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Nahjul Balagha Hindi Khutba 172-175 नहजुल बलाग़ा हिन्दी ख़ुत्बा 172-175

 

172-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा


(हम्दे ख़ुदा) सारी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसके सामने एक आसमान दूसरे आसमान को और एक ज़मीन दूसरी ज़मीन को छुपा नहीं सकती है।
(रोज़े “ाूरा) एक “ाख़्स (1) ने मुझसे यहाँ तक कह दिया के फ़रज़न्द्र अबूतालिब! आप में इस खि़लाफ़त की तमअ पाई जाती है? तो मैंने कहा के ख़ुदा की क़सम तुम लोग ज़्यादा हरीस हो हालांके तुम दूर वाले हो। मैं तो उसका अहल भी हूँ और पैग़म्बर (स0) से क़रीबतर भी हूँ। मैंने इस हक़ का मुतालबा किया है जिसका मैं हक़दार हूँ लेकिन तुम लोग मेरे और उसके दरम्यान हाएल हो गए हो और मेरे ही रूख़ को उसकी तरफ़ से मोड़ना चाहते हो। फिर जब मैंने भरी महफ़िल में दलाएल के ज़रिये से कानों के पर्दों को खटखटाया तो होषियार हो गया और ऐसा मबहूत हो गया के कोई जवाब समझ में नहीं आ रहा था।


(क़ुरैष के खि़लाफ़ फ़रियाद) ख़ुदाया! मैं क़ुरैष और उनके अन्सार के मुक़ाबिल में तुझसे मदद चाहता हूँ के इन लोगों ने मेरी क़राबत का रिष्ता तोड़ दिया और मेरी अज़ीम मन्ज़िलत को हक़ीर बना दिया। मुझसे इस अम्र के लिये झगड़ा करने पर तैयार हो गए जिसका मैं वाक़ेअन हक़दार था और फिर यह कहने लगे के आप से ले लें तो भी सही है और इससे दस्तबरदार हो जाएं तो भी बरहक़ है।
(असहाबे जमल के बारे में) यह ज़ालिम इस “ाान से बरामद हुए के रसूल (स0) को यूँ खींच कर मैदान में ला रहे थे जैसे कनीज़ें ख़रीद व फ़रोख़्त के वक़्त ले जाई जाती हैं। इनका रूख़ बसरा की तरफ़ था। इन दोनों ने (2) अपनी औरतों को घर में बन्द कर रखा था और ज़ौजाए रसूल (स0) को मैदान में ला रहे थे। जबके इनके लष्कर में कोई ऐसा न था जो पहले मेरी बैअत न कर चुका हो और बग़ैर कसी ख़बर व इकराह के मेरी इताअत में न रह चुका हो। यह लोग पहले मेरे आमिले बसरा (3) और ख़ाज़ने बैतुलमाल जैसे अफ़राद पर हमलावर हुए तो एक जमाअत को गिरफ़्तार करके क़त्ल कर दिया और एक को धोके में तलवार के घाट उतार दिया। ख़ुदा की क़सम अगर यह तमाम मुसलमानों में सिर्फ़ एक “ाख़्स को भी क़सदन क़त्ल कर देते तो भी मेरे वास्ते पूरे लष्कर से जंग करने का जवाज़ मौजूद था के दीगर अफ़राद हाज़िर रहे और उन्होंने नापसन्दीदगी का इज़हार नहीं किया और अपनी ज़बान (4) या अपने हाथ से दिफ़ाअ नहीं किया और फिर जबके मुसलमानों में से इतने अफ़राद को क़त्ल कर दिया है जितनी उनके पूरे लष्कर की तादाद थी।


