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Nahjul Balagha Hindi Khutba 214-220 नहजुल बलाग़ा हिन्दी ख़ुत्बा 214-220

214-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें रसूले अकरम (स0) की तारीफ़, ओलमा की तौसीफ़ और तक़वा की नसीहत का ज़िक्र किया गया है)


मैं गवाही देता हूँ के वह परवरदिगार ऐसा आदिल है जो अद्ल ही से काम लेता है, और ऐसा हाकिम है जो हक़ व बातिल को जुदा कर देता है और मैं ‘ाहादत देता हूँ के मोहम्मद (स0) उसके बन्दे और रसूल हैं और फिर तमाम बन्दों के सरदार भी हैं। जब भी परवरदिगार ने मख़लूक़ात को दो गिरोहों (हक़ व बातिल) में तक़सीम किया है उन्हें (मोहम्मद स0 को) बेहतरीन हिस्से ही में रखा है। आपकी तख़लीक़ (आपके नसब) में न किसी बदकार का कोई हिस्सा है और न किसी फासिक़ व फ़ाजिर का कोई दख़ल है।
याद रखो के परवरदिगार ने हर ख़ैर के लिये अहल क़रार दिये हैं और हर हक़ के लिये सुतून और हर इताअत के लिये वसीलाए हिफ़ाज़त क़रार दिया है और तुम्हारे लिये हर इताअत के मौक़े पर ख़ुदा की तरफ़ से एक मददगार का इन्तेज़ाम रहता है जो ज़बानों पर बोलता है और दिलों को ढारस इनायत करता है। इसके वजूद में हर इकतेफ़ा करने के लिये किफ़ायत है और तलबगारे सेहत के लिये शिफ़ा व आफ़ियत है (हर बेनियाज़ी चाहने वाले के लिये बेनियाज़ी और शिफ़ा चाहने वाले के लिये शिफ़ा है)।
 

याद रखो के अल्लाह के वह बन्दे जिन्हें उसने इल्म का मुहाफ़िज़ बनाया है वह उसका तहफ़्फ़ुज़ भी करते हैं और उसके चश्मों को जारी भी करते रहते हैं। आपस में मोहब्बत से एक-दूसरे की मदद करते हैं और चाहत के साथ मुलाक़ात करते हैं। सेराब करने वाले (इल्म व हिकमत के साग़रों) चश्मों से मिलकर (छककर) सेराब होते हैं और फिर सेरो सेराब होकर ही बाहर निकलते हैं। उनके आमाल में रैब (शक व ‘ाुबह) की आमेज़िश नहीं है और उनके मुआशरे में ग़ीबत का गुज़र नहीं है। इसी अन्दाज़ से मालिक ने उनकी तख़लीक़ की है और उनके एख़लाक़ क़रार दिये हैं और इसी बुनियाद पर वह आपस में मोहब्बत भी करते हैं और मिलते भी रहते हैं। उनकी मिसाल उन दानों की है जिनको इस तरह चुना जाता है के अच्छे दानों को ले लिया जाता है और ख़राब को फेंक दिया जाता है। उन्हें इसी सफ़ाई ने मुमताज़ बना दिया है और उन्हें इसी परख ने साफ़ सुथरा क़रार दे दिया है।
 

