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Nahjul Balagha Hindi Khutba 192-194 नहजुल बलाग़ा हिन्दी ख़ुत्बा 192-194

192-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(ख़ुत्बए क़ासअ)


(इस ख़ुत्बे में इबलीस के तकब्बुर की मज़म्मत की गई है और इस अम्र का इज़हार किया गया है के सबसे पहले तास्सुब और ग़ुरूर का रास्ता इसी ने इख़्तेयार कया है लेहाज़ा इससे इजतेनाब ज़रूरी है)
 

सारी तारीफ़ उस अल्लाह के लिये हैं जिसका लिबास इज़़्त और किबरियाई है और उसने इस कमाल में किसी को “ारीक नहीं बनाया है। उसने दोनों सिफ़तों को हर एक के लिये हराम और ममनूअ क़रार देकर सिर्फ़ अपनी इज़्ज़त व जलाल के लिये मुन्तख़ब कर लिया है और जिसने भी इन दोनों सिफ़तों में उससे मुक़ाबला करना चाहा है उसे मलऊन क़रार दे दिया है। इसके बाद इसी रूख़ से मलाएका मुक़र्रबीन का इम्तेहान लिया है ताके तवाज़ोह करने वालों और ग़ुरूर रखने वालों में इम्तियाज़ क़ायम हो जाए और इसी बुनियाद पर उस दिलों के राज़ और ग़ैब के इसरार से बाख़बर परवरदिगार ने यह एलान कर दिया के ‘‘मैं मिट्टी से एक बषर पैदा करने वाला हूँ और जब इसका पैकर तैयार हो जाए और मैं इसमें अपनी रूहे कमाल फूंक दूं तो तुम सब सजदे में गिर पड़ना’’ जिसके बाद तमाम मलाएका ने सजदा कर लिया, सिर्फ़ इबलीस ने इन्कार कर दिया’’ के उसे तास्सुब लाहक़ हो गया और उसने अपनी तख़लीक़ के माद्दे से आदम पर फ़ख़्र किया और अपनी असल की बिना पर इस्तकबार का षिकार हो गया। जिसके बाद यह दुष्मने ख़ुदा तमाम मुतास्सुब अफ़राद का पेषवा और तमाम मुतकब्बिर लोगों का मोरिसे आला बन गया। उसी ने असबियत की बुनियाद क़ायम की और उसी ने परवरदिगार से जबरूत की रिदा में मुक़ाबला किया और अपने ख़याल में इज़्ज़त व जलाल का लिबास ज़ेबे तन कर लिया और तवाज़ोअ का नक़ाब उतार कर फ़ेंक दिया।
अब क्या तुम नहीं देख रहे हो के परवरदिगार ने किस तरह उसे तकब्बुर की बिना पर छोटा बना दिया है और बलन्दी के इज़हार की बुनियाद पर पस्त कर दिया है। दुनिया में इसे मलऊन क़रार दे दिया है और आख़ेरत में उसके लिये आतिषे जहन्नम का इन्तेज़ाम कर दिया है।
अगर परवरदिगार यह चाहता के आदम (अ0) को एक ऐसे नूर से ख़ल्क़ करे जिसकी ज़िया आंखों को चकाचैंद कर दे और जिसकी रौनक़ अक़्लों को मबहूत कर दे या ऐसी ख़ुषबू से बनाए जिसकी महक सांसों को जकड़ ले तो यक़ीनन कर सकता था और अगर ऐसा कर देता तो यक़ीनन गर्दनें उनके सामने झुक जातीं और मलाएका का इम्तेहान आसान हो जाता लेकिन वह उन चीज़ों से इम्तेहान लेना चाहता था जिनकी असल मालूम न हो ताके इसी इम्तेहान से इनका इम्तियाज़ क़ायम हो सके और उनके इस्तेकबार का इलाज किया जा सके और उन्हें ग़ुरूर से दूर रखा जा सके।
तो अब तुम परवरदिगार के इबलीस के साथ बरताव से इबरत हासिल करो के उसने इसके तवील अमल और बेपनाह जद्दो जेहद को तबाह व बरबाद कर दिया जबके वह छः हज़ार साल इबादत कर चुका था।
 

(((-इसमें कोई “ाक नहीं है के मलाएका की इस्मत बषर जैसी इख़्तेयारी नहीं है जहां इन्सान सारे जज़्बात व ख़्वाहिषात से टकराकर इस्मते किरदार का मुज़ाहिरा करता है। लेकिन इसमें भी कोई “ाक नहीं है के मलाएका बिल्कुल जमादात व नबातात जैसे नहीं हैं के उन्हें किसी तरह का इख़्तेयार हासिल न हो। वरना अगर ऐसा होता तो न तकलीफ़ के कोई मानी होते और न इम्तेहान का कोई मक़सद होता। इनमें जज़्बात व एहसासात हैं लेकिन बषर जैसे नहीं हैं। उन्हें फ़ेल व तर्क का इख़्तेयार हासिल है लेकिन बिल्कुल इन्सानों जैसा नहीं है। इसी बिना पर इनका इम्तेहान लिया गया और इम्तेहान सिर्फ़ जज़्बा हब ज़ात और अनानीयत से मुताल्लिक़ था के यह जज़्बा मलक के अन्दर भी बज़ाहिर पाया जाता है।  और इसी जज़्बे की आज़माइष के लिये आदम (अ0) को बज़ाहिर ‘‘पस्त तरीन अनासिर’’ से पैदा किया गया जिसे आम तौर से पैरों से रौन्द दिया जाता है लेकिन इसी पैकरे ख़ाकी में रूहे कमाल को फूंक कर इतना बलन्द बना दिया के मलाएका के मसजूद बनने के लाएक़ हो गए और क़ुदरत ने इन्सानों को भी मुतवज्जो कर दिया के तुम्हारा कमाल तुम्हारी असल से नहीं है, तुम्हारा कमाल हमारे राबते और ताल्लुक़ से है, लेहाज़ा जब तक यह राबेता बरक़रार रहेगा तुम साहेबे कमाल रहोगे और जिस दिन यह राबेता टूट जाएगा, तुम ख़ाक का ढेर हो जाओगे और बस!-)))


जिनके बारे में किसी को मालूम नहीं है के वह दुनिया के साल थे या आख़ेरत के मगर एक साअत के तकब्बुर ने सबको मलियामेट कर दिया तो अब इस (इबलीस) के बाद कौन रह जाता है जो ऐसी मासियत के अज़ाबे इलाही से महफ़ूज़ रह सकता है।
यह हरगिज़ मुमकिन नहीं है के जिस जुर्म की बिना पर मलक को निकाल बाहर किया उसके साथ बषर को दाखि़ले जन्नत कर दे जबके ख़ुदा का क़ानून ज़मीन व आसमान के लिये एक ही जैसा है और अल्लाह और किसी ख़ास बन्दे के दरम्यान कोई ऐसा ख़ास ताल्लुक़ नहीं है के वह उसके लिये इस चीज़ को हलाल कर दे जो उसने सारे आलमीन के लिये हराम क़रार दी है।
बन्दगाने ख़ुदा! इस दुष्मने ख़ुदा से होषियार रहो, कहीं तुम्हें भी अपने मर्ज़ में मुब्तिला न कर दे और कहीं अपनी आवाज़ पर खींज न ले और तुम पर अपने सवारों और प्यादे लष्कर से हमला न कर दे। इसलिये के मेरी जान की क़सम उसने तुम्हारे लिये “ारांगेज़ी के तीर को चिल्लए कमान में जोड़ लिया है और कमान को ज़ोर से खींच लिया है और तुम्हें बहुत नज़दीक से निषाना बनाना चाहता है। उसने साफ़ कह दिया है (अल्लाह ने उसकी ज़बानी फ़रमाया है) के ‘‘परवरदिगार जिस तरह तूने मुझे बहका दिया है अब मैं भी इनके लिये गुनाहों को आरास्ता कर दूंगा और इन सबको गुमराह कर दूंगा’’ हालांके यह बात बिल्कुल अटकल पच्चू में कही थी और बिल्कुल ग़लत अन्दाज़े की बिना पर ज़बान से निकाली थी लेकिन ग़ुरूर की औलाद, तास्सुब की बिरादरी और तकब्बुर व जाहेलीयत के “ाहसवारों ने इसकी बात की तस्दीक़ कर दी। यहां तक के जब तुम में से मुंहज़ोरी करने वाले उसके मुतीअ हो गए और उसकी तमअ तुम में मुस्तहकम हो गई तो बात परदए राज़ से निकल कर मन्ज़रे आम आ गई। उसने अपने इक़तेदार को तुम पर क़ायम कर लिया और अपने लष्करों का रूख़ तुम्हारी तरफ़ मोड़ दिया। फ़ित्नों ने तुम्हें ज़िल्लत के ग़ारों में ढकेल दिया और तुम्हें क़त्ल व ख़ून के भंवर में फंसा दिया और मुसलसल ज़ख़्मी करके पामाल कर दिया। तुम्हारी आंखों में नैज़े चुभो दिये, तुम्हारे हल्क़ पर ख़न्जर चला दिये और तुम्हारी नाक (नथनों) को रगड़ (पारा-पारा कर) दिया, तुम्हारे जोड़ बन्द को तोड़ दिया और तुम्हारी नाक में तस्लत व ग़लबे की नकेलें डाल कर तुम्हें उस आग की तरफ़ खींच लिया जो तुम्हारे ही वास्ते मुहैया की गई है । वह तुम्हारी दीन को इन सबसे ज़्यादा मजरूह करने वाला और तुम्हारी दुनिया में उन सबसे ज़्यादा फ़ित्ना व फ़साद की आग भड़काने वाला है जिनसे मुक़ाबले की तुमने तैयारी कर रखी है और जिनके खि़लाफ़ तुमने लष्कर जमा किये हैं। लेहाज़ा अब अपने ग़ैज़ व ग़ज़ब का मरकज़ उसी को क़रार दो और सारी कोषिष उसी के खि़लाफ़ सर्फ़ करो।
ख़ुदा की क़सम उसने तुम्हारी असल पर अपनी बरतरी का इज़हार किया है और तुम्हारे हसब में ऐब निकाला है और तुम्हारे नसब पर ताना दिया है और तुम्हारे खि़लाफ़ लष्कर जमा किया है और तुम्हारे रास्ते को अपने प्यादों से रौंदने का इरादा किया है। जो हर जगह तुम्हारा षिकार करना चाहते हैं और हर मक़ाम पर तुम्हारे एक-एक उंगली के पोर ज़र्ब लगाना चाहते हैं और तुम न किसी हीले से अपना बचाव करते हो और न किसी अज़्म व इरादे से अपना दिफ़ाअ करते हो, दरआन्हालीके तुम ज़िल्लत के भंवर, तंगी के दाएरे, मौत के मैदान और बलाओं की जूला निगाह में हो।


