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Nahjul Balagha Hindi Khutba 161-164 नहजुल बलाग़ा हिन्दी ख़ुत्बा 161-164

161-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें रसूले अकरम (स0) के सिफ़ात, अहलेबैत (अ0) की फ़ज़ीलत और तक़वा व इत्तेबाअ रसूल (स0) की दावत का तज़किरा किया गया है)


परवरदिगार ने आपको रोषन नूर, वाज़ेह दलील, नुमायां रास्ता और हिदायत करने वाली किताब के साथ भेजा है। आपका ख़ानदान बेहतरीन ख़ानदान, और आपका “ाजरा बेहतरीन “ाजरा है, जिसकी “ााख़ें मोअतदिल हैं (सीधी हैं) और समरात दस्त-रस के अन्दर (झुके हुए) हैं। आपकी जाए विलादत मक्के मुकर्रमा है और मक़ामे हिजरत अर्ज़े तय्यबा। यहीं से आपका ज़िक्र बलन्द हुआ है और यहीं से आपकी आवाज़ फै़ली है। परवरदिगार ने आपको किफ़ायत करने वाली हुज्जत, षिफ़ा देने वाली नसीहत, गुज़िष्ता तमाम उमूर की तलाफ़ी करने वाली दावत के साथ भेजा है, आपके ज़रिये ग़ैर मारूफ़ “ारीअतों को ज़ाहिर किया है और महमिल बिदअतों का क़िला क़मा कर दिया है और वाज़ेह एहकाम को बयान कर दिया है लेहाज़ा अब जो भी इस्लाम के अलावा किसी रास्ते को इख़्तेयार करेगा उसकी “ाक़ावत साबित हो जाएगी और रसीमाने हयात बिखर जाएगी और मुंह के बल गिरना सख़्त हो जाएगा और अन्जामकार दाएमी हुज़्न व इल्म और “ादीदतरीन अज़ाब होगा।
मैं ख़ुदा पर इसी तरह भरोसा करता हूं जिस तरह उसकी तरफ़ तवज्जो करने वाले करते हैं और उससे उस रास्ते की हिदायत तलब करता हूँ जो उसकी जन्नत तक पहुंचाने वाला और उसकी मन्ज़िले मतलूब की तरफ़ ले जाने वाला है।
बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें तक़वा इलाही और इसकी इताअत की वसीयत करता हूं के इसी में कुल निजात है और यही हमेषा के लिये मरकज़े निजात है। उसने तुम्हें डराया तो मुकम्मल तौर से डराया और (जन्नत की) रग़बत दिलाई तो मुकम्मल रग़बत का इन्तेज़ाम किया, तुम्हारे लिये दुनिया आर उसकी जुदाई, उसके फ़ना व ज़वाल और उससे इन्तेक़ाल सबकी तौसीफ़ कर दी है लेहाज़ा उसमें जो चीज़ अच्छी लगे उससे एराज़ करो (पहलू बचाए रखो) के साथ जाने वाली “ौ बहुत कम है (जान लो) यह (दुनिया का) घर ग़ज़बे इलाही से क़रीबतर और रिज़ाए इलाही से दूरतर है।
 

