Go to content Go to menu
 


imam mahdi इमाम महदी (अ0) की पहचान ki pahchaan hindi

2011-07-13

हज़रत इमाम महदी (अ0) की पहचान

हज़रत इमाम मुहम्मद महदी (अ0) सिलसिलए अस्मते मुहम्मदिया की चौदहवीं ओर सिल्के इमामते अलविया की बारहवीं कडी है। आपके वालिदे माजिद हज़रत इमाम हसन असकरी (अ0) और वालेदा-ए- माजेदा जनाबे नरजिस ख़ातून [1]थीं।

आप अपने आबा व अजदाद की तरह इमामे मन्सूस, मासूम, आलमे ज़माना और अफ़ज़ले कायनात हैं। आप बचपन ही में इल्मो हिकमत में भर पूरे थे।

(सवाएके मोहर्रेका सफ़ा 124)

आपको पाँच साल की उम्र में वैसी ही हिकमत दे दी गयी थी जैसी हज़रत यहीया को मिली थी, और आप बतने मादर में उसी तरह इमाम क़रार दिये गये थे, जिस तरह हज़रत ईसा (अ0) नबी क़रार पाये थे।

( कशफ़ुल ग़ुम्मा सफ़ा 130)

आप अम्बिया से बहतर हैं। (ओसाफ-उर-राग़ेबीन, सफा 128) आपके मुताअल्लिक़ हज़रत रसूल अकरम (स0) ने बे शुमार पेशीन गोइयाँ फ़रमाई है और इसकी वज़ाहत की है कि आप हुज़ूर की इतरत और हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स0) की औलाद से होंगे। मुलाहिज़ा हो (जामए सग़ीर सियूती, सफ़ा 130 तबा मिस्र 122 व मुसनद अहमद बिन हम्बल जिल्द 1, सफ़ा 84 तबा मिस्र व कन्जुल हक़ाइक़, सफ़ा 122 व मुस्तदरक जिल्द 4, सफ़ा 520 व मिशकात शरीफ़)

आपने यह भी फ़रमाया कि आप का ज़हूर आखिर ज़माने में होगा और हज़रत ईसा (अ0) उनके पीछे नमाज़ पढ़ेगें। मुलाहेज़ा हो सही बुखारी पारा 14 सफ़ा 399 व सही मुसलिम जिल्द 2, सफ़ा 95, सही तिर्मिज़ी सफ़ा 270 व सही अबू दाऊद जिल्द 2, सफ़ा210 व सही इब्ने माजा सफ़ा 204 व सफ़ा 309 व जामए सग़ीर सफ़ा 134 व अनवारुल हक़ाइक़ सफ़ा 90) आपने यह भी कहा कि इमाम महदी (अ0) मेरे ख़लीफ़ा की हैसियत से हज़ूर करेंगें और यख़तमुद्दीन बिही कमा फ़तेह बिनाजिस तरह मेरे ज़रिये से देने इस्लाम का आग़ाज़ हुआ उसी तरह उनके ज़रिये से मुहरे इख़तेताम लगा दी जायेगी। मुलाहेज़ा हो कन्ज़ुल हक़ाइक़ सफ़ा 209। आपने इसकी भी बज़ाहत फ़रमाई है कि इमाम महदी का असल नाम मेरे नाम की रतह मुहम्मद और कुन्नियत मेरी कुन्नियत की तरह अबुल क़ासिमहोगी। वह जब ज़हूर करेंगे तो सारी दुनिया को अदल व इनसाफ़ से उसी तरह पुर कर देगें, जिस तरह वह उस वक़्त ज़ुल्म व जौर से भरी होगी। मुलाहेज़ा हो, जामाए सग़ीर, सफ़ा 104 व मुस्तदरिक इमाम हाकिम सफ़ा 422415) ज़हूर के बाद उनकी फ़ौरन बैअत करनी चाहिये क्योंकि वह ख़ुदा के ख़िलाफ़ा होंगे।

सुनने इब्ने माजा उर्दू सफ़ा 261 तबा कँराची, 1377 हिजरी)

हज़रत इमाम महदी (अ0) की विलादत ब सआदत

मुवर्रेख़ीन का इत्तेफ़ाक़ है कि आपकी विलादत बासआदत 15 शाबान, 255 हिजरी यौमे जुमा बवक़्ते तुलूए फ़जर वाक़ेअ हुई है। जैसा कि दफ़यातुल अयान, रौज़तुल अहबाब. तारीख़ इब्नुल नरदी, यनाबि उल मोवद्दता, तारीख़े कामिल, तबरी, कशफ़ुल ग़ुम्मा, जिला उल अयून,उसूले काफ़ी,, नूरुल अबसार, इरशाद, जामए अब्बासी, आलामुल वरा और अनवारुल हुसैनिया वगैरा) में मौजूद है।