अब हर ‘ाख़्स को चाहिये के उन्हीं सिफ़ात को क़ुबूल करके करामत को क़ुबूल करे और क़यामत के आन से पहले होशियार हो जाए। अपने मुख़्तसर दिनों और थोड़े से क़याम के बारे में ग़ौर करे के इस मन्ज़िल को दूसरी मन्ज़िल में बहरहाल बदल जाना है। अब इसका फ़र्ज़ है के नई मन्ज़िल  और जानी पहचानी जाए बाज़गश्त (क़ब्र, बरज़ख़, हश्र) के बारे में अमल करे।
ख़ु‘ााबहाल (मुबारकबाद) इन क़ल्बे सलीम वालों के लिये जो रहनुमा की इताअत करें और हलाक होने वालों से परहेज़ करें। कोई रास्ता दिखा दे तो देख लें और वाक़ेई राहनुमा अम्र करे तो उसकी इताअत करें, हिदायत की तरफ़ सबक़त करें क़ब्ल इसके के इसके दरवाज़े बन्द हो जाएं और इसके असबाब मुनक़ता हो जाएं। तौबा का दरवाज़ा खोल लें और गुनाहों के दाग़ों को धो ढालें, यही वह लोग हैं जिन्हें सीधे रास्ते पर खड़ा कर दिया गया है और उन्हें वाज़ेह रास्ते की हिदायत मिल गई। (मुबारक हो उस पाक व पाकीज़ा दिल वाले को जो हिदायत करने वाले की पैरवी और तबाही डालने वाले से किनारा करता है और दीदाए बसीरत में जिला बख़्शने वाले की रोशनी और हिदायत करने वाले के हुक्म की फ़रमाबरदारी से सलामती की राह पा लेता है और हिदायत के दरवाज़ों के बन्द और वसाएल व ज़राए के क़ता होने से पहले हिदायत की तरफ़ बढ़ जाता है।)
 

(((-दुनिया में साहेबाने इल्म व फ़ज़्ल बेशुमार हैं लेकिन वह अहले इल्म जिन्हें मालिक ने अपने इल्म और अपने दीन का मुहाफ़िज़ बनाया है वह महदूद ही हैं जिनकी सिफ़त यह है के इल्म का तहफ़्फ़ुज़ भी करते हैं और दूसरों को सेराब भी करते रहते हैं, ख़ुद भी सेराब रहते हैं और दूसरों की तशनगी का भी इलाज करते रहते हैं। इनके इल्म में जेहालत और ‘‘लाअदरी’’ का गुज़र नहीं है और वह किसी साएल को महरूम वापस नहीं पेश करत हैं-)))
 

215 -आपकी दुआ का एक हिस्सा
(जिसकी बराबर तकरार फ़रमाया करते थे)


ख़ुदा का ‘ाुक्र है के उसने सुबह के हंगाम (मुझे) न मुर्दा बनाया है और न बीमार, न किसी रग पर मर्ज़ का हमला हुआ है और न किसी बदअमली का मुवाख़ेज़ा किया गया है। न मेरी नस्ल को मुनक़ता किया गया है और न अपने दीन में इरतेदाद का शिकार हुआ हूं, न अपने दीन से मुरतद हूँ और न अपने रब का मुनकिर। न अपने ईमान से मुतवह्हश और न अपनी अक़्ल का मख़बूत और न मुझ पर गुज़िश्ता उम्मतों जैसा कोई अज़ाब हुआ है। मैंने इस आलम मे सुबह की है के मैं एक बन्दए ममलूक हूँ जिसने अपने नफ़्स पर ज़ुल्म किया है। ख़ुदाया! तेरी हुज्जत मुझ पर तमाम है और मेरी कोई हुज्जत नहीं है (मेरे लिये अब उज़्र की कोई गुन्जाइश नहीं है)। तू जो दे दे उससे ज़्यादा ले नहीं सकता है (ख़ुदाया मुझमें किसी चीज़ के हासिल करने की क़ूवत नहीं सिवा उसके के जो तू मुझे अता कर दे) और जिस चीज़ से तू न बचाए उससे बच नहीं सकता।
 

ख़ुदाया! मैं उस अम्र से पनाह चाहता हूं के तेरी दौलत में रह कर फ़क़ीर हो जाऊ या तेरी हिदायत के बावजूद गुमराह हो जाऊ, या तेरी सलतनत के बावजूद सताया जाऊं या तेरे हाथ में सारे इख़्तेयारात होने के बावजूद मुझ पर दबाव डाला जाए।   ख़ुदाया! मेरी जिन नफ़ीस चीज़ों को मुझसे वापस लेना और अपनी जिन अमानतों को मुझसे पलटाना, उनमें सबसे पहली चीज़ मेरी रूह को क़रार देना।
ख़ुदाया! मैं उस अम्र से तेरी पनाह चाहता हूँ के मैं तेरे इरशादात से बहक जाऊँ या तेरे दीन में किसी फ़ित्ने में मुब्तिला हो जाऊँ या तेरी आई हुई हिदयतों के मुक़ाबले में मुझ पर ख़्वाहिशात का ग़लबा हो जाए।
 