बन्दगाने ख़ुदा! हम-व-ग़म और इसके इष्ग़ाल से चष्मपोषी कर लो (इसकी फ़िक्रों और उसके धन्दों से आंखें बन्द कर लो) तुम्हें मालूम है के इससे बहरहाल जुदा होना है और इसके हालात बराबर बदलते रहते हैं इससे इस तरह एहतियात करो जिस तरह एक ख़ौफ़ज़दा और अपने नफ़्स का मुख़लिस और जाँफ़ेषानी के साथ कोषिष करने वाला एहतियात करता है और उससे इबरत हासिल करो उन मनाज़िर के ज़रिये जो तुमने ख़ुद देख लिये हैं के गुज़िष्ता नस्लें हलाक हो गईं, उनके जोड़ बन्द अलग-अलग हो गए, उनकी आंखें और उनके कान ख़त्म हो गए, उनकी “ाराफ़त और इज़्ज़त चली गई, उनकी मसर्रत और नेमत का ख़ात्मा हो गया। औलाद का क़ुर्ब फ़िक़दान में तब्दील हो गया और अज़वाज की सोहबत फ़िराक़ में बदल गई। अब न बाहमी सिफ़ाख़रत रह गई है और न नस्लों का सिलसिला, न मुलाक़ातें रह गई हैं और न बात-चीत। (उनका “ारफ़ व वक़ार मिट गया, उनकी मसर्रतें और नेमतें जाती रहीं और बाल बच्चों के क़रीब के बजाए अलाहेदगी और बीवियों से हमनषीनी के बजाए उनसे जुदाई हो गई। अब न वह फ़ख़्र करते हैं और न उनके औलाद होती है, न एक दूसरे से मिलते मिलाते हैं और न आपस में एक दूसरे के हमसाया बन कर रहते हैं।)
लेहाज़ा बन्दगाने ख़ुदा! डरो उस “ाख़्स की तरह जो अपने नफ़्स पर क़ाबू रखता हो, अपनी ख़्वाहिषात को रोक सकता हो और अपनी अक़्ल की आंखों से देखता हो, मसएल बिलकुल वाज़ेह है, निषानियां क़ायम हैं, रास्ता सीधा है और सिरात बिल्कुल मुस्तक़ीम है।


162- आपका इरषादे गिरामी
(उस “ाख़्स से जिसने यह सवाल कर लिया के लोगों ने आपको आपकी मन्ज़िल से किस तरह हटा दिया)


ऐ बरादरे बनी असद! तुम बहोत तंग हौसला हो और ग़लत रास्ते पर चल पड़े हो, लेकिन बहरहाल तुम्हें क़राबत (-1-) का हक़ भी हासिल है और सवाल का हक़ भी है और तुमने दरयाफ़्त भी कर लिया है तो अब सुनो! हमारे बलन्द नसब रसूले अकरम (स0) से क़रीबतरीन ताल्लुक़ के बावजूद क़ौम ने हमसे इस हक़ को इसलिये छीन लिया के इसमें एक ख़ुदग़र्ज़ी थी जिस पर एक जमाअत (-2-) के नफ़्स मर मिटे थे और दूसरी जमाअत ने चष्मपोषी से काम लिया था लेकिन बहरहाल हाकिम अल्लाह है और रोज़े क़यामत उसी की बारगाह में पलट कर जाना है।


इस लूट मार का ज़िक्र छोड़ो जिसका “ाोर चारों तरफ़ मचा हुआ था (-3-)
अब ऊंटनियों की बात करो जो अपने क़ब्ज़े में रह कर निकल गई हैं


(((-1-षायद इस अम्र की तरफ़ इषारा हो के सरकारे दो आलम (स0) की एक ज़ौजा ज़ैनब बिन्त जहष असदी थीं और उनकी वालेदा असीमा बिन्ते अब्दुल मुत्तलिब आपकी फूफी थीं।
-2- इसमें दोनों इहतमालात पाए जाते हैं, या उस क़ौम की तरफ़ इषारा है जिसने हक़्क़े अहलेबैत (अ0) का तहफ़्फ़ुज़ नहीं किया और तग़ाफ़ुल से काम लिया। या ख़ुद अपने करदार की बलन्दी की तरफ़ इषारा है के हमने भी चष्म पोषी से काम लिया और मुक़ाबला करना मुनासिब नहीं समझा और इस तरह ज़ालिमों ने मन्सब पर मुकम्मल तौर से क़ब्ज़ा कर लिया।
-3- यह अम्र अलक़ैस का मिसरा है जब उसके बाप को क़त्ल कर दिया गया तो वह इन्तेक़ाम के लिये क़बाएल की कमक तलाष कर रहा था एक मक़ाम पर मुक़ीम था के लोग उसके ऊंट पकड़ ले गए, उसने मेज़बान से फ़रयाद की, मेज़बान ने कहा के मैं अभी वापस लाता हूं सबूत में तुम्हारी ऊंटनियां ले जाता हूँ और इस तरह ऊंट के साथ ऊंटनी पर भी क़ब्ज़ा कर लिया-)))


