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Nahjul Balagha Hindi Khutba 87-90, नहजुल बलाग़ा हिन्दी ख़ुत्बा 87-90

2011-03-25

87-आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा

 

(जिसमें मुत्तक़ीन और फ़ासेक़ीन के सिफ़ात का तज़किरा किया गया है और लोगों को तम्बीह की गई है)

 

बन्दगाने ख़ुदा! अल्लाह की निगाह में सबसे महबूब बन्दा वह है जिसकी ख़ुदा ने उसके नफ़्स के खि़लाफ़ मदद की है और उसने अन्दर लिबासे हुज़्न और बाहर ख़ौफ़ का लिबास पहन लिया है। (यानी अन्दोह व मलाल उसे चिमटा रहता है और ख़ौफ़ उस पर छाया रहता है) उसके दिल में हिदायत का चिराग़ रौषन है और उसने आने वाले दिन की मेहमानी का इन्तेज़ाम कर लिया है। अपने नफ़्स के लिये आने वाले बईद (मौत) को क़रीब कर लिया है और सख़्त मरहले को आसान कर लिया है, देखता है तो बसीरत व मारेफ़त पैदा की है और ख़ुदा को याद किया है तो अमल में कसरत पैदा की है। हिदायत के इस चष्मए “ाीरीं व ख़ुषगवार से सेराब हो गया है जिस के घाट पर (अल्लाह की रहनुमाई ने) वारिद होने को आसान बना दिया गया है, जिसके नतीजे में ख़ूब छक कर पी लेता है और सीधे रास्ते पर चल पड़ा है। ख़्वाहिषात के लिबास को जुदा कर दिया है और तमाम अफ़कार से आज़ाद हो गया है। सिर्फ़ एक फ़िक्रे आख़ेरत बाक़ी रह गई है जिसके ज़ेरे असर गुमराही की मन्ज़िल से निकल आया है और अहले हवा व हवस की षिरकत (हवस परस्तों की हवसरानियों) से दूर हो गया है। हिदायत के दरवाज़े की कलीद बन गया है और गुमराही के दरवाज़ों का क़फ़ल बन गया है। अपने रास्ते को देख लिया है और उसी पर चल पड़ा है। हिदायत के मिनारे को पहचान लिया है और गुमराहियों के धारे को तय कर लिया है। मज़बूत तरीन वसीले से वाबस्ता हो गया है और मोहकमतरीन रस्सी को पकड़ लिया है इसलिये के वह अपने यक़ीन में बिलकुल नूर आफताब जैसी रौषनी रखता है। अपने नफ़्स को बलन्दतरीन उमूर की ख़ातिर राहे ख़ुदा में आमादा कर लिया है के हर आने वाले के मसले को हल कर देगा और फ़ुरूअ को उनकी असल की तरफ़ पलटा देगा। वह तारीकियों का चिराग़ है और अन्धेरों का रौषन करने वाला मुष्तबा बातों को हल करने वाला, उलझे हुए मसलों को सुलझाने वाला, मुष्किलात का दफ़ा करने वाला और फिर सहराओं में रहनुमाई करने वाला। वह बोलता है तो बात को समझा लेता है और चुप रहता है तो सलामती का बन्दोबस्त कर लेता है। उसने अल्लाह से इख़लास बरता है तो अल्लाह ने उसे अपना बन्द-ए मुख़लिस बना लिया है। अब वह दीने ख़ुदा का मअदन है और ज़मीने ख़ुदा का कारकुन आज़म। इसने अपने नफ़्स के लिये अद्ल को लाज़िम क़रार दे लिया है और इसके अद्ल की पहली मन्ज़िल यह है के ख़्वाहिषात को अपने नफ़्स से दूर कर दिया है और अब हक़ ही को बयान करता है और उसी पर अमल करता है। नेकी की कोई मन्ज़िल ऐसी नहीं है जिसका क़स्द न करता हूँ और कोई ऐसा एहतेमाल नहीं है जिसका इरादा न रखता हो। अपने उमूर की ज़माम किताबे ख़ुदा के हवाले कर दी है और अब वही उसकी क़ायद और पेषवा है जहाँ इसका सामान उतरतर है वहीं वारिद हो जाता है और जहां इसकी मंज़िल होती है वहीं पड़ाव डाल देता है।