(((- इस मक़ाम पर यह सवाल ज़रूर पैदा होता है के सूरए कहफ़ की आयत नम्बर 5 में इबलीस को जिन्नात में क़रार दिया गया है तो इस मक़ाम पर इसे मलक के लफ़्ज़ से किस तरह ताबीर किया गया है। इसका जवाब बिल्कुल वाज़ेह है के मक़ामे तकलीफ़ में हमेषा ज़ाहिर को देखा जाता है और मक़ामे जज़ा में हक़ीक़त पर निगाह की जाती है, ईमान के एहकाम उन तमाम अफ़राद के लिये हैं जिनका ज़ाहिर ईमान है लेकिन ईमान की जज़ा और उसका इनआम सिर्फ़ उन अफ़राद के लिये है जो वाक़ेई साहेबाने ईमान हैं।
यही हाल मलाएका और जिन्नात का है के मलाएका के एहकाम में वह तमाम अफ़राद “ाामिल हैं जो अपने मलक होने के दावेदार हैं चाहे वाक़ेअन क़ौमे जिन से ताल्लुक़ रखते हों और मलाएका की अज़मत व “ाराफ़त सिर्फ़ उन अफ़राद के लिये है जो वाक़ेअन मलक हैं और उसका क़ौमे जिन से कोई ताल्लुक़ नहीं है।-)))


अब तुम्हारा फ़र्ज़ है के तुम्हारे दिलों में जो अस्बियत और जाहेलियत के कीनों की आग भड़क रही है उसे बुझा दो के यह ग़ुरूर एक मुसलमान के अन्दर “ौतानी वसवसों, फ़ितना अंगेज़ियों और फ़सोकारियों का नतीजा है (क्योंके मुसलमान में यह ग़ुरूर ख़ुद पसन्दी “ौतान की वसवसा अन्दाज़ी, नख़वत पसन्दी, फ़ित्ना अंगेज़ी और फसांेकारी ही का नतीजा होती है अज्ज़ व फ़रवतनी का सरताज बनाए कब्र व ख़ुद बीनी को पैरों तले रौंदने और तकब्बुर व रऊनत का तौक़ गर्दन से उतारने का अज़म बिल जज़्म कर लो) अपने सर पर तवाज़ोह का ताज रखने का अज़म करो और तकब्बुर को पैरों तले रख कर कुचल दो, ग़ुरूर के तौक़ को अपनी गर्दनों से उतार कर फेंक दो और अपने दुष्मन इब्लीस और उसके लष्करों के दरम्यान तवाज़ोह व इन्केसार का मोर्चा क़ायम कर लो के उसने हर क़ौम में अपने लष्कर, मददगार, प्यादे, सवार सब का इन्तेज़ाम कर लिया है और तुम उस “ाख़्स के जैसे न हो जाओ जिसने अपने माँजाए के मुक़ाबले में ग़ुरूर किया बग़ैर इसके के अल्लाह ने उसे कोई फ़ज़ीलत अता की हो, अलावा इसके के हसद की अदावत ने उसके नफ़्स में अज़मत का एहसास पैदा करा दिया और बेजा ग़ैरत ने उसके दिल में ग़ज़ब की आग भड़का दी। “ौतान ने इसकी नाक में तकब्बुर की हवा फूंक दी और अन्जामकार निदामत ही हाथ आई0आर0सी0 और क़यामत तक के तमाम क़ातिलों का गुनाह इसके सर आ गया के इसने क़त्ल की बुनियाद क़ायम की है।
याद रखो तुमने अल्लाह से खुल्लम खुल्ला दुष्मनी और साहेबाने ईमान से जंग का एलान करके ज़ुल्म की इन्तेहा कर दी है और ज़मीन में फ़साद बरपा कर दिया है। ख़ुदारा ख़ुदा से डरो, तकब्बुर के ग़ुरूर और जाहेलियत के तफ़ाख़र के सिलसिले में के यह अदावतों के पैदा करने की जगह और “ौतान की फ़सोंकारी की मन्ज़िल है। (तुम ज़माने जाहिलीयत वाली ख़ुदबीनी की बिना पर फ़ख़्र व ग़ुरूर करने से अल्लाह का ख़ौफ़ खाओ क्योंके यह दुष्मनी व अनाद का सरचष्मा और “ौतान की फ़सोंकारी का मरकज़ है, जिससे उसने गुज़िष्ता उम्मतों और पहली क़ौमों को वरग़लाया, यहाँ तक के वह इसके ढकेलने और आगे से खींचने पर बे चूँ व चरा जेहालत की अन्ध्यारियों और ज़लालत के गढ़ों में तेज़ी से गिर पड़े हैं। ऐसी सूरत से जिसमें ऐसे लोगों के तमाम दिल मिलते-जुलते हुए हैं और सदियों का हाल एक ही सा रहा है और ऐसा ग़ुरूर जिसके छिपाने से सीनों की वुसअतें तंंग होती हैं।
आगाह हो जाओ! अपने उन सरदारों और बड़ों (बुज़ुर्गों) की इताअत से मोहतात रहो जिन्होंने अपने हसब पर ग़ुरूर किया और अपने नसब की बलन्दियों की बुनियाद पर ऊंचे बन गए। बदनुमा चीज़ों को अल्लाह के सर डाल दिया और उसके एहसानात का सरीही इन्कार कर दिया। उन्होंने उसके क़ज़ा व क़द्र से टक्कर लेने और उसकी नेमतों पर ग़लबा पाने के लिये उसके एहसानात से यकसर इन्कार कर दिया। यही वह लोग हैं जो अस्बियत की बुनियाद के सुतुन (फ़ितने के काख़ व ऐवान के सुतून) और जाहेलीयत के नसबी तफ़ाख़ुर की तलवारें हैं।
अल्लाह से डरो और ख़बरदार उसकी नेमतों के दुष्मन और उसके दिये हुए फ़ज़ाएल के हासिद न बनो। इन झूठे मदइयाने इस्लाम का इत्तेबाअ न करो जिनके गन्दे पानी को अपने साफ़ पानी में मिलाकर पी रहे हो और जिनकी बीमारियों को तुमने अपनी सेहत के साथ मख़लूत कर दिया है और जिनके बातिल को अपने हक़ में “ाामिल कर लिया है, यह लोग फ़िस्क़ व फ़ुजूर की बुनियाद हैं और नाफ़रमानियों के साथ चिपके हुए हैं।


(((- माँजाये से हाबील और क़ाबील की तरफ़ इषारा है जहां क़ाबील ने सिर्फ़ हम्द और तास्सुब की बुनियाद पर अपने हक़ीक़ी भाई का ख़ून कर दिया और अल्लाह की पाकीज़ा ज़मीन को खून ब हक़ से रंगीन कर दिया और इस तरह दुनिया में क़त्ल व ख़ून का सिलसिला “ाुरू हो गया जिसके हर जुर्म में क़ाबील का एक हिस्सा बहरहाल रहेगा।
किसी क़ौम की तबाही और बरबादी में सबसे बड़ा हाथ उन रईसों और सरदारों का होता है जिनकी हैसियत कुछ नहीं होती है लेकिन अपने को इस क़द्र अज़ीम बनाकर पेष करते हैं जिसका अन्दाज़ा करना मुष्किल होता है। उनके पास तास्सुब, अनाद, ग़ुरूर और तकब्बुर के अलावा कुछ नहीं होता है और ग़रीब बन्दगाने ख़ुदा को यह समझाना चाहते हैं के अल्लाह ने हमको बलन्द बनाया है और उसी ने तुम्हें पस्त क़रार दिया है लेहाज़ा अब तुम्हारा फ़र्ज़ है के उसके फ़ैसले पर राज़ी रहो और हमारी इताअत की राह पर चलते रहो, बग़ावत का इरादा मत करो के यह क़ज़ा व क़द्रे इलाही से बग़ावत है और यह “ााने इस्लाम के खि़लाफ़ है-)))


इबलीस ने उन्हें गुमराही की सवारी बनाया है और ऐसा लष्कर क़रार दे लिया है जिसके ज़रिये लोगों पर हमला करता है और यही उसके तर्जुमान हैं जिनकी ज़बान से वह बोलता है। तुम्हारी अक़्लों को छीनने के लिये तुम्हारी आंखों में समा जाने के लिये और तुम्हारे कानों में अपनी बातों को फूंकने के लिये उसने तुम्हें अपने तीरों का निषाना और अपने क़दमों की जुला निगाह और अपने हाथों का खिलौना बना लिया है।
देखो तुमसे पहले इस्तेकबार करने वाली क़ौमों पर जो ख़ुदा का अज़ाब, हमला, क़हर और इताब नाज़िल हुआ है उससे इबरत हासिल करो। इनके ख़सारों के भल लेटने और पहलुओं के भल गिरने से नसीहत हासिल करो, अल्लाह की बारगाह में तकब्बुर की पैदावार की मन्ज़िलों से इस तरह पनाह मांगो जिस तरह ज़माने के हवादिस से पनाह मांगते हो। अगर परवरदिगार तकब्बुर की इजाज़त किसी बन्दे को दे सकता तो सबसे पहले अपने मख़सुस अम्बिया और औलिया को इजाज़त देता लेकिन उस बेनियाज़ ने इनके लिये भी तकब्बुर को नापसन्दीदा क़रार दिया है और उनकी भी तवाज़ोह ही से ख़ुष हुआ है। उन्होंने अपने रूख़सारों को ज़मीन से चिपका दिया था और अपने चेहरों को ख़ाक पर रख दिया था और अपने “ाानों को मोमेनीन के लिये झुका दिया था।
यह सब समाज के वह कमज़ोर बना दिये जाने वाले अफ़राद थे जिनका ख़ुदा ने भूक से इम्तेहान लिया, मसाएब से आज़माया ख़ौफ़नाक मराहेल से इख़्तेयार किया और नाख़ुषगवार हालात में उन्हें तहो बाला करके देख लिया। ख़बरदार ख़ुदा की ख़ुषनूदी और नाराज़गी का मेयार माल और औलाद को क़रार न देना के तुम फ़ित्ने की मन्ज़िलों को नहीं पहचानते हो और तुम्हें नहीं मालूम है के ख़ुदा मालदारी और इक़्तेदार से किस तरह इम्तेहान लेता है। उसने साफ़ एलान कर दिया है ‘‘क्या इन लोगों का ख़याल है के हम उन्हें माल व औलाद की फ़रावानी अता करके उनकी नेकियों में इज़ाफ़ा कर रहे हैं, हक़ीक़त यह है के उन्हें कोई “ाऊर नहीं है।’’
अल्लाह अपने को ऊंचा समझने वालों का इम्तेहान अपने कमज़ोर क़रार दिये जाने वाले औलिया के ज़रिये लिया करता है।
देखो मूसा बिन इमरान अपने भाई हारून के साथ फ़िरऔन के दरबार में इस “ाान से दाखि़ल हुए के उनके बदल पर ऊन का पैराहन था और उनके हाथ में एक असा था, इन हज़रात ने इससे वादा किया के ‘‘अगर इस्लाम क़ुबूल करेगा तो उसके मुल्क और उसकी इज़्ज़त को दवाम व बक़ा अता कर देंगे तो उसने लोगों से कहा’’ क्या तुम लोग इन दोनों के चाल पर ताज्जुब नहीं कर रहे हो जो इन फ़क्ऱ-व-फ़ाक़ा की हालत में मेरे पास आए हैं और मेरे मुल्क को दवाम की ज़मानत दे रहे हैं, अगर यह ऐसे ही ऊंचे हैं तो इन पर सोने के कंगन क्यों नहीं नाज़िल हुए?’’ उसकी नज़र में सोना और इसकी जमा आवरी एक अज़ीम कारनामा था और ऊन का लिबास पहनना ज़िल्लत की अलामत था। हालांके अगर परवरदिगार चाहता तो अम्बियाए कराम की बअसत के साथ ही उनके लिये सोने के ख़ज़ाने, तलाए ख़ाहज़ के मआवन, बाग़ात के कष्तज़ारों के दरवाज़ों के दरवाज़े खोल देता और उनके साथ फ़िज़ा में परवाज़ करने वाले परिन्दे और ज़मीन के चैपायों को उनका ताबेअ फ़रमान बना देता, लेकिन ऐसा कर देता तो आज़माइष ख़त्म हो जाती और इनआमात का सिलसिला भी बन्द हो जाता।