अब आओ इस मुसीबत को देखो जो अबू सुफ़ियान के बेटे की तरफ़ से आई है के ज़माने ने रूलाने के बाद हंसा दिया है और बख़ुदा इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं है। ताज्जुब तो इस हादिस (मुसीबत) पर है जिसने ताज्जुब (की हद) का भी ख़ात्मा कर दिया है और कजी को बढ़ावा दिया है। क़ौम ने चाहा था के नूरे इलाही को उसके चिराग़ ही से रूपोष कर दिया जाए (अल्लाह के रौषन चिराग़ का नूर बुझाना चाहा) और फ़व्वारे को चष्मा (सरचष्मए हिदायत) ही से बन्द कर दिया जाए। मेरे और अपने दरम्यान ज़हरीले घूंटों की आमेज़िष कर दी के अगर मुझसे और क़ौम के दरम्यान से इब्तेला की ज़हमतें ख़त्म हो गईं तो मैं उन्हें ख़ालिस हक़ के रास्ते पर चलाऊंगा और अगर कोई दूसरी सूरत हो गई तो तुम्हें हसरत व अफ़सोस से तुम्हें जान नहीं देनी चाहिये। अल्लाह इनके आमाल से ख़ूब बाख़बर है।


163-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा


सारी तारीफ़े उस अल्लाह के लिये हैं जो बन्दों का ख़ल्क़ करने वाला, ज़मीन का फ़र्ष बिछाने वाला, वदियों में पानी का बहाने वाला और टीलों को सरसब्ज़ व “ाादाब बनाने वाला है। उसकी औलियत की कोई इब्तेदा नहीं है और इसकी अज़लियत की कोई इन्तेहा नहीं है। वह इब्तेदा से है और हमेषा रहने वाला है। वह बाक़ी है और उसकी बक़ा की कोई मुद्दत नहीं है। पेषानियां उसके सामने सजदारेज़ और लब उसकी वहदानियत का इक़रार करने वाले हैं। उसने तख़लीक़ के साथ ही हर “ौ के हुदूद मुअय्यन कर दिये हैं ताके वह किसी से मुषाबेह न होने पाएं। इन्सानी औहाम उसके लिये हुदूद व हरकात और आज़ा व जवारेह का तअय्युन नहीं कर सकते हैं। इसके लिये यह नहीं कहा जा सकता है के वह कब से है और न यह हद बन्दी की जा सकती है के कब तक रहेगा वह ज़ाहिर है लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है के किस चीज़ से और बातिन है लेकिन यह नहीं सोचा जा सकता है के किस चीज़ में? वह न कोई ढांचा है के ख़त्म हो जाए और न किसी हिजाब में है के महदूद हो जाए। ज़ाहेरी इत्तेसाल की बुनियाद पर अष्याअ इससे क़रीब नहीं हैं और जिस्मानी जुदाई की बिना पर दूर नहीं है। इसके ऊपर बन्दों के हालात में से न एक का झीकना मख़फ़ी है और न अलफ़ाज़ का दोहराना। न बलन्दी का दूर से झलकना पोषीदा है और न क़दम का आगे बढ़ना, न अन्धेरी रात में और न छाई हुई अन्धियारियों में जिन पर रोषन चान्द अपनी किरनों का साया डालता है और रौषन आफ़ताब तुलूअ व ग़ुरूब में और ज़माने की इन गर्दिषों में जो आने वाली रात की आमद और जाने वाले दिन के गुज़रने से पैदा होती हैं। वह हर इन्तेहा व मुद्दत से पहले है और हर एहसाए और “ाुमार से मावराए है। वह इन सिफ़ात से बलन्दतर है जिन्हें महदूद समझ लेने वाले इसकी तरफ़ मन्सूब कर देते हैं चाहे वह सिफ़तों के अन्दाज़े हों या इतराफ़ व जवानिब की हदें। मकानात में क़याम हो या मसाकिन में क़रार, हदबन्दी उसकी मख़लूक़ के लिये है और उसकी निस्बत इसके ग़ैर की तरफ़ होती है।


