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Nahjul Balagha Hindi Khutba 37-45 नहजुल बलाग़ा हिन्दी ख़ुत्बा 37-45

37- आपका इरषादे गिरामी
(जो बमन्ज़िलए ख़ुत्बा है और इसमें नहरवान के वाक़ेए के बाद आपने अपने फ़ज़ाएल और कारनामों का तज़किरा किया है।)
 

मैंने उस वक़्त अपनी ज़िम्मेदारियों के साथ क़याम किया जब सब नाकाम हो गए थे और उस वक़्त सर उठाया जब सब गोषों में छुपे हुए थे और उस वक़्त बोला जब सब गूंगे हो गए थे और उस वक़्त नूरे ख़ुदा के सहारे आगे बढ़ा जब सब ठहरे हुए थे। मेरी आवाज़ सबसे धीमी थी लेकिन मेरे क़दम सबसे आगे थे। मैंने अनान हुकूमत संभाली तो इसमें क़ूवते परवाज़ पैदा हो गई और मेंै तनो तन्हा इस मैदान में बाज़ी ले गया। मेरा सेबात पहाड़ों जैसा था जिन्हें न तेज़ हवाएं हिला सकती थीं और न आंधियां हटा सकती थीं। न किसी के लिये मेरे किरदार में तान-ओ-तन्ज़ की गुन्जाइष थी और न कोई ऐब लगा सकता था। याद रखो के तुम्हारा ज़लील मेरी निगाह में अज़ीज़ है यहां तक के इसका हक़ दिलवा दूँ और तुम्हारा अज़ीज़ मेरी निगाह में ज़लील है यहाँ तक के इससे हक़ ले लूँ। मैं क़ज़ाए इलाही पर राज़ी हूँ और उसके हुक्म के सामने सरापा तस्लीम हूँ। क्या तुम्हारा ख़्याल है के मैं रसूले अकरम (स0) के बारे में कोई ग़लत बयानी कर सकता हूँ जबके सबसे पहले मैंने आपकी तसदीक़ की है तो अब सबसे पहले झूठ बोलने वाला नहीं हो सकता हूँ। मैंने अपने मुआमले में ग़ौर किया तो मेरे लिये इताअते रसूल (स0) का मरहला बैयत पर मुक़द्दम था और मेरी गरदन में हज़रत के ओहद का तौक़ पहले से पड़ा हुआ था।


38- आपका इरषादे गिरामी
(जिसमें “ाुबह की वजहे तसमिया बयान की गई है और लोगों के हालात का ज़िक्र किया गया है।)
 

यक़ीनन “ाुबह को “ाुबह इसीलिये कहा जाता है के वह हक़ से मुषाबेह होता है। इस मौक़े पर औलियाअल्लाह के लिये यक़ीन की रोषनी होती है और सिम्त हिदायत की रहनुमाई। लेकिन दुष्मनाने ख़ुदा की दावत गुमराही और रहनुमा बे बसीरती होती है। याद रखो के मौत से डरने वाला मौत से बच नहीं सकता है और बक़ा का तलबगार बक़ाए दवाम पा नहीं सकता है।


39- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जो माविया के सरदारे लष्कर नामान बिन बषीर के ऐनलतमर पर हमले के वक़्त इरशाद फ़रमाया और लोगों को अपनी नुसरत पर आमादा किया)


मैं ऐसे अफ़राद में मुब्तिला हो गया हूँ जिन्हें हुक्म देता हूँ तो इताअत नहीं करते हैं और बुलाता हूँ तो लब्बैक नहीं कहते हैं। ख़ुदा तुम्हारा बुरा करे, अपने परवरदिगार की मदद करने में किस चीज़ का इन्तेज़ार कर रहे हो। क्या तुम्हें जमा करने वाला दीन नहीं है और क्या जोश दिलाने वाली ग़ैरत नहीं है। मैं तुम में खड़ा होकर आवाज़ देता हूँ और तुम्हें फ़रयाद के लिये बुलाता हूँ लेकिन न मेरी बात सुनते हो और न मेरी इताअत करते हो।
 