216-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसे मुक़ामे सिफ़्फ़ीन में इरशाद फ़रमाया)
 

अम्माबाद! परवरदिगार ने वली अम्र होने की बिना पर मेरा एक हक़ क़रार दिया है और तुम्हारा भी मेरे ऊप एक तरह का हक़ है और हक़ मदह सराई के एतबार से तो बहुत वुसअत रखता है लेकिन इन्साफ़ के एतबार से बहुत तंग है। यह किसी का उस वक़्त तक साथ नहीं देता है जब तक उसके ज़िम्मे कोई हक़ साबित न कर दे और किसी के खि़लाफ़ फ़ैसला नहीं करता है जब तक उसे कोई हक़ न दिलवा दे। अगर कोई हस्ती ऐसी मुमकिन है जिसका दूसरों पर हक़ हो और उस पर किसी का हक़ न हो तो वह सिर्फ़ परवरदिगार की हस्ती है के वह हर ‘ौ पर क़ादिर है और उसके तमाम फ़ैसले अद्ल व इन्साफ़ पर मबनी हैं लेकिन उसने भी जब बन्दों पर अपना हक़ इताअत क़रार दिया है तो अपने फ़ज़्ल व करम और अपने उस एहसान की वुसअत की बिना पर जिसका वह अहल है उनका यह हक़ क़रार दे दिया है के उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा सवाब दे दिया जाए।
परवरदिगार के मुक़र्रर किये हुए हुक़ूक़ में से वह तमाम हुक़ूक़ है जो उसने एक दूसरे पर क़रार दिये हैं और उनमें मसावात भी कऱार दी है के एक हक़ से दूसरा हक़ पैदा होता है और एक हक़ नहीं पैदा होता है जब तक दूसरा हक़ न पैदा हो और इन तमाम हुक़ूक़ में सबसे अज़ीमतरीन हक़ रिआया पर वाली का हक़ और वाली पर रियाया का हक़ है जिसे परवरदिगार ने एक को दूसरे के लिये क़रार दिया है और इसी से उनकी बाहमी उलफ़तों को मुनज़्ज़म किया है और उनके दीन को इज़्ज़त दी है। रिआया की इस्लाह मुमकिन नहीं है जब तक वाली सॉलेह न हो और वाली सॉलेह नहीं रह सकते हैं जब तक रिआया सॉलेह न हो। अब अगर रिआया ने वाली को उसका हक़ दे दिया और वाली ने रिआया को उनका हक़ दे दिया तो हक़ दोनों के दरम्यान अज़ीज़ रहेगा। दीन के रास्ते क़ायम हो जाएंगे। इन्साफ़ के निशानात बरक़रार रहेंगे और पैग़म्बरे इस्लाम (स0) की सुन्नतें अपने ढर्रे पर चल पड़ेंगी और ज़माना ऐसा सॉलेह हो जाएगा के बक़ाए हुकूमत की उम्मीद भी की जाएगी और दुश्मनों की तमन्नाएं भी नाकाम हो जाएंगी।
 

लेकिन अगर रिआया हाकिम पर ग़ालिब आ गई या हाकिम ने रिआया पर ज़्यादती की तो कलेमात में इख़्तेलाफ़ हो जाएगा, ज़ुल्म के निशानात ज़ाहिर हो जाएंगे, दीन में मक्कारी बढ़ जाएगी। सुन्नतों के रास्ते नज़र अन्दाज़ हो जाएंगे, ख़्वाहिशात पर अमल होगा, एहकाम मुअत्तल हो जाएंगे और नफ़सानी बीमारियां बढ़ जाएंगी, न बड़े से बड़े हक़ के मोअत्तल हो जाने से कोई वहशत होगी और न बड़े से बड़े बातिल पर अमल दरआमद से कोई परेशानी होगी।
ऐसे मौक़े पर नेक लोग ज़लील कर दिये जाएंगे और ‘ारीर लोगों की इज़्ज़त होगी और बन्दों पर ख़ुदा की उक़ूबतें अज़ीमतर हो जाएंगी।
 