इसके बरखि़लाफ़ एक “ाख़्स वह भी है जिसने अपना नाम आलिम रख लिया है हालांके इल्म से कोई वाबस्ता नहीं है। जाहिलों से जेहालत को हासिल किया है और गुमराहों से गुमराही को। लोगों के वास्ते धोका के फन्दे और मक्रो फ़रेब के जाल बिछा दिये हैं। किताब की तावील अपनी राय के मुताबिक़ की है और हक़ को अपने ख़्वाहिषात की तरफ़ मोड़ दिया है। लोगों को बड़े-बड़े जरायम की तरफ़ से महफ़ूज़ बनाता है और उनके लिये गुनाहाने कबीरा को भी आसान बना देता है। कहता यही है के मैं “ाुबहात के मवाक़े पर तवक़फ़ करता हूं लेकिन वाक़ेअन इन्हीं में गिर पड़ता है और फिर कहता है के मैं बिदअतों से अलग रहता हूं हालांके उन्हीं के दरमियान उठता बैठता है।
इसकी सूरत इन्सानों जैसी है लेकिन दिल जानवरों जैसा है। न हिदायत के दरवाज़े को पहुंचता है के इसका इत्तेबाअ करे और न गुमराही के रास्ते को जानता है के इससे अलग रहे, यह दर हक़ीक़त एक चलती फिरती मय्यत है और कुछ नहीं है।
तो आखि़र तुम लोग किधर जा रहे हो और तुम्हें किस सिम्त मोड़ा जा रहा है? जबके निषानात क़ायम रहते हैं और आयात वाज़ेअ हैं। मिनारे नसब के लिये जा चुके हैं और तुम्हें भटकाया जा रहा है और तुम भटके जा रहे हो। देखो तुम्हारे दरम्यान तुम्हारे नबी की इतरत मौजूद है। यह सब हक़ के ज़मामदार दीन के परचम और सिदाक़त के तरजुमान हैं। उन्हें क़ुरआने करीम की बेहतरीन मन्ज़िल पर जगह दो और उनके पास इस तरह वारिद हो जिस तरह प्यासे ऊँट चष्मे पर वारिद होते हैं।
लोगों! हज़रत ख़ातेमुन्नबीयीन (अ0) के इस इरषादे गिरामी पर अमल करो के ‘‘हमारा मरने वाला मय्यत नहीं होता है और हममें से कोई मुरदर ज़माने से बोसीदा नहीं होता है।’’ ख़बरदार वह न कहो जो तुम नहीं जानते हो। इसलिये के बसाऔक़ात हक़ इसी में होता है जिसे तुम नहीं पहचानते हो और जिसके खि़लाफ़ तुम्हारे पास कोई दलील नहीं है उसके उज़्र को क़ुबूल कर लो और वह मैं हँू। क्या मैंने सक़ल अकबर क़ुरान पर अमल नहीं किया है और क्या सक़ले असग़र अहलेेबैत (अ0) को तुम्हारे दरम्यान नहीं रखा है। मैंने तुम्हारे दरम्यान ईमान के परचम को नस्ब कर दिया है और तुम्हें हलाल व हराम के हुदूद से आगाह कर दिया है। अपने अद्ल की बिना पर तुम्हें लिबास आफ़ियत बिछाना है और अपने क़ौलो फ़ेल की नेकियों को तुम्हारे लिये फ़र्ष कर दिया है और तुम्हें अपने बलन्द तरीन एख़लाक़ का मन्ज़र दिखला दिया है। लेहाज़ा ख़बरदार जिस बात की गहराई तक निगाहें नहीं पहुंच सकती हैं और जहां तक फ़िक्र रसाई नहीं है इसमें अपनी राय को इस्तेमाल न करना।


