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Nahjul Balagha Hindi Khutba 97-103, नहजुल बलाग़ा हिन्दी ख़ुत्बा97-103

2011-03-31

97- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें अपने असहाब और असहाबे रसूले अकरम (स0) का मवाज़ाना किया गया है।)
 

 

अगर परवरदिगार ने ज़ालिम को मोहलत दे रखी है तो इसका मतलब यह नहीं है के वह उसकी गिरफ़्त से बाहर निकल गया है। यक़ीनन वह उसकी गुज़गाह और उसकी गरदन में उच्छू लगने की जगह पर उसकी ताक में है। क़सम है उस मालिक की जिसके क़ब्ज़े में मेरी जान है के यह क़ौम यक़ीनन तुम पर ग़ालिब आ जाएगी। न इसलिये के वह तुमसे ज़्यादा हक़दार हैं बल्कि इसलिये के वह अपने अमीर के बातिल की फ़ौरन इताअत कर लेते हैं और तुम मेरे हक़ में हमेषा सुस्ती से काम लेते हो। तमाम दुनिया की क़ौमें अपने हुक्काम के ज़ुल्म से ख़ौफ़ज़दा हैं और मैं अपनी रेआया के ज़ुल्म से परेषान हूँ। मैंने तुम्हें जेहाद के लिये आमादा किया मगर तुम न उठे। मौअज़ सुनाया तो तुमने न सुना, अलल एलान और ख़ुफ़िया तरीक़े से दावत दी लेकिन तुमने लब्बैक न कही और नसीहत भी की तो उसे क़ुबूल न किया। तुम ऐसे हाज़िर हो जैसे ग़ायब और ऐसे इताअत गुज़ार हो जैसे मालिक। मैं तुम्हारे लिये हिकमत आमेज़ बातें करता हूँ और तुम बेज़ार हो जाते हो। बेहतरीन नसीहत करता हूँ और तुम भाग खड़े होते हो, बाग़ियों के जेहाद पर आमादा करता हूँ और अभी आखि़रे कलाम तक नहीं पहुँचने पाता हूं के तुम सबा की औलाद की तरह मुन्तषिर हो जाते हो। अपनी महफ़िलों की तरफ़ पलट जाते हो और एक दूसरे के धोके में मुब्तिला हो जाते हो। मैं सुबह के वक़्त तुम्हें सीधा करता हूँ और तुम “ााम के वक़्त यूँ पलट कर आते हो जैसे कमान, तुम्हें सीधा करने वाला भी आजिज़ आ गया और तुम्हारी इस्लाह भी नामुमिकन हो गई।
ऐ वह क़ौम जिसके बदन हाज़िर हैं और अक़्लें ग़ायब, तुम्हारे ख़्वाहिषात गो-ना-गों हैं और तुम्हारे हुक्काम तुम्हारी बग़ावत में मुब्तिला हैं। तुम्हारा अमीर अल्लाह की इताअत करता है और तुम उसकी नाफ़रमानी करते हो और “ााम का हाकिम अल्लाह की मासियत करता है और उसकी क़ौम उसकी इताअत करती है। ख़ुदा गवाह है के मुझे यह बात पसन्द है के वामिया मुझसे दिरहम व दीनार का सौदा करे के तुममें के दस लेकर अपना एक दे दे।
 

कूफ़े वालों! मैं तुम्हारी वजह से तीन तरह की “ाख़्िसयात और दो तरह की कैफ़ियात से दो-चार हू। तुम कान रखने वाले बहरे, ज़बान रखने वाले गूंगे और आंख रखने वाले अन्धे हो। तुम्हारी हालत यह है के न मैदाने जंग के सच्चे जवाँमर्द हो और न मुसीबतों में क़ाबिले एतमाद साथी। तुम्हारे हाथ ख़ाक में मिल जाएं, तुम उन ऊंटों जैसे हो जिनके चराने वाले गुम हो जाएं के जब एक तरफ़ से जमा किये जाएँ तो दूसरी तरफ़ से मुन्तषिर हो जाएं। ख़ुदा की क़सम, मैं अपने ख़याल के मुताबिक़ तुम्हें ऐसा देख रहा हूँ के जंग तेज़ हो गई और मैदाने कारज़ार गर्म हो गया तो तुम फ़रज़न्दे अबूतालिब से इस बेषर्मी के साथ अलग हो जाओगे जिस तरह कोई औरत बरहना हो जाती है, लेकिन बहरहाल मैं अपने परवरदिगार की तरफ़ से दलीले रौषन रखता हूँ और पैग़म्बर (स0) के रास्ते पर चल रहा हूँ। मेरा रास्ता बिल्कुल रौषन है जिसे मैं बातिल के अन्धेरों में भी ढून्ढ लेता हूँ।
 

