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Nahjul Balagha Hindi Khutba 125-131, नहजुल बलाग़ा हिन्दी ख़ुत्बा 125-131

125- आपका इरषादे गिरामी
(तहकीम के बारे में, हकमीन की दास्तान सुनने के बाद)


याद रखो, हमने अफ़राद को हकम नहीं बनाया था बल्के क़ुरआन को हकम क़रार दिया था और क़ुरान वही किताब है जो दफ़्तियों के दरम्यान मौजूद है लेकिन मुष्किल यह है के यह ख़ुद नहीं बोलता है और उसे तर्जुमान की ज़रूरत है और तर्जुमान अफ़राद ही होते हैं। इस क़ौम ने हमें दावत दी के हम क़ुरान से फ़ैसले कराएं तो हम तो क़ुरान से रूगर्दानी करने वाले नहीं थे जबके परवरदिगार ने फ़रमाया है के अपने खि़लाफ़त को ख़ुदा व रसूल की तरफ़ मोड़ दो और ख़ुदा की तरफ़ मोड़ने का मतलब उसकी किताब से फ़ैसला कराना ही है और रसूल (स0) की तरफ़ मोड़ने का मक़सद भी सुन्नत का इत्तेबाअ करना है और यह तय है के अगर किताबे ख़ुदा से सच्चाई के साथ फ़ैसला किया जाए तो उसके सबसे ज़्यादा हक़दार हम ही हैं और इसी तरह सुन्नते पैग़म्बर के लिये सबसे ऊला व अक़रब हम ही हैं।


अब तुम्हारा यह कहना के आपने तहकीम की मोहलत क्यों दी? तो किसका राज़ यह है के मैं चाहता था के बेख़बर बाख़बर हो जाए और बाख़बर तहक़ीक़ कर ले के “ाायद परवरदिगार इस वक़्फ़े में उम्मत के उमूर की इस्लाह कर दे और इसका गला न घोंटा जाए के तहक़ीक़े हक़ से पहले गुमराही के पहले ही मरहले में भटक जाएं और याद रखो के परवरदिगार के नज़दीक बेहतरीन इन्सान वह है जिसे हक़ पर अमल दरआमद करना (चाहे इसमें नुक़सान ही क्यों न हो) बातिल पर अमल करने से ज़्यादा महबूब हो (चाहे इसमें फ़ायदा ही क्यों न हो), तो आखि़र तुम्हें किधर ले जाया जा रहा है और तुम्हारे पास “ौतान किधर से आ गया है, देखो इस क़ौम से जेहाद के लिये तैयार हो जाओ जो हक़ के मामले में इस तरह सरगर्दां है के उसे कुछ दिखाई ही नहीं देता है और बातिल पर इस तरह अक़ारद कर दी गई है के सीधे रास्ते पर जाना ही नहीं चाहती है। यह किताबे ख़ुदा से अलग और वह राहे हक़ से मुन्हरिफ़ हैं मगर तुम भी क़ाबिले एतमाद अफ़राद और लाएक़ तमस्सुक “ारफ़ के पासबान नहीं हो। तुम आतिषे जंग के भड़काने का बदतरीन ज़रिया हो, तुम पर हैफ़ है मैंने तुमसे बहुत तकलीफ़ उठाई है, तुम्हें अलल एलान भी पुकारा है और आहिस्ता भी समझाया है लेकिन तुम न आवाज़े जंग पर सच्चे “ारीफ़ साबित हुए और न राज़दारी पर क़ाबिले एतमाद साथी निकले।