बाज़ उलमा का कहना है कि विलादत का सन 256 हिजरी और माद्दए तारीख़ नूर है। यानी आप शबे बराअत के इख़्तेताम पर बवक़्ते सुबहे सादिक़ आलमे ज़हूर व शहूद में तशरीफ़ लाये है।

हज़रत इमाम हसन असकरी (अ0) की फुफी जनाबे हकीमा ख़ातून का बयान है कि एक रोज़ मै हज़रत इमाम हसन असकरी (अ0) के पास गई तो आपने फ़रमाया की ऐ फुफी आप आज हमारे ही घर में रहिये, क्योंकि ख़ुदा वन्दे आलम मुझे आज एक वारिस अता फ़रमायेगा। मैने कहा कि यह फ़रज़न्द किसके बतन से होगा। आपने फ़रमाया कि बतने नरजिस से मुतावल्लिद होगा। जनाबे हकीमा ने कहा! बेटे मै तो नरजिस में कुछ भी हमल के आसार नही पाती, इमाम ने फ़रमाया कि ऐ फुफी नरजिस की मिसाल मादरे मूसा जैसी है। जिस तरह हज़रत मूसा का हमल विलादत के वक़्त से पहले ज़ाहिर नही हुआ। उसी रतह मेरे फ़रजन्द का हमल भी बर वक़्त ज़ाहिर होगा। ग़रज़ कि इमाम के फ़रमाने से उस शब वहीं रहीं। जब आधी रात गुज़र गयी तो मै उठी और नमाज़ तहज्जुद में मशग़ूल हो गई, और नरजिस भी उठ कर नमाज़े तहज्जुद पढ़ने लगी। उस के बाद मेरे दिल मे यह ख़्याल गुज़रा कि सुबह क़रीब है और इमाम हसम असकरी (अ0) ने जो कहा था वह अभी तक ज़हिर नही हुआ। इस ख़याल के दिल में आते ही इमाम (अ0) ने अपने हुजरे से आवाज़ दी! ऐ फुफी जल्दी न किजिये, हुज्जते ख़ुदा के ज़हूर का वक़्त बिल्कुल क़रीब है। यह सुन कर मै नरजिस के हुजरे की तरफ पलटी, नरजिस मुझे रास्ते ही में मिली, मगर उनकी हालत उस वक़्त मुताग़य्यर थी। वह लरज़ा बर अन्दाम थीं और उनका सारा जिस्म कांप रहा था।

(अल बशरा, शराह मोअद्दतुल कुरबा सफ़ा 139)

मेने यह देखकर उनको अपने सीने से लिपटा लिया और सूरए क़ुल, इन्ना अनज़लना, व आयतल कूर्सीपढ़ कर उन पर दम किया। बतने मादर से बच्चे की आवाज़ आने लगी। यानी जो कुछ मै पढती थी वह बच्चा भी बतने मादर मे वही कुछ पढता था। उस के बाद मेने देखा कि तमाम हुजरा रौशन व मुनव्वर हो गया। अब जो मै देखती हूँ तो एक मौलूदे मसऊद ज़मीन पर सजदे में पडा हुआ है। मैने बच्चे को उठा लिया। हज़रत इमाम हसन अकरी (अ0) ने अपने हुजरे से आवाज़ दी ऐ फुफी! मेरे फ़रज़नद को मेरे पास लाईये। मै ले गई, आपने अपनी गरदन पर बैठा लिया और ज़बान दर दहान वै करद और अपनी ज़बान बच्चे के मूहँ मे दे दी और कहा कि ऐ फ़रज़न्द ! खुदा के हुक्म से बात करो। बच्चे ने इस आयत

بسم الله الرحمن الرحيم ونريد ان نمن علي الذين استضعفوا في الارض ونجعلهم الائمة ونجعلهم الاوارثين

की तिलावत की जिसका तर्जुमा यह है। कि हम चाहते है कि एहसान करें उन लोगों पर जो ज़मीन पर कमज़ोर कर दिये गये हैं और उनको इमाम बनायें और उन्हीं को रूए ज़मीन का वारिस क़रार दें।