(((- ख़ुदा गवाह है के क़ाएद की तमाम क़ायदाना सलाहियतें बेकार होकर रह जाती हैं जब क़ौम इताअत के रास्ते से मुन्हरिफ़ हो जाती है और बग़ावत पर आमादा हो जाती है। इन्हेराफ़ भी अगर जेहालत की बिना पर होता है तो उसकी इस्लाह का इमकान रहता है, लेकिन माले ग़नीमत और रिष्वत का बाज़ार गर्म हो जाए और दौलते दीन की क़ीमत बनने लगे तो वहाँ एक सही और सॉलेह क़ाएद का फ़र्ज़ क़यादत अन्जाम देना तक़रीबन नामुमकिन होकर रह जाता है और उसे सुबह-व-षाम हालात की फ़रयाद ही करना पड़ती है ताके क़ौम पर हुज्जत तमाम कर दे और मालिक की बारगाह में अपना उज़्र पेष कर दे। -)))


(असहाबे रसूले अकरम (स0)) देखो, अहलेबैते (अ0) पैग़म्बर (स0) पर निगाह रखो और उन्हीं के रास्ते को इख़्तेयार करो, उन्हीं के नक़्षे क़दम पर चलते रहो के वह न तुम्हें हिदायत से बाहर ले जाएंगे और न हलाकत में पलट कर जाने देंगे। वह ठहर जाएं तो ठहर जाओ, उठ खड़े हों तो खड़े हो जाओ, ख़बरदार उनसे आगे न निकल जाना के गुमराह हो जाओ और पीछे भी न रह जाना के हलाक हो जाओ। मैंने अस्हाबे पैग़म्बर (स0) का दौर भी देखा है मगर अफ़सोस तुममें का एक भी उनका जैसा नहीं है। वह सुबह के वक़्त इस तरह उठते थे के बाल उलझे हुए, सर पर ख़ाक पड़ी हुई जबके रात सजदे और क़याम में गुज़ार चुके होते थे और कभी पेषानी ख़ाक पर रखते थे और कभी रूख़सार। क़यामत की याद में गोया अंगारों पर खड़े रहते थे और उनकी पेषानियों पर सजदों की वजह से बकरी के घुटने जैसे गट्टे होते थे, उनके सामने ख़ुदा का ज़िक्र आता था तो आँसू इस तरह बरस पड़ते थे के गरेबान तक तर हो जाता था और उनका जिस्म अज़ाब के ख़ौफ़ और सवाब की उम्मीद में इस तरह लरज़ता था जिस तरह सख़्त तरीन आंधी के दिन कोई दरख़्त।


98- आपका इरषादे गिरामी
(जिसमें बनी उमय्या के मज़ालिम की तरफ़ इषारा किया गया है)


ख़ुदा की क़सम, यह यूँ ही ज़ुल्म करते रहेंगे यहां तक के कोई हराम न बचेगा जिसे हलाल न बना लें और कोई अहद व पैमान न बचेका जिसे तोड़ न दें और कोई मकान या ख़ेमा बाक़ी न रहेगा जिसमें इनका ज़ुल्म दाखि़ल न हो जाए और उनका बदतरीन बरताव उन्हें तर्के वतन पर आमादा न कर दे और दोनों तरह के लोग रोने पर आमादा न हो जाएं। दुनियादार अपनी दुनिया के लिये रोए और दीनदार अपने दीन की तबाही पर आँसू बहाए, और तुममें एक का दूसरे से मदद तलब करना उसी तरह हो जिस तरह के ग़ुलाम आक़ा से मदद तलब करे के सामने आ जाए तो इताअत करे और ग़ायब हो जाए तो ग़ीबत करे। और तुममें सबसे ज़्यादा मुसीबतज़दा वह हो जो ख़ुदा पर सबसे ज़्यादा एतमाद रखने वाला हो, लेहाज़ा अगर ख़ुदा तुम्हें आफ़ियत दे तो उसक क़ुबूल कर लो, और अगर तुम्हारा इम्तेहान लिया जाए तो सब्र करो के अन्जामकार बहरहाल साहेबाने तक़वा के लिये है।