(((- हज़रत ने तहकीम का फ़ैसला करते हुए दोनों अफ़राद को एक साल की मोहलत दी थी ताके इस दौरान नावाक़िफ़ अफ़राद हक़ व बातिल की इत्तेलाअ हासिल कर लें और जो किसी मिक़दार में हक़ से आगाह हैं वह मज़ीद तहक़ीक़ कर लें, ऐसा न हो के बेख़बर अफ़राद पहले ही मरहले में गुमराह हो जाएं और अम्र व आस की मक्कारी का षिकार हो जाएं। मगर अफ़सोस यह है के हर दौर में ऐसे अफ़राद ज़रूर रहते हैं जो अपने अक़्ल व फ़िक्र को हर एक से बालातर तसव्वुर करते हैं और अपने क़ाएद के फ़ैसलों को भी मानने के लिये तैयार नहीं होते हैं और खुली हुई बात है के जब इमाम (अ0) के साथ ऐसा बरताव किया गया है तो नाएब इमाम या आलिमे दीन की क्या हक़ीक़त है?-)))


126- आपका इरषादे गिरामी
(जब अताया की बराबरी पर एतराज़ किया गया)


क्या तुम मुझे इस बात पर आमादा करना चाहते हो के मैं जिन रिआया का ज़िम्मेदार बनाया गया हूँ उन पर ज़ुल्म करके चन्द अफ़राद की कमक हासिल कर लूँ। ख़ुदा की क़सम जब तक इस दुनिया का क़िस्सा चलता रहेगा और एक सितारा दूसरे सितारे की तरफ़ झुकता रहेगा ऐसा हरगिज़ नहीं हो सकता है। यह माल अगर मेरा ज़ाती होता जब भी मैं बराबर से तक़सीम करता, चे जाएका यह माल माले ख़ुदा है और याद रखो के  माल का नाहक़ अता कर देना भी इसराफ़ और फ़िज़ूल ख़र्ची में “ाुमार होता है और यह काम इन्सान को दुनिया में बलन्द भी कर देता है तो आख़ेरत में ज़लील कर देता है। लोगों में मोहतरम भी बना देता है तो ख़ुदा की निगाह में पस्ततर बना देता है और जब भी कोई “ाख़्स माल को नाहक़ या ना अहल पर सर्फ़ करता है तो परवरदिगार उसके “ाुक्रिया से भी महरूम कर देता है और उसकी मोहब्बत का रूख़ भी दूसरों की तरफ़ मुड़ जाता है। फ़िर अगर किसी दिन पैर फैल गए और उनकी इमदाद का भी मोहताज हो गया तो वह बदतरीन दोस्त और ज़लीलतरीन साथी ही साबित होते हैं।


127- आपका इरषादे गिरामी
(जिसमें बाज़ एहकामे दीन के बयान के साथ ख़वारिज के “ाुबहात का एज़ाला और हकमीन के तोड़ का फ़ैसला बयान किया गया है।)