(((-वाक़ेअन अजीब व ग़रीब मन्ज़र रहा होगा जब अल्लाह के दो मुख़लिस बन्दे मामूली लिबास पहले हुए फ़िरऔन के दरबार में खड़े होंगे और उसे दीने हक़ की दावत दे रहे होंगे और उससे जज़ा व इनआम का वादा कर रहे होंगे और वह मुस्कुराकर दरबारियों की तरफ़ देख रहा होगा, ज़रा इन दोनों की जराअत तो देखो, ख़ुदाए वक़्त को दावते बन्दगी दे रहे हैं और फिर हौसले तो देखो, बोसीदा लिबास के बावजूद इनामात का वादा कर रहे हैं और मामूली हैसियत के साथ अज़ाबे अलीम से डरा रहे हैं।
लेकिन जनाबे मूसा (अ0) ने इन हालात की कोई परवाह नहीं की और निहायत सुकून व वेक़ार के साथ अपना पैग़ाम सुनाते रहे के अल्लाह वाले सल्तनत व जबरूत से मरऊब नहीं होते हैं और बेहतरीन जेहाद यही है के सुलतान जाबिर के सामने कलमए हक़ बलन्द कर दिया जाए और हक़ की आवाज़ को दबने न दिया जाय।-)))


आसमानी ख़बरें भी बेकार व बरबाद हो जातीं। न मसाएब को क़ुबूल करने वालों को इम्तेहान देने वाले का अज्र मिलता और न साहेबाने ईमान को ऐसे (फ़िरऔन जैसे) किरदारों जैसा इनाम मिलता और न अलफ़ाज़ मानी का साथ देते।
अलबत्ता परवरदिगार ने अपने पुरसलीन को इरादों के एतबार से इन्तेहाई साहबे क़ूवत क़रार दिया है अगरचे देखने में हालात के एतबार से बहुत कमज़ोर हैं उनके पास वह क़नाअत है जिसने लोगों के दिल व निगाह को उनकी बे नियाज़ी से मामूर कर दिया है और वह ग़ुरबत है जिसकी बिना पर लोगों की आंखों और कानों को अज़ीयत होती है।
अगर अम्बियाए कराम ऐसी क़ूवत के मालिक होते जिसका इरादा भी न किया जा सके और ऐसी इज़्ज़त के दारा होते जिसको ज़लील न किया जा सके और ऐसी सल्तनत के हामिल होते जिसकी तरफ़ गर्दनें उठती हों और सवारियों के पालान कसे जाते हों तो यह बात लोगों की इबरत हासिल करने के लिये आसान होती और उन्हें इस्तकबार से बा-आसानी दूर कर सकती और सब के सब क़हर आमेज़ ख़ौफ़ और लज़्ज़त आमेज़ रग़बत की बिना पर ईमान ले आते, सब की नीयतें एक जैसी होतीं और सबके दरम्यान नेकियां तक़सीम हो जातीं। लेकिन उसने यह चाहा के उसके रसूलों का इत्तेबाअ और उसकी किताबों की तस्दीक़ और उसकी बारगाह में ख़ुज़ू और उसके सामने फ़रवतनी और उसके एहकाम की फ़रमाबरदारी और उसकी इताअत सब उसकी ज़ाते अक़दस से मख़सूस रहें और इसमें किसी तरह की मिलावट न होने पाए और ज़ाहिर है के जिस क़दर आज़माइष और इम्तेहान में षिद्दत होगी उसी क़द्र अज्र व सवाब भी ज़्यादा होगा।
क्या तुम यह नहीं देखते हो के परवरदिगारे आलम ने आदम (अ0) के दौर से आज तक अव्वलीन व आख़ेरीन सबका इम्तेहान लिया है उन पत्थरों के ज़रिये जिनका बज़ाहिर न कोई नफ़ा है और न नुक़सान, न उनके पास बसारत है और न समाअत, लेकिन उन्हीं से अपना वह मोहतरम मकान बनवा दिया है जिसे लोगों के क़याम का ज़रिया क़रार दे दिया है और फिर उसे ऐसी जगह क़रार दिया है जो रूए ज़मीन पर इन्तेहाई पथरीली व बलन्द ज़मीनों में इन्तेहाई मिटटी वाली वादियों में एतराफ़ के एतबार से इन्तेहाई तंग है उसके एतराफ़ सख़्त क़िस्म के रेतीले मैदान, के पानी वाले चष्मे और मुनतषिर क़िस्त की बस्तियां हैं जहां न ऊंट परवरिष पा सकते हैं और न गाय और न बकरियां।
इसके बाद उसने आदम (अ0) और उनकी औलाद को हुक्म दे दिया के अपने कान्धों को उसकी तरफ़ मोड़ दें और इस तरह उसे सफ़रों से फ़ायदा उठाने की मन्ज़िल और पालानों के उतारने की जगह बना दिया जिसकी तरफ़ लोग दौरे इफ़तादा बेआब-व-ग्याह बियाबानों, दूर-दराज़ घाटियों के नषेबी रास्तों, ज़मीन से कटे हुए दरियाओं के जज़ीरों से दिल व जान से मुतवज्जो होते हैं ताके ज़िल्लत के साथ अपने कान्धों को हरकत दें और उसके गिर्द अपने परवरदिगार की उलूहियत का एलान करें और पैदल इस आलम में दौड़ते रहें के उनके बाल बिखरे हुए हों और सर पर ख़ाक पड़ी हुई हो। अपने पैराहनों को उतार कर फेंक दें।


(((-यह उस अम्र की तरफ़ इषारा है के तामीरे ख़ानए काबा का ताल्लुक़ जनाबे इबराहीम (अ0) से नहीं है बल्कि जनाबे आदम (अ0) से है। सबसे पहले उन्होंने हुक्मे ख़ुदा से उसका घर बनाया और उसका तवाफ़ किया और फिर अपनी औलाद को तवाफ़ का हुक्म दिया और यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा यहाँ तक के तूफ़ाने नूह (अ0) के मौक़े पर इस तामीर को बलन्द कर लिया गया और इसके बाद जनाबे इबराहीम (अ0) ने अपने दौर में इसकी दीवारों को बलन्द करके एक मकान की हैसियत दे दी जिसका सिलसिला आजतक क़ायम है और सारी दुनिया से मुसलमान इस घर का तवाफ़ करने के लिये आ रहे हैं जबके इसकी तामीरी हैसियत लाखों मकानों से कमतर है लेकिन मसल इसकी माद्दी हैसियत का नहीं है, मसला इसकी निस्बत का है जो परवरदिगार ने अपनी तरफ़ दे दी है और इसे मरजअ ख़लाएक़ बना दिया है जिस तरह के सरकारे दो आलम (स0) ने ख़ुद मौलाए कायनात को ‘‘अन्ता बेमन्जे़लतिल काबते’(काबा)’’ कह के मरजअ अवाम व ख़वास बना दिया है के इससे इन्हेराफ़ की कोई गुन्जाइष नहीं रह गई है।’’-)))


