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Nahjul Balagha Hindi Khutba 46-54 , नहजुल बलाग़ा हिन्दी ख़ुत्बा 46-54

2011-03-18

 46- आपका इरषादे गिरामी
(जब “ााम की तरफ़ जाने का इरादा फ़रमाया और इस दुआ को रकाब में पांव रखते हुए विर्दे ज़बान फ़रमाया)


ख़ुदाया मैं सफ़र की मषक्क़त और वापसी के अन्दोह व ग़म और अहल-व-माल-व-औलाद की बदहाली से तेरी पनाह चाहता हूँ। तू ही सफ़र का साथी है और घर का निगराँ है के यह दोनों काम तेरे अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता है के जिसे घर में छोड़ दिया जाए वह सफ़र में काम नहीं आता है और जिसे सफ़र में साथ ले लिया जाए वह घर की निगरानी नहीं कर सकता है।
सय्यद रज़ी- इस दुआ का इब्तेदाई हिस्सा सरकारे दो आलम (स0) नक़ल किया गया है और आखि़री हिस्सा मौलाए कायनात की तज़मीन का है जो सरकार (अ0) के कलेमात की बेहतरीन तौज़ीअ और तकमील है ‘‘ला यहमाहमा ग़ैरक’’


47- आपका इरषादे गिरामी
(कूफ़े के बारे में)


ऐ कूफ़ा! जैसे के मैं देख रहा हूँ के तुझे बाज़ार अकाज़ के चमड़े की तरह खींचा जा रहा है। तुझ पर हवादिस के हमले हो रहे हैं और तुझे ज़लज़लों का मरकब बना दिया गया है और मुझे यह मालूम है के जो ज़ालिम व जाबिर भी तेरे साथ कोई बुराई करना चाहेगा परवरदिगार उसे किसी न किसी मुसीबत में मुब्तिला कर देगा और उसे किसी क़ातिल की ज़द पर ले आएगा।


48- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा

(जो सिफ़्फ़ीन के लिये कूफ़े से निकलते हुए मक़ामे नख़लिया पर इरषाद फ़रमाया था)


परवरदिगार की हम्द है जब भी रात आए और तारीकी छाए या सितारा चमके और डूब जाए। परवरदिगार की हम्दो सना है के उसकी नेमतें ख़त्म नहीं होती हैं और उसके एहसानात का बदला नहीं दिया जा सकता।
अम्माबाद! मैंने अपने लश्कर का हरावल दस्ता रवाना कर दिया है और उन्हें हुक्म दिया है के इस नहर के किनारे ठहर कर मेरे हुक्म का इन्तेज़ार करें। मैं चाहता हूँ के इस दरियाए दजला को अबूर करके तुम्हारी एक मुख़्तसर जमाअत तक पहुँच जाऊँ जो एतराफ़े दजला में मुक़ीम हैं ताके उन्हें तुम्हारे साथ जेहाद के लिये आमादा कर सकूँ और उनके ज़रिये तुम्हारी क़ूवत में इज़ाफ़ा कर सकूँ।
सय्यद रज़ी- मलतात से मुराद दरिया का किनारा है और असल में यह लफ़्ज़ हमवार ज़मीन के मानों में इस्तेमाल होता है। नुत्फ़े से मुराद फ़ुरात का पानी है और यह अजीबो ग़रीब ताबीरात में है।
 

(((इस जमाअत से मुराद अहले मदायन हैं जिन्हें हज़रात (अ0) इस जेहाद में “ाामिल करना चाहते थे और उनके ज़रिये लष्कर की क़ूवत में इज़ाफ़ा करना चाहते थे। ख़ुत्बे के आगणऩाज़ में रात और सितारों का ज़िक्र इस अम्र की तरफ़ भी इषारा हो सकता है के लष्करे इस्लाम को रात की तारीकी और सितारे के ग़ुरूब व ज़वाल से परेषान नहीं होना चाहिए। नूरे मुतलक़ और ज़ियाए मुकम्मल साथ है तो तारीकी कोई नुक़सान नहीं पहुँच मार्गँचा सकती है और सितारों का क्या भरोसा है। सितारे तो डूब भी जाते हैं लेकिन जो परवरदिगार क़ाबिले हम्दो सना है उसके लिये ज़वाल व ग़ुरूब नहीं है और वह हमेषा बन्दए मोमिन के साथ रहता है।)))


49- आपका इरषादे गिरामी
(जिसमें परवरदिगार के मुख़्तलिफ़ सिफ़ात और उसके इल्म का तज़किरा किया गया है)