इसके बाद कुछ सब्ज़ ताएरों ने आकर हमें घेर लिया, इमाम हसन असकरी(अ0) ने उन में से एक को बुलाया और बच्चे को देते हुए कहा قد كفا حفظهइस को ले जाकर इस की हिफ़ाज़त करो। यहाँ तक कि ख़ुदा इसके बारे में कोई हुक्म दे। क्योंकि खुदा अपने हुक्म को पूरा करके रहेगा। मैने इमाम हसन असकरी (अ0) से पूछा कि यह तायर कौन थे ? आपने फ़रमाया कि या जिब्रईल थे और वह दूसरे फ़रिश्त-ए-रहमत थे। इसके बाद फ़रमाया कि ऐ फुफी इस फरज़न्द को उसकी माँ के पास से ले जाओ ताकि उस की आखें खूनुक हों और महज़ून व मग़मून न हो और यह जान लो कि खुदा का वादा हक़ हैو اكثرهم لا يعقلونलेकिन अक्सर लोग इसे नही जनते इसके बाद इस मौलूदे असऊद को उसकी माँ को पास पहुँचा दिया गया।

(शवाहेदुन नबूवत सफ़ा 212 तबा लखनऊ 19050)

अल्लामा हायरी लिखते हैं कि विलादत के बाद आपको जिब्रईल परवरिश के लिये उठा ले गये।

(ग़ायतुल मकसूद जिलद 1, सफ़ा 75)

किताबे शवाहेदुन नुबूवत और वफ़यातुल आयान व रौज़तुल अहबाब में है कि जब आप पैदा हुए तो मख़्तून और नाफ़ बुरीदा थे और आपके दाहिने बाज़ू पर या आयत मन्कूश थी।جاء الحق وذهق الباطل ان الباطل كان ذهوقا यानि हक़ आया और बातिल मिट गया और बातिल मिटने ही के क़बिल था। यह क़ुदरती तौर पर बहरे मुताक़ारिब के दो मिसरे बन गये है। हज़रत नसीम अमरोहवी ने इस पर क्या खूब तज़मीन की है वह लिखते है।

चशमो, चराग़े दीदए नरजिस ऐने खुदा की आखँ का तारा

बदरे कमाल, नीमए शाबान चौदहवाँ अख़्तर औजे बक़ा का

हामिए मिल्लत माहिए बिदअद कुफ़्र मिटाने ख़ल्क़ में आया

वक़्ते विलादत माशा अल्लाह क़ुरआन सूरत देख के बोला

जा अल हक़्क़ो ज़हक़ल बातिल

इन्नल बातिला काना ज़हूक़ा

मुहद्दिस देहलवी शेख़ अब्दुल हक़ अपनी किताब मनाक़िबे आइम्मा-ए-अतहार में लिखते हैं कि हकीमा ख़ातून जब नरजिस के पास आईं तो देखा कि एक मौलूद पैदा हुआ है, जो मख़्तून और मफ़रूग़ मुंह है। यानी जिस का ख़तना किया हुआ है और नहलाने धुलाने के कामों से जो मौलूद के साथ होते हैं बिलकुल मुसतग़नी है। हकीमा ख़ातून बच्चे को इमाम हसन असकरी (अ0) के पास लाईं। इमाम ने बच्चे को लिया और उसकी पुश्ते अक़दस और चश्मे मुबारक पर हाथ फेरा। अपनी ज़बाने मुतह्हर उनके मुँह मे डाली और दाहिने कान में अज़ान और बाएं कान में अक़ामत कही। यही मज़मून फ़सलुल खिताब और बिहारुल अनवार में भी है। किताब रौज़तुल अहबाब और यनाबि उल मवद्दत में है कि आपकी विलादत मुक़ामे सरमन राय सामरा में हुई है।

किताबे कशफ़ुल ग़ुम्मा सफ़ा 120 में है कि आपकी विलादत छुपाई गई और पूरी सई की गयी कि आपकी पैदाइश किसी को मालूम न हो सके। किताब दमातुस साकेबा जिल्द 3, सफ़ा में है कि आपकी विलादत इस लिये छुपाई गयी कि बादशाहे वक़्त पूरी ताक़त के साथ आप की तलाश में थे। इस किताब के सफ़ा 192 में है कि इसका मक़सद यह था कि हज़रत हुज्जत को कत्ल करके नस्ले रिसालत का ख़ात्मा कर दें। तारीखे अबुल फ़िदा में है कि बादशाहे वक़्त मोतज़ बिल्लाह था। तज़किरा-ए- ख़वासुल उम्मत में है कि उसी के अहद में इमाम अली नक़ी (अ0) को ज़हर दिया गया था। मोतज़ के बारे में मुवर्रेख़ीन की राय कुछ अच्छी नही है। तर्जुमा तारीख़ुल ख़ुलफ़ा, अल्लामा सियूती के सफ़ा 363 में है कि उसने अपनी खिलाफ़त में अपने भाई को वली अहदी से माज़ूल करने के बाद कोडे लगवाये थे और ता हयात क़ैद में रखा था। अक्सर तवारीख़ में है कि बादशाहे वक़्त मोतमिद बिन मुतवक्किल था। जिसने इमाम हसन असकरी(अ0) को ज़हर से शहीद किया। तारीख़े इस्लाम जिल्द 1, सफ़ा 67 में है कि खलीफ़ा मोतमिद बिन मुतावक्किल कमज़ोर मतलून मिज़ाज और ऐश पसन्द था। यह अय्याशी और शराब नोशी में बसर करता था। इसी किताब के सफ़ा 29 में है कि मोतमिद हज़रत इमाम हसन अकरी(अ0) को ज़हर से शहीद करने के बाद इमाम महदी(अ0) को क़त्ल करने के दरपै हो गाया था।