((( माविया की मुफ़सिदाना कारवाइयों में से एक अमल यह भी था के उसने नामान बिन बषीर की सरकरदगी में दो हज़ार का लष्कर ऐनलतमर पर हमला करने के लिये भेज दिया था जबके उस वक़्त अमीरूल मोमेनीन (अ0) की तरफ़ से मालिक बिन कअब एक हज़ार अफ़राद के साथ इलाक़े की निगरानी कर रहे थे लेकिन वह सब मौजूद न थे। मालिक ने हज़रत के पास पैग़ाम भेजा। आपने ख़ुत्बा इरषाद फ़रमाया लेकिन ख़ातिरख़्वाह असर न हुआ। सिर्फ़ अदमी बिन हातम अपने क़बीले के साथ तैयार हुए लेकिन आपने दूसरे क़बाएल को भी “ाामिल करना चाहा और जैसे ही मख़निफ़ बिन सलीम ने अब्दुर्रहमान बिन मख़निफ के हमराह पचास आदमी रवाना कर दिये लष्करे माविया आती हुई मकक को देख फ़रार कर गया। लेकिन क़ौम के दामन पर नाफ़रमानी का धब्बा रह गया के आम अफ़राद ने हज़रत के कलाम पर कोई तवज्जो नहीं दी।)))
 

यहाँ तक के हालात के बदतरीन नताएज सामने आ जाएं। सच्ची बात यह है के तुम्हारे ज़रिये न किसी ख़ूने नाहक़ का बदला लिया जा सकता है और न कोई मक़सद हासिल किया जा सकता है। मैंने तुमको तुम्हारे ही भाइयों की मदद के लिये पुकारा मगर तुम उस ऊंट की तरह बिलबिलाने लगे जिसकी नाफ़ में दर्द हो और उस कमज़ोर ‘ातर की तरह सुस्त पड़ गए जिसकी पुष्त ज़ख़्मी हो। इसके बाद तुमसे एक मुख़्तसर सी कमज़ोर, परेषान हाल सिपाह बरामद हुई इस तरह जैसे उन्हें मौत की तरफ़ ढकेला जा रहा हो और यह बेकसी से मौत देख रहे हों।
सय्यद रज़ी- हज़रत (अ0) के कलाम में मतज़ाएब मुज़तरिब के मानी में है के अरब इस लफ़्ज़ को उस हवा के बारे में इस्तेमाल करते हैं जिसका रूख़ मुअय्यन नहीं होता है और भेडिये को भी ज़ैब इसीलिसे कहा जाता है के इसकी चाल बे-हंगम होती है।
 

40- आपका इरषादे गिरामी
(ख़वारिज के बारे में इनका यह मक़ौल सुन कर के ‘‘हुक्मे अल्लाह के अलावा किसी के लिये नहीं है)
 

यह एक कलमए हक़ है जिससे बातिल मानी मुराद ले गए हैं- बेषक हुक्म सिर्फ़ अल्लाह के लिये है लेकिन उन लोगों का कहना है के हुकूमत और इमारत भी सिर्फ़ अल्लाह के लिये है हालांके खुली हुई बात है के निज़ामे इन्सानियत के लिये एक हाकिम का होना बहरहाल ज़रूरी है चाहे नेक किरदार हो या फ़ासिक़ के हुकूमत के ज़ेरे साया ही मोमिन को काम करने का मौक़ा मिल सकता है और काफ़िर भी मज़े उड़ा सकता है और अल्लाह हर चीज़ को उसकी आखि़री हद तक पहुंचा देता है और माले ग़नीमत व ख़ेराज वग़ैरह जमा किया जाता है और दुष्मनों से जंग की जाती है और रास्तों का तहफ़्फ़ुज़ किया जाता है और ताक़तवर से कमज़ोर का हक़ लिया जाता है ताके नेक किरदार इन्सान को राहत मिले और बदकिरदार इन्सान से राहत मिले। (एक रिवायत में है के जब आपको तहकीम की इत्तेला मिली तो फ़रमाया) ‘‘मैं तुम्हारे बारे में हुक्मे ख़ुदा का इन्तेज़ार कर रहा हूँ।’’ फिर फ़रमाया - हुकूमत नेक होती है तो मुत्तक़ी को काम करने का मौक़ा मिलता है और हाकिम फ़ासिक़ व फ़ाजिर होता है तो बदबख़्तों को मज़ा उड़ाने का मौक़ा मिलता है यहाँ तक के इसकी मुद्दत तमाम हो जाए और मौत उसे अपनी गिरफ्त में ले ले।


41- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें ग़द्दारी से रोका गया है और इसके नताएज से डराया गया है।)


अय्योहन्नास! याद रखो वफ़ा हमेषा सिदाक़त के साथ रहती है और मैं उससे बेहतर मुहाफ़िज़ कोई सिपर नहीं जानता हूँ और जिसे बाज़गष्त की कैफ़ियत का अन्दाज़ा होता है वह ग़द्दारी नहीं करता है। हम एक ऐसे दौर में वाक़ेअ हुए हैं जिसकी अक्सरीयत ने ग़द्दारी और मक्कारी का नाम होषियारी रख लिया है।
(((सत्रहवीं सदी में एक फ़लसफ़ा ऐसा भी पैदा हुआ था जिसका मक़सद मिज़ाज की हिमायत था और उसका दावा यह था के हुकूमत का वजूद समाज में हामिक व महकूम का इम्तेयाज़ पैदा करता है। हुकूमत से एक तबक़े को अच्छी-अच्छी तन्ख़्वाहें मिल जाती हैं और दूसरा महरूम रह जाता है। एक तबक़े को ताक़त इस्तेमाल करने का हक़ होता है और दूसरे को यह हक़ नहीं होता है और यह सारी बातें मिज़ाजे इन्सानियत के खि़लाफ़ हैँ लेकिन हक़ीक़ते अम्र यह है के यह बयान लफ़्ज़ों में इन्तेहाई हसीन है और हक़ीक़त के एतबार से इन्तेहाई ख़तरनाक है और बयान करदा मफ़ासिद का इलाज यह है के हाकिमे आला को मासूम और आम हुक्काम को अदालत का पाबन्द तस्लीम कर लिया जाए। सारे फ़सादात का ख़ुद-ब-ख़ुद इलाज हो जाएगा।
मज़कूरा बाला फ़लसफ़े के खि़लाफ़ फ़ितरत की रौषनी भी वह थी जिसने 1920 ई0 में इसका जनाज़ा निकाल दिया और फिर कोई ऐसा अहमक़ फ़लसफ़ी नहीं पैदा हुआ।)))
और अहले जेहालत ने इसका नाम हुस्ने तदबीर रख लिया है। आखि़र उन्हें क्या हो गया है? ख़ुदा इन्हें ग़ारत करे, वह इन्सान जो हालात के उलट फेर को देख चुका है वह भी हीला के रूख़ को जानता है लेकिन अम्र व नहीं इलाही इसका रास्ता रोक लेते हैं और वह इमकान रखने के बावजूद उस रास्ते को तर्क कर देता है और वह “ाख़्स इस मौक़े से फ़ायदा उठा लेता है जिसके लिये दीन सरे राह नहीं होता है।


42- आपका इरषादे गिरामी
(जिसमें इत्तबाअ ख़्वाहिषात और तूले अमल से डराया गया है)


अय्योहन्नास! मैं तुम्हारे बारे में सबसे ज़्यादा दो चीज़ों का ख़ौफ़ रखता हूँ। इत्तेबाअ ख़्वाहिषात और दराज़िये उम्मीद, के इत्तेबाअ ख़्वाहिषात इन्सान को राहे हक़ से रोक देता है और तूले अमल आख़ेरत को भुला देता है। याद रखो दुनिया मुंह फेरकर जा रही है और इसमें से कुछ बाक़ी नहीं रह गया है मगर उतना जितना बरतन से चीज़ को उण्डेल देने के बाद तह में बाक़ी रह जाता है और आखि़रत अब सामने आ रही है।
दुनिया व आख़ेरत दोनों की अपनी औलाद हैं। लेहाज़ा तुम आख़ेरत के फ़रज़न्दों में “ाामिल हो जाओ और ख़बरदार फ़रज़न्दाने दुनिया में “ाुमार न होना इसलिये के अनक़रीब हर फ़रज़न्द को इसके माल के साथ मिला दिया जाएगा। आज अमल की मंज़िल है और कोई हिसाब नहीं है और कल हिसाब ही हिसाब है और कोई अमल की गुंजाइष नहीं है।


43- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जब जरीर बिन अब्दुल्लाह अल बजली को माविया के पास भेजने और माविया के इन्कारे बैयत के बाद असहाब को अहले “ााम से जंग पर आमादा करना चाहा)


इस वक़्त मेरी अहले “ााम से जंग की तैयारी जबके जरीर वहां मौजूद हैं “ााम पर तमाम दरवाज़े बन्द कर देना है और उन्हें ख़ैर के रास्ते से रोक देना है और अगर वह ख़ैर का इरादा भी करना चाहें मैंने ख़ैर के लिये एक वक़्त मुक़र्रर कर दिया है। इसके बाद वह वहाँ या किसी धोके की बिना पर रूक सकते हैं या नाफ़रमानी की बिना पर, और दोनों सूरतों में मेरी राय यही है के इन्तेज़ार किया जाए लेहाज़ा अभी पेषक़दमी न करो और मैं मना भी नहीं करता हूँ अगर अन्दर-अन्दर तैयारी करते रहो।
(((इन्सान की आक़ेबत का दारोमदार हक़ाएक और वाक़ेयात पर है और वहां हर “ाख़्स को इसकी माँ के नाम से पुकारा जाएगा के माँ ही एक साबित हक़ीक़त है बाप की त“ाख़ीस में तो इख़्तेलाफ़ हो सकता है लेकिन माँ की त“ाख़ीस में कोई इख़्तेलाफ़ नहीं हो सकता है। इमाम अलैहिस्सलाम का मक़सद यह है के दुनिया में आख़ेरत की गोद में परवरिष पाओ ताके क़यामत के दिन इसी से मिला दिये जाओ वरना अबनाए दुनिया इस दिन वह यतीम होंगे जिनका कोई बाप न होगा और माँ को भी पीछे छोड़ कर आए होंगे। ऐसा बेसहारा बनने से बेहतर यह है के यहीं से सहारे का इन्तेज़ाम कर लो और पूरे इन्तेज़ाम के साथ आख़ेरत का सफ़र इख़्तेयार करो।
यह इस अम्र की तरफ़ इषारा है के अमली एहतियात का तक़ाज़ा यह है के दुष्मन को कोई बहाना फ़राहम न करो और वाक़ई एहतियात का तक़ाज़ा यह है के उसके मक्रो फ़रेब से होशियार हो और हर वक़्त मुक़ाबला करने के लिये तैयार रहो।)))
मैंने इस मसले पर मुकम्मल ग़ौरो फ़िक्र कर लिया है और इसके ज़ाहिर व बातिन को उलट पलट कर देख लिया है। अब मेरे सामने दो ही रास्ते हैं या जंग करूं या बयानाते पैग़म्बरे इस्लाम (स0) का इन्कार कर दूँ। मुझसे पहले इस क़ौम का एक हुकमराँ था। उसने इस्लाम में बिदअतें ईजाद कीं और लोगों को बोलने का मौक़ा दिया तो लोगों ने ज़बान खोली। फिर अपनी नाराज़गी का इज़हार किया और आखि़र में समाज का ढांचा बदल दिया।


44- हज़रत का इरषादे गिरामी
(इस मौक़े पर जब मुस्क़िला बिन हबीरा “ाीबानी ने आपके आमिल से बनी नाजिया के असीर ख़रीद कर आज़ाद कर दिया और जब जब हज़रत ने उससे क़ीमत का मुतालबा किया तो बददयानती करते हुए “ााम की तरफ़ फ़रार कर गया)