और बाल बढ़ाकर अपने हुस्न व जमाल को बदनुमा बना लें यह एक अज़ीम इब्तिला, “ादीद इम्तेहान और वाज़ेह इख़्तेयार है जिसके ज़रिये अबदीयत की मुकम्मल आज़माइष हो रही है, परवरदिगार ने इस मकान को रहमत का ज़रिया और जन्नत का वसीला बना दिया है। वह अगर चाहता तो इस घर को और उसके तमाम मषाएर को बाग़ात और नहरों के दरम्यान नर्म व हमवार ज़मीन पर बना देता जहां घने दरख़्त होते और क़रीब क़रीब फ़ल। इमारतें एक दूसरे से जुड़ी होतीं और आबादियाँ एक दूसरे से मुत्तसिल, कहीं सुरख़ी माएल गन्दुम के पौदे होते और कहीं सरसब्ज़ बाग़ात, कहीं चमन ज़ार होता और कहीं पानी में डूबे हुए मैदान, कहीं सरसब्ज़ व “ाादाब किष्तज़ार होते और कहीं आबाद गुज़रगाहें लेकिन इस तरह आज़माइष की सहूलत के साथ जज़ा की मिक़दार भी घट जाती।
और अगर जिस बुनियाद पर इस मकान को खड़ा किया गया है वह सब्ज़ ज़मदावर सुखऱ् याक़ूत जैसे पत्थरों और नूर व ज़िया की ताबानियों से इबारत होती तो सीनों पर “ाुकूक के हमले कम हो जाते और दिलों से इबलीस की मेहनतों का असर ख़त्म हो जाता और लोगों के ख़लजाने क़ल्ब का सिलसिला ख़त्म हो जाता। लेकिन परवरदिगार अपने बन्दों को सख़्त तरीन हालात से आज़माना चाहता है और उनसे संगीनतरीन मषक़्क़तों के ज़रिये बन्दगी कराना चाहता है और उन्हें तरह-तरह के नाख़ुषगवार हालात से आज़माना चाहता है ताके उनके दिलों से तकब्बुर निकल जाए और उनके नुफ़ूस में तवाज़ोअ और फ़रवतनी को जगह मिल जाए और इसी बात को फ़ज़्ल व करम के खुले हुए दरवाज़ों और अफ़ू व मग़फ़ेरत के आसानतरीन वसाएल में क़रार दे दे।
देखो दुनिया में सरकषी के अन्जाम, आख़ेरत में ज़ुल्म के अज़ाब और तकब्बुर के बदतरीन नतीजे के बारे में ख़ुदा से डरो के यह तकब्बुर “ौतान का अज़ीमतरीन जाल और बुज़ुर्गतरीन मक्र है जो दिलों में इस तरह उतर जाता है जैसे ज़हरे क़ातिल के न इसका असर ज़ाएल होता है और न इसका वार ख़ता करता है, न किसी आलिम के इल्म की बिना पर और न किसी नादार पर इसके फटे कपड़ों की बिना पर।
और इसी मुसीबत से परवरदिगार ने अपने साहेबाने ईमान बन्दों को नमाज़ और ज़कात और मख़सूस दिनों में रोज़े की मषक़्क़त के ज़रिये बचाया है के उनके आज़ा व जवारेह को सुकून मिल जाए, निगाहों में ख़ुषू पैदा हो जाए, नफ़्स में एहसासे ज़िल्लत पैदा हो, दिल बारगाहे इलाही में झुक जाएं और उनसे ग़ुरूर निकल जाए और इस बुनियाद पर के नमाज़ में नाज़ुक चेहरे तवाज़ोअ के साथ ख़ाक आलूद किये जाते हैं और मोहतरम आज़ा व जवारेह को ज़िल्लत के साथ ज़मीन से मिला दिया जाता है और रोज़े में एहसासे आजिज़ी के साथ पेट पीठ से मिल जाते हैं और ज़कात में ज़मीन के बेहतरीन नताएज को फ़ोक़रा व मसाकीन के हवाले कर दिया जाता है।


(((- इन्सान की सबसे बड़ी मुसीबत “ौतान का इत्तेबाअ है और “ौतान का सबसे बड़ा जरबा फ़साद और इस्तेकबार है इसलिये परवरदिगार ने इन्सान को इस हमले से बचाने के लिये नमाज़, रोज़ा और ज़कात को वाजिब कर दिया के नमाज़ के ज़रिये ख़ुज़ू व ख़ुषू का इज़हार होगा। रोज़ा के ज़रिये मषक़्क़त बरदाष्त करने का जज़्बा पैदा होगा और ज़कात के ज़रिये अपनी मेहनत के नताएज में फ़ोक़रा और मसाकीन को मुक़द्दम करने का ख़याल पैदा होगा और इस तरह वह ग़ुरूर निकल जाएगा जो इस्तेकबार की बुनियाद बनता है और जिसकी बिना पर इन्सान “ौतनत से क़रीबतर हो जाता है-)))
 

और देखो के इन आमाल में किस तरह तफ़ाख़ुर के आसार को जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया जाता है और तकब्बुर के नुमायां होने वाले आसार को दबा दिया जाता है।
मैंने तमाम आलमीन को परख कर देख लिया है, कोई “ाख़्स ऐसा नहीं है जिसमें किसी “ौ का तास्सुब पाया जाता हो और उसके पीछे कोई ऐसी इल्लत न हो जिसमें जाहिल धोका खा जाएं या ऐसी दलील न हो जो अहमक़ों की अक़्ल से चिपक जाए, अलावा तुम लोगों के के तुम ऐसी चीज़ का तास्सुब रखते हो जिसकी कोई इल्लत और जिसका कोई सबब नहीं है, देखो इबलीस ने आदम (अ0) के मुक़ाबले में असबियत का इज़हार किया तो अपनी असल की बुनियाद पर उनकी तख़लीक़ पर तन्ज़ किया और यह कह दिया के मैं आग से बना हूँ और तुम ख़ाक से बने हो।
इसी तरह उम्मतों के दौलतमन्दों ने अपनी नेमतों के आसार की बिना पर ग़ुरूर का मुज़ाहिरा किया और यह एलान कर दिया के ‘‘हम ज़्यादा माल व औलाद वाले हैं लेहाज़ा हम पर अज़ाब नहीं हो सकता है’’ लेकिन तुम्हारे पास तो ऐसी कोई बुनियाद भी नहीं है। लेहाज़ा अगर फ़ख़्र ही करना चाहते हो तो बेहतरीन आदात, क़ाबिले तहसीन आमाल और हसीनतरीन ख़साएल की बिना पर करो जिनके बारे में अरब के ख़ानदानों, क़बाएल के सरदारों के बुज़ुर्ग और “ारीफ़ लोग किया करते थे, यानी पसन्दीदा एख़लाक़, अज़ीम व दानाई, आला मरातब और क़ाबिले तारीफ़ कारनामे।
तुम भी इन्हीं क़ाबिले सताइष आमाल पर फ़ख़्र करो, हमसायों का तहफ़्फ़ुज़ करो, अहद व पैमान को पूरा करो, नेक लोगों की इताअत करो, सरकषों की मुख़ालफ़त करो, फ़ज़्ल व करम को इख़्तेयार करो, ज़ुल्म व सरकषी से परहेज़ करो, ख़ूंरेज़ी से पनाह मांगो, ख़ल्क़े ख़ुदा के साथ इन्साफ़ करो, ग़ुस्से को पी जाओ, फ़साद फ़िल अर्ज़ से इज्तेनाब करो के यही सिफ़ात व कमालात क़ाबिले फ़ख्ऱ व मुबाहात हैं।
बदतरीन आमाल की बिना पर गुज़िष्ता उम्मतों पर नाज़िल होने वाले अज़ाब से अपने को महफ़ूज़ रखो, खै़ैर व “ार हर हाल में इन लोगों को याद रखो और ख़बरदार उनके जैसे बदकिरदार न हो जाना।
अगर तुमने उनके अच्छे बुरे हालात पर ग़ौर कर लिया है तो अब ऐसे उमूर को इख़्तेयार करो जिनकी बिना पर इज़्ज़त हमेषा इनके साथ रही। दुष्मन उनसे दूर-दूर रहे, आफ़ियत का दामन उनकी तरफ़ फ़ैला दिया गया, नेमतें उनके सामने सर निगूं हो गईं और करामत व “ाराफ़त ने उनसे अपना रिष्ता जोड़ लिया के वह इफ़तेराक़ से बचे, मोहब्बत के साथ, इसी पर दूसरों को आमादा करते रहे और इसी की आपस में वसीयत और नसीहत करते रहे।
और देखो हर उस चीज़ से परहेज़ करो जिसने इनकी कमर को तोड़ दिया, उनकी ताक़त को कमज़ोर कर दिया, यानी आपस का कीना, दिलों की अदावत, नफ़्सों का एक-दूसरे से मुंह फेर लेना और हाथों का एक-दूसरे की इमदाद से रूक जाना।
ज़रा अपने पहले वाले साहेबाने ईमान के हालात पर भी ग़ौर करो के वह किस तरह बला और आज़माइष की मन्ज़िलों में थे, क्या वह तमाम मख़लूक़ात में सबसे ज़्यादा बोझ के मुतहम्मिल और तमाम बन्दों में सबसे ज़्यादा मसाएब में मुब्तिला नहीं थे और तमाम अहले दुनिया सबसे ज़्यादा तन्गी में बसर नहीं कर रहे थे, फ़राअन ने उन्हें ग़ुलाम बना लिया था और तरह-तरह के बदतरीन अज़ाब में मुब्तिला कर रहे थे, उन्हें तल्ख़ घूंट पिला रहे थे और वह इन्हीं हालात में ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे के हलाकत की ज़िल्लत भी थी और तग़लुब की क़हर सामानी भी, न बचाव का कोई रास्ता था और न दिफ़ाअ की कोई सबील।
 

(((-तारीख़ किरदारसाज़ी का बेहतरीन ज़रिया है और इससे इस्तेफ़ादा करने का बुनियादी उसूल यह है के इन्सान दोनों तरह की क़ौमों के हालात का जाएज़ा ले, इन क़ौमों को भी देखे जिन्होंने सरफ़राज़ी और बलन्दी हासिल की है और उन क़ौमों के हालात का भी मुतालेआ करे के जिन्होंने ज़िल्लत और रूसवाई का सामना किया है। ताके इन अक़वाम के किरदार को अपनाए जिन्होंने अपने वजूद को सरमाया तारीख़ बना दिया है और उन लोगों के किरदार से परहेज़ करे जिन्होंने अपने को ज़िल्लत के ग़ार में ढकेल दिया है।-)))