आपका नसब नामा आपके पिदरी नसब नामा यह है। मुहम्मद बिन हसन बिन अली बिन मुहम्मद बिन अली इब्ने जाफ़र बिन मुहम्मद बिन हुसैन बिन अली व फ़ातमा बिन्ते रसूल अल्लाह(स0) यानी आप फ़रज़न्दे रसूल(स0), दिल्बन्दे अली और नूरे नज़रे बुतूल(स0) है। इमाम अहमद बिन हम्बल का कहना है कि इस सिलसिला-ए- नसब के असमा को अगर किसी मजनून पर दम कर दिया जाय तो उसे यक़ीनन शिफ़ा हासिल होगी। (मसनदे इमाम रज़ा सफ़ा 7)

आप का सिलसिला-ए- नसब माँ की तरफ़ से हज़र शमऊन बिन हन अल सफ़आ वसी-ए- हज़रत ईसा तक पहुँचता है।

अल्लामा मजलिसी और अल्लामा तबरी लिखते हैं कि आपकी वालेदा जनाब नरजिस खातून थीं। जिनका नाम मलीकाभी था। नरजिक ख़ातून यशूआ की बेटी थीं। जो रोम के बादशाह क़ैसरके फ़रज़न्द थे जिनका सिललिए नसब वसी-ए- हज़रते ईसा(अ0) जनाब समऊन तक पहुँचता है। 13 साल की उम्र में क़ैसरे रोम ने चाहा था कि नरजिस का अक़्द अपने भतीजे से कर दे, लेकिन बाज़ क़ुदरती हालात की वजह से वह इस मक़्सद में कामयाब न हो सका। बिल आखिर एक ऐसा वक़्त आ गया कि आलमे अरवाह में हज़रते ईसा(अ0), जनाबे शमऊन हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा(स0) जनाब अमीरुल मोमेनीन और हज़रत फ़ातेमा ज़हरा(स0) बमक़ामे क़सरे क़ैसर जमा हुए, जनाबे सैयदह ने नरजिस ख़तून को इस्लाम की तलक़ीन की और हज़रत की और आँ हज़रत(स0) ने बतवस्सुते हज़रते ईसा(अ0) जनाबे शमऊन से इमाम हसन असकरी के लिये नरजिस ख़ातून की ख़वास्तगारी की, निस्बत की तकमील के बाद हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा(स0) ने एक नूरी मिम्बर पर बैठ कर अक़्द पढ़ा और कमाले मसर्रत के साथ यह महफ़िले निशात बर्ख़्वास्त हो गई। जिसकी इत्तेला जनाबे नरजिस को ख़्वाब के तौर पर हुई। बिल आख़िर वह वक़्त आया कि जनाबे नरजिस ख़तून हज़रत हसन(अ0) की ख़िदमत में आ पहुँची और आपके बतने मुबारक से नूर ख़ुदा का ज़हूर हुआ।

(किताबे जला उल अयून, सफ़ा 298 व ग़एतुल मकसूद सफ़ा 175)

आपका इस्मे गीरामी

आप का नामे नामी व इस्मे गिरामी मुहम्मदऔर मशहूर लक़ब महदीहै। उलमा का कहना है कि आपका नाम ज़बान पर जारी करने की मुमानिअत है।

अल्लामा मजलिसी इसकी ताईद करते हुए फ़रमाते है कि हिकमते आन मख़्फ़ी अस्तइसकी वजह पोशीदा और ग़ैर मालूम है। (जला उल अयून)

उलमा का बयान है कि आपका नाम ख़ुद हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा(स0) ने रखा था। मुलाहेज़ा हो रौज़तुल अहबाब व यनाबि उल मोअद्दत।

