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ghaibat-e-imam mahdi/mehdi/qaem a.t.f. hindi

2011-07-15

हज़रत इमाम महदी (अ0) की ग़ैबत और उसकी ज़रूरत

बादशाहे वक़्त ख़लीफ़ा मोतामीद बिन मुतावक्किल अब्बासी जो आपने आबा व अजदाद की तरह सितमकार ख़ुगर और आले मुहम्मद का जानी दुशमन था। उसके कानों में महदी (अ0) की विलादत कि भनक पड चुकी थी। उस ने हज़रत इमाम हसन असकरी (अ0) की शहादत के बाद तकफ़ीन व तदफ़ीन से पहले बक़ौल अल्लामा मजलिसी हज़रत के घर पर पुलिस का छापा डलवाया और चाहा कि इमाम महदी (अ0) को गिरफ़्तार करा ले। लेकिन चूँकि वह हुक्मे ख़ुदा से 23 रमज़ानुल मुबारक 259, हिजरी को सरदाब में जाकर ग़ायब हो चुके थे। जैसा कि शवाहेदुन नबूवत, नुरूल अबसार, दमातुस साकिबा, रौज़तुश शोहादा, मनाक़िबुल आइम्मा, अनवारुल हुसैनिया वग़ैरा से मुस्तफ़ाद मुस्दबज़ होता है। इसी लिए वह उसे दसतियाब न हो सके। उसने उसके रद्दे अमल में इमाम हसन असकरी (अ0) की तमाम बीवियों को गिरफ़ता करा लिया और हुक्म दिया कि इस अम्र की तहक़ीक़ की जाये कि कोई उनमें से हामिला तो नही है, अगर कोई हामिला हो तो उस का हमल ज़ाया कर दिया जाय। क्योंकि वह हज़रते सरवरे काएनात (स0) की इस पेशीन गोई से ख़ाइफ़ था कि आख़री ज़माने में मेरा एक फ़रज़न्द जिसका नाम महदी होगा। कायनाते आलम के इन्क़ेलाब का ज़ामिन होगा, और उसे यह मालूम था कि वह फ़रज़न्दे इमाम हसन असकरी (अ0) की औलाद से ही होगा। लिहाज़ा उस ने अपकी तलाश और आपके क़त्ल की पूरी कोशिश की। तारीख़े इस्लाम जिल्द 1, सफ़ा 31 में है कि 260 हिजरी में इमाम हसन असकरी (अ0) कि शहादत के बाद जब मोतमिद ख़लीफ़ा-ए-अब्बासी ने आपके क़त्ल करने के लिये आदमी भेजे तो आप (सरदाबे) 1 सरमन राय में ग़ायब हो गये। बाज़ अकाबिर उलमा-ए-अहले सुन्नत भी इस अम्र में शियों के हम ज़बान हैं। चुनान्चे मुल्ला जामी ने शवाहेदुन नबूवत में इमाम अब्दुल वहाब शेरानी ने लवाक़े उल अनवार अल यवाक़ीत वल जवाहर में ओर शेख़ अहमद मुहिउद्दीन इब्ने अरबी ने फ़तुहाते मक्किया में और ख्वाज़ पारसा ने फ़सलुल ख़िताब में मुहद्दिस देहलवी ने रिसाला-ए-आइम्मा-ए-ताहेरीन में और जमालुद्दीन मुहद्दिस ने रौज़तुल अहबाब में, अबू अब्दुल्लाह शामी साहिबे किफ़ायतुत तालिब ने अपनी किताब अत्तिबयान फ़ी अख़बारि साहिबुज़्ज़मान में और सिब्ते इब्ने जौज़ी ने तज़किरा-ए- ख़्वासुल उम्मत में और इब्ने लबाग़ नूरूद्दीन अली मालकी ने फ़ुसूलुल मुहिम्मा में और कमालुद्दीन इब्ने तलहा शाफ़ई ने मतालेबुल सुवेल में और शाह वली उल्लाह ने फ़ज़लुल मुबीन में और शेख़ सुलैमान हनफ़ी ने यनाबि-उल- मवद्दा में और बाज़ दीगर उलामा ने भी ऐसा ही लिखा है जो लोग इन हज़रत के तवील उम्र होने में ताअज्जुब करके इंकार करते हैं उनको यह जवाब देते है कि ख़ुदा की कुदरत से कुछ बईद नही है जिस ने आदम को बग़ैर माँ बाप के और ईसा (अ0) को बग़ैर बाप के पैदा किया, तमाम अहले इस्लाम ने हज़रत ख़िज़्र (अ0) को अब तक ज़िन्दा माना हुआ है, इदरीस (अ0) को बहिश्त में और हज़रत ईसा (अ0) को आसमान पर अब तक ज़िन्दा मानते हैं और अगर ख़ुदा-ए-तआला ने आले मुहम्मद (स0) में से एक शख़्स को तूले उम्र इनायत की तो ताअज्जुब क्या है? हालां कि अहले इस्लाम को दज्जाल के मौजूद होने और क़रीबे क़ियामत ज़हूर करने से इंकार नही है। किताब शवाहेदुन नबूवत सफ़ा 68 में है कि ख़ानदाने नबूवत के ग्यारहवें इमाम हसन अकरी (अ0) 260 हिजरी में ज़हर से शहीद कर दिए गए थे। उनकी वफ़ात पर इनके साहब ज़ादे जिनका नाम मुहम्मद व लक़ब महदी है शियों के आख़री इमाम हुए।