यहाँ तक के जब परवरदिगार ने देख लिया के उन्होंने उसकी मोहब्बत में तरह-तरह की अज़ीयतें बरदाष्त कर ली हैं और उसके ख़ौफ़ से हर नागवार हालात का सामना कर लिया है तो उनके लिये इन तंगियों में वुसअत का सामान फ़राहम कर दिया औश्र उनकी ज़िल्लत को इज़्ज़त में तब्दील कर दिया, ख़ौफ़ के बदले अम्न व अमान अता फ़रमा दिया और वह ज़मीन के हाकिम और बादषाह, क़ाएद और नुमायां अफ़राद बन गए, इलाही करामत ने उन्हें इन मन्ज़िलों तक पहुंचा दिया जहां तक जाने का उन्होंने तसव्वुर भी नहीं किया था।
देखो जब तक इनके इज्तेमाआत यकजा रहे उनके ख़्वाहिषात में इत्तेफ़ाक़ रहा, उनके दिल मोतदिल रहे, उनके हाथ एक-दूसरे की इमदाद करते रहे, इनकी तलवारें एक-दूसरे के काम आती रहीं, इनकी बसीरतें नाफ़िज़ रहीं और इनके अज़ाएम में इत्तेहाद रहा, वह किस तरह बाइज़्ज़त रहे, क्या वह तमाम एतराफ़े ज़मीन के अरबाब और तमाम लोगों की गर्दनों के हुक्काम नहीं थे।
लेकिन फ़िर आखि़रकार इनका अन्जाम क्या हुआ जब इनके दरम्यान इफ़तेराक़ पैदा हो गया और मोहब्बतों में इन्तेषार पैदा हो गया, बातों और दिलों में इख़्तेलाफ़ पैदा हो गया और सब मुख़्तलिफ़ जमाअतों और मुतहारिब गिरोहों में तक़सीम हो गए, तो परवरदिगार ने इनके बदन से करामत का लिबास उतार लिया और उनसे नेमतों की “ाादाबी को सल्ब कर लिया और अब उनके क़िस्से सिर्फ़ इबरत हासिल करने वालों के लिये सामाने इबरत बन कर रह गए हैं।
लेहाज़ा अब तुम औलादे इस्माईल और औलादे इस्हाक़ व इसराईल (याक़ूब) से इबरत हासिल करो के सबसे हालात किस क़द्र मिलते हुए और कैफ़ियात किस क़द्र यकसाँ हैं, देखो इनके इन्तेषार व इफ़तेराक़ के दौर में इनका क्या आलम था के क़ैसर व कसरा इनके अरबाब बन गए थे, और इन्हें एतराफ़े आलम के सब्ज़ा ज़ारों, इराक़ के दरयाओं, और दुनिया की “ाादाबियों से निकाल कर ख़ारदार झाड़ियों और आन्धियों की बेरोक गुज़रगाहों और मईषत की दुष्वार गुज़ार मन्ज़िलों तक पहुंचाकर इस आलम में छोड़ दिया था के वह फ़क़ीर व नादार, ऊंट की पुष्त पर चलने वाले और बालू के ख़ेमों में क़यामक रने वाले हो गए थे, घर बार के एतबार से तमाम क़ौमों से ज़्यादा ज़लील और जगह के एतबार से सबसे ज़्यादा ख़ुष्क सालियों का षिकार थे, न उनकी आवाज़ थी जिनकी पनाह लेकर अपना तहफ़्फ़ुज़ कर सकें और न कोई उलफ़त का साया था जिसकी ताक़त पर भरोसा कर सकें, हालात मुज़तरिब, ताक़तें मुन्तषिर, कसरत में इन्तेषार, बलाएं सख़्त, जेहालत तह ब तह, ज़िन्दा दरगोर बेटियां, पत्थर पर सतष के क़ाबिल, रिष्तेदारियां टूटी हुई और चारों तरफ़ से हमलों की यलग़ार।


(((- आलमे इस्लाम को बनी इसराईल के हालात से इबरत हासिल करना चाहिये के उन्हें क़ैसर व कसरा और दीगर सलातीने ज़माना ने किस क़द्र ज़लील किया और कैसे-कैसे बदतरीन हालात से दो चार किया, सिर्फ़ इसलिये के इनके दरम्यान इत्तेहाद नहीं था और वह ख़ुद भी बुराइयों में मुब्तिला थे और दूसरों को भी बुराइयों से रोकने का ख़याल नहीं रखते थे, नतीजा यह हुआ के परवरदिगार ने उन्हें इस अज़ाब में मुब्तिला कर दिया औश्र इनका यह तसव्वुर महमिल होकर रह गया के हम अल्लाह के मुन्तख़ब बन्दे और उसकी औलाद का मरतबा रखते हैं, दौरे हाज़िर में मुसलमानों का यही आलम है के सिर्फ़ उम्मते दस्त के नाम पर झूम रहे हैं, इसके अलावा इनके किरदार में किसी तरफ़ से एतदाल की कोई झलक नहीं है। हर तरफ़ इन्हेराफ़ ही इन्हेराफ़ और कजी ही कजी नज़र आती है, न कहीं वहदते कलमा है और न कहीं इत्तेहादे कलाम। इख़्तेलाफ़ात का ज़ोर है और दुष्मनों की हुक्मरानी, आपस का झगड़ा है और ग़ैरों की ग़ुलामी, इन्नालिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन!-)))


इसके बाद देखो के परवरदिगार ने उनपर किस क़द्र एहसानात किये जब इनकी तरफ़ एक रसूल भेज दिया जिसने अपने निज़ाम से इनकी इताअत का पाबन्द बनाया और अपनी दावत पर इनकी उलफ़तों को मुत्तहिद किया और इसके नतीजे में नेमतों ने इन पर करामत के बालो पर फैला दिये और राहतों के दरया बहा दिये। “ारीयत ने उन्हें अपनी बरकतों के बेषक़ीमत फ़वाएद में लपेट लिया, वह नेमतों में ग़र्क़ हो गए और ज़िन्दगी की “ाादाबियों में मज़े उड़ाने लगे, एक मज़बूत फ़रमान्दवा (इस्माल के ज़ेरे साया उनकी ज़िन्दगी) के ताम “ाोबे (नज़म व तरतीब) क़ायम हो गए (हालात साज़गार हो गए) और हालात ने ग़लबा व बुज़ुर्गी के पहलू में जगह दिलवा दी और एक मुस्तहकम मुल्क की बुलन्दियों पर दुनिया व दीन की सआदतें उनकी तरफ़ झुक पड़ीं, वह आलमीन के हुकाम हो गए और एतराफ़े ज़मीन के बादषाह “ाुमार होने लगे जो कल उनके उमूर के मालिक थे आज वह उनके उमूर के मालिक हो गए और अपने एहकाम उन पर नाफ़िज़ करने लगे, जो कल अपने एहकाम इन पर नाफ़िज़ कर रहे थे के न इनका दम ख़म निकाला जा सकता था और न इनका ज़ोर ही तोड़ा जा सकता था।
देखो तुमने अपने हाथों को इताअत के बन्धनों से झाड़ लिया है और अल्लाह की तरफ़ से अपने गिर्द खिंचे हुए हिसार में जाहेलीयत के एहकाम की बिना पर रख़ना पैदा कर दिया है। अल्लाह ने इस उम्मत के इज्तेमाअ पर यह एहसान किया है के उन्हें उलफ़त की ऐसी बन्दिषों में गिरफ़्तार कर दिया है के इसी के ज़ेरे साया सफ़र करते हैं और इसी के पहलू में पनाह लेते हैं और यह वह नेमत है जिसकी क़द्र व क़ीमत को कोई “ाख़्स नहीं समझ सकता है इसलिये के यह हर क़ीमत से बड़ी क़ीमत और हर “ारफ़ व करामत से बालातर करामत है।
और याद रखो के हिजरत के बाद फ़िर सहराई बद्दू हो गए हो और बाहमी दोस्ती के बाद फ़िर गिरोहों में तक़सीम हो गए हो, तुम्हारा इस्लाम से राबता सिर्फ़ नाम का रह गया है और तुम ईमान में से सिर्फ़ अलामतों को पहचानते हो और रूहे मज़हब से बिल्कुल बेख़बर हो।
तुम्हारा कहना है के आग बर्दाष्त कर लेंगे मगर ज़िल्लत नहीं बदाष्त करेंगे, गोया के इस्लाम के हुदूद को तोड़ कर और इसके उस अहद व पैमान को पारा-पारा करके जिसे अल्लाह ने ज़मीन में पनाह और मख़लूक़ात में अमन क़रार दिया है। इस्लाम को उलट देना चाहते हो, हालांके अगर तुमने इस्लाम के अलावा किसी और तरफ़ रूख़ भी किया तो अहले कुफ्ऱ तुमसे बाक़ाएदा जंग करेंगे और उस वक़्त न जिब्राईल आएंगे न मीकाईल, न महाजिर तुम्हारी इमदाद करेंगे और न अन्सार, सिर्फ़ तलवारें खड़खड़ाती रहेंगी यहाँतक के परवरदिगार अपना आखि़री फ़ैसला नाफ़िज़ कर दे।
तुम्हारे पास तो ख़ुदाई इताब व अज़ाब और हवादिस व हलाकत के नमूने मौजूद हैं लेहाज़ा ख़बरदार उसकी गिरफ्त से ग़ाफ़िल होकर दूर न समझो और उसके हमले को आसान समझ कर उसकी सख़्ती से ग़ाफ़िल होकर अपने को मुतमईन न बना लो।
देखो परवरदिगार ने तुमसे पहले गुज़र जाने वाली क़ौमों पर सिर्फ़ इसी लिये लानत की है के उन्होंने अम्र बिल मारूफ़ और नहीं अनिल मुनकिर तर्क कर दिया था जिसके नतीजे में जेहला पर मआसी के इरतेकाब की बिना पर लानत हुई और दानिष्मन्दों पर उन्हें न मना करने की बिना पर
 

(((-अफ़सोस जिस क़ौम ने चार दिन पहले इज़्ज़त के दिन देखे हों, अपने इत्तेहाद व इत्तेफ़ाक़ और अपनी इताअत “ाआरी के असरात का मुषाहेदा किया हो, वह यकबारगी इस तरह मुन्क़लिब हो जाए और राहत पसन्दी उसे दोबारा ढकेलकर माज़ी के गढ़े में ढाल दे और ज़िल्लत व रूसवाई उसका मुक़द्दर बन जाए।
(2) यह नुकता हर दौर के लिये क़ाबिले तवज्जो है के दीने ख़ुदा में लानत का इस्तेहक़ाक़ सिर्फ़ जेहालत और बदअमली ही से नहीं पैदा होता है बल्कि अकसर औक़ात उसके हक़दार अहले इल्म और दीनदार हज़रात भी बन जाते हैं, जब उनके किरदार में अनानीयत पैदा हो जाती है और वह दूसरों की तरफ़ से यकसर ग़ाफ़िल हो जाते हैं, न नेकियों का हुक्म देते हैं और न बुराइयों से रोकते हैं, दीने ख़ुदा की बरबादी की तरफ़ से उसी तरह आंखें बन्द कर लेते हैं जैसे किसी ग़रीब का सरमाया लुट रहा है और हमसे इसका कोई ताल्लुक़ नहीं जबके दीने इस्लाम हर मुसलमान का सरमायाए हयात है और इसके तहफ़्फ़ुज़ की ज़िम्मेदारी हर साहेबे ईमान पर आएद होती है-)))