ख़ुदारा आपस में एक-दूसरे के मुख़लिस रहो (एक दूसरे को समझाते-बुझाते रहो) और एक-दूसरे की मदद करते रहो इसलिये के तुममें कोई ‘ाख़्स भी कितना ही ख़ुशनूदिये ख़ुदा की तमअ रखता हो और किसी क़द्र भी ज़हमते अमल बरदाश्त कर ले इताअते ख़ुदा की उस मन्ज़िल तक नहीं पहुंच सकत है जिसका वह अहल है लेकिन फिर भी मालिक का यह हक़्के़ वाजिब उसके बन्दों के ज़िम्मे है के अपने इमकान भर नसीहत करते रहें और हक़ के क़याम में एक दूसरे की मदद करते रहें इसलिये के कोई ‘ाख़्स भी हक़ की ज़िम्मेदारी अदा करने में दूसरे की इमदाद से बेनियाज़ नहीं हो सकता है चाहे हक़ में इसकी मन्ज़िलत किसी क़द्र अज़ीम क्यों न हो और दीन में उसकी फ़ज़ीलत को किसी क़द्र तक़द्दुम क्यों न हासिल हो और न कोई ‘ाख़्स हक़ में मदद करने या मदद लेने की ज़िम्मेदारी से कमतर हो सकता है चाहे लोगों की नज़र में किसी क़द्र छोटा क्यों न हो (चाहे लोग उसे ज़लील समझें) और चाहे उनकी निगाहों में किसी क़द्र क्यों न गिर जाए (चाहे उनकी निगाहों में किसी क़द्र हक़ीर क्यों न हो)।
(इस गुफ़्तगू के बा आपके असहाब में से एक ‘ाख़्स ने एक तवील तक़रीर की जिसमें आपकी मदहा व सना के साथ इताअत का वादा किया गया तो आपने फ़रमाया के-)
 