मोलवी अमीर लिखते है कि ख़ानदाने रिसालत के इन इमामों के हालात निहायत दर्द नाक हैं। ज़ालिम मुतावक्किल ने हज़रत इमाम हसन असकरी (अ0) के वालिदे माजिद इमाम अली नक़ी को मदीने से सामरा, पकड़ बुलाया था और वहाँ उनकी वफ़ात तक उनको नज़र बन्द रखा था। फिर ज़हर से हलाक कर दिया था इसी तरह मुतवक्किल [2] के जानशीनों ने बदगुमानी और हसद के मारे हज़रत इमाम हसन असकरी (अ0) को क़ैद रखा था। उन के कमसिन साहब ज़ादे मुहम्मद अल महदी जिनकी उम्र अपने वालिद की वफ़ात के वक़्त पांच साल की थी। ख़ौफ़ के मारे अपने घर के क़रीब ही एक ग़ार में छुप गये और ग़ायब हो गये। इब्ने बतूता ने अपने सफ़र नामे में लिखा है कि जिस ग़ार में इमाम महदी (अ0) की ग़ैबत बताई जाती है उसे मैने आपनी आँखों से देखा है। (नूरुल अबसार जिल्द 1, सफ़ा 152) अल्लामा हजरे मक्की का इरशाद है कि इमाम महदी (अ0) सरदाब में ग़ायब हुऐ थे। फ़लम याअरफ़ यज़हबफिर मालूम नहीं कहां तशरीफ़ ले गये।

इमाम महदी का हुलीया-ए- मुबारक

किताब इक्मालुद्दीन मे शेख़ सदूक़ तहरीर फ़रमाते हैं कि सरवरे काएनात (स.) का इरशाद है कि इमाम महदी, शक्ल व शबाहत ख़ल्क़ व ख़ुलक़, ख़साएल, अक़वाल व अफ़आल में मेरे मुशाबे होगें।

आपके हुलये के मुताबिक़ उलमा ने लिख़ा है कि आपका रंग गंदुम गून, क़द मियाना है। आपकी पेशानी ख़ुली हुइ और आपके अबरू घने और बाहम पेवस्ता हैं। आपकी नाक बारीक और बुलन्द है आपकी आखें बडी और चेहरा निहायत नूरानी है। आपके दाहिने रुख़सार पर एक तिल है काअन्नहू कौकबु दुर्रीयुनजो सितारे की मानिन्द चमकता है, आपके दाँत चमकादार ख़ुले हुए हैं आपकी ज़ुल्फ़ें कन्धों तक पड़ी रहती है। आपका सीना चौड़ा और आपके कन्धे खुले हुए हैं आपकी पुश्त पर इसी तरह की मुहरे इमामत सब्त है जिस तरह पुश्ते रिसालत मआब (स0) पर मुहरे नबूवत सब्त थी।