(((यह मकतबे अहलेबैत (अ0) का ख़ासा है के हमेषा हक़ के रास्ते पर चलना चाहिये और दूसरों को भी इसी रास्ते पर चलाना चाहिये और इस राह में किसी तरह की ज़हमत व मुसीबत की परवाह नहीं करना चाहिये, चुनांचे बाज़ मोअर्रेख़ीन के बयान के मुताबिक़ जब दौरे उमर बिन ख़त्ताब में सलमान फ़ारसी को मदाएन का गवर्नर बनाया गया और उन्होंने कारोबार की निगरानी का क़ानून नाफ़िज़ किया तो अरबाबे सरवत व तिजारत ने खलीफ़ा से षिकायत कर दी और उन्होंने फ़िलज़ोर जनाबे सलमान को माज़ूल कर दिया के कहीं निगरानी और मुहासेबा का तसव्वुर सारे मुल्क में न फैल जाए के अरबाबे मसालेह व मुनाफ़ेअ बग़ावत पर आमादा हो जाएं और हुकूमत को हक़ की राह पर चलने के लिये ख़ातिर ख़्वाह क़ीमत अदा करना पड़े। (फ़ी ज़लाल नहजुल बलाग़ा (2/448) -)))


उसने अष्याए की तख़लीक़ न अज़ली मवाद से की है और न अबदी मिसालों से, जो कुछ भी ख़ल्क़ किया है ख़ुद ख़ल्क़ किया है और उसकी हदें मुअय्यन कर दी हैं और हर सूरत को हसी बना दिया है। कोई “ौ भी इसके हुक्म से सरताबी नहीं कर सकती है और न किसी की इताअत में उसका कोई फ़ायदा है। उसका इल्म माज़ी के मरने वाले अफ़राद के बारे में वैसा ही है जैसा के रह जाने वाले ज़िन्दों के बारे में है। और वह बलन्दतरीन आसमानों के बारे में वैसा ही इल्म रखता है जिस तरह के पस्त तरीन ज़मीनों के बारे में रखता है।
(दूसरा हिस्सा) ऐ वह इन्सान जिसे हर एतबार से दुरूस्त बनाया गया है और रहम के अन्धेरों और पर्दा दर पर्दा ज़ुल्मतें मुकम्मल निगरानी के साथ ख़ल्क़ कया गया है। तेरी इब्तेदा ख़ालिस मिट्टी से हुई है और तुझे एक ख़ास मरकज़ में ख़ास मुद्दत तक रखा गया है। तू षिकमे मादर में इस तरह हरकत कर रहा था के न आवाज़ का जवाब दे सकता था और न किसी को सुन सकता था। इसके बाद तुझे वहाँ से निकाल कर उस घर में लाया गया जिसे तूने देखा भी नहीं था और जहां के मुनाफ़ेअ के रास्तों से बाख़बर भी नहीं था। बता तुझे पिस्ताने मादर से दूध हासिल करने की हिदायत किसने दी है और ज़रूरत के वक़्त मवारिद तलब व इरादे का पता किसने बताया है? होषियार, जो “ाख़्स एक साहबे हैसियत व आज़ाए मख़लूक़ के सिफ़ात के पहचानने से आजिज़ होगा वह ख़ालिक़ के सिफ़ात को पहचानने से यक़ीनन ज़्यादा आजिज़ होगा और मख़लूक़ात के हुदूद के ज़रिये उसे हासिल करने से यक़ीनन दूरतर होगा।