(((- दुनिया के हर ज़ुल्म के मुक़ाबले में साहबाने ईमान व किरदार के लिये यही बषारत काफ़ी है के अन्जामकार साहबाने तक़वा के हाथ में है और इस दुनिया की इन्तेहाई फ़साद और तबाहकारी पर होने वाली नहीं है बल्कि उसे एक न एक दिन बहरहाल अद्ल व इन्साफ़ से मामूर होना है। उस दिन हर ज़ालिम को उसके ज़ुल्म का अन्दाज़ा हो जाएगा और हर मज़लूम को उसके सब्र का फल मिल जाएगा। मालिके कायनात की यह बषारत न होती तो साहेबाने ईमान के हौसले पस्त हो जाते और उन्हें हालाते ज़माना मायूसी का षिकार बना देते लेकिन इस बषारत ने हमेषा उनके हौसलों को बलन्द रखा है और इसी की बुनियाद पर वह हर दौर में हर ज़ालिम से टकराने का हौसला रखे रहे हैं।)))


99-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें दुनिया से किनाराकषी की दावत दी गई है।)


ख़ुदा की हम्द है उस पर जो हो चुका और उसकी इमदाद का तक़ाज़ा है के उन हालात पर जो सामने आने वाले हैं, हम उससे दीन की सलामती का तक़ाज़ा उसी तरह करते हैं जिस तरह बदन की सेहत व आफ़ियत की दुआ करते हैं।
बन्दगाने ख़ुदा! मैं तुम्हें वसीयत करता हूँ के उस दुनिया को छोड़ दो जो तुम्हें बहरहाल छोड़ने वाली है चाहे तुम उसकी जुदाई पसन्द न करो, वह तुम्हारे जिस्म को बहरहाल बोसीदा कर देगी तुम लाख उसकी ताज़गी की ख़्वाहिष करो, तुम्हारी और उसकी मिसाल उन मुसाफ़िरों जैसी है जो किसी रास्ते पर चले और गोया के मन्ज़िल तक पहुंच गए। किसी निषाने राह का इरादा किया और गोया के उसे हासिल कर लिया और कितना थोड़ा वक़्फ़ा होता है इस घोड़ा दौड़ाने वाले के लिये जो दौड़ाते ही मक़सद तक पहुंच जाए। इस “ाख़्स की बक़ा ही क्या है जिसका एक दिन मुक़र्रर हो जिससे आगे न बढ़ सके और फ़िर मौत तेज़ रफ़्तारी से उसे हंका कर ले जा रही हो यहाँ तक के बादल-नाख़्वास्ता दुनिया को छोड़ दे, ख़बरदार दुनिया की इज़्ज़त और इसकी सरबलन्दी में मुक़ाबला न करना और इसकी ज़ीनत व नेमत को पसन्द न करना और इसकी दुष्वारी और परेषानी से रंजीदा न होना के इसकी इज़्ज़त व सरबलन्दी ख़त्म हो जाने वाली है और उसकी ज़ीनत व नेमत को ज़वाल आ जाने वाला है और उसकी तंगी और सख़्ती बहरहाल ख़त्म हो जाने वाली है, यहाँ हर मुद्दत की एक इन्तेहा है और हर ज़िन्दा के लिये फ़ना है। क्या तुम्हारे लिये गुज़िष्ता लोगों के आसार में सामाने तम्बीह नहीं है? और क्या आबा व अजदाद की दास्तानों में बसीरत व इबरत नहीं है? अगर तुम्हारे पास अक़्ल है, क्या तुमने यह नहीं देखा है के जाने वाले पलट कर नहीं आते हैं और बाद में आने वाले रह नहीं जाते हैं, क्या तुम नहीं देखते हो के अहले दुनिया मुख़्तलिफ़ हालात में सुबह व “ााम करते हैं। कोई मुर्दा है जिस पर गिरया हो रहा है और कोई ज़िन्दा है तो उसे पुरसा दिया जा रहा है। एक बिस्तर पर पड़ा हुआ है तो एक इसकी अयादत कर रहा है और एक अपनी जान से जा रहा है। कोई दुनिया तलाष कर रहा है तो मौत उसे तलाष कर रही है और कोई ग़फ़लत में पड़ा हुआ है तो ज़माना उससे ग़ाफ़िल नहीं है और इस तरह जाने वालों के नक़्षे क़दम पर रह जाने वाले चले जा रहे हैं। आगाह हो जाओ के अभी मौक़ा है उसे याद करो जो लज़्ज़तों को फ़ना कर देने वाली, ख़्वाहिषात को मुकदर कर देने वाली और उम्मीदों को क़ता कर देने वाली है। ऐसे औक़ात में जब बुरे आमाल का इरतेकाब कर रहे हो और अल्लाह से मदद मांगो के इसके वाजिब हक़ को अदा कर दो और उन नेमतों का “ाुक्रिया अदा कर सको जिनका “ाुमार करना नामुमकिन है।


