जाना है। भला उस घर में क्या ख़ूबी है जो कमज़ोर इमारत की तरह गिर जाए और उस अम्र में क्या भलाई है जो ज़ादे राह की तरह ख़त्म हो जाए और इस ज़िन्दगी में क्या हुस्न है जो चलते-फ़िरते तमाम हो जाए।
देखो अपने मतलूबे उमूर में फ़राएज़े इलाहिया को भी “ाामिल कर लो और इसी से इसके हक़ के अदा करने की तौफ़ीक़ का मुतालेबा करो। अपने कानों को मौत की आवाज़ सुना दो क़ब्ल इसके के तुम्हें बुला लिया जाए। दुनिया में ज़ाहिदों की “ाान यही होती है के वह ख़ुष भी होते हैं तो उनका दिल रोता रहता है और वह हंसते भी हैं तो इनका रंज व अन्दोह “ादीद होता है। वह ख़ुद अपने नफ़्स से बेज़ार रहते हैं चाहे लोग इनके रिज़्क़ से ग़बता ही क्यों न करें। अफ़सोस तुम्हारे दिलों से मौत की याद निकल गई है और झूठी उम्मीदों ने उन पर क़ब्ज़ा कर लिया है। अब दुनिया का इख़्तेयार तुम्हारे ऊपर आख़ेरत से ज़्यादा है और वह आक़बत से ज़्यादा तुम्हें खींच रही है। तुम दीने ख़ुदा के एतबार से भाई-भाई थे। लेकिन तुम्हें बातिन की ख़बासत और ज़मीर की ख़राबी ने अलग-अलग कर दिया है के अब न किसी का बोझ बटाते हो, न नसीहत करते हो, न एक दूसरे पर ख़र्च करते हो और न एक दूसरे से वाक़ेअन मोहब्बत करते हो। आखि़र तुम्हें क्या हो गया है के मामूली सी दुनिया को पाकर ख़ुष हो जाते हो और मुकम्मल आख़ेरत से महरूम होकर रन्जीदा नहीं होते हो, थोड़ी सी दुनिया हाथ से निकल जाए तो परेषान हो जाते हो और इसका असर तुम्हारे चेहरों से ज़ाहिर हो जाता है और इसकी अलाहेदगी पर सब्र नहीं कर पाते हो जैसे वही तुम्हारी मन्ज़िल है और जैसे इसका सरमाया वाक़ई बाक़ी रहने वाला है। तुम्हारी हालत यह है के कोई “ाख़्स भी दूसरे के ऐब के इज़हार से बाज़ नहीं आता है मगर सिर्फ़ इस ख़ौफ़ से के वह भी इसी तरह पेष आएगा। तुम सबने आख़ेरत को नज़रअन्दाज़ करने और दुनिया की मोहब्बत पर इत्तेहाद कर लिया है और हर एक का दीन ज़बान की चटनी बनकर रह गया है। ऐसा लगता है के जैसे सबने अपना अमल मुकम्मल कर लिया है और अपने मालिक को वाक़ेअन ख़ुष कर लिया है।


114-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें लोगों की नसीहत का सामान फ़राहम किया गया है)


सारी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसने हम्द को नेमतों से और नेमतों को “ाुक्रिया से मिला दिया है। हम नेमतों में इसकी हम्द उसी तरह करते हैं जिस तरह मुसीबतों में करते हैं और उससे इस नफ़्स के मुक़ाबले के लिये मदद के तलबगार हैं जो अम्र की तामील में सुस्ती करता है और नवाही की तरफ़ तेज़ी से बढ़ जता है। उन तमाम ग़लतियों के लिये अस्तग़फ़ार करते है। जिन्हें इसके इल्म ने अहाता कर रखा है और उसकी किताब ने जमा कर रखा है। इसका इल्म क़ासिर नहीं है और इसकी किताब कोई चीज़ छोड़ने वाली नहीं है। हम उस पर इसी तरह ईमान लाए हैं जैसे ग़ैब का मुषाहेदा कर लिया हो और वादा से आगाही हासिल कर ली हो। हमारे इस ईमान के इख़लास ने षिर्क की नफ़ी की है और इसके यक़ीन ने “ाक का एज़ाला किया है। हम गवाही देते हैं के इसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं है। वह एक है उसका कोई “ारीक नहीं है और हज़रत मोहम्मद (स0) इसके बन्दे और रसूल हैं। यह दोनों “ाहादतें वह हैं जो अक़वाल को बलन्दी देती हैं और आमाल को रफ़अत अता करती हैं। जहां यह रख दी जाएं वह पल्ला हल्का नहीं होता है और जहां से उन्हें उठा लिया जाए उस पल्ले में कोई वज़न नहीं रह जाता है।
अल्लाह के बन्दों! मै। तुम्हें तक़वाए इलाही की वसीअत करता हूँ जो तुम्हारे लिये ज़ादे राह है और इसी पर आख़ेरत का दारोमदार है। यही ज़ादेराह मन्ज़िल तक पहुँचाने वाला है और यही पनाहगाह काम आने वाली है। उसी की तरफ़ सबसे बेहतर दाई ने दावत दे दी है और उसे सबसे बेहतर सुनने वाले ने महफ़ूज़ कर लिया है। चुनांचे उसके सुनाने वाले ने सुना दिया और उसके महफ़ूज़ करने वाले ने कामयाबी हासिल कर ली।