(((-(1) बाज़ हज़रात का ख़याल है के यह बात “ाूरा के मौक़े पर साद बिन अबी वक़ास ने कही थी और बाज़ का ख़याल है के सक़ीफ़ा के मौक़े पर अबू उबैदा बिन अलजराह ने कही थी और दोनों ही इमकानात पाए जाते हैं के दोनों की फ़ितरत एक जैसी थी और दोनों अमीरूल मोमेनीन (अ0) की मुख़ालफ़त पर मुत्तहिद थे।
(2) उससे मुराद तल्हा व ज़ुबैर हैं जिन्होंने ज़ौजए रसूल (स0) का इतना भी एहतेराम नहीं किया जितना अपने घर की औरतों का किया करते थे।
(3) जनाबे उस्मान बिन ख़ैफ़ का मुसला कर दिया और उनके साथियों की एक बड़ी जमाअत को तहे तेग़ कर दिया।
(4) फ़िक़ही एतबार से दिफ़ाअ न करने वालों का क़त्ल जाएज़ नहीं होता है लेकिन यहां वह लोग मुराद हैं जिन्होंने इमामे बरहक़ के खि़लाफ़ ख़ुरूज करके फ़साद फ़िल अर्ज़ का इरतेकाब किया था और यह जुर्म जवाज़े क़त्ल के लिये काफ़ी होता है।-)))


173-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(रसूले अकरम (स0) के बारे में और इस अम्र की वज़ाहत के सिलसिले में के खि़लाफ़त का वाक़ेई हक़दार कौन है?)


पैग़म्बरे इस्लाम (स0) वहीए इलाही के अमानतदार और ख़ातमुल मुरसलीन थे रहमते इलाही की बषारत देने वाले और अज़ाबे इलाही से डराने वाले थे।
लोगों! याद रखो उस अम्र का सबसे ज़्यादा हक़दार वही है जो सबसे ज़्यादा ताक़तवर और दीने इलाही का वाक़िफ़कार हो। इसके बाद अगर कोई फ़ित्ना परवाज़ फ़ित्ना खड़ा हो जाएगा तो पहले उसे तौबा की दावत दी जाएगी, उसके बाद अगर इन्कार करेगा तो क़त्ल कर दिया जाएगा। मेरी जान की क़सम अगर उम्मत का मसल तमाम अफ़रादे बषर के इज्तेमाअ के बग़ैर तय नहीं हो सकता है तो इस इज्तेमाअ का तो कोई रास्ता ही नहीं है। होता यही है के हाज़िरीन का फ़ैसला ग़ायब अफ़राद पर नाफ़िज़ हो जाता है और न तो हाज़िर को अपनी बैअत से रूजू करने का हक़ होता है और न ग़ायब को दूसरा रास्ता इख़्तेयार करने का जवाज़ होता है।
याद रखो के मैं दोनों तरह के अफ़राद से जेहाद करूंगा। उनसे भी जो ग़ैरे हक़ के दावेदार होंगे और उनसे भी जो हक़दार को उसका हक़ न देंगे। बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें तक़वाए इलाही की वसीयत करता हूँ के यह बन्दों के दरम्यान बेहतरीन वसीयत है और पेषे परवरदिगार अन्जाम के ऐतबार से बेहतरीन अमल है। देखो! तुम्हारे और अहले क़िबला मुसलमानों के दरम्यान जंग का दरवाज़ा खोला जा चुका है। अब इस अलम को वही उठाएगा जो साहेबे बसीरत व सब्र होगा और हक़ के मराकज़ का पहचानने वाला होगा। तुम्हारा फ़र्ज़ है के मेरे एहकाम के मुताबिक़ क़दम आगे बढ़ाओ और मैं जहांँ रोक दूं वहाँ रूक जाओ और ख़बरदार किसी मसले में भी तहक़ीक़ के बग़ैर जल्दबाज़ी से काम न लेना के मुझे जिन बातों का तुम इन्कार करते हो उनमें ग़ैर मामूली इन्के़लाबात का अन्देषा रहता है।
याद रखो- यह दुनिया जिसकी तुम आरज़ू कर रहे हो और जिसमें तुम रग़बत का इज़हार कर रहे हो और जो कभी कभी तुमसे अदावत करती है और कभी तुम्हें ख़ुष कर देती है। यह तुम्हारा वाक़ेई घर और तुम्हारी वाक़ेई मन्ज़िल नहीं है जिसके लिये तुम्हें ख़ल्क़ किया गया है और जिसकी तरफ़ तुम्हें दावत दी गई है और फिर यह बाक़ी रहने वाली भी नहीं है और तुम भी उसमें बाक़ी रहने वाले नहीं हो। यह अगर कभी धोका देती है तो दूसरे वक़्त अपने “ार से होषियार भी कर देती है, लेहाज़ा इसके धोके से बचो और इसकी तम्बीह पर अमल करो। इसकी लालच को नज़र अन्दाज़ करो और इसकी तख़वीफ़ का ख़याल रखो। इसमें रहकर इस घर की तरफ़ सबक़त करो जिसकी तुम्हें दावत दी गई है और अपने दिलों का रूख़ उसकी तरफ़ से मोड़ लो और ख़बरदार तुममें से कोई “ाख़्स इसकी किसी नेमत से महरूमी की बुनियाद पर कनीज़ों की तरह रोने न बैठ जाए। अल्लाह से उसकी नेमतों की तकमील का मुतालेबा करो, उसकी इताअत पर सब्र करने और इसकी किताब के एहकाम की मुख़ालफ़त करने के ज़रिये।
याद रखो अगर तुमने दीन की बुनियाद को महफ़ूज़ कर दिया तो दुनिया की किसी “ौ की बरबादी भी तुम्हें नुक़सान नहीं पहुंचा सकती है और अगर तुमने दीन को बरबाद कर दिया तो दुनिया में किसी “ौ की हिफ़ाज़त भी फ़ायदा नहीं दे सकती है। अल्लाह हम सबके दिल को हक़ के रास्ते पर लगा दे और सबको सब्र की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।