ग़लतफ़हमी


(बनी उमय्या के मज़ालिम ने इस क़द्र दहषतज़दा बना दिया है के बाज़ लोग ख़याल कर रहे हैं के दुनिया बनी उमय्या के दामन से बान्धी दी गई है। उन्हीं को अपने फ़वाएद से फ़ैज़याब करेगी और वही इसके चष्मे पर वारिद होते रहेंगे और अब इस उम्मत के सर से उनके ताज़याने और तलवारें उठ नहीं सकती हैं। हालांके यह ख़याल बिलकुल ग़लत है। यह हुकूमत फ़क़त एक लज़ीज़ क़िस्म का आबे दहन है जिसे थोड़ी देर चूसेंगे और फिर ख़ुद ही थूक देंगे।)


88- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें लोगों की हलाकत के असबाब बयान किये गए हैं)


अम्माबाद! परवरदिगार ने किसी दौर के ज़ालिमों की कमर उस वक़्त तक नहीं तोड़ी है जब तक उन्हें मोहलत और ढील नहीं दे दी है और किसी क़ौम की टूटी हुई हड्डी को उस वक़्त तक जोड़ा नहीं है जब तक उसे मुसीबतों और बलाओं में मुब्तिला नहीं किया है।
अपने लिये जिन मुसीबतों का तुमने सामना किया है और जिन हादेसात से तुम गुज़र चुके हो उन्हीं में सामाने इबरत मौजूद है। मगर मुष्किल यह है के हर दिल वाला अक़्लमन्द नहीं होता है और हर कान वाला समीअ या हर आंख वाला बसीर नहीं होता है।
किस क़द्र हैरतअंगेज़ बात है और मैं किस तरह ताअज्जुब न करूं के यह तमाम फ़िरक़े अपने दीन के बारे में मुख़तलिफ़ दलाएल रखने के बावजूद सब ग़लती पर हैं के न नबी (स0) के नक़्षे क़दम पर चलते हैं और न उनके आमाल की पैरवी करते हैं, न ग़ैब पर ईमान रखते हैं और न ग़ैब से से परहेज़ करते हैं। “ाुबहात पर अमल करते हैं और ख़्वाहिषात के रास्तों पर क़दम आगे बढ़ाते हैं। इनके नज़दीक मारूफ़ वही है जिसको यह नेकी समझें और मुनकिर वही है जिसका यह इनकार कर दें। मुष्किलात में इनका मरजा ख़ुद इनकी ज़ात है और मबहम मसाएल में इनका एतमाद सिर्फ़ अपनी राय पर है। गोया के इनमें का हर “ाख़्स अपने नफ़्स का इमाम है और अपनी हर राय को मुस्तहकम वसाएल और मज़बूत दलाएल का नतीजा समझता है।


89- आपके ख़ुतबे का एक हिस्सा
(रसूले अकरम (स0) और तबलीग़े इमाम के बारे में)


अल्लाह ने उन्हें उस दौर में भेजा जब रसूलों का सिलसिला मौक़ूफ़ और उम्मतें ख़्वाबे ग़फ़लत में पड़ी हुई थीं। फ़ितने सर उठाए हुए थे और जुमला उमूर में एक इन्तेषार की कैफ़ियत थी और जंग के “ाोले भड़क रहे थे। दुनिया की रोषनी कजलाई हुई थी और उसका फ़रेब वाज़ेह था। बाग़े ज़िन्दगी के पत्ते ज़र्द हो गए थे और समराते हयात से मायूसी पैदा हो चली थी, पानी भी तहनषीन हो चुका था और हिदायत के मिनारे भी मिट गए थे और हलाकत के निषानात भी नुमायां थे। यह दुनिया अपने अहल को तर्ष रोई से देख रही थी और अपने तलबगारों के सामने मुंह बिगाड़ कर पेष आ रही थी। इसका समरा फ़ितना था और इसकी ग़िज़ा मुरदार। इसका अन्दरूनी लिबास ख़ौफ़ था और बैरूनी लिबास तलवार। लेहाज़ा बन्दगाने ख़ुदा तुम इबरत हासिल करो और उन हालात को याद करो जिनमें तुम्हारे बाप दादा और भाई बन्दे गिरफ़्तार हैं और इनका हिसाब दे रहे हैं।
मेरी जान की क़सम- अभी इनके और तुम्हारे दरम्यान ज़्यादा ज़माना नहीं गुज़रा है और न सदियों का फ़ासला हुआ है और न आज का दिन कल के दिन से ज़्यादा दूर है जब तुम उन्हीं बुज़ुर्गों के सल्ब में थे।
ख़ुदा की क़सम रसूले अकरम (स0) ने तुम्हें कोई ऐसी बात नहीं सुनाई है जिसे आज मैं नहीं सुना रहा हूँ और तुम्हारे कान भी कल के कान से कम नहीं हैं और जिस तरह कल उन्होंने लोगों की आंखें खोल दी थीं और दिल बना दिये थे वैसे ही आज मैं भी तुम्हें वह सारी चीज़ें दे रहा हूँ और ख़ुदा गवाह है के तुम्हें कोई ऐसी चीज़ नहीं दिखलाई जा रही है जिससे तुम्हारे बुज़ुर्ग नावाक़िफ़ थे और न कोई ऐसी ख़ास बताई जा रही है जिससे वह महरूम रहे हों और देखो तुम पर एक मुसीबत नाज़िल हो गई है उस ऊंंटनी के मानिन्द जिसकी नकेल झूल रही हो और जिसका तंग ढीला हो गया हो लेहाज़ा ख़बरदार तुम्हें पिछले फ़रेबख़ोर्दा लोगों की ज़िन्दगी धोके में न डाल दे के यह इष्क़े दुनिया एक फैला हुआ साया है जिसकी मुद्दत मुअय्यन है और फिर सिमट जाएगी।


90- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें माबूद के क़ेदम और उसकी मख़लूक़ात की अज़मत का तज़किरा करते हुए मोअज़ पर इख़्तेताम किया गया है।)