(((- अमीरूल मोमेनीन (अ0) के अलावा दुनिया का कोई दूसरा इन्सान होता तो इस मौक़े को ग़नीमत तसव्वुर करके एहतेजाज करने वालों के हौसले मज़ीद बलन्द कर देता और लम्हों में उस्मान का ख़ात्मा करा देता लेकिन आपने अपनी “ारई ज़िम्मेदारी और इस्लामी सहूलियत का ख़याल करके इन्क़ेलाबी जमाअत को रोका और चाहा के पहले एतमामे हुज्जत कर दिया जाए ताके उस्मान को इस्लाहे अम्र का तवक़ोअ मिल जाए और बनी उमय्या मुझे नस्ले उस्मान का मुलज़िम न ठहराने पाएं। वरना उस्मान के दौर के मज़ालिम आलम आष्कार थे। उनके बारे में किसी तहक़ीक़ और तफ़तीष की ज़रूरत नहीं थी। जनाबे अबूज़र का “ाहरबदर करा दिया जाना, जनबो अब्दुल्लाह बिन मसऊद की पस्लियों का तोड़ दिया जाना, जनबो अम्मारे यासिर के षिकम को जूतियों से पामाल कर देना, वह मज़ालिम हैं जिन्हें सारा आलमे इस्लाम और बालनहूस मदीनतुर्ररसूल ख़ूब जानता था और यही वजह है के आपने दरम्यान में पड़ कर इस्लाह हाल के बारे में यह फ़ारमूला पेष किया के मदीने के मामेलात की फ़िलफ़ौर इस्लाह की जाए और बाहर के लिये बक़द्रे ज़रूरत मोहलत ले ली जाए लेकिन ख़लीफ़ा को इस्लाह नहीं करना थी नहीं की, और आखि़रष वही अन्जाम हुआ जिसके पेषे नज़र अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने इस क़द्र ज़हमत बरदाष्त की थी और जिसके बाद बनी उमय्या को नए फ़ित्नों का मौक़ा मिल गया और उनसे अमीरूल मोमेनीन (अ0) को भी दो चार होना पड़ा था।-)))


164- आपका इरषादे गिरामी
(जब लोगों ने आपके पास आकर उस्मान के मज़ालिम का ज़िक्र किया और उनकी फ़हमाइष और तम्बीह का तक़ाज़ा किया तो आपने उस्मान के पास जाकर फ़रमाया)