आगाह हो जाओ के तुमने इस्लाम की पाबन्दियों को तोड़ दिया है, उसके हुदूद को मोअत्तल कर दिया है और उसके एहकाम को मुर्दा बना दिया है परवरदिगार ने मुझे हुक्म दिया है के मैं बग़ावत करने वाले अहद षिकन और मुफ़सेदीन (ज़मीन में फ़साद बरपा करने वालों) से जेहाद करूं। चुनांचे मैं अहद व पैमान तोड़ने वालों (असहाबे जमल) से जेहाद कर चुका ना फ़रमानों (अहले सिफ़्फ़ीन) से मुक़ाबला कर चुका और बेदीन ख़वारिज (ख़वारिजे नहरवान) को मुकम्मल तरीक़े से ज़लील कर चुका। रह गया गढ़े में गिरने (गिरकर मरने) वाला “ौतान तो उसका मसला उस चिंघाड़ से हल हो गया जिसके दिल की धड़कन और सीने की थरथराहट की आवाज़ मेरे कानों में पहुच रही थी। अब सिर्फ़ बाग़ियों में थोड़े से अफ़राद बाक़ी रह गए हैं के अगर परवरदिगार उन पर हमला करने की इजाज़त दे दे तो उन्हें भी तबाह करके हुकूमत का रूख़ दूसरी तरफ़ मोड़ दूंगा फिर वही लोग बाक़ी रह जाएंगे जो मुख़्तलिफ़ “ाहरों (की दूर दराज़ हुदूद) में बिखरे पड़े हैं।
(मुझे पहचानो) मैंने कमसिनी ही में अरब के सीनों को ज़मीन से मिला दिया था और रबीया व मुज़िर (के क़बीलों) की सींगों को तोड़ दिया था। तुम्हें मालूम है के रसूले अकरम (स0) से मुझे किस क़द्र क़रीबी क़राबत और मख़सूस मन्ज़िलत हासिल है। उन्होंने बचपने से मुझे अपनी गोद में इस तरह ले लिया था के मुझे अपने सीने से लगाए रखते थे। अपने बिस्तर पर जगह देते थे, अपने कलेजे से लगाकर रखते थे ौर मुझे मुसलसल अपनी ख़ुषबू से सरफ़राज़ फ़रमाया करते थे और ग़िज़ा को अपने दांतों से चबाकर मुझे खिलाते थे, न उन्होंने मेरे कसी बयान में झूठ पाया और न मेरे किसी अमल में ग़लती देखी।
और अल्लाह ने दूध बढ़ाई के दौर ही से उनके साथ एक अज़ीम तरीन मलक को कर दिया था जो उनके साथ बुजु़र्गियों के रास्ते और बेहतरीन एख़लाक़ के तौर तरीक़े पर चलता रहता था और “ाब व रोज़ यही सिलसिला रहा करता था, और मैं भी उनके साथ उसी तरह रहता था जिस तरह बच्चा नाक़ा अपनी माँ के हमराह चलता है। वह रोज़ाना मेरे सामने अपने एख़लाक़ का एक निषाना पेष करते थे और फिर मुझे उसकी इक़तेदा करने का हुक्म दिया करते थे।
वह साल में एक ज़माना ग़ारे हिरा में गुज़ारा करते थे जहां सिर्फ़ मैं उन्हें देखता था और कोई दूसरा न होता था, उस वक़्त रसूले अकरम (स0) और ख़दीजा के अलावा किसी घर में इस्लाम का गुज़र न हुआ था और इनमें का तीसरा मैं था। मैं नूरे वहीए रिसालत का मुषाहेदा किया करता था और ख़ुषबूए रिसालत से दिमाग़ को मोअत्तर रखता था।
मैंने नुज़ूले वही के वक़्त “ौतान की चीख़ की आवाज़ सुनी थी और अर्ज़ की थी या रसूलल्लाह! यह चीख़ किसकी है? तो फ़रमाया के यह “ौतान है जो आज अपनी इबादत से मायूस हो गया है, तुम वह सब देख रहे हो जो मैं देख रहा हूँ और वह सब सुन रहे हो जो मैं सुन रहा हूँ। सिर्फ फ़र्क यह है के तुम नबी नहीं हो, लेकिन तुम मेरे वज़ीर भी हो और मन्ज़िले ख़ैर पर भी हो।
मैं उस वक़्त भी हज़रत के साथ था जब क़ुरैष के सरदारों ने आकर कहा था के मोहम्मद (स0)! त्ुमने बहुत बड़ी बात का दावा किया है जो तुम्हारे घरवालों में किसी ने नहीं किया था। अब हम तुमसे एक बात का सवाल कर रहे हैं, अगर तुमने सही जवाब दे दिया और हमें हमारे मुदआ को दिखला दिया तो हम समझ लेंगे के तुम नबीए ख़ुदा और रसूले ख़ुदा हो वरना अगर ऐसा न कर सके तो हमें यक़ीन हो जाएगा के तुम जादूगर और झूठे हो, तो आपने फ़रमाया था तुम्हारा सवाल क्या है? उन लोगों ने कहा के आप उस दरख़्त को दावत दे ंके वह जड़ से उखड़ कर आ जाए और आपके सामने खड़ा हो जाए? आपने फ़रमाया के परवरदिगार हर “ौ पर क़ादिर है अगर उसने ऐसा कर दिया तो क्या तुम लोग ईमान ले आओगे? और हक़ की गवाही दे दोगे! डन लोगों ने कहा बेषक। आपने फ़रमाया के मैं अनक़रीब यह मन्ज़र दिखला दूँगा लेकिन मुझे मालूम है के तुम कभी ख़ैर की तरफ़ पलट कर आने वाले नहीं हो। तुममें वह “ाख़्स भी मौजूद है जो कुंवे में फेंका जाएगा और वह भी है जो जो एहज़ाब क़ायम करेगा। यह कहकर आपने दरख़्त को आवाज़ दी के अगर तेरा ईमान अल्लाह और रोज़े आखि़रत पर है और तुझे यक़ीन है के मैं अल्लाह का रसूल हूँ तो जड़ से उखड़ कर मेरे सामने आजा और इज़्ने ख़ुदा से खड़ा हो जा। क़सम है उस ज़ात की जिसने उन्हें हक़ के साथ मबऊस किया है के दरख़्त जड़ से उखड़ गया और इसी आलम में हुज़ूर के सामने आ गया के इसमें सख़्त खड़खड़ाहट थी और परिन्दों के परों जैसी फड़फड़ाहट भी थी। उसने (कुछ)एक “ााख़े सरकार के सर पर साया फ़िगन कर दी और (कुछ)एक मेरे कान्धे पर, जबके मैं आपके दाहिने पहलू में था।
उन लोगों ने जैसे ही यह मन्ज़र देखा निहायत दरजए सरकषी और ग़ुरूर के साथ कहने लगे के अच्छा अब हुक्म दीजिये के आधा हिस्सा आप के पास आ जाए और आधा रूक जाए, आपने यह भी कर दिया और आधा हिस्सा निहायत दरजा-ए-हैरत के साथ और सख़्त तरीन खड़खड़ाहट के साथ आ गया और आपका हिसार कर लिया। उन लोगों ने फ़िर बरबिनाए कुफ्ऱ व सरकषी यह मुतालबा किया के अच्छा अब इससे कहिये के वापस जाकर दूसरे निस्फ़ हिस्से से मिल जाए (जैसा पहले था), आपने यह भी करके दिखला दिया तो मैंने आवाज़ दी के मैं तौहीदे इलाही का पहला इक़रार करने वाला और इस हक़ीक़त का पहला एतराफ़ करने वाला हूँ के दरख़्त ने अम्रे इलाही से आपकी नबूवत की तस्दीक़ की और आपके कलाम की बलन्दी (दिखाने) के लिये (जो कुछ किया वह अम्रे वाक़ेई है) आपके हुक्म की मुकम्मल इताअत कर दी।
लेकिन सारी क़ौम ने आपको झूठा और जादूगर क़रार दे दिया के इनका जादू अजीब भी है और बारीक भी है और ऐसी बातों की तस्दीक़ ऐसे ही अफ़राद कर सकते हैं, हम लोग नहीं कर सकते हैं। लेकिन मैं बहरहाल उस क़ौम में “ाुमार होता हूँ जिन्हें ख़ुदा के बादे में किसी मलामत करने वाले की मलामत की परवाह नहीं होती है। जिनकी निषानियां सिद्दीक़ीन जैसी हैं और जिनका कलाम नेक किरदार अफ़राद जैसा, यह रातों को आबाद रखने वाले और दिनों के मिनारे हैं। क़ुरान की रस्सी से मुतमस्सिक हैं और ख़ुदा व रसूल की सुन्नत को ज़िन्दा रखने वाले हैं, उनके यहाँ न ग़ुरूर है और न सरकषी, न ख़यानत है और न फ़साद, उनके दिल जन्नत में लगे हुए हैं और उनके जिस्म अमल में मसरूफ़ हैं।
 

(((-अगरचे कुफ़्फ़ार व मुष्रेकीन ने यह बात बतौर तमस्ख़ुर व इस्तेहज़ा कही थी लेकिन हक़ीक़ते अम्र यह है के ऐसे हक़ाएक़ का इक़रार ऐसे ही अफ़राद कर सकते हैं और ईमान की दौलत से सरफ़राज़ होना हर एक के बस की बात नहीं है। इस दौलत से महरूम आजके वह दानिषवर भी हैं जिनकी समझ में मोजिज़ा ही नहीं आता है और वह मोजिज़े को खि़लाफ़े क़ानून तबीअत क़रार देकर रद कर देते हैं और उनका ख़याल यह है के क़ानून साहबे क़ानून पर भी हुकूमत कर रहा है और साहबे क़ानून को भी यह हक़ नहीं है के वह अपने किसी बन्दे के मन्सब की तस्दीक़ के लिये अपने क़ानून में तबदीली कर दे जबके इसकी हज़ारों मिसालें तारीख़ में मौजूद हैं और वह जेहला और मुतास्सुब अफ़राद भी हैं जिनकी समझ में “ाक़्क़ुल क़मर और रद्दे “ाम्स जैसा रौषन मोजिज़ा नहीं आता है तो क़ुरान मजीद की बारीकियों और दीगर करामात की नज़ाकतों को क्या समझेंगे और किस तरह ईमान ला सकेंगे।-)))


193- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें साहेबाने तक़वा की तारीफ़ की गई है)