अगर तुम्हारा इसरार इसी बात पर है के मुझे ख़ताकार और गुमराह क़रार दो तो सारी उम्मते पैग़म्बर (स0) को क्यों ख़ताकार दे रहे हो और मेरी ‘‘ग़लती’’ का मवाख़ेज़ा उनसे क्यों कर रहे हो और मेरे ‘‘गुनाह’’ की बिना पर उन्हें क्यों काफ़िर क़रार दे रहे हो। तुम्हारी तलवारें तुम्हारे कान्धों पर रखी हैं जहां चाहते हो ख़ता, बेख़ता चला देते हो और गुनहगार और बेगुनाह में कोई फ़र्क़ नहीं करते हो हालांके तुम्हें मालूम है के रसूले अकरम (स0) ने ज़िनाए महज़ा के मुजरिम को संगसार किया तो उसकी नमाजे़ जनाज़ा भी पढ़ी थी और उसके अहल को वारिस भी क़रार दिया था और इसी तरह क़ातिल को क़त्ल किया तो उसकी मीरास भी तक़सीम की और चोर के हाथ काटे या ग़ैर “ाादी “ाुदा ज़िनाकार को कोड़े लगवाए तो उन्हें माले ग़नीमत में हिस्सा भी दिया और उनका मुसलमान औरतों से निकाह भी कराया गोया के आपने इन लोगों के गुनाहों का मवाख़ेज़ा किया और उनके बारे में हक़े खुदा को क़ायम किया लेकिन इस्लाम में उनके हिस्से को नहीं रोका और न उनके नाम को अहले इस्लाम की फ़ेहरिस्त से ख़ारिज किया। मगर बदतरीन अफ़राद हो के “ौतान तुम्हारे ज़रिये अपने मक़ासिद को हासिल कर लेता है और तुम्हें सहराए ज़लालत में डाल देता है और अनक़रीब मेरे बारे में दो तरह के अफ़राद गुमराह होंगे- मोहब्बत में ग़लू करने वाले जिन्हें मोहब्बत ग़ैरे हक़ की तरफ़ ले जाएगी और अदावत में ज़्यादती करने वाले जिन्हें अदावत बातिल की तरफ़ खींच ले जाएगी और बेहतरीन अफ़राद वह होंगे जो दरम्यानी मन्ज़िल पर हों, लेहाज़ा तुम भी इसी रास्ते को इख़्तेयार करो और इसी नज़रिये की जमाअत के साथ हो जाओ के अल्लाह का हाथ इसी जमाअत के साथ है और ख़बरदार तफ़रिक़े की कोषिष न करना के जो ईमानी जमाअत से कट जाता है वह उसी तरह “ौतान का षिकार हो जाता है जिस तरह गल्ले से अलग हो जाने वाली भेड़ भेड़िये की नज़र हो जाती है। आगाह हो जाओ के जो भी इस इन्हेराफ़ का नारा लगाए उसे क़त्ल कर दो चाहे वह मेरे ही अमामे के नीचे क्यों न हो। इन दोनों अफ़राद को हकम बनाया गया था ताके उन उमूर को ज़िन्दा करें जिन्हें क़ुरआन ने ज़िन्दा किया है और इन उमूर को मुर्दा करें जिन्हें क़ुरान ने मुर्दा बना दिया है और ज़िन्दा करने के मानी इस पर इत्तेफ़ाक़ करने और मुर्दा बनाने के मानी इससे अलग हो जाने के हैं। हम इस बात पर तैयार थे के अगर क़ुरान हमें दुष्मनों की तरफ़ खींच ले जाएगा तो हम उनका इत्तेबाअ कर लेंगे और अगर उन्हें हमारी तरफ़ ले आएगा तो उन्हें आना पड़ेगा लेकिन ख़ुदा तुम्हारा बुरा करे, इस बात में मैंने कोई ग़लत काम तो नहीं किया और न तुम्हें कोई धोका दिया है और न किसी बात को “ाुबह में रखा है। लेकिन तुम्हारी जमाअत ने दो आदमियों के इन्तेख़ाब पर इत्तेफ़ाक़ कर लिया और मैंने उन पर “ार्त लगा दी के क़ुरान के हुदूद से तजावुज़ नहीं करेंगे मगर वह दोनों क़ुरान से मुन्हरिफ़ हो गए और हक़ को देख भाल कर नज़रअन्दाज कर दिया और असल बात यह है के इनका मक़सद ही ज़ुल्म था और वह उसी रास्ते पर चले गए जबके मैंने उनकी ग़लत राय और ज़ालिमाना फ़ैसले से पहले ही फ़ैसले में अदालत और इरादाए हक़ की “ार्त लगा दी थी।


128- आपका इरषादे गिरामी
(बसरा के हवादिस की ख़बर देते हुए)