लोग मेरे पीछे मुन्तज़िरि हैं और उन्होंने मुझे अपने और तुम्हारे दरम्यान वास्ता क़रार दिया है और ख़ुदा की क़सम मैं नहीं जानता हूँ के मैं तुमसे क्या कहूं? मैं कोई ऐसी बात नहीं जानता हूं जिसका तुम्हें इल्म न हो और किसी ऐसी बात की निषानदेही नहीं कर सकता हूं जो तुम्हें मालूम न हो। तुम्हें तमाम वह बातें मालूम हैं जो मुझे मालूम हैं और मैंने किसी अम्र की तरफ़ सबक़त नहीं की है के उसकी इत्तेलाअ तुम्हें करूं और न कोई बात चुपके से सुन ली है के तुम्हें बाख़बर करूं। तुमने वह सब ख़ुद देखा है जो मैंने देखा है और वह सब कुछ ख़ुद भी सुना है जो मैंने सुना है और रसूले अकरम (स0) के पास वैसे ही रहे हो जैसे मैं रहा हूँ। इब्ने अबी क़हाफ़ा और इब्निल ख़त्ताब हक़ पर अमल करने के लिये तुमसे ज़्यादा ऊला नहीं थे के तुम उनकी निस्बत रसूलल्लाह से ज़्यादा क़रीबी रिष्ता रखते हो।
तुम्हें वह दामादी का “ारफ़ भी हासिल है जो उन्हें हासिल नहीं था लेहाज़ा ख़ुदारा अपने नफ़्स को बचाओ के तुम्हें अन्धेपन से बसारत या जेहालत से इल्म ........ दिया जा रहा है। रास्ते बिल्कुल वाज़ेअ हैं और निषानाते दीन क़ायम हैं। याद रखो ख़ुदा के नज़दीक बेहतरीन बन्दा वह इमामे आदिल है जो ख़ुद हिदायत याफ़्ता हो और दूसरों को हिदायत दे। जानी पहचानी सुन्नत को क़ायम करे और मजहोल बिदअत को मुर्दा बना दे। देखो ज़िया बख़्ष सुन्नतों के निषानात भी रौषन हैं और बिदअतों के निषानात भी वाज़ेह हैं और बदतरीन इन्सान ख़ुदा की निगाह में वह ज़ालिम पेषवा है जो ख़ुद भी गुमराह हो और लोगों को भी गुमराह करे।
पैग़म्बर से मिली हुई सुन्नतों को मुर्दा बना बना दे आर क़ाबिले तर्क बिदअतों को ज़िन्दा कर दे। मैंने रसूले अकरम (स0) को यह फ़रमाते हुए सुना है के रोज़े क़यामत ज़ालिम रहनुमा को इस आलम में लाया जाएगा के न कोई उसका मददगार होगा और न उज़्र ख़्वाही करने वाला और उसे जहन्नम में डाल दिया जाएगा और वह इस तरह चक्कर खाएगा जिस तरह चक्की। इसके बाद उसे क़ारे जहन्नम में जकड़ दिया जाएगा। मैं तुम्हें अल्लाह की क़सम देता हूं के ख़ुदारा तुम इस उम्मत के मक़तूल पेषवा न बनो इसलिये के दौरे क़दीम से कहा जा रहा है के इस उम्मत में एक पेषवा क़त्ल किया जाएगा जिसके बाद क़यामत तक क़त्ल व के़ताल का दरवाज़ा खुल जाएगा और सारे उमूर मुष्तबा हो जाएंगे और फ़ित्ने फैल जाएंगे और लोग हक़ व बातिल में इम्तियाज़ न कर सकेंगे और इसी में चक्कर खाते रहेंगे और तहो बाला होते रहेंगे। ख़ुदारा मरवान की सवारी न बन जाओ के वह जिधर चाहे खींच कर ले जाए के तुम्हारा सिन ज़्यादा हो चुका है और तुम्हारी उम्र ख़ात्मे के क़रीब आ चुकी है।
उस्मान ने इस सारी गुफ़्तगू को सुनकर कहा के आप उन लोगों से कह दे ंके ज़रा मोहलत दें ताके मैं उनकी हक़ तलफ़ियों का इलाज कर सकूं? आपने फ़रमाया के जहां तक मदीने के मामेलात का ताल्लुक़ है उनमें किसी मोहलत की कोई ज़रूरत नहीं है और जहां तक बाहर के मामलात का ताल्लुक़ है उनमें सिर्फ़ इतनी मोहलत दी जा सकती है के तुम्हारा हुक्म वहां पहुंच जाए।


(((-दर हक़ीक़त रहनुमा और ज़ालिम वह दो मुतज़ाद अलफ़ाज़ हैं जिन्हें किसी आलमे “ाराफ़त व करामत में जमा नहीं होना चाहिये, इन्सान को रहनुमाई का “ाौक़ है तो पहले अपने किरदार में अदालत व “ाराफ़त पैदा करे उसके बाद आगे चलने का इरादा करे। इसके बग़ैर रहनुमाई का “ाौक़ इन्सान को जहन्नम तक पहुंचा सकता है रहनुमा नहीं बना सकता है। जैसा के सरकारे दो आलम (स0) ने फ़रमाया है और इस अज़ाब की षिद्दत का राज़ यही है के रहनुमा की वजह से बेषुमार लोग मज़ीद गुमराह होते हैं और उसके ज़ुल्म से बेहिसाब लोगों को ज़ुल्म का जवाज़ फ़राहम हो जाता है और सारा मुआषेरा तबाह व बरबाद होकर रह जाता है।
उस्मान का दौर पहला दौर था जब साबिक़ की ज़ाहिरदारी भी ख़त्म हो गई थी और खुल्लम खुल्ला ज़ुल्म का बाज़ार गर्म हो गया था। इसलिये इतना “ादीद रद्दे अमल देखने में आया और न इसके बाद से तो आज तक सारा आलमे इन्सान उन्हीं ख़ानदान परवरियों का षिकार है और अवाम की सारी दौलत एक-एक  ख़ानदान के अय्याष “ाहज़ादों पर सर्फ़ हो रही है और मदीने के मुसलमानों में भी ग़ैरत की हरकत नहीं पैदा हो रही है तो बाक़ी आलमे इस्लाम और दूसरे इलाक़ों का क्या तज़किरा है।-)))