(((-अलम लष्करे क़ौम की सरबलन्दी की निषानी और लष्कर के वेक़ार व इज़्ज़त की अलामत होता है। लेहाज़ा इसको उठाने वाले को भी साहबे बसीरत व बरदाष्त होना ज़रूरी है वरना अगर परचम सरनिगूँ हो गया तो न लष्कर का कोई वेक़ार रह जाएगा और न मज़हब का कोई एतबार रह जाएगा।
सरकारे दो आलम (स0) ने इन्हें ख़ुसूसियात के पेषे नज़र ख़ैबर के मौक़े पर एलान फ़रमाया था के कल मैं उसको अलम दूंगा जो कर्रार, ग़ैरे फ़र्रार, मोहिब्बे ख़ुदा व रसूल (स0), महबूबे ख़ुदा व रसूल (स0) और मर्दे मैदाँ होगा के इसके अलावा कोई “ाख़्स अलमबरदारी का अहल नहीं हो सकता है!-)))


174-आपका इरषादे गिरामी
(तल्हा बिन अब्दुल्लाह के बारे में जब आपको ख़बर दी गई के तल्हा व ज़ुबैर जंग के लिये बसरा की तरफ़ रवाना हो गए हैं)


मुझे किसी ज़माने में भी न जंग से मरऊब किया जा सका है और न हर्ब व ज़र्ब से डराया जा सका है। मैं अपने परवरदिगार के नुसरत पर मुतमईन हूँ और ख़ुदा की क़सम उस “ाख़्स ने ख़ूने उस्मान के मुतालबे के साथ तलवार खींचने में सिर्फ़ इसलिये जल्दबाज़ी से काम लिया है के कहीं उसी से इस ख़ून का मुतालेबा न कर दिया जाए के इसी अम्र का गुमान ग़ालिब है और क़ौम में उससे ज़्यादा उस्मान के ख़ून का प्यासा कोई न था। अब यह इस फ़ौजकषी के ज़रिये लोगों को मुग़ालते में रखना चाहता है और मसले को मुष्तबा और मषकूक बना देना है। हालांके ख़ुदा गवाह है के उस्मान के मामले में उसका मुआमला तीन हाल से ख़ाली नहीं था, अगर उस्मान ज़ालिम था जैसा के इसका ख़याल था तो इसका फ़र्ज़ था के क़ातिलों की मदद करता और उस्मान के मददगारों को ठुकरा देता और अगर वह मज़लूम था तो उसका फ़र्ज़ था के इसके क़त्ल से रोकने वालों और उसकी तरफ़ से माज़ेरत करने वालों में “ाामिल हो जाता और अगर यह दोनों बातें मषकूक थीं तो इसके लिये मुनासिब था के इस मामले से अलग होकर एक गोषे में बैठ जाता और उन्हें क़ौम के हवाले कर देता लेकिन उसने इन तीन में से कोई भी तरीक़ा इख़्तेयार नहीं किया और ऐसा तरीक़ा इख़्तेयार किया जिसकी सेहत का कोई जवाज़ नहीं था और इसकी माज़ेरत का कोई रास्ता नहीं था।