ऐ अहनफ़! गेया के मैं उस “ाख़्स को देख रहा हूँ जो एक ऐसा लष्कर लेकर आया है जिसमें न गर्द व ग़ुबार है और न “ाोर वग़ोग़ा है, न लजामों की खड़खड़ाहट है और न घोड़ों की हिनहिनाहट, यह ज़मीन को उसी तरह रोन्द रहे हैं जिस तरह “ाुर्तमुर्ग़ के पैर।
सय्यद रज़ी - हज़रत ने इस ख़बर में साहबे रन्ज की तरफ़ इषारा किया है (जिसका नाम अली बिन मोहम्मद था और उसने सन 225 हि0 में बसरा में ग़ुलामों को मालिकों के खि़लाफ़ मुत्तहिद किया और हर ग़ुलाम से उसके मालिक को 500 कोड़े लगवाए।
अफ़सोस है तुम्हारी आबाद गलियों और उन सजे सजाए मकानात के हाल पर जिन के छज्जे गिदों के पर और हाथियों के सूंड़ के मानिन्द हैं उन लोगों की तरफ़ से जिनके मक़तूल पर गिरया नहीं किया जाता है और उनके ग़ाएब को तलाष नहीं किया जाता है, मैं दुनिया को मुंह के भल औन्धा कर देने वाला और इसकी सही औक़ात का जानने वाला और उसकी हालत को उसके “ाायाने “ाान निगाह से देखने वाला हूँ।


(तुर्कों के बारे में) मैं एक ऐसी क़ौम को देख रहा हूँ जिनके चेहरे चमड़े से मन्ढी ढाल के मानिन्द हैं, रेषम व दीबा के लिबास पहनते हैं और बेहतरीन असील घोड़ों से मोहब्बत रखते हैं, उनके दरम्यान अनक़रीब क़त्ल की गर्म बाज़ारी होगी जहाँ ज़ख़्मी मक़तूल के ऊपर से गुज़रंेगे और भागने वाले क़ैदियों से कम होंगे। (यह तातारियों के फ़ित्ने की तरफ़ इषारा है जहां चंगेज़ ख़ाँ और उसकी क़ौम ने तमाम इस्लामी मुल्कों को तबाह व बरबाद कर दिया और कुत्ते, सुअर को अपनी ग़िज़ा बनाकर ऐसे हमले किये के “ाहरों को ख़ाक में मिला दिया)
यह सुनकर एक “ाख़्स ने कहा के आप तो इल्मे ग़ैब की बातें कर रहे हैं तो आपने मुस्कुराकर इस कलबी “ाख़्स से फ़रमाया ऐ बरादरे कल्बी! यह इल्मे ग़ैब नहीं है बल्के साहेबे इल्म से तअल्लुम है।


(((- बनी तमीम के सरदार अहनफ़ बिन क़ैस से खि़ताब है जिन्होंने रसूले अकरम (स0) की ज़ेयारत नहीं की मगर इस्लाम क़ुबूल किया और जंगे जमल के मौक़े पर अपने इलाक़े में उम्मुल मोमेनीन के फ़ित्नों का दिफ़ाअ करते रहे और फिर जंगे सिफ़फ़ीन में मौलाए कायनात के साथ “ारीक हो गए और जेहाद राहे ख़ुदा का हक़ अदा कर दिया।-)))


इल्मे ग़ैब क़यामत का और उन चीज़ों का इल्म है जिनको ख़ुदा ने क़ुराने मजीद में “ाुमार कर दिया है के अल्लाह के पास क़यामत का इल्म है बारिष के बरसाने वाला वही है और पेट में पलने वाले बच्चे का मुक़द्दर वही जानता है। उसके अलावा किसी को नहीं मालूम है के वह क्या कमाएगा और किस सरज़मीन पर मौत आएगी।


परवरदिगार जानता है के रह्म का बच्चा लड़का है या लड़की, हसीन है या क़बीअ, सख़ी है या बख़ील, “ाफ़ी है या सईद, कौन जहन्नम का कुन्दा बन जाएगा और कौन जन्नत में अम्बियाए कराम का हमनषीन होगा। यह वह इल्मे ग़ैब है जिसे ख़ुदा के अलावा कोई नहीं जानता है। इसके अलावा जो भी इल्म है वह ऐसा इल्म है जिसे अल्लाह ने पैग़म्बर (स0) को तालीम दिया है और उन्होंने मुझे इसकी तालीम दी है और मेरे हक़ में दुआ की है के मेरा सीना उसे महफ़ूज़ कर ले और उस दिल में उसे महफ़ूज़ कर दे जो मेरे पहलू में हो।