(((- ख़ुदा जानता है के ज़िन्दगी की इससे हसीनतर ताबीर नहीं हो सकती है के इन्सान ज़िन्दगी के प्रोग्राम बनाता ही रह जाता है और मौत सामने आकर खड़ी हो जाती है, ऐसा मालूम होता है के घोड़े ने दम भरने का इरादा ही किया था के मन्ज़िल क़दमों में आ गई और सारे हौसले धरे रह गये। ज़ाहिर है के इस ज़िन्दगी की क्या हक़ीक़त है के जिसकी मीआद मुअय्यन है और वह भी ज़्यादा तवील नहीं है और हर हाल में पूरी हो जाने वाली है चाहे इन्सान मुतवज्जोह हो या ग़ाफ़िल, और चाहे उसे पसन्द करे या नापसन्द।)))


100-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(रसूले अकरम (स0) और आपके अहलेबैत (अ0) के बारे में)


“ाुक्र है उस ख़ुदा का जो अपने फ़ज़्लो करम का दामन फैलाए हुए है और अपने जूदो-अता का हाथ बढ़ाए हुए है। हम उसकी हम्द करते हैं उसके तमाम मआमलात में उसकी मदद चाहते हैं ख़ुद उसके हुक़ूक़ का ख़याल रखने के लिये, हम “ाहादत देते हैं के उसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं है और मोहम्मद (स0) उसके बन्दे और रसूल हैं। जिन्हें उसने अपने अम्र के इज़हार और अपने ज़िक्र के बयान के लिये भेजा तो उन्होंने निहायत अमानतदारी के साथ उसके पैग़ाम को पहुंचा दिया और राहे रास्त पर इस दुनिया से गुज़र गए और हमारे दरम्यान एक ऐसा परचमे हक़ छोड़ गए के जो उससे आगे बढ़ जाए वह दीन से निकल गया और जो पीछे रह जाए वह हलाक हो गया और जो इससे वाबस्ता रहे वह हक़ के साथ रहा। उसकी तरफ़ रहनुमाइ करने वाला वह है जो बात ठहर कर करता है और क़याम इत्मीनान से करता है लेकिन क़याम के बाद फिर तेज़ी से काम करता है। देखो जब तुम उसके लिये अपनी गरदनों को झुका दोगे और हर मसले में उसकी तरफ़ इषारा करने लगोगे तो उसे मौत आ जाएगी और उसे लेकर चली जाएगी। फिर जब तक ख़ुदा चाहेगा तुम्हें उसी हाल में रहना पड़ेगा यहां तक के वह इस “ाख़्स को मन्ज़रे आम पर ले आए, जो तुम्हें एक मक़ाम पर जमा कर दे और तुम्हारे इन्तेषार को दूर कर दे। तो देखो जो आने वाला है उसके अलावा किसी की तमअ न करो और जो जा रहा है उससे मायूस न हो जाओ, हो सकता है के जाने वाले का एक क़दम उखड़ जाए तो दूसरा जमा रहे और फिर ऐसे हालात पैदा हो जाएं के दोनों क़दम जम जाएं।
देखो आले मोहम्मद (स0) की मिसाल आसमान के सितारों जैसी है के जब एक सितारा ग़ायब हो जाता है तो दूसरा निकल आता है, तो गोया अल्लाह की नेमतें तुम पर तमाम हो गई हैं और उसने तुम्हें वह सब कुछ दिखला दिया है जिसकी तुम आस लगाए बैठे थे।


101- आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जो उन ख़ुत्बों में है जिनमें हवादिस ज़माना का ज़िक्र किया गया है)


सारी तारीफ़ उस अव्वल के लिये हैं जो हर एक से पहले है और उस आखि़र के लिये है जो हर एक के बाद है। उसकी अव्वलीयत का तक़ाज़ा है के उसका अव्वल न हो और इसकी आखि़रत का तक़ाज़ा है के इसका कोई आखि़र न हो। मैं गवाही देता हूँ के उसके अलावा कोई ख़ुदा नहीं है और इस गवाही में मेरा बातिन ज़ाहिर के मुताबिक़ है और मेरी ज़बान दिल से मुकम्मल तौर पर हमआहंग है।


(((-उससे मुराद ख़ुद हज़रत अली (अ0) की ज़ाते गिरामी है जिसे हक़ का महवर व मरकज़ बनाया गया है और जिसके बारे में रसूले अकरम (स0) की दुआ है के मालिक हक़ को उधर-उधर फेर दे जिधर-जिधर अली (अ0) मुड़ रहे हों (सही तिरमिज़ी) और बाद के फ़िक़रात में आले मोहम्मद (अ0) के दीगर अफ़राद की तरफ़ इषारा है जिनमें मुस्तक़बिल क़रीब में इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ0) और इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ0) का दौर था जिनकी तरफ़ अहले दुनिया ने रूजू किया और उनकी सियासी अज़मत का भी एहसास किया और मुस्तक़बिल बईद में इमाम मेहदी (अ0) का दौर है जिनके हाथों उम्मत का इन्तेषार दूर होगा और इस्लाम पलटकर अपने मरकज़ पर आ जाएगा। ज़ुल्म व जौर का ख़ात्मा होगा और अद्ल व इन्साफ़ का निज़ाम क़ायम हो जाएगा-)))


अय्योहन्नास! ख़बरदार मेरी मुख़ालफ़त की ग़लती न करो और मेरी नाफ़रमानी करके हैरान व सरगर्दान न हो जाओ और मेरी बात सुनते वक़्त एक-दूसरे को इषारे न करो के उस परवरदिगार की क़सम जिसने दाने को षिगाफ़्ता किया है और नुफ़ूस को ईजाद किया है के मैं जो कुछ ख़बर दे रहा हूँ वह रसूले उम्मी की तरफ़ से है जहां न पहुंचाने वाला ग़लत गो था और न सुनने वाला जाहिल था और गोया के मैं उस बदतरीन गुमराह को भी देख रहा हूँ जिसने “ााम में ललकारा और कूफ़े के एतराफ़ में अपने झण्डे गाड़ दिये और उसके बाद जब इसका दहाना खुल गया और उसकी लगाम का दहाना मज़बूत हो गया और ज़मीन में उसकी पामालियां सख़्ततर हो गई तो फ़ितने अबनाए ज़माना को अपने दांतों से काटने लगे और जंगों ने अपने थपेड़ों की लपेट में ले लिया और दिनों की सख़्ितयां और रातों की जराहतें मन्ज़रे आम पर आ गईं और फिर जब इसकी खेती तैयार होकर अपने पैरों पर खड़ी हो गई और इसकी सरमस्तियां अपना जोष दिखलाने लगीं और तलवारें चमकने लगीं तो सख़्त तरीन फ़ितनों के झण्डे गाड़ दिये गए और वह तारीक रात और तलातुम ख़ेज़ समन्दर की तरह मन्ज़रे आम पर आ गए, और कूफ़े को इसके अलावा भी कितनी ही आन्धियां पारा-पारा करने वाली हैं और उस पर से कितने ही झक्कड़ गुज़रने वाले हैं और अनक़रीब वहां जमाअतें जमाअतों से गुथने वाली हैं और खड़ी खेतियां काटी जाने वाली हैं और कटे हुए माहसल को भी तबाह व बरबाद किया जाएगा।


102-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(जिसमें क़यामत और इसमें लोगों के हालात का ज़िक्र किया गया है)


वह दिन वह होगा जब परवरदिगार अव्वलीन व आख़ेरीन को दक़ीक़तरीन हिसाब और आमाल की जज़ा के लिये इस तरह जमा करेगा के सब ख़ुज़ू व ख़ुषू के आलम में खड़े होंगे, पसीना इनके दहन तक पहुँचा होगा और ज़मीन लरज़ रही होगी। बेहतरीन हाल उसका होगा जो अपने क़दम जमाने की जगह हासिल कर लेगा और जिसे सांस लेने का मौक़ा मिल जाएगा।