सारी तारीफ़ें उस ख़ुदा के लिये हैं जो मख़फ़ी उमूर की गहराइयों से बाख़बर है और उसके वजूद की रहनुमाई ज़हूर की तमाम निषानियां कर रही हैं। वह देखने वालों की निगाह में आने वाला नहीं है लेकिन न किसी न देखने वाले की आँख उसका इन्कार कर सकती है और न किसी असबात करने वाले का दिल इसकी हक़ीक़त को देख सकता है। वह बुलन्दियों में इतना आगे है के कोई “ौ उससे बुलन्दतर नहीं है और क़ुरबत में इतना क़रीब है के कोई “ाय इससे क़रीबतर नहीं है। न इसकी बलन्दी उसे मख़लूक़ात से दूर बना सकती है और न इसकी क़ुरबत बराबर की जगह पर ला सकती है। इसने अक़लों को अपनी सिफ़तों की हुदूद से बाख़बर नहीं किया है और बक़द्रे वाजिब मारेफ़त से महरूम भी नहीं रखा है। वह ऐसी हस्ती है के इसके इनकार करने वाले के दिल पर इसके वजूद की निषानियां “ाहादत दे रही हैं। वह मख़लूक़ात से तषबीह देने वाले और इन्कार करने वाले दोनों की बातों से बलन्द व बालातर है।


50- आपका इरषादे गिरामी
(इसमें उन फ़ित्नों का तज़केरा है जो लोगों को तबाह कर देते हैं और इनके असरात का भी तज़किरा है)


फ़ित्नों की इब्तेदा इन ख़्वाहिषात से होती है जिनका इत्तेबाअ किया जाता है और इन जदीदतरीन एहकाम से होती है जो गढ़ लिये जाते हैं और सरासर किताबे ख़ुदा के खि़लाफ़ होते हैं। इसमें कुछ लोग दूसरे लागों के साथ हो जाते हैं और दीने ख़ुदा से अलग हो जाते हैं के अगर बातिल हक़ की आमेज़िष से अलग रहता तो हक़ के तलबगारों पर मख़फ़ी न हो सकता और अगर हक़ बातिल की मिलावट से अलग रहता तो दुष्मनों की ज़बानें न खुल सकती। लेकिन एक हिस्सा इसमें से लिया जाता है और एक हिस्सा उसमें से, और फिर दोनों को मिला दिया जाता है और ऐसे ही मवाक़े पर “ौतान अपने साथियों पर मुसल्लत हो जाता है और सिर्फ़ वह लोग निजात हासिल कर पाते हैं जिनके लिये परवरदिगार की तरफ़ से नेकी पहले ही पहुँच जाती है।


(((इस इरषादे गिरामी का आग़ाज लफ़्ज़े इन्नमा से हुआ है जो इस बात की दलील है के दुनिया का हर फ़ितना ख़्वाहिषात की पैरवी और बिदअतों की ईजाद से “ाुरू होता है और यही तारीख़ी हक़ीक़त है के अगर उम्मते इस्लामिया ने रोज़े अव्वल किताबे ख़ुदा के खि़लाफ़ मीरास के एहकाम वाज़े न किये होते और अगर मन्सब व इक़्तेदार की ख़्वाहिष में ‘‘मन कुन्तो मौला’’ का इन्कार न किया होता और कुछ लोग कुछ लोगों के हमदर्द न हो गए होते और नस्ल पैग़म्बर (स0) के साथ सिन व साल और सहाबियत व क़राबत के झगड़े न “ाामिल कर दिये होते तो आज इस्लाम बिल्कुल ख़ालिस और सरीह होता और उम्मत में किसी तरह का फ़ित्ना व फ़साद न होता। लेकिन अफ़सोस के यह सब कुछ हो गया और उम्मत एक दायमी फ़ित्ने में मुब्तिला हो गई जिसका सिलसिला चैदह सदियों से जारी है और ख़ुदा जाने कब तक जारी रहेगा।)))


51- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जब माविया के साथियों ने आपके साथियों को हटाकर सिफ़फ़ीन के क़रीब फ़ुरात पर ग़लबा हासिल कर लिया और पानी बन्द कर दिया)


देखो दुष्मनों ने तुमसे ग़िज़ाए जंग का मुतालबा कर दिया है अब या तो तुम ज़िल्लत और अपने मुक़ाम की पस्ती पर क़ायम रह जाओ या अपनी तलवारों को ख़ून से सेराब कर दो और ख़ुद पानी से सेराब हो जाओ। दर हक़ीक़त मौत ज़िल्लत की ज़िन्दगी में हैं और ज़िन्दगी इज़्ज़त की मौत में है। आगाह हो जाओ के माविया गुमराहों की एक जमाअत की क़यादत कर रहा है जिस पर तमाम हक़ाएक़ पोषीदा हैं और उन्होंने जेहालत की बिना पर अपनी गरदनों को तीरे अजल का निषाना बना दिया है।


52- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें दुनिया में ज़ोहद की तरग़ीब और पेष परवरदिगार इसके सवाब और मख़लूक़ात पर ख़ालिक़ की नेमतों का तज़किरा किया गया है।)


अगाह हो जाओ दुनिया जा रही है और इसने अपनी रूख़सत का एलान कर दिया है और इसकी जानी पहचानी चीज़ें भी अजनबी हो गई हैं। वह तेज़ी से मुंह फेर रही है और अपने बाषिन्दों को फ़ना की तरफ़ ले जा रही है और अपने हमाइयों को मौत की तरफ़ ढकेल रही है। इसकी “ाीरीं तल्ख़ हो चुकी है और इसकी सफ़ाई मकद्दर हो चुकी है। अब इसमें सिर्फ़ इतना ही पानी बाक़ी रह गया है जो तह में बचा हुआ है और वह नपा तुला घूूंट रह गया है जिसे प्यासा पी भी ले तो उसकी प्यास नहीं बुझ सकती है। लेहाज़ा बन्दगाने ख़ुदा अब इस दुनिया से कूच करने का इरादा कर लो जिसके रहने वालों का मुक़द्दर ज़वाल है और ख़बरदार! त्ुम पर ख़्वाहिषात ग़ालिब न आने पायें और इस मुख़्तसर मुद्दत को तवील न समझ लेना।
ख़ुदा की क़सम अगर तुम इन ऊंटनियों की तरह भी फ़रयाद करो जिनका बच्चा गुम हो गया हो और उन कबूतरों की तरह नाला-ओ-फ़ुग़ाँ करो जो अपने झुण्ड से अलग हो गए होँ और उन राहिबों की तरह भी गिरया व फ़रयाद करो जो अपने घरबार को छोड़ चुके हों और माल व औलाद को छोड़ कर क़ुरबते ख़ुदा की तलाष में निकल पड़ो ताके इसकी बारगाह में दरजात बलन्द हो जाएं या वह गुनाह माफ़ हो जाएं जो इसके दफ़्तर में सब्त हो गए हैं और फ़रिष्तों ने उन्हें महफ़ूज़ कर लिया है तो भी यह सब इस सवाब से कम होगा जिसकी मैं तुम्हारे बारे में उम्मीद रखता हूँ या जिस अज़ाब का तुम्हारे बारे में ख़ौफ़ रखता हूँ।
ख़ुदा की क़सम अगर तुम्हारे दिल बिल्कुल पिघल जाएं और तुम्हारी आँखों से आंसुओं के बजाए रग़बते सवाब या ख़ौफ़े अज़ाब में ख़ून जारी हो जाए और तुम्हें दुनिया में आखि़र तक बाक़ी रहने का मौक़ा दे दिया जाए तो भी तुम्हारे आमाल इसकी अज़ीमतरीन नेमतों और हिदायते ईमान का बदला नहीं हो सकते हैँ चाहे इनकी राह में तुम कोई कसर उठाकर न रखो।


(((खुली हुई बात है के ‘‘फ़िक्र हरकस बक़द्रे रहमत ओस्त’’ दुनिया का इन्सान कितना ही बलन्द नज़र और आली हिकमत क्यों न हो जाए मौलाए कायनात (अ0) की बलन्दीए फ़िक्र को नहीं पा सकता है और इस दरजए इल्म पर फ़ाएज़ नहीं हो सकता है जिस पर मालिके कायनात ने बाबे मदीनतुल इल्म को फ़ाएज़ किया है।
आप फ़रमाना चाहते हैं के तुम लोग मेरी इताअत करो और मेरे एहकाम पर अमल करो इसका अज्र व सवाब तुम्हारे उफ़्कार की रसाई की हुदूद से बालातर है। मैं तुम्हारे लिये बेहतरीन सवाब की उम्मीद रखता हूँ और तुम्हें बदतरीन अज़ाब से बचाना चाहता हूँ लेकिन इस राह में मेरे एहकाम की इताअत करना होगी और मेरे रास्ते पर चलना होगा जो दर हक़ीक़त “ाहादत और क़ुरबानी का रास्ता है और इन्सान इसी रास्ते पर क़दम आगे बढ़ाने से घबराता है और हैरत अंगेज़ बात यह है के एक दुनियादार इन्सान जिसकी सारी फ़िक्र माल व दुनिया और सरवते दुनिया है वह भी किसी हलाकत के ख़तरे में मुब्तिला हो जाता है तो अपने को हलाकत से बचाने के लिये सारा माल व मताअ क़ुरबान कर देता है तो फिर आखि़र दुनियादार इन्सान में यह जज़्बा क्यों नहीं पाया जाता है? वह जन्नतुल नईम को हासिल करने और अज़ाबे जहन्नम से बचने के लिये अपनी दुनिया को क़ुरबान क्यों नहीं करता है? इसका तो अक़ीदा यही है के दुनिया चन्द रोज़ा और फ़ानी है और आख़ेरत अबदी और दायमी है तो फ़िर फ़ानी को बाक़ी की राह में क्यों क़ुरबान नहीं कर देता है? ‘‘अन हाज़ल “ौअ अजाब’’)))


53- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें रोज़े ईदुल अज़हा का तज़केरा है और क़ुरबानी के सिफ़ात का ज़िक्र किया गया है)


क़ुरबानी के जानवर का कमाल यह है के इसके कान बलन्द हों और आँखें सलामत हों के अगर कान और आँख सलामत हैं तो गोया क़ुरबानी सालिम और मुकम्मल है चाहे इसकी सींग टूटी हुई हो और वह पैरों को घसीट कर अपने को क़ुरबान गाह तक ले जाए।


सय्यद रज़ी- इस मक़ाम पर मन्सक से मुराद मज़नअ और क़ुरबानगाह है।


54- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें आपने अपनी बैयत का तज़किरा किया है)


लोग मुझ पर यूँ टूट पड़े जैसे वह प्यासे ऊँट पानी पर टूट पड़ते हैं जिनके निगरानों ने उन्हें आज़ाद छोड़ दिया हो और उनके पैरों की रस्सियां खोल दी हों यहां तक के मुझे यह एहसास पैदा हो गया के यह मुझे मार ही डालेंगे या एक दूसरे को क़त्ल कर देंगे। मैंने इस अम्रे मुख़ालफ़त को यूँ उलट पलट कर देखा है के मेरी नीन्द तक उड़ गई है और अब यह महसूस किया है के या इनसे जेहाद करना होगा या पैग़म्बर (स0) के एहकाम का इन्कार कर देना होगा। ज़ाहिर है के मेरे लिये जंग की सख़्ितयों का बरदाष्त करना अज़ाब की सख़्ती बरदाष्त करने से आसानतर है और दुनिया की मौत आख़ेरत की मौत और तबाही से सुबुकतर है।


(((सवाल यह पैदा होता है के जिस इस्लाम में रोज़े अव्वल से बज़ोरे “ामषीर बैअत ली जा रही थी और इन्कारे बैअत करने पर घरों में आगणन लगाई जा रही थी या लोगों को ख़न्जर व “ामषीर और ताज़ियाना व दुर्रा का निषाना बनाया जा रहा था। इसमें यकबारगी यह इन्क़ेलाब कैसे आ गया के लोग एक इन्सान की बैअत करने के लिये टूट पड़े और यह महसूस होने लगा के जैसे एक दूसरे को क़त्ल कर देंगे।
क्या इसका राज़ यह था के लोग इस एक “ाख़्स के इल्म व फ़ज़्ल, ज़ोहद व तक़वा और “ाुजाअत व करम से मुतास्सिर हो गए थे। ऐसा होता तो यह सूरते हाल बहुत पहले पैदा हो जाती और लोग इस “ाख़्स पर क़ुरबान हो जाते। हालांके ऐसा नहीं हो सका जिसका मतलब यह है के क़ौम ने “ाख़्िसयत से ज़्यादा हालात को समझ लिया था और यह अन्दाज़ा कर लिया था के वह “ाख़्स जो उम्मत के दरमियान वाक़ेई इन्साफ़ कर सकता है और जिसकी ज़िन्दगी एक आम इन्सान की ज़िन्दगी की तरह सादगी रखती है और इसमें किसी तरह की हर्स व तमअ का गुज़र नहीं है वह इस मर्दे मोमिन और कुल्ले ईमान के अलावा कोई दूसरा नहीं है। लेहाज़ा इसकी बैयत में सबक़त करना एक इन्सानी और ईमानी फ़रीज़ा है और दरहक़ीक़त मौलाए कायनात (अ0) ने इस पूरी सूरते हाल को एक लफ़्ज़ में वाज़ेअ कर दिया है के यह दिन दर हक़ीक़त प्यासों के सेराब होने का दिन था और लोग मुद्दतों से तष्नाकाम थे लेहाज़ा इनका टूट पड़ना हक़ बजानिब था। इस एक तषबीह से माज़ी और हाल दोनों का मुकम्मल अन्दाज़ा किया जा सकता है।)))