ख़ुदा बुरा करे मुस्क़िला का के उसने काम “ारीफ़ों जैसा किया लेकिन फ़रार ग़ुलामों की तरह किया। अभी इसके मद्दाह ने ज़बान खोली भी नहीं थी के इसने ख़ुद ही ख़ामोष कर दिया और इसकी तारीफ़ कुछ कहने वाला कुछ कहने भी न पाया था के इसने मुंह बन्द कर दिया। अगर वह यहीं ठहरा रहता तो मैं जिस क़द्र क़ीमत मुमकिन होता उससे ले लेता और बाक़ी के लिये इसके माल की ज़्यादती का इन्तेज़ार करता।


45- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(यह ईदुल फ़ित्र के मौक़े पर आपके तवील ख़ुत्बे का एक जुज़ है जिसमें हम्दे ख़ुदा और मज़म्मते दुनिया का ज़िक्र किया गया है)


तमाम तारीफ़ उस अल्लाह के लिये है जिसकी रहमत से मायूस नहीं हुआ जाता और जिसकी नेमत से किसी का दामन ख़ाली नहीं है। न कोई “ाख़्स इसकी मग़फ़ेरत से मायूस हो सकता है और न किसी में इसकी इबादत से अकड़ने का इमकान है। न इसकी रहमत तमाम होती है और न इसकी नेमत का सिलसिला रूकता है।
यह दुनिया एक ऐसा घर है जिसके लिये फ़ना और इसके बाषिन्दों के लिये जिला वतनी मुक़र्रर है। यह देखने में “ाीरीं और सरसब्ज़ है जो अपने तलबगार की तरफ़ तेज़ी से बढ़ती है और उसके दिल में समा जाती है। लेहाज़ा ख़बरदार इससे कूच की तैयारी करो और बेहतरीन ज़ादे राह लेकर चलो। इस दुनिया में ज़रूरत से ज़्यादा सवाल न करना और जितने से काम चल जाए उससे ज़्यादा का मुतालबा न करना।
((( उस वाक़िये का ख़ुलासा यह है के तहकीम के बाद ख़वारिज ने जिन “ाोरषों का आगणऩाज़ किया था उनमें एक बनी नाजिया के एक “ाख़्स ख़रीत बिन राषिद का इक़दाम था जिसको दबाने के लिये हज़रत ने ज़ियादा बिन हफ़सा को रवाना किया था और उन्होंने “ाोरष को दबा दिया था लेकिन ख़रीत दूसरे इलाक़ों में फ़ितने बरपा करने लगा तो हज़रत ने माक़ल बिन क़ैस रियाही को दो हज़ार का लष्कर देकर रवाना कर दिया और उधर इब्ने अब्बास ने बसरा से मकक भेज दी और बाला आखि़र हज़रत (अ0) के लष्कर ने फ़ितना को दबा दिया और बहुत से अफ़राद को क़ैदी बना लिया। क़ैदियों को लेकर जा रहे थे के रास्ते में मुस्क़ला के “ाहर से गुज़र हुआ। इसने क़ैदियों की फ़रयाद पर उन्हें ख़रीद कर आज़ाद कर दिया और क़ीमत की सिर्फ़ एक क़िस्त अदा कर दी। इसके बाद ख़ामोष बैठ गया। हज़रत (अ0) ने बार-बार मुतालबा किया। आखि़र में कूफ़ा आकर दो लाख दिरहम दे दिये और जान बचाने के लिये “ााम भाग गया। हज़रत (अ0) ने फ़रमाया के काम “ारीफ़ों का किया था लेकिन वाक़ेयन ज़लील ही साबित हुआ।
काष इसे इस्लाम के इस क़ानून की इत्तेलाअ होती के क़र्ज़ की अदायगी में जब्र नहीं किया जाता है बल्कि हालात का इन्तेज़ार किया जाता है और जब मक़रूज़ के पास इमकानात फ़राहम हो जाते हैं तब क़र्ज़ का मुतालबा किया जाता है।)))