कहा जाता है के अमीरूल मोमेनीन (अ0) के एक आबिद व ज़ाहिद सहाबी जिनका नाम हमाम था, एक दिन हज़रत से अर्ज़ करने लगे के हुज़ूर मुझसे मुत्तक़ीन के सिफ़ात कुछ इस तरह बयान फ़रमाएं के गोया मैं उनको देख रहा हूँ, आपने जवाब से गुरेज़ करते हुए फ़रमाया के हमाम अल्लाह से डरो और नेक अमल करो के अल्लाह तक़वा  और हुस्ने अमल वालों को दोस्त रखता है (अल्लाह उन लोगों के साथ है जो मुत्तक़ी और नेक किरदार हैं)। हमाम इस मुख़्तसर बयान से मुतमईन न हुए तो हज़रत ने हम्द व सनाए परवरदिगार और सलवात व सलाम के बाद इरषाद फ़रमाया-
अम्माबाद! परवरदिगार ने तमाम मख़लूक़ात को इस आलम में पैदा किया है के वह उनकी इताअत से मुस्तग़नी और उनकी नाफ़रमानी से महफ़ूज़ था, न उसे किसी नाफ़रमान की मासीयत नुक़सान पहुंचा सकती थी और न किसी इताअत गुज़ार की इताअत फ़ायदा दे सकती थी।
उसने सबकी माषियत को तक़सीम कर दिया, और सबकी दुनिया में एक मन्ज़िल क़रार दे दी, इस दुनिया में मुत्तक़ी अफ़राद वह हैं जो साहेबाने फ़ज़ाएल व कमालात होते हैं के उनकी गुफ़्तगू हक़ व सवाब, उनका लिबास मोतदिल, उनकी रफ़्तार मुतवाज़ेअ होती है। जिन चीज़ों को परवरदिगार ने हराम क़रार दे दिया है उनसे नज़रों को नीचा रखते हैं और अपने कानों को उन उलूम के लिये वक़्फ़ रखते हैं जो फ़ायदा पहुंचाने वाले हैं। उनके नुफ़ूस बला व आज़माइष में ऐसे ही रहते हैं जैसे राहत व आराम में, अगर परवरदिगार ने हर षख़्स की हयात की मुद्दत मुक़र्रर न कर दी होती तो इनकी रूहें इनके जिस्म में पलक झपकने के बराबर भी ठहर नहीं सकती थीं के उन्हें सवाब का “ाौक़ है और अज़ाब का ख़ौफ़। ख़ालिक़ इनकी निगाह में इस क़द्र अज़ीम है के सारी दुनिया निगाहों से गिर गई है। जन्नत उनकी निगाह के सामने इस तरह है जैसे इसकी नेमतों से लुत्फ़ अन्दोज़ हो रहे हों और जहन्नुम को इस तरह देख रहे हैं जैसे इसके अज़ाब को महसूस कर रहे हों। उनके दिल नेकियों के ख़ज़ाने हैं और इनसे “ार का कोई ख़तरा नहीं है। इनके जिस्म नहीफ़ और लाग़र हैं और इनके ज़रूरियात निहायत दर्जए मुख़्तसर और इनके नुफ़ूस भी तय्यबो ताहिर हैं। इन्होंने दुनिया में चन्द दिन तकलीफ़ उठाकर अबदी राहत का इन्तेज़ाम कर लिया है और ऐसी फ़ायदा बख़्ष तिजारत की है जिसका इन्तेज़ाम इनके परवरदिगार ने कर दिया था। दुनिया ने उन्हें बहुत चाहा लेकिन उन्होंने इसे नहीं चाहा और इसने उन्हें बहुत गिरफ़्तार करना चाहा लेकिन उन्होंने फ़िदया देकर अपने को छुड़ा लिया।
रातों के वक़्त मुसल्ला पर खड़े रहते हैं, ख़ुष अलहानी के साथ (ठहर-ठहर कर) तिलावते क़ुरान करते रहते हैं। अपने नफ़्स को महज़ून रखते हैं और इसी तरह अपनी बीमारीए दिल का इलाज करते हैं। जब किसी आयत तरग़ीब से गुज़रते हैं तो इसकी तरफ़ मुतवज्जो हो जाते हैं और जब किसी आयते तरहीब व तख़वीफ़ से गुज़रते हैं तो दिल के कानों को इसकी तरफ़ यूं मसरूफ़ कर देते हैं जैसे जहन्नुम के “ाोलों की आवाज़ और वहां की चीख़ पुकार मुसलसल इनके कानों तक पहुंच रही हो, यह रूकूअ में कमर ख़मीदा और सजदे में पेषानी, हथेली, अंगूठों और घुटनों को फ़र्षे ख़ाक किये रहते हैं। परवरदिगार से एक ही सवाल करते हैं के इनकी गर्दनों को आतिषे जहन्नुम से आज़ाद कर दे। इसके बाद दिन के वक़्त यह ओलमा और दानिषमन्द, नेक किरदार और परहेज़गार होते हैं जैसे उन्हें तीरअन्दाज़ के तीर की तरह ख़ौफ़े ख़ुदा ने तराषा हो।


(((- यूँ तो तिलावते क़ुरान का सिलसिला घरों से लेकर मस्जिदों तक और गुलदस्तए अज़ान से लेकर टीवी इस्टेषन तक हर जगह हावी है और जुस्ने क़राअत के मुक़ाबलों में ‘‘अल्लाह-अल्लाह’’ की आवाज़ भी सुनाई देती है लेकिन कहां हैं वह तिलावत करने वाले जिनकी “ाान मौलाए कायनात ने बयान की है के हर आयत उनके किरदार का एक हिस्सा बन जाए और हर फ़िक़रा दर्दे ज़िन्दगी के एक इलाज की हैसियत पैदा कर ले। आयते नेमत पढ़ें तो जन्नत का नक़्षा निगाहों में खिंच जाए और तमन्नाए मौत में बेक़रार हो जाएं और आयत ग़ज़ब की तिलावत करें तो जहन्नुम के “ाोलों की आवाज़ कानों में गूंजने लगे और सारा वजूद थरथरा जाए।
दरहक़ीक़त यह अमीरूलमोमेनीन (अ0) ही की ज़िन्दगी का नक़्षा है जिसे हज़रत ने मुत्तक़ीन के नाम से बयान किया है वरना दीदा तारीख़ ऐसे मुत्तक़ीन की ज़ियारत के लिये सरापा इष्तियाक़ है-)))


देखने वाला इन्हें देखकर बीमार तसव्वुर करता है हालांके यह बीमार नहीं हैं और इनकी बातों को सुनकर कहता है के इनकी अक़्लों में फ़ितूर है हालांके ऐसा क़तई नहीं है। बात सिर्फ़ यह है के इन्हें एक बहुत बड़ी बात ने मदहोष बना रखा है के यह न क़लीले अमल से राज़ी होते हैं और न कसीर अमल को हक़ीर समझते हैं। हमेषा अपने नफ़्स ही को मुतहम करते रहते हैं (कोताहियों का इलज़ाम रखते हैं) और अपने आमाल से ख़ौफ़ ज़दा रहते हैं जब इनमें से किसी एक को (सलाह व तक़वा की बिना पर) सरापा जाना जाता है (तारीफ़ की जाती है) तो वह अपने हक़ में कही हुई बात से ख़ौफ़ज़दा हो जाते हैं और कहते हैं के मैं ख़ुद अपने नफ़्स को दूसरों से बेहतर पहचानता हूँ और मेरा परवरदिगार तो मुझसे भी बेहतर जानता है।
ख़ुदाया! मुझसे उनके अक़वाल का मुहासेबा न करना और मुझे उनके हुस्ने ज़न से भी बेहतर क़रार दे दुनिया और फिर उन गुनाहों को माफ़ भी कर देना जिन्हें यह सब नहीं जानते हैं।
उनकी एक अलामत यह भी है के इनके पास दीन में क़ुवत, नर्मी में षिद्दते एहतियात, यक़ीन में ईमान, इल्म के बारे में तमअ, हिल्म की मंज़िल में इल्म, मालदारी में मयानारवी, इबादत में ख़ुषू-ए-क़ल्ब, फ़ाक़े में ख़ुद्दारी, सख़्ितयों में सब्र, हलाल की तलब, हिदायत में निषात, लालच से परहेज़ जैसी तमाम बातें पाई जाती हैं। वह नेक आमाल भी अन्जाम देते हैं तो लरज़ते हुए अन्जाम देते हैं। “ााम के वक़्त इनकी फ़िक्र “ाुक्रे परवरदिगार होती है और सुबह के वक़्त ज़िक्रे इलाही। ख़ौफ़ज़दा आलम में रात करते हैं और फ़रह व सुरूर में सुबह, जिस ग़फ़लत से डराया गया है उससे मोहतात रहते हैं और जिस फ़ज़्ल व रहमत का वादा किया गया है उससे ख़ुष रहते हैं। अगर नफ़्स नागवार अम्र के लिये सख़्ती भी करे तो इसके मुतालबे को पूरा नहीं करते हैं इनकी आंखों की ठण्डक लाज़वाल नेमतों में है और इनका परहेज़ फ़ानी अष्यिा के बारे में है। यह हिल्म को इल्म से और क़ौल को अमल से मिलाए हुए हैं। तुम हमेषा इनकी उम्मीदों को मुख़्तसर, दिल को ख़ाषा (मुतवाज़ेअ), नफ़्स को क़ानेअ, खाने को मामूली, मुआमलात को आसान, दीन को महफ़ूज़, ख़्वाहिषात को मुर्दा और ग़ुस्से को पिया हुआ देखोगे।
उनसे हमेषा नेकियों की उम्मीद रहती है और इन्सान इनके “ार की तरफ़ से महफ़ूज़ रहता है। यह ग़ाफ़िलों में नज़र आएं तो भी यादे ख़ुदा करने वालों में कहे जाते हैं और याद करने वालों में नज़र आए तो भी ग़ाफ़िलों में “ाुमार नहीं होते हैं। ज़ुल्म करने वाले को माफ़ कर देते हैं, महरूम रखने वाले को अता कर देते हैं, क़तए रहम करने वालों से ताल्लुक़ात रखते हैं, लग़्िवयात से दूर, नर्म कलाम, मुनकिरात ग़ाएब, नेकियां हाज़िर, ख़ैर आता हुआ, “ार जाता हुआ, ज़लज़्ालों में बावक़ार, दुष्वारियों में साबिर, आसानियों में “ाुक्रगुज़ार, दुष्मन पर ज़ुल्म नहीं करते हैं चाहने वालों की ख़ातिर गुनाह नहीं करते हैं। गवाही तलब किये जाने से पहले हक़ का एतराफ़ करते हैं, अमानतों को ज़ाया नहीं करते हैं, जो बात याद दिलाई जाए उसे भूलते नहीं हैं और अलक़ाब के ज़रिये एक-दूसरे को चिढ़ाते नहीं हैं और हमसाये को नुक़सान नहीं पहुंचाते हैं।