(अलाम अल वरा सफ़ा 235 गाएत एल मक़सूद जिल्द 1 सफ़ा 64 नूरूल अबसार सफ़ा 152)

तीन साल कि उमर में हुज्जतुल्लाह होने का दावा

किताबे तारीख़ व सिरत से मालूम होता है कि आप की परवरिश का काम जनाबे जिबराईल(अ0) के सुपुर्द था और वही आपकी परवरिश करते थे। ज़ाहिर है कि जो बच्चा विलादत के वक़्त कलाम कर चुका हो और जिसकी परवरिश जिबराईल जैसे मुक़र्ब फ़रिशते के सुपुर्द हो वह यक़ीनन दुनिया में चन्द दिन ग़ुज़र जाने के बाद बहर सूरत इस सलाहियत का मालिक हो सकता है कि वह अपनी ज़बान से हुज्जतुल्लाह होने का दावा कर सके।

अल्लामा अरदबेली लिखते है कि इब्ने इसहाक़ और साद अल अशकरी एक दिन हज़रत इमाम हसन असकरी (अ0) की ख़िदमत में हाज़िर हुए और उन्होने ख़्याल किया कि आज इमाम से यह दरयाफ़्त करेंगे कि आप के बाद हुज्जतुल्लाह फ़ी अल अर्ज कौन होंगे। जब सामना हुआ तो इमाम हसन असकरी (अ0) ने फ़रमाया कि ऐ अहमद! तुम जो दिल में ले कर आये हो मै उसका जवाब तुम्हें देता हूँ यह फ़रमा कर आप अपने मुक़ाम से उठे और अन्दर जाकर यूँ वापस आये कि आप के कँधे पर एक निहायत ख़ूबसूरत बच्चा था, जिस की उम्र तीन साल की थी। आपने फ़रमाया ऐ अहमद! मेरे बाद हुज्जते ख़ुदा यह होगा। इसका नाम मुहम्मद और इसकी कुन्नियत अबुल क़ासिम है और यह ख़िज़्र कि तरह ज़िन्दा रहेगा और ज़ुलक़रनैन की तरह सारी दुनिया पर हुकूमत करेगा। अहमद इब्ने इसहाक़ ने कहा मौला! कोई ऐसी अलामत बता दीजिये जिससे दिल को इतमिनाने कामिल हो जाए। आपने महदी की तरफ़ मुतवज्जेह हो कर फ़रमाया, बेटा इसका तुम जवाब दो! इमाम महदी (अ0) ने कमसिनी के बावजूद बज़बाने फ़सीह फ़रमाया- अना हुज्जतुल्लाह व बक़ियतुल्लाहमै ही ख़ुदा की हुज्जत और हुकमे ख़ुदा से बाक़ी रहने वाला हूँ, एक वह दिन आयेगा जिस में मै दुश्मने ख़ुदा से बदला लूँगा, यह सुन कर अहमद ख़ुश व मसरूर हो गए।

(कशफ़ुल ग़ुम्मा सफ़ा 138)

पाँच साल की उमर में खासुल ख़ास असहाब आपकी मुलाक़ातत

याक़ूब बिन मनक़ूस बिन उसमान उमरी व अबी हाशिम जाफ़री और मूसा बिन जाफ़र बिन वहब बिन बग़दादी का ब्यान है कि हम हज़रत इमाम हसन असकरी (अ0) की ख़िदमत में हाज़िर हुए और हमने अर्ज़ की मौला! आपके बाद अम्रे इमात किस के सुपुर्द होगा और कौन हुज्जते ख़ुदा करार पायेगा। आपने फ़रमाया कि मेरा फ़रज़न्द मुहम्मद मेरे बाद हुज्जतुल्लाह फ़ी अर्ज़ होगा। हम ने अर्ज़ की मौला हमें उस की ज़ियारत करा दीजिये। आपने फ़रमाया वह पर्दा जो सामने आवेख़ता है उसे उठाओ। हमने पर्दा उठाया तो उससे निहायत ख़ूब सूरत बच्चा जिसकी उमर पाँच साल थी बरामद हुआ, और वह आकर इमाम हसन असकरी (अ0) की आग़ोश में बैठ गया। इमाम ने फ़रमाया कि यही मेरा फ़रज़न्द मेरे बाद हुज्जतुल्लाह होगा। मुहम्मद बिन उसमान का कहना है कि हम इस वक़्त चालीस अफ़राद थे और हम ने उनकी ज़ियारत की। इमामे हसन असकरी (अ0) ने अपने फ़रज़न्द महदी को हुक्म दिया कि वह अन्दर चले जाएं और हमसे फ़रमाया शुमा ऊरा नख्वाही दीदकि अब तुम आज के बाद फिर उसे ने देख सकोगे। चुनान्चे ऐसा ही हुआ फिर ग़ैबत शरू हो गई।