सारी तारीफ़ें उस अल्लाह के लिये हैं जो बग़ैर देखे मारूफ़ है और बग़ैर सोचे पैदा करने वाला है। वह हमेषा से क़ायम और दायम है जब न यह बुर्जों वाले आसमान थे और न बलन्द दरवाज़ों वाले हेजाबात, न अन्धेरी रात थी और न ठहरे हुए समन्दर, न लम्बे चैड़े रास्तों वाले पहाड़ थे और न टेढ़ी तिरछी पहाड़ी राहें, न बिछे हुए फ़र्ष वाली ज़मीन थी और न किसी बल वाली मख़लूक़ात, वही मख़लूक़ात का ईजाद करने वाला है और वही आखि़र में सबका वारिस है। वही सबका माबूद है और सबका राज़िक़ है। “ाम्स व क़मर इसकी मर्ज़ी से मुसलसल हरकत में हैं के हर नए को पुराना कर देते हैं और हर बईद को क़रीबतर बना देते हैं।
उसी ने सबके रिज़्क़ को तक़सीम किया है और सबके आसार व आमाल का अहसाए किया है। उसी ने हर एक की सांसों का “ाुमार किया है और हर एक की निगाह की ख़यानत और सीने के पीछे छुपे हुए इसरार और इसलाब व अरहाम में इनके मराकज़ का हिसाब रखता है यहाँ तक के वह अपनी आखि़री मन्ज़िल तक पहुंच जाएं। वही वह है जिसका ग़ज़ब दुष्मनों पर उसकी वुसअते रहमत के बावजूद “ादीद है और उसकी रहमत इसके दोस्तों के लिये इसके षिद्दते ग़ज़ब के बावजूद वसीअ है जो इस पर ग़लबा पैदा करना चाहते हैं।उसके हक़ में क़ाहिर है और जो कोई इससे झगड़ा करना चाहे उसके हक़ में तबाह करने वाला है। हर मुख़ालेफ़त करने वाले का ज़लील करने वाला और हर दुष्मनी करने वाले पर ग़ालिब आने वाला है। जो इस पर तवक्कल करता है उसके लिये काफ़ी हो जाता है और जो उससे सवाल करता है उसे अता कर देता है। जो उसे क़र्ज़ देता है उसे अदा कर देता है और जो इसका “ाुक्रिया अदा करता है उसको जज़ा देता है।
बन्दगाने ख़ुदा, अपने आप को तौल लो, क़ब्ल इसके के तुम्हारा वज़न किया जाए और अपने नफ़्स का मुहासेबा कर लो क़ब्ल इसके के तुम्हारा हिसाब कर लिया जाए। गले का फन्दा तंग होने से पहले सांस ले लो और ज़बरदस्ती ले जाए जाने से पहले अज़ ख़ुद जाने के लिये तैयार हो जाओ और याद रखो के जो “ाख़्स ख़ुद अपने नफ़्स की मदद करके उसे नसीहत और तम्बीह नहीं करता है उसको कोई दूसरा न नसीहत कर सकता है अैर न तम्बीह कर सकता है।
(((यूँ तो परवरदिगार की किसी सिफ़त और उसके किसी कमाल में इसका कोई मिस्लो नज़ीर या “ारीक व वज़ीर नहीं है लेकिन इन्सानी ज़िन्दगी के लिये ख़ुसूसियत के साथ यह जार सिफ़ात इन्तेहाई अहम हैंः
1. वह अपने ऊपर एतमाद करने वालों के लिये काफ़ी हो जाता है और उन्हें दूसरों का दोस्त निगर नहीं बनने देता है।
2. वह हर सवाल करने वाले को अता करता है और किसी तरह की तफ़रीक़ का क़ायल नहीं है बल्कि हक़ीक़त यह है के सवाल न करने वालों को भी अता करता है।
3. वह हर क़र्ज़ को अदा कर देता है हालांके हर क़र्ज़ देने वाला उसी के दिये हुए माल में से क़र्ज़ देता है और उसी की राह में ख़र्च करता है।
4. वह “ाुक्रिया अदा करने वालों को भी इनाम देता है जबके वह अपने फ़रीज़े को अदा करते हैं और कोई नया कारे ख़ैर अन्जाम नहीं देते हैं। यह और बात है के उन लोगों को भी इस बात का ख़याल रखना चाहिए के इस बात का “ाुक्रिया न अदा करें के हमें दिया है और ‘‘दूसरों को नहीं दिया है’’ के यह इसके करम की तौहीन है “ाुक्रिया यह नहीं है। “ाुक्रिया इस बात का है के हमें यह नेमत दी है। अगरचे दूसरों को भी मसलहत के मुताबिक़ दूसरी नेमतों से नवाज़ा है।)))