याद रखो के जिसके दिल में जलाले इलाही की अज़मत और जिसके नफ़्स में इसके मक़ामे उलूहियत की बलन्दी है उसका हक़ यह है के तमाम कायनात उसकी नज़र में छोटी हो जाए और ऐसे लोगों में इस हक़ीक़त का सबसे बड़ा अहल वह है जिस पर उसकी नेमतें अज़ीम और उसके अच्छे एहसानात किये हों, इसलिये के किसी ‘ाख़्स पर अल्लाह की नेमतें अज़ीम नहीं होतीं मगर यह के उसका हक़ भी अज़ीमतर हो जाता है और एहकाम के हालात में नेक किरदार अफ़राद के नज़दीक बदतरीन हालत ये है के उनके बारे में ग़ुरूर का गुमान हो जाए और उनके मामेलात को तकब्बुर पर मबनी समझा जाए और मुझे यह बात सख़्त नागवार है के तुम में से किसी को यह गुमान पैदा हो जाए के मैं रोसा (बढ़ चढ़ कर सराहे जाने) को दोस्त रखता हूँ या अपनी तारीफ़ सुनना चाहता हूँ और बेहम्दे अल्लाह मैं ऐसा नहीं हूँ और अगर मैं ऐसी बातें पसन्द भी करता होता तो भी उसे नज़रअन्दाज़ कर देता के मैं अपने को उससे कमतर समझता हूँ के इसी अज़मत व किबरियाई का अहल बन जाऊँ जिसका परवरदिगार हक़दार है। यक़ीनन बहुत से लोग ऐसे हैं जो अच्छी कारकर्दगी पर तारीफ़ को दोस्त रखते हैं लेकिन ख़बरदार तुम लोग मेरी इस बात पर तारीफ़ न करना के मैंने तुम्हारे हुक़ूक़ अदा कर दिये हैं के अभी बहुत से ऐसे हुक़ूक़ का ख़ौफ़ बाक़ी है जो अदा नहीं हो सके हैं और बहुत से फ़राएज़ हैं जिन्हें बहरहाल नाफ़िज़ करना है। देखो मुझसे उस लहजे में बात न करना जिस लहजे में जाबिर बादशाहों से बात की जाती है और न मुझसे इस तरह बचने की कोशिश करना जिस तरह तैश में आने वालों से बचा जाता है, न मुझसे ख़ुशामद के साथ ताल्लुक़ात रखना और न मेरे बारे में यह तसव्वुर करना के मुझे हर्फ़े हक़ गराँ गुज़रेगा और न मैं अपनी ताज़ीम का तलबगार हूँ। इसलिये के जो ‘ाख़्स भी हर्फ़े हक़ सुनने को गराँ समझता है या अदल की पेशकश को नापसन्द करता है वह हक़ व अदल पर अमल को यक़ीनन मुश्किलतर ही तसव्वुर करेगा। लेहाज़ा ख़बरदार हर्फ़े हक़ कहने में तकल्लुफ़ न करना और मुन्सिफ़ाना मश्विरा देने से गुरेज़ न करना इसलिये के मैं ज़ाती तौर पर अपने को ग़लती से बालातर नहीं तसव्वुर करता हूँ और न अपने अफ़आल को इस ख़तरे से महफ़ूज़ समझता हूँ मगर यह के मेरा परवरदिगार मेरे नफ़्स को बचा ले के वह इसका मुझसे ज़्यादा साहबे इख़्तेयार है।
 

देखो हम सब एक ख़ुदा के बन्दे और उसके ममलूक हैं और उसके अलावा कोई दूसरा ख़ुदा नहीं है। वह हमारे नुफ़ूस पर इतना इख़्तेयार रखता है जितना ख़ुद हमें भी हासिल नहीं है और उसी ने हमें साबेक़ा हालात से निकाल कर इस इस्लाह के रास्ते पर लगा दिया है के अब गुमराही हिदायत में तबदील हो गई है और अन्धेपन के बाद बसीरत हासिल हो गई है।
 

217- आपका इरशादे गिरामी
(क़ुरैश से शिकायत और फ़रयाद करते हुए)
 

ख़ुदाया! मैं क़ुरैश से और उनके मददगारों से तेरी मदद चाहता हूँ के इन लोगों ने मेरी क़राबतदारी का ख़याल नहीं किया और मेरे ज़र्फे़ अज़मत को इलट दिया है और मुझसे उस हक़ के बारे में झगड़ा करने पर इत्तेहाद कर लिया है जिसका मैं सबसे ज़्यादा हक़दार था और फिर यह कहने लगे के आप इस हक़ को ले लें तो यह भी सही है और आपको इससे रोक दिया जाए तो  यह भी सही है। अब चाहें हम्म व ग़म के साथ सबर करें या रन्ज व अलम के साथ मर जाएं।
ऐसे हालात में मैंने देखा के मेरे पास न कोई मददगार है और न कोई दिफ़ाअ करने वाला सिवाए मेरे घरवालों के, तो मैने उन्हें मौत के मुंह में देने से गुरेज़ किया और बाला आखि़र आँखों में ख़स व ख़ाशाक के होते हुए चश्मपोशी की और गले में फन्दे के होते हुए लोआबे दहन निगल लिया और ग़ुस्से को पीने में ख़ेज़ल से ज़ियाह तल्ख़ ज़ाएक़े पर सब्र किया और छुरियों के ज़ख़्मों से ज़्यादा तकलीफ़देह हालात पर ख़ामोशी इख़्तेयार कर ली।
(सय्यद रज़ी - गुज़िश्ता ख़ुत्बे में यह मज़मून गुज़र चुका है लेकिन रिवायतें मुख़्तलिफ़ थीं लेहाज़ा मैंने दोबारा उसे नक़्ल कर दिया)
 