( कशफ़ुल ग़ुम्मा सफ़ा 139 व शवाहेदुन नबूअत सफ़ा 213)

अल्लामा तबरसी किताब आलामुल वरा के सफ़ा 243 में तहरीर फ़माते है कि आइम्मा के नज़दीक मुहम्मद और उसमाने उमरी दोनों सिक़ाह हैं।

फिर इसी सफहे पर तहरीर फ़रमाते है कि अबू हारून का कहना है कि मैंने बचपन में साहेबुज़्ज़मान को देखा है कअन्नहु अलक़मरु लैलतिल बदरिइनका चेहरा चौदवीं के चाँद की तरह चमकता था।

इमाम महदी नबूअत के आईने में:-

अल्लामा तबरसी बहवाल-ए- हज़रात मासूमीन (अ0) तहरीर फ़रमाते है कि इमाम महदी(अ0) में बहुत से अम्बिया के हालात व कैफ़ियात नज़र आते हैं और जिन मुखतलिफ़ वाक़ियात से अम्बिया को दो चार होना पड़ा, वह तमाम वाक़ियात आपकी ज़ात सतूदा सिफ़ात में दिखाई देते हैं। मिसाल के लिए हज़रत नूह (अ0) हज़रत इब्राहीम(अ0) हज़रत मूसा(अ0) हज़रत ईसा(अ0) हज़रत अय्यूब(अ0) हज़रत यूनुस(अ0) हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स0) को ले लीजिये और उनके हालात पर ग़ौर कीजिये, आपको हज़रत नूह की तवील ज़न्दगी नसीब होगी हज़रत इब्राहीम की तरह आप की विलादत छिपाई गई और लोगों से किनारा कश हो कर रूपोश होना पडा। हज़रत मूसा(अ0) की तरह हुज्जत के ज़मान से उठ जाने का खौफ़ ला हक़ हुआ और उन्ही की विलादत की तरह आपकी विलादत भी पोशीदा रखी गई और उन्ही के मानने वालों की तरह आपके मानने वालों को ग़ैबत के बाद सताया गया। हज़रत ईसा(अ0) की तरह आपके बारे में लोगों ने इख्तेलाफ़ किया। हज़रत अय्यूब(अ0) की तरह तमाम इम्तेहानात के बाद आपकी फ़र्ज व कशाइश होगी। हज़रत यूसुफ़(अ0) की तरह अवाम व ख़वास से आपकी ग़ैबत होगी। हज़रत यूनुस की रतह ग़ैबत के बाद आपका ज़हूर होगा। यानी जिस तरह वह अपनी क़ौम से ग़ायब हो कर बुढापे के बावजूद नौजवान थे। उसी तरह आपका जब ज़हूर होगा तो आप चालीस साल के जवान होंगे और हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स0) की तरह आप साहिबे सैफ़ होंगे।

(आलम अल वरा सफ़ा 264 तबा बम्बई 1312 हजरी)

इमाम हसन अकरी (अ0) की शहादत

इमाम महदी (अ0) की उम्र अभी सिर्फ़ पाँच साल की ही थी कि ख़लीफ़ा मोतमिद बिन मुतवक्किल अब्बासी ने मुद्दतों से क़ैद इमाम हसन असकरी (अ0) को ज़हर दे दिया। जिस की वजह से आप बतारीख़ 8, रबीउल अव्वल 260 हिजरी मुताबिक़ 873 ई. ब उम्र 28 साल रेहलत फ़रमा गए। वख़ल मन अलविदा बनुहु मुहम्मदनऔर आपनी औलाद में सिर्फ़ इमाम महदी (अ0) को छोड़ा।