(((-रसूले अकरम (स0) के दौर में अब्दुल्लाह बिन उबी और मौलाए कायनात (अ0) के दौर में अषअत बिन क़ैस जैसे अफ़राद हमेषा रहे हैं जो बज़ाहिर साहेबाने ईमान की सफ़ों में रहते हैं लेकिन इनका काम बातों का मज़ाक़ उड़ाकर उन्हें मुष्तबा बना देने और क़ौम में इन्तेषार पैदा कर देने के अलावा कुछ नहीं होता है। इसलिये आपने चाहा के अपनी ख़बरों के मसदर व माखि़ज़ की तरफ़ इषारा कर दें ताके ज़ालिमों को “ाुबहा पैदा करने का मौक़ा न मिले और आप इस हक़ीक़त को भी वाज़े कर सकें के मेरे बयान में “ाुबह दर हक़ीक़त रसूले अकरम (स0) की सिदाक़त में “ाुबह है जो कुफ़्फ़ार व मुष्रेकीने मक्का भी न कर सके तो मुनाफ़िक़ीन के लिये इसका जवाज़ किस तरह पैदा हो सकता है?
इसके बाद आपने इस नुक्ते की तरफ़ भी इषारा फ़रमा दिया के अगर बाक़ी लोग यह काम नहीं कर सकते हैं तो इसका ताल्लुक़ उनकी जेहालत से है रिसालत के ओहदए फ़याज़ से नहीं है, उसने तो हर एक को तालीमे दुनिया चाही लेकिन बे सलाहियत अफ़राद इस फ़ैज़ से महरूम रह गए तो करीम का क्या क़ुसूर है।)))
 

इसी ख़ुत्बे का एक हिस्सा


ऐसे फ़ित्ने जैसे अन्धेरी रात के टुकड़े जिसके सामने न घोड़े खड़े हो सकेंगे और न उनके परचमों को पलटाया जा सकेगा, यह फ़ित्ने लगाम व सामान की पूरी तैयारी के साथ आएँगे के इनका क़ाएद उन्हें हंका रहा होगा और उनका सवाल उन्हें थका रहा होगा। इसकी अहल एक क़ौम होगी जिसके हमले सख़्त होंगे लेकिन लूट मार कम और उनका मुक़ाबला राहे ख़ुदा में सिर्फ़ वह लोग करेंगे जो मुस्तकबरीन की निगाह में कमज़ोर और पस्त होंगे। वह अहले दुनिया में मजहूल और अहले आसमान में मारूफ़ होंगे।
ऐ बसरा! ऐसे वक़्त में तेरी हालत क़ाबिले रहम होगी इस अज़ाबे इलाही के लष्कर की बना पर जिसमें न ग़ुबार होगा न “ाोर व ग़ोग़ा और अनक़रीब तेरे बाषिन्दों को सुखऱ् मौत और सख़्त भूक में मुब्तिला किया जाएगा।


103-आपके ख़ुत्बे का एक हिस्सा
(ज़ोहद के बारे में)


अय्योहन्नास! दुनिया की तरफ़ इस तरह देखो जैसे वह लोग देखते हैं जो ज़ोहद रखने वाले और उससे नज़र बचाने वाले होते हैं के अनक़रीब यह अपने साकिनों को हटा देगी और अपने ख़ुषहालों को रन्जीदा कर देगी। इसमें जो चीज़ मुंह फेरकर जा चुकी वह पलट कर आने वाली नहीं है और जो आने वाली है उसका हाल नहीं मालूम है के इसका इन्तेज़ार किया जाए। इसकी ख़ुषी रन्ज से मख़लूत है और इसमें मर्दों की मज़बूती ज़ोफ़ व नातवानी की तरफ़ माएल है। ख़बरदार इसकी दिल लुभाने वाली चीज़ें तुम्हें धोके में न डाल दे ंके इसमें से साथ जाने वाली चीज़ें बहुत कम हैं।
ख़ुदा रहमत नाज़िल करे उस “ाख़्स पर जिसने ग़ौर व फ़िक्र किया तो इबरत हासिल की और इबरत हासिल की तो बसीरत पैदा कर ली के दुनिया की हर मौजूद “ौ अनक़रीब ऐसी हो जाएगी जैसे थी ही नहीं और आख़ेरत की चीज़ें इस तरह हो जाएंगी जैसे अभी मौजूद हैं। हर गिनती में आने वाला कम होने वाला है और हर वह “ौ जिसकी उम्मीद हो वह अनक़रीब आने वाली है और जो आने वाला है वह गोया के क़रीब और बिल्कुल क़रीब है।
(सिफ़ते आलिम) आलिम वह है जो अपनी क़द्र ख़ुद पहचाने और इन्सान की जेहालत के लिये इतना ही काफ़ी है के वह अपनी क़द्र को न पहचाने। अल्लाह की निगाह में बदतरीन बन्दा वह है जिसे उसने उसी के हवाले कर दिया हो के वह सीधे रास्ते से हट गया है और बग़ैर रहनुमा के चल रहा है।
 