मुवर्रिख़े आज़म मिस्टर ज़ाकिर हुसैन तारीख़े इस्लाम जल्द 1, सफ़ा 31 में लिख़ते है कि आँ ह़ज़रत(स0) ने फ़रमाया कि मेरे बाद बारह ख़लीफ़ा कुरैश से होंगे। आपने फ़रमाया कि आख़िरे ज़मान में जब दुनिया जुल्मो जौर से भर जायगी, तो मेरी औलाद में से महदी का ज़हूर होगा जो ज़ुल्मो जौर को दूर करके दुनिया को अदलो इन्साफ़ से भर देगा। शिर्क व कुफ़्र को दुनिया से नाबूद कर देगा। उसका नाम मुहम्मदऔर लक़ब महदीहोगा। हज़रत ईसा(अ0) आसमान से उतर कर उसकी नुसरत करेंगे और उसके पीछे नमाज़ पढ़ेंगे और वह दज्जाल को कत्ल करेंगे।

आप की कुन्नियत

इस पर उलमा-ए-फ़रीक़ैन का इत्तेफ़ाक़ है कि आपकी कुन्नियत अबुल क़सिमऔर अबू अबदुल्लाह थी और इस पर भी उलेमा मुत्तफ़िकक है कि अबुल क़ासिम कुन्नियत ख़ुद सरवरे कायनात की तजवीज़ करदा है। मुलाहेज़ा हो! (जामए सग़ीर सफ़ा 104, तज़किरए ख़वास अल उम्मत, सफ़ा 204, रौज़तुल शोहदा, लफ़ा 439, लवाएक़े मोहरिक़ा सफ़ा 134, शवाहदुन नबूवत सफ़ा 312, कशफ़ुल ग़ुम्मा सफ़ा 130, जला उल अयून, सफ़ा 298)

यह मुसल्लेमात में से है कि आँ हज़रत(स0) ने इरशाद फ़रमाया कि महदी का नाम मेरा नाम और उसकी कुन्नियत मेरी कुन्नियत होगी। लेकिन इस रिवायत में बाज़ अहले इस्लाम ने यह इज़ाफ़ा किया है कि आँ हज़रत ने यह भी फ़रमाया है कि महदी के बाप का नाम मेरे वालिदे मोहतरम का नाम होगा। मगर हमारे रावियों ने ऐसी कोई रिवायत नही की और ख़ुद तिरमिज़ी शरीफ़ में भी इस्मे अबीह असमे अबीनही है। ताहम बक़ौल साहेबुल मनाक़िब अल्लामा कन्जी शाफ़ेई यह कहा जा सकता है कि रिवायत में लफ़ेज़े “”अबीह से मुराद अबु अब्दिल्लाह-अल-हुसैन है। यानि इससे इस उम्र कि तरफ़ इशारा है कि इमाम महदी(अ0) हज़रत इमाम हुसैन(अ0)कि औलाद से हैं।

आपके अलक़ाब

आपके अलक़ाब महदी, हुज्जतुल्लाह,ख़लफ़ुस्सालेह, साहिबुल अस्र व साहिबुल अम्र, साहिबुज़्ज़मान, अलक़ाइम, अलबाक़ी और अलमुन्तज़र हैं। मुलाहेज़ा हो तज़केरा-ए-ख़वासुल उम्मत सफ़ा 204, रौज़तुश शोहदा सफ़ा 439 कशफ़ुल ग़ुम्मा सफ़ा 131 सवाइक़े मुहर्रिक़ा सफ़ा 124 मतालेबुल सुवेल सफ़ा 294, आलामुल वरा सफ़ा 24)

हज़रत दानियाल नबी ने हज़रत इमाम महदी(अ0) की विलादत से 1420 साल पहले आप का लक़ब मुन्तजिर क़रार दिया है। मुलाहेज़ा हो किताब व दानियाल बाब 12 आएत 12। अल्लामा इब्ने हजरे मक्की अल मुन्तज़िर की शरह करते हुए लिखते है कि उन्हें मुन्तज़िर यानी जिसका इन्तेज़ार किया जाय इस लिए कहते है कि वह सरदाब में ग़ायब हो गए हैं और यह मालूम नही होता कि कहाँ चले गए। ( मतलब यह है कि लोग उनका इन्तेज़ार कर रहें हैं, शेख़ उल ऐराक़ैन अल्लामा शेख अब्दुलरसा तहरीर फ़रमाते है कि आपको मुन्तज़िर इस लिए कहते है कि आप की ग़ैबत की वजह से आपके मुख़लिस आपका इन्तेज़ार कर रहें हैं। मुलाहेज़ा हो।

( अनवारुल हुसैनिया जिल्द 2 सफ़ा 57 तबा बम्बई)