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Nahjul Balagha Hindi Khutba 94-96, नहजुल बलाग़ा हिन्दी ख़ुत्बा 94-96

2011-03-29

94- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा

(जिसमें परवरदिगार के औसाफ़ - रसूले अकरम (स0) और अहलेबैत (अ0) अतहार के फ़ज़ाएल और मौअज़ए हसना का ज़िक्र किया गया है)


ब-बरकत है वह परवरदिगार जिसकी ज़ात तक हिम्मतों की बलन्दियां नहीं पहुँच सकती हैं और अक़्ल व फ़हम की ज़ेहानतें उसे नहीं पा सकती हैं। वह ऐसा अव्वल है जिसकी कोई आखि़री हद नहीं है और ऐसा आखि़र है जिसके लिये कोई फ़ना नहीं है।
(अम्बियाए कराम) (अ0) परवरदिगार ने उन्हें बेहतरीन मुक़ामात परवरीयत रखा और बेहतरीन मन्ज़िल में मुस्तक़र किया। वह मुसलसल “ारीफ़तरीन असलाब से पाकीज़ातरीन अरहाम की तरफ़ मुन्तक़िल होते रहे के जब कोई बुज़ुर्ग गुज़र गया तो दीने ख़ुदा की ज़िम्मेदारी बाद वाले ने संभाल ली।
(रसूले अकरम (अ0)) यहां तक के इलाही “ारफ़ हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (स0) तक पहुंच गया और उसने उन्हें बेहतरीन नष्र व नुमा के मअदन और “ारीफ़तरीन असल के मरकज़ के ज़रिये दुनिया में भेज दिया। इसी “ाजरए तय्यबा से जिस से अम्बिया को पैदा किया और अपने अमीनों का इन्तेख़ाब किया। पैग़म्बर (स0) की इतरत बेहतरीन और उनका ख़ानदान “ारीफ़तरीन ख़ानदान है। इनका “ाजरा बेहतरीन “ाजरा है जो सरज़मीने हरम पर उगा है और बुज़ुर्गी के साये में परवान चढ़ा है। इसकी “ााख़ें बहुत तवील हैं और इसके फल इन्सानी दस्तरस से बालातर हैं। वह अहले तक़वा के इमाम और हिदायत हासिल करने वालों के लिये सरचष्मए बसीरत हैं।


(((अमीरूल मोमेनीन (अ0) का यह इरषादे गिरामी इस बात की वाज़ेअ दलील है के अम्बियाए कराम के आबाओ अजदाद और उम्महात में कोई एक भी ईमान या किरदार के एतबार से नाक़िस और ऐबदार नहीं था और इसके बाद इस बहस की ज़रूरत नहीं रह जाती है के यह बात अक़्ली एतबार से ज़रूरी है या नहीं और उसके बग़ैर मन्सब का जवाज़ पैदा हो सकता है या नहीं? इसलिये के अगर काफ़िर अस्लाब और बेदीन अरहाम में कोई नुक़्स नहीं था और नापाक ज़र्फ़ मन्सबे इलाही के हामिल के लिये नामुनासिब नहीं था तो इस क़द्र एहतेमाम की क्या ज़रूरत थी के आदम (अ0) से लेकर ख़ातम तक किसी एक मरहले पर भी कोई नापाक या ग़ैर तय्यब रहम दाखि़ल न होने पाए।)))