अल्लाह के बन्दों! इसी तक़वाए इलाही ने औलियाए ख़ुदा को मोहर्रमात से बचाकर रखा है और इनके दिलों में ख़ौफ़े ख़ुदा को लाज़िम कर दिया है यहाँ तक के इनकी रातें बेदारी की नज़र हो गईं और इनके यह तपते हुए दिन प्यास में गुज़र गए। उन्होंने राहत को तकलीफ़ के एवज़ और सेराबी को प्यास के ज़रिये हासिल किया है वह मौत को क़रीबतर समझते हैं तो तेज़ अमल करते हैं और उन्होंने उम्मीदों को झुठला दिया है तो मौत को निगाह में रखा है, फिर यह दुनिया तो बहरहाल फ़ना और तकलीफ़ तग़य्युर और इबरत का मक़ाम है। फ़ना ही का नतीजा है के ज़माना हर वक़्त अपनी कमान चढ़ाए रहता है के इसके तीर ख़ता नहीं करते हैं और इसके ज़ख़्मों का इलाज नहीं हो पाता है। वह ज़िन्दा को मौत से, सेहतमन्द को बीमारी से और निजात पाने वाले को हलाकत से मार देता है। इसका खाने वाला सेर नहीं होता है और पीने वाला सेराब नहीं होता है। और इसके रन्ज व ताब का असर यह है के इन्सान अपने खाने का सामान फ़राहम करता है, रहने के लिये मकान बनाता है और उसके बाद अचानक ख़ुदा की बारगाह की तरफ़ चल देता है। न माल साथ ले जाता है और न मकान मुन्तक़िल हो पाता है।
इसके तग़य्युरात का हाल यह है के जिसे क़ाबिले रहम देखा था वह क़ाबिले रष्क हो जाता है और जिसे क़ाबिले रष्क देखा था वह क़ाबिले रहम हो जाता है। गोया एक नेमत है जो ज़ाएल हो गई और एक बला है जो नाज़िल हो गई। इसकी इबरतों की मिसाल यह है के इन्सान अपनी उम्मीदों तक पहुंचने वाला ही होता है के मौत इसके सिलसिले को क़ता कर देती है और न कोई उम्मीद हासिल होती है और न उम्मीद करने वाला ही छोड़ा जाता है। ऐ सुबहानल्लाह- इस दुनिया की ख़ुषी भी क्या धोका है और इसकी सेराबी भी कैसी तष्नाकामी है और इसके साये में भी किस क़द्र धूप है, न यहाँ आने वाली मौत को वापस किया जा सकता है और न किसी जाने वाले को पलटाया जा सकता है। सुबहानल्लाह ज़िन्दा मुर्दे से किस क़द्र जल्दी मुलहक़ होकर क़रीबतर हो जाता है और मुर्दा ज़िन्दा से रिष्ता तोड़कर किस क़द्र दूर हो जाता है।
(याद रखो) “ार से बदतर कोई “ौ इसके अज़ाब के अलावा नहीं है और ख़ैर से बेहतर कोई “ौ उसके सवाब के सिवा नहीं है। दुनिया में हर “ौ का सुनना उसके देखने से अज़ीमतर होता है और आख़ेरत में हर “ौ का देखना उसके सुनने से बढ़-चढ़ कर होता है। लेहाज़ा तुम्हारे लिये देखने के बजाय सुनना और ग़ैब के मुषाहिदे के बजाय ख़बर ही को काफ़ी हो जाना चाहिए। याद रखो के दुनिया में किसी “ौ का कम होना और आख़ेरत में ज़्यादा होना इससे बेहतर है के दुनिया में ज़्यादा हो और आख़ेरत में कम हो जाए के कितने ही कम वाले फ़ायदे में रहते हैं और कितने ही ज़्यादती वाले घाटे में रह जाते हैं। बेषक जिन चीज़ों का तुम्हें हुक्म दिया गया है उनमें ज़्यादा वुसअत है ब निस्बत उन चीज़ों के जिनसे रोका गयाहै और जिन्हें हलाल किया गया है वह उनसे कहीं ज़्यादा हैं जिन्हें हराम क़रार दिया गया है। लेहाज़ा क़लील को कसीर के लिये और तंगी को वुसअत की ख़ातिर छोड़ दो। परवरदिगार ने तुम्हारे रिज़्क़ की ज़िम्मेदारी ली है और अमल करने का हुक्म दिया है लेहाज़ा ऐसा न हो के जिसकी ज़मानत ली गई है इसकी तलब उससे ज़्यादा हो जाए जिसको फ़र्ज़ किया गया है। ख़ुदा गवाह है के तुम्हारे हालात को देख कर यह “ाुबह होने लगता है और ऐसा लगता है के “ाायद जिस की ज़मानत ली गई है वही तुम पर वाजिब किया गया है और जिसका हुक्म दिया गया है उसी को साक़ित कर दिया गया है। ख़ुदारा अमल की तरफ़ सबक़त करो और मौत के अचानक वारिद हो जाने से डरो इसलिये के मौत के वापस होने की वह उम्मीद नहीं है जिस क़द्र रिज़्क़ के पलट कर आ जाने की है। जो रिज़्क़ आज हाथ से निकल गया है उसके कल इज़ाफ़े का इमकान है लेकिन जो उम्र आज निकल गई है उसके कल वापस आने का भी इमकान नहीं है। उम्मीद आने वाले की हो सकती है जाने वाले की नहीं। इससे तो मायूसी ही हो सकती है ‘‘अल्लाह से इस तरह डरो जो डरने का हक़ है और ख़बरदार उस वक़्त तक दुनिया से न जाना जब तक वाक़ेई मुसलमान न हो जाओ।’’