(((- हक़ीक़ते अम्र यह है के इन्सान अपनी क़द्र व औक़ात को पहचान लेता है तो उसका किरदार ख़ुद-ब-ख़ुद सुधर जाता है और इस हक़ीक़त से ग़ाफ़िल हो जाता है तो कभी क़द्र व मन्ज़िलत से ग़फ़लत दरबारदारी, ख़ुषामद, मदहे बेजा, ज़मीर फ़रोषी पर आमादा कर देती है के इल्म को माल व जाह के एवज़ बेचने लगता है और कभी औक़ात से नावाक़फ़ीयत मालिक से बग़ावत पर आमादा कर देती है के अवामुन्नास पर हुकूमत करते-करते मालिक की इताअत का जज़्बा भी ख़त्म हो जाता है और एहकामे इलाही को भी अपनी ख़्वाहिषात के रास्ते पर चलाना चाहता है जो जेहालत का बदतरीन मुज़ाहिरा है और इसका इल्म से कोई ताल्लुक़ नहीं है-!)))


ऐ दुनिया के कारोबार की दावत दी जाए तो अमल पर आमादा हो जाता है और आख़ेरत के काम की दावत दी जाए तो सुस्त हो जाता है। गोया के जो कुछ किया है वही वाजिब था और जिसमें सुस्ती बरती है वह उससे साक़ित है।
(आखि़र ज़माना) वह ज़माना ऐसा होगा जिसमें सिर्फ़ वही मोमिन निजात पा सकेगा जो गोया के सो रहा होगा के मजमे में आए तो लोग उसे पहचान न सकें और ग़ाएब हो जाए तो कोई तलाष न करे। यही लोग हिदायत के चिराग़ और रातों के मुसाफ़िरों के लिये निषान मन्ज़िल होंगे न इधर उधर लगाते फिरेंंगे और न लोगों के उयूब की इषाअत करेंगे। उनके लिये अल्लाह रहमत के दरवाज़े खोल देगा और उनसे अज़ाब की सख़्ितयों को दूर कर देगा।
लोगों!  अनक़रीब एक ज़माना आने वाला है जिसमें इस्लाम को इसी तरह उलट दिया जाएगा जिस तरह बरतन को उसके सामान समेत उलट दिया जाता है। लोगों! अल्लाह ने तुम्हें इस बात से पनाह दे रखी है के वह तुम पर ज़ुल्म करे लेकिन तुम्हें इस बात से महफ़ूज़ नहीं रखा है के तुम्हारा इम्तेहान न करे। इस मालिके जल्लाजलालोह ने साफ़ एलान कर दिया है के ‘‘इसमें हमारी खुली हुई निषानियां हैं और हम बहरहाल तुम्हारा इम्तेहान लेने वाले हैं’’
सय्यद “ारीफ़ रज़ी - मोमिन के नौमए (ख़्वाबीदा) होने का मतलब इसका गुमनाम और बेषर होना है और मसायीह, मिस्याह की जमा है और वह वह “ाख़्स है के जिसे किसी का ऐब मालूम हो जाए तो उसकी इषाअत के बग़ैर चैन न पड़े। बुज़ुर-बुज़दर की जमा है यानी वह “ाख़्स जिसकी हिमाक़त ज़यादा है और उसकी गुफ़्तगू लग़्िवयात पर मुष्तमिल हो।