129-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(नाप तौल के बारे में)


अल्लाह के बन्दों! तुम और जो कुछ इस दुनिया से तवक़्क़ो रखते हो सब एक मुक़र्ररा मुद्दत के मेहमान हैं और ऐसे क़र्जदार हैं जिनसे क़र्ज़ का मुतालबा हो रहा हो, उम्रें घट रही हैं और आमाल महफ़ूज़ किये जा रहे हैं, कितने दौड़ धूप करने वाले हैं जिनकी मेहनत बरबाद हो रही है और कितने कोषिष करने वाले हैं जो मुसलसल घाटे का षिकार हैं। तुम ऐसे ज़माने में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हो जिसमें नेकी मुसलसल मुंह फेरकर जा रही है और बुराई बराबर सामने आ रही है। “ौतान लोगों को तबाह करने की हवस में लगा हुआ है, इसका साज़ व सामान मुस्तहकम हो चुका है उसकी साज़िषें आम हो चुकी हैं और उसके षिकार उसके क़ाबू में हैं। तुम जिधर चाहो निगाह उठाकर देख लो सिवाए उस फ़क़ीर के जो फ़क्ऱ की मुसीबत झेल रहा है और उस अमीर के जिसने नेमते ख़ुदा की नाषुक्री की है और उस बुख़ल के जिसने हक़क़े ख़ुदा में बुख़्ल ही को माल के इज़ाफ़े का ज़रिया बना लिया है और उस सरकष के जिसके कान नसीहतों के लिये बहरे हो गए हैं और कुछ नज़र नहीं आएगा। कहां चले गए वह नेक और स्वालेह बन्दे और किधर हैं वह “ारीफ़ और करीमुन्नफ़्स लोग, कहां हैं वह अफ़राद जो कस्ब माष में एहतियात बरतने वाले थे और रास्तों में पाकीज़ा रास्ता इख़्तेयार करने वाले थे, क्या सब के सब इस पस्त और ज़िन्दगी को मकदर बना देने वाली दुनिया से नहीं चले गये और क्या तुम्हें ऐसे अफ़राद में नहीं छोड़ गए जिनकी हिक़ारत और जिनके ज़िक्र से एराज़ की बिना पर होंठ सिवाए इनकी मज़म्मत के किसी बात के लिये आपस में नहीं मिलते हैं। इन्ना लिल्लाह व इन्ना इलैहे राजेऊन। फ़साद इस क़द्र फ़ैल चुका है के न कोई हालात का बदलने वाला है और न कोई मना करने वाला और न ख़ुद परहेज़ करने वाला है तो क्या तुम इन्हीं हालात के ज़रिये ख़ुदा के मुक़द्दस जवार में रहना चाहते हो और उसके अज़ीज़तरीन दोस्त बनना चाहते हो। अफ़सोस! अल्लाह को जन्नत के बारे में धोका नहीं दिया जा सकता है और न उसकी मर्ज़ी को इताअत के बग़ैर हासिल किया जा सकता है। अल्लाह लानत करे उन लोगों पर जो दूसरों को नेकियों का हुक्म देते हैं और ख़ुद अमल नहीं करते हैं। समाज को बुराइयों से रोकते हैं और ख़ुद उन्हीं में मुब्तिला हैं।


130- आपका इरषादे गिरामी
(जो आपने अबूज़र ग़फ़्फ़ारी से फ़रमाया जब उन्हें रब्ज़ा की तरफ़ “ाहर बदर कर दिया गया)