175-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें मौअज़त के साथ रसूले अकरम से क़राबत का ज़िक्र कर किया गया है)


ऐ वह ग़ाफ़िलों जिनकी तरफ़ से ग़फ़लत नहीं बरती जा सकती है और ऐ छोड़ देने वालों जिनको छोड़ा नहीं जा सकता है। (ताअज्जुब है) मुझे क्या हो गया के मैं तुम्हें अल्लाह से दूर भागते हुए और ग़ैरे ख़ुदा की रग़बत करते हुए देख रहा हूँ। गोया तुम वह ऊंट हो जिनका चरवाहा उन्हें एक हलाक कर देने वाली चरागाह और तबाह कर देने वाले घाट पर ले आया हो या वह चैपाया हो जिसे छुरियों (से ज़िबह करने) के लिये पाला गया है के उसे नहीं मालूम है  के जब उनके साथ अच्छा बरताव किया जाता है तो उससे मक़सूद किया है। यह तो अपने दिन को अपना पूरा ज़माना ख़याल करते हैं और पेट भर कर खा लेना ही अपना काम समझते हैं।
ख़ुदा की क़सम मैं चाहूँ तो हर “ाख़्स को इसके दाखि़ल और ख़ारिज होने की मन्ज़िल से आगाह कर सकता हूं और जुमला हालात को बता सकता हूँ। लेकिन मैं डरता हूँ के कहीं तुम मुझमें गुम होकर रसूले अकरम (स0) का इन्कार न कर दो और याद रखो के मैं इन बातों से उन लोगों को बहरहाल आगाह करूंगा जिनसे गुमराही का ख़तरा नहीं है। क़सम है उस ज़ाते अक़दस की जिसने उन्हें हक़ के साथ भेजा है और मख़लूक़ात में मुन्तख़ब क़रार दिया है के मैं सिवाए सच के कोई कलाम नहीं करता हूँ।


(((-मोअर्रेख़ीन का इस अम्र पर इत्तेफ़ाक़ है के उस्मान के आखि़र दौरे हयात में इनके क़ातिलों का इज्तेमाअ तल्हा के घर में हुआ करता था और अमीरूल मोमेनीन (अ0) ही ने इस अम्र का इन्केषाफ़ किया था इसके बाद तल्हा ही ने जनाज़े पर तीर बरसाए थे और मुसलमानों के क़ब्रिस्तान में दफ़न करने से रोक दिया था लेकिन चार दिन के बाद वह ज़ालिम ख़ूने उस्मान का वारिस बन गया और उस्मान के वाक़ेई मोहसिन को उनके ख़ून का ज़िम्मेदार ठहरा दिया। कहीं ऐसा न हो के मुसलमानों को सोचने का मौक़ा मिल जाए, बनी उमय्या तल्हा से इन्तेक़ाम लेने के लिये तैयार हो जाएं और यह तरीक़ा हर “ाातिर सियासतकार का होता है।-)))


रसूले ख़ुदा (स0) ने सारी बातें मुझे बता दी हैं और हलाक होने वाले की हलाकत और निजात पाने वाले की निजात का रास्ता भी बता दिया है मुझे इस अम्रे खि़लाफ़त के अन्जाम से भी बाख़बर कर दिया है और कोई ऐसी “ौ नहीं है जो मेरे सर से गुज़रने वाली हो और उसे मेरे कानों में न डाल दिया हो और मुझ तक पहुंचा न दिया हो।
ऐ लोगों! ख़ुदा गवाह है के मैं तुम्हें किसी इताअत पर आमादा नहीं करता हूँ मगर पहले ख़ुद सबक़त करता हूँ और किसी मासियत से नहीं रोकता हूं मगर यह के पहले ख़ुद उससे बाज़ रहता हूँ।