218-आपका इरशादे गिरामी
(बसरा की तरफ़ आपसे जंग करने के लिये जाने वालों के बारे में)
 

यह लोग मेरे आमिलों, मेरे ज़ेरे दस्त बैतुलमाल के ख़ेरानादारों और तमाम अहले ‘ाहर जो मेरी इताअत व बैअत में थे सबकी तरफ़ वारिद हुए। इनके कलेमात में इफ़तेराक़ पैदा किया। इनके इजतेमाअ को बरबाद किया और मेरे चाहने वालों पर हमला कर दिया और इनमें से एक जमाअत को धोके से क़त्ल भी कर दिया लेकिन दूसरी जमाअत ने तलवारें उठाकर दाँत भींच लिये और बाक़ायदा मुक़ाबला किया यहां तक के हक़ व सिदाक़त के साथ ख़ुदा की बारगाह में हाज़िर हो गए।
 

(((-हैरत अंगेज़ बात है के मुसलमान अभी तक इन दो गिरोहों के बारे में हक़ व बातिल का फ़ैसला नहीं कर सका है जिनमें एक तरफ़ नफ़्स रसूल (स0) अली बिन अबीतालिब (अ0) जैसा इन्सान था जो अपनी तारीफ़ को भी गवारा नहीं करता था और हर लम्हे अज़मते ख़ालिक़ के पेशे नज़र अपने आमाल को हक़ीर व मामूली तसव्वुर करता था और एक तरफ़ तल्हा व ज़ुबैर जैसे वह दुनिया परस्त थे जिनका काम फ़ितना परवाज़ी ‘ारांगेज़ी, तफ़रिक़ा अन्दाज़ी और क़त्ल व ग़ारत के अलावा कुछ न था और जो दौलत व इक़तेदार की ख़ातिर व दुनिया की हर बुराई कर सकते थे और हर जुर्म का इरतेकाब कर सकते थे।)))
 

219- आपका इरशादे गिरामी
(जब रोज़े जमल तल्हा बिन अब्दुल्लाह और अब्दुर्रहमान बिन अताब बिन उसीद की लाशों के क़रीब से गुज़र हुआ)


अबू मोहम्मद (तल्हा) ने इस मैदान में आलमे ग़ुरबत में सुबह की है, ख़ुदा गवाह है के मुझे यह बात हरगिज़ पसन्द नहीं थी के क़ुरैश के चमकते सितारों के नीचे ज़ेरे आसमान पड़े रहें लेकिन क्या करूं। बहरहाल मैंने अब्द मुनाफ़ की औलाद से उनके किये का बदला ले लिया है (लेकिन) अफ़सोस के बनी जमअ बच कर निकल गए उन सबने अपनी गर्दनें इस अम्र की तरफ़ उठाई थीं जिसके यह हरगिज़ अहल नहीं थे। इसीलिये यहाँ तक पहुंचने से पहले ही इनकी गर्दनें तोड़ दी गईं।
 

220-आपका इरशादे गिरामी
(ख़ुदा की राह में चलने वाले इन्सानों के बारे में)

ऐसे ‘ाख़्स ने अपनी अक़्ल को ज़िन्दा रखा है और अपने नफ़्स को मुर्दा बना दिया है। इसका जिस्म बारीक हो गया है और इसका भारी भरकम तनो तोश हल्का हो गया है इसके लिये बेहतरीन ज़ोपाश नूरे हिदायत चमक उठा है और उसने रास्ते को वाज़ेह करके इसी पर चला दिया है। तमाम दरवाज़ों ने उसे सलामती के दरवाज़े और हमेशगी के घर तक पहुंचा दिया है और इसके क़दम तमानीयते बदन के साथ अम्न व राहत की मन्ज़िल में साबित हो गए हैं के इसने अपने दिल को इस्तेमाल किया है और अपने रब को राज़ी कर लिया है।