अबूज़र! तुम्हारा ग़ैज़ व ग़ज़ब अल्लाह के लिये है लेहाज़ा उससे उम्मीद वाबस्ता रखो जिसके लिये यह ग़ैज़ व ग़ज़ब इख़्तेयार किया है। क़ौम को तुमसे अपनी दुनिया के बारे में ख़तरा था और तुम्हें उनसे अपने दीन के बारे में ख़ौफ़ था लेहाज़ा जिसका उन्हें ख़तरा था वह उनके लिये छोड़ दो और जिसके लिये तुम्हें ख़ौफ़ था उसे बचाकर निकल जाओ। यह लोग बहरहाल उसके मोहताज हैं जिसको तुमने उनसे रोका है और तुम उससे बहरहाल बेनियाज़ हो जिससे इन लोगों ने तुम्हें महरूम किया है। अनक़रीब यह मालूम हो जाएगा के फ़ायदे में कौन रहा और किससे हसद करने वाले ज़्यादा हैं। याद रखो के किसी बन्दए ख़ुदा पर अगर ज़मीन व आसमान दोनों के रास्ते बन्द हो जाएं और वह तक़वाए इलाही इख़्तेयार कर ले तो अल्लाह उसके लिये कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकाल देगा। देखो तुम्हें सिर्फ़ हक़ से उन्स और बातिल से वहषत होनी चाहिए तुम अगर इनकी दुनिया को क़ुबूल कर लेते तो यह तुमसे मोहब्बत करते और अगर दुनिया में से अपना हिस्सा ले लेते तो तुम्हारी तरफ़ से मुतमइन हो जाते।


131- आपका इरषादे गिरामी
(जिसमें अपनी हुकूमत तलबी का सबब बयान फ़रमाया है और इमामे बरहक़ के औसाफ़ का तज़किरा किया है।)


अगर वह लोग जिनके नफ़्स मुख़्तलिफ़ हैं और दिल मुतफ़र्रिक़, बदन हाज़िर हैं और अक़्लें ग़ायब, मैं तुम्हें मेहरबानी के साथ हक़ की दावत देता हूँ और तुम इस तरह फ़रार करते हो जैसे “ोर की डकार से बकरियां। अफ़सोस तुम्हारे ज़रिये अद्ल की तारीकियों को कैसे रौषन किया जा सकता है और हक़ में पैदा हो जाने वाली कजी को किस तरह सीधा किया जा सकता है। ख़ुदाया तू जानता है के मैंने हुकूमत के बारे में जो एक़दाम किया है उसमें न सलतनत की लालच थी और न माले दुनिया की तलाष, मेरा मक़सद सिर्फ़ यह था के दीन के आसार को उनकी मन्ज़िल तक पहुंचाऊं और “ाहरों में इस्लाह पैदा कर दूँ ताके मज़लूम बन्दे महफ़ूज़ हो जाएं और मोअत्तल हुदूद क़ाएम हो जाएं। ख़ुदाया तुझे मालूम है के मैंने सबसे पहले तेरी तरफ़ रूख़ किया है और उसे क़ुबूल किया है और तेरी बन्दगी में रसूले अकरम (स0) के अलावा किसी ने भी मुझ पर सबक़त नहीं की है।
तुम लोगों को मालूम है के लोगों की आबरू, उनकी जान, उनके मनाफ़े, इलाही एहकाम और इमामते मुस्लेमीन का ज़िम्मेदार न कोई बख़ील हो सकता है के वह अमवाले मुस्लेमीन पर हमेषा दांत लगाए रहेगा और न कोई जाहिल हो सकता है के वह अपनी जेहालत से लोगांे को गुमराह कर देगा और न कोई बद एख़लाक़ हो सकता है के वह बद एख़लाक़ी के चरके लगाता रहेगा और न कोई मालियात का बद दियानत हो सकता है के वह एक को माल दे देगा और एक को महरूम कर देगा और न कोई फैसले में रिष्वत लेने वाला हो सकता है के वह हुक़ूक़ को बरबाद कर देगा और उन्हें इनकी मन्ज़िल तक न पहुंचने देगा और न कोई सुन्नत को मुअत्तल करने वाला हो सकता है के वह उम्मत को हलाक कर देगा।