(((-ख़ुदा गवाह है के एक-एक लफ़्ज़ आबे ज़र से लिखने के क़ाबिल है और इन्सानी ज़िन्दगी में इन्क़ेलाब पैदा करने के लिये काफ़ी है। साहेबाने तक़वा की वाक़ेई निषान यही है के इनसे हर ख़ैर की उम्मीद की जाए और इनके बारे में किसी “ार का तसव्वुर न किया जाए। वह ग़ाफ़िलों के दरम्यान भी रहें तो ज़िक्रे ख़ुदा में मषग़ूल रहें और बेईमानों की बस्ती में भी आबाद हों तो ईमान व किरदार में फ़र्क़ न आए। नफ़्स इतना पाकीज़ा हो के हर बुराई का जवाब नेकी से दें और हर ग़लती को माफ़ करने का हौसला रखते हों, गुफ़्तगू, आमाल, रफ़्तार, किरदार हर एतबार से तय्यब व ताहिर हों और कोई एक लम्हा भी ख़ौफ़े ख़ुदा से ख़ाली न हो।
तलाष कीजिये आज के दौर के साहेबाने तक़वा और मदअयाने परहेज़गारी की बस्ती में, कोई एक “ाख़्स भी ऐसा जामेअ सिफ़ात नज़र आता है और किसी इन्सान के किरदार में भी मौलाए कायनात के इरषाद की झलक नज़र आती है, और अगर ऐसा नहीं है तो समझिये के हम ख़यालात की दुनिया में आबाद हैं और हमारा वाक़ेयात से कोई ताल्लुक़ नहीं है-)))


जो मसाएब में किसी को ताने नहीं देते हैं, हर्फ़े बातिल में दाखि़ल नहीं होते हैं और कलमए हक़ से बाहर नहीं आते हैं, यह चुप रहें तो उनकी ख़ामोषी हम व ग़म की बिना पर नहीं है और यह हंसते हैं तो आवाज़ बलन्द नहीं करते हैं, इन पर ज़ुल्म किया जाए तो सब्र कर लेते हैं ताके ख़ुदा इसका इन्तेक़ाम ले। इनका अपना नफ़्स हमेषा रन्ज में रहता है और लोग इनकी तरफ़ से हमेषा मुमतईन रहते हैं इन्होंने अपने नफ़्स को आखि़रत के लिये थका डाला है और लोग इनके नफ़्स की तरफ़ से आज़ाद हो गए हैं। दूर रहने वालों से इनकी दूरी ज़ोहद और पाकीज़गी की बिना पर है और क़रीब रहने वालों से इनकी क़ुरबत नर्मी और मरहमत की बिना पर है, न दूरी तकब्बुर व बरतरी का नतीजा है और न क़ुरबत मकरो फ़़रेब का नतीजा।
रावी कहता है के यह सुनकर हमाम ने एक चीख़ मारी और दुनिया से रूख़सत हो गए।
तो अमीरूल मोमेनीन (अ0) ने फ़रमाया के मैं इसी वक़्त से डर रहा था के मैं जानता था के साहेबाने तक़वा के दिलों पर नसीहत का असर इसी तरह हुवा करता है। यह सुनना था के एक “ाख़्स बोल पड़ा के फिर आप पर ऐसा असर क्यों नहीं?
तो आपने फ़रमाया के ख़ुदा तेरा बुरा करे, हर अजल के लिये एक वक़्त मुअय्यन है जिससे आगे बढ़ना नामुमकिन है और हर “ौ के लिये एक सबब है जिससे तजावुज़ करना नामुमकिन है, ख़बरदार अब ऐसी गुफ़्तगू न करना, यह “ौतान ने तेरी ज़बान पर अपना जादू फूंक दिया है।


194- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें मुनाफ़ेक़ीन के औसाफ़ बयान किये गए हैं)


हम उस परवरदिगार का “ाुक्र अदा करते हैं के उसने इताअत की तौफ़ीक़ अता फ़रमाई और मासीयत से दूर रखा और फिर उससे एहसानात के मुकम्मल करने और उसकी रीसमाने हिदायत से वाबस्ता रहने की दुआ भी करते हैं। और इस बात की “ाहादत देते हैं के मोहम्मद (स0) उसके बन्दे और रसूल हैं। उन्होंने उसकी रिज़ा की ख़ातिर हर मुसीबत में अपने को डाल दिया और हर ग़ुस्से के घूंट को पी लिया। क़रीब वालों ने उनके सामने रंग बदल दिया और दूर वालों ने उन पर लष्कर कषी कर दी। अरबों ने अपनी ज़माम का रूख़ उनकी तरफ़ मोड़ दिया और अपनी सवारियों को उनसे जंग करने के लिये महमीज़ कर दिया यहां तक के अपनी औरतों को दूर दराज़ इलाक़ों और दूर इफ़तादा सरहदों से लाकर उनके सहन में उतार दिया।
बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें तक़वा इलाही की वसीयत करता हूं और तुम्हें मुनाफ़ेक़ीन से होषियार कर रहा हूँ के यह गुमराह भी हैं और गुमराह कुन भी, मुनहरिफ़ भी हैं और मुनहरिफ़साज़ भी, यह मुसलसल रंग बदलते रहते हैं और तरह-तरह के फ़ितने उठाते रहते हैं, हर मक्रो फ़रेब के ज़रिये तुम्हारा ही क़स्द करते हैं और हर घात में तुम्हारी ही ताक में बैठते हैं। इनके दिल बीमार हैं और इनके चेहरे पाक व साफ़, अन्दर ही अन्दर चाल चलते हैं और नुक़सानात की ख़ातिर रेंगते हुए क़दम बढ़ाते हैं। इनका तरीक़ा दवा जैसा और इनका कलाम षिफ़ा जैसा है लेकिन इनका किरदार नाक़ाबिले इलाज मर्ज़ है, यह राहतों में हसद करने वाले, मुसीबतों में मुब्तिला कर देने वाले और उम्मीदों को नाउम्मीद बना देने वाले हैं। जिस राह पर देखो इनका मारा हुआ पड़ा है और जिस दिल को देखो वहाँ तक पहुंचने का एक सिफ़ारिषी ढूंढ रखा है।


(((-अगर सारी दुनिया के जराएम की फ़ेहरिस्त तैयार की जाए तो इसमें सरे फेहरिस्त निफ़ाक़ ही का नाम होगा जिसमें हर तरह की बुराई और हर तरह का ऐब पाया जाता है। निफ़ाक़ अन्दर से कुफ्ऱ व षिर्क की ख़बासत रखता है और बाहर से झूठ और ग़लत बयानी की कसाफ़त रखता है और इन दोनों से बदतरीन दुनिया का कोई जुर्म और कोई ऐब नहीं है।
दौरे हाज़िर का दक़ीक़तरीन जाएज़ा लिया जाए तो अन्दाज़ा होगा के इस दौर में आलमी सतह पर निफ़ाक़ के अलावा कुछ नहीं रह गया है। हर “ाख़्स जो कुछ कर रहा है उसका बातिन उसके खि़लाफ़ है और हर हुकूमत जिस बात का दावा कर रही है उसकी कोई वाक़ईयत नहीं है। तहज़ीब के नाम पर फ़साद, मवासलात के नाम पर तबाहकारी, अमने आलम के नाम पर असलहों की दौड़, तालीम के नाम पर बद एख़लाक़ी और मज़हब के नाम पर लामज़हबीयत ही इस दौर का का तरहे इम्तेयाज़ है और इसी को ज़बाने “ारीअत में निफ़ाक़ कहा जाता है-)))


हर रन्ज व ग़म के लिये आंसू तैयार रखे हुए हैं, एक दूसरे की तारीफ़ में हिस्सा लेते हैं और इसके बदले के मुन्तज़िर रहते हैं। सवाल करते हैं तो चिपक जाते हैं और बुराई करते हैं तो रूसवा करके ही छोड़ते हैं और फ़ैसला करते हैं तो हद से बढ़ जाते हैं।
हर हक़ के लिये एक बातिल तैयार कर रखा है और हर सीधे के लिये एक कजी का इन्तेज़ाम कर रखा है। हर ज़िन्दा के लिये एक क़ातिल मौजूद है और हर दरवाज़े के लिये एक कुन्जी बना रखी है और हर रात के लिये एक चिराग़ मुहैया कर रखा है। तमअ के लिये नामूस को ज़रिया बनाते हैं ताके अपने बाज़ार को रवाज दे सकें और अपने माल को राएज कर सकें। जब बात करते हैं तो मुष्तबा क़िस्म की और जब तारीफ़ करते हैं तो बातिल को हक़ का रंग देकर। उन्होंने अपने लिये रास्ते को आसान बना लिया है और दूसरों के लिये तंगी पैदा कर दी है। यह “ौतान के गिरोह हैं और जहन्नुम के “ाोले , यही हिज़्बुष्षैतान के मिसदाक़ हैं और हिज़्बुष्षैतान का मुक़द्दर सिवाए ख़सारे के कुछ नहीं है।
 

(((-हक़ीक़ते अम्र यह है के मुनाफ़िक़ीन का कोई अम्र क़ाबिले एतबार नहीं होता और इनकी ज़िन्दगी सरापा ग़लत बयानी होती है। तारीफ़ करने पर आ जाते हैं तो ज़मीन व आसमान के क़लाबे मिला देते हैं और बुराई करने पर तुल जाते हैं तो आदमी को आलमी सतह पर ज़लील करके छोड़ते हैं। इसलिये के इनका न कोई ज़मीर होता है और न कोई मेयार, इन्हें सिर्फ़ मौक़े परस्ती से काम लेना है और इसी के एतबार से ज़बान खोलना है।
ख़ुत्बे के उनवान से यह अन्दाज़ा हुआ था के यह समाज के चन्द अफ़राद का एक गिरोह है जिसके किरदार वाज़ेह किया जा रहा है ताके लोग इस किरदार से होषियार रहें और अपनी ज़िन्दगी को निफ़ाक़ से बचाकर ईमान व तक़वा के रास्ते पर लगा दें, लेकिन तफ़सीलात को देखने के बाद महसूस होता है के यह पूरे समाज का नक़्षा है और सारा आलमे इन्सानियत इसी रंग में रंगा हुआ है। ज़िन्दगी का कोई “ाोबा ऐसा नहीं है जिसमें निफ़ाक़ की हुकमरानी न हो और इन्सान के किरदार का कोई रूख़ ऐसा नहीं है जिसमें वाक़ईयत और हक़ीक़त पाई जाती हो और जिसे निफ़ाक़ से पाक व पाकीज़ा क़रार दिया जा सके।
ऐसे हालात में तो हर “ाख़्स को अपने नफ़्स का जाएज़ा लेना चाहिये और मुनाफ़ेक़ीन के बारे में बयान किये हुए सिफ़ात से इबरत हासिल करनी चाहिये।-)))