(नूरूल अबसार सफ़ा 53 दमातुस साकेबा सफ़ा 191)

अल्लामा शिब्लन्जी लिख़ते है कि जब आपकी शहादत की ख़बर मशहूर हुई, तो सारे शहरे सामरा में हलचल मच गई। फरयादो फ़ुगां की आवाज़ें बुलन्द हो गई। लोगों ने अपने कोरोबार छोड़ दिए। तमाम बनी हाशिम हुक्कामे दौलत, मुन्शी क़ाज़ी ,अरकाने अदालत, अयाने हुकूमत और आम्मा-ए- ख़लाएक़ हज़रत के जनाज़े के लिए दौड़ पडें, हालत यह थी कि शहर सामरा क़यामत का मन्ज़र पेश कर रहा था। तजहीज़ और नमाज़ से फ़राग़त के बाद आपको इसी मकान में दफ़न कर दिया गाया जिस में हज़रत इमाम अली नक़ी(अ0) मदफ़ून थे।

(नुरुल अबसार सफ़ा 152 व तारीख़े कामिल सवाएक़े मुहर्रिक़ा व फ़ुसूलुल मुहिम्मा, जिला-उल-उयून सफ़ा 296)

अल्लामा मुहम्मद बाक़र तहरीर फ़रमाते हैं कि इमाम हसन असकरी (अ0) की वफ़ात के बाद नमाज़े जनाज़ा हज़रत इमाम महदी (अ0) ने पढ़ाई, मुलाहेज़ा हो,

(दमातुस साक़ेबा जिल्द 3 सफ़ा 192 व जिला अल अयून सफ़ा 297)

अल्लामा तबरसी लिख़ते हैं कि नमाज़े के बाद आपको बहुत से लोगों ने देखा और आपक के हाथों का बोसा दिया।(आलामुल वरा सफ़ा 242) अल्लामा इब्ने ताऊस का इरशाद है कि 8, रबी उल अव्वल को इमामे हसन असकरी (अ0) की वफ़ात वाक़ए हुई और 9, रबी उल अव्वल से हज़रत हुज्जत की इमामत का अग़ाज़ हुआ हम 9, रबीउल अव्वल जो ख़ुशी मनाते है इसकी एक वजह यह भी है। (किताब इक़बाल) अल्लामा मजलिसी लिखते है 9, रबी उल अव्वल को उमर बिन साद बदस्ते मुख़्तारे आले मुहम्मद का क़त्ल हुआ। (ज़ाद अल माद सफ़ा 585) जो उबैदुल्लाह इब्ने ज़्याद का सिपाह सालार था, जिस के क़त्ल के बाद आले मुहम्मद (स0) ने पूरे तौर पर ख़ुशी मनायी। (बिहारुल अनवार, मुख़्तारे आले मुहम्मद) किताब दमातुस साक़िबा के सफ़ा 192 में है कि हज़रत इमाम हसन असकरी(अ0) ने 259 में अपनी वालेदा को हज के लीये भेज दिया था, और फ़रमा दिया था कि 260 हिजरी में मेरी शहादत हो जाएगी। इसी सिन में हज़रत इमाम महदी को जुमला तबर्रूकात दे दिए थे और इस्मे आज़म वग़ैरा तालीम कर दिया था। (दमातुस साक़िबा व जिला उल उयून सफ़ा 298) उन्हीं तबर्रूकात में हज़रत अली (अ0) का जमा किया हुआ वह क़ुरान भी था जो तरतीबे नुज़ूल पर सरवरे काएनात की ज़िन्दगी में मुरत्तब किया गया था। (तारीख़ अल ख़ुलाफ़ा व अतफ़ान) और जिसे हज़रत अली (अ0) ने अपने अहदे ख़िलाफ़त में भी इस लिए रायज न किया था कि इस्लाम में दो क़ुरआन रिवाज पा जाएगें और इस्लाम में तफ़रक़ा पड़ जाएगा (अज़ता अल ख़फ़ा सफ़ा 273) मेरे नज़दीक इसी सिन में हज़रत नरजिस ख़ातुन का इन्तेक़ाल हुआ और इसी सिन में हज़रत ने ग़ैबत इख्तियार फ़रमाई है।