ऐसा चिराग़ हैंं जिसकी रोषनी लौ दे रही है और ऐसा रौषन सितारा हैं जिसका नूर दरख़्षाां है और ऐसा चक़माक़ हैं जिसकी ज़ौ “ाोला फ़िषां है, उनकी सीरत (अफ़रात व तग़रीयत से बच कर) सीधी राह पर चलना और सुन्नत हिदायत करना है। इनका कलाम हक़ व बातिल का फ़ैसला करने वाला और हुक्म मुबीन अद्ल है। अल्लाह ने उन्हें उस वक़्त भेजा के जब रसूल की आमद का सिलसिला रूका हुआ था। बदअमली फैली हुई और उम्मतों पर ग़फ़लत छाई हुई थी।
(मोअज़) देखो। ख़ुदा तुम पर रहमत नाज़िल करे। रौषन निषानियों पर जम कर अमल करो। रास्ता बिल्कुल सीधा है। वह तुम्हें सलामतीयों के घर (जन्नत) की तरफ़ बुला रहे हैं और अभी तुम ऐसे घर में हो के जहां तुम्हें इतनी मोहलत व फ़राग़त है के इसकी ख़ुषनूदियां हासिल कर सको, अभी मौक़ा है, चूंके आमालनामे खुले हुए हैं, क़लम चल रहे हैं, बदन सही व सालिम हैं, ज़बानें आज़ाद हैं, तौबा सुनी जा रही है और आमाल क़ुबूल किये जा रहे हैं।


 95- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा


(जिसमें रसूले अकरम (स0) के फ़ज़ाएल व मनाक़िब का तज़किरा किया गया है।)


अल्लाह ने उन्हें उस वक़्त भेजा जब लोग गुमराही, हैरत व परेषानी में गुमकर्दा राह थे और फ़ितनों में हाथ पांव मार रहे थे। ख़्वाहिषात ने उन्हें बहका दिया और ग़ुरूर ने उनके क़दमों में लग़्िज़ष पैदा कर दी थी और भरपूर जाहलीयत ने उन्हें सुबक सर बना दिया था और वह ग़ैर यक़ीनी हालात और जिहालत की बलाओं की वजह से हैरान व परेषान थे। आपने नसीहत का हक़ अदा कर दिया, सीधे रास्ते पर चलने और लोगों को हिकमत और मोअज़ हसना की तरफ़ दावत दी।


96-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा


(हज़रत रब्बुल आलमीन और रसूले अकरम (स0) के सिफ़ात के बारे में)


तमाम तारीफ़ें उस अल्लाह के लिये हैं जो ऐसा अव्वल है के उससे पहले कोई “ाय नहीं है और ऐसा आखि़र है के इसके बाद कोई “ौ नहीं है, वह ज़ाहिर है तो इससे माफ़ूक़ (बालातर) कुछ नहीं है और बातिन है तो इससे क़रीबतर कोई “ाय नहीं है। इसी ख़ुत्बे के ज़ैल में (रसूले अकरम (स0)) का ज़िक्र फ़रमाया। बुज़ुर्गी और “ाराफ़त के मादनों और पाकीज़गी की जगहों में इनका मुक़ाम बेहतरीन मुक़ाम और मरजियोम बेहतरीन मरज़ियोम है। उनकी तरफ़ नेक लोगों के दिल झुका दिये गए हैं और निगाहों के रूख़ मोड़ दिये गए हैं। ख़ुदा ने इनकी वजह से फ़ित्ने दबा दिये और (अदावतों के) “ाोले बुझा दिये भाइयों में उलफ़त पैदा की और जो (कुफ्ऱ में) इकट्ठे थे, उन्हें मुन्तषिर (अलहदा-अलहदा) कर दिया (इस्लाम की) पस्ती व ज़िल्लत को इज़्ज़त बख़्षी, और (कुफ्ऱ) की इज्ज़त व बुलन्दी को ज़लील कर दिया। इनका कलाम (षरीयत का) बयान और सुकूत (एहकाम की) ज़बान थी। 


(((ओलमाए उसूल की ज़बान में मासूम की ख़ामोषी तक़रीर से ताबीर किया जाता है और वह उसी तरह हुज्जत और मुदरक एहकाम है जिस तरह मासूम का क़ौल व अमल। वह सनद की हैसियत रखता है और उससे एहकामे “ारीअत का इस्तनबात व इस्तख़राज किया जाता है। आम इन्सानों की ख़ामोषी दलीले रज़ामन्दी नहीं बन सकती है लेकिन मासूम की ख़ामोषी दलीले एहकाम भी बन जाती है।)))