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aqwale masoomeen (aqwaal -e- masoomeen a.s.) hindi shiyat

2011-07-16

301. सब से बुरा वतन वह है, जिसमें रहने वाले लोग सुरक्षित न हों।
302. सब से बुरे लोग वह है जिन से किसी भलाई की उम्मीद न हो और उनकी बुराई से न बचा जा सकता हो।
303. सब से बुरे साथी वह हैं जो जल्दी ही रंग बदल दें।
304. इरादा करने से पहले मशवरा करो और काम शुरु करने से पहले सोचो।
305. दो चीज़ें ऐसी हैं जिनके महत्व को केवल वही जानता है, जिसके पास से वह चली जाती है : जवानी और स्वास्थ।
306. شَيئانِ لا يُوزَنُ ثَوابُهُما; اَلعَفوُ وَالعَدلُ; दो चीज़ें ऐसी हैं जिनके सवाब (पुणय) का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता है : क्षमा और न्याय।
307. شارِكُوا الَّذِي قَد أقبَلَ الرِّزقُ فَإنَّهُ أجدَرُ بِالحَظِّ وَأخلَقُ بِالغِنى; जिसकी ओर धन बढ़ जाये, उसके साझीदार बन जाओ, क्योंकि वह लाभान्वित होने के लिए योग्य व मालदारी के लिए उपयुक्त है।
308. कार्यों का सही होना, नीयत के सही होने पर आधारित है।
309. तवक्कुल (अल्लाह पर भरोसा), इबादत को सवांरता है।
310. इन्सान की भलाई, ज़बान को काबू में रखने और नेकी करने में है।
311. तन्दरुस्ती, सब से बड़ी नेमत है।
312. औरत का पर्दा, उसके लिये लाभदायक है और उसकी सुन्दरता को हमेशा बाकी रखता है।
313. बुरा साथी दोज़ख की आग का एक अंगारा होता है।
314. सिला ए रहम (रिश्तेदारों के साथ मिलने जुलने) से माल बढ़ता है और मौत टलती है।
315. छिपा कर दिया जाने वाला सदक़ा, गुनाहों को छिपाता है और खुले आम दिये जाने वाले सदक़े से माल बढ़ाता है।
316. अपने दीन की दुनिया के द्वारा रक्षा करो ताकि दोनों से फ़ायदा उठाओ और अपनी दुनिया को दीन के द्वारा न बचाओ वरन दोनों का नुक़्सान होगा।
317. जिस खामोशी के परिणाम में तुम्हारी सुरक्षा हो, वह उस बोलने से अच्छी है जिसके नतीजे में तुम्हें बुरा कहा जाये।
318. दिल का रोज़ा, पेट के रोज़े से अच्छा है (अर्थात पेट को खाने से रोकने से अच्छा यह है कि दिल को गुनाह की फिक़्र से रोका जाये।
319. बुद्धिमान का सीना, उसके रहस्यों का सन्दूक होता है।
320. आवश्यक्तायें, मर्दों की गर्दनों को झुका देती हैं।
321. आलस्य को दृढ़ संकल्प से खत्म करो।
322. खुशी है उनके लिये जिनके दिल अल्लाह के लिये टूटे हैं।
323. खुशी है उनके लिये जिनके सीने किनः (ईर्ष्या) से ख़ाली और दिल धोखे बाज़ी से साफ़ हैं।
324. खुशी है उनके लिये जो अपनी इच्छाओं को कम करते हैं और मोहलत (उम्र) को ग़नीमत मानते हैं।
325. (अच्छे) कार्य किये बिना, जन्नत की चाहत मूर्खता है।
326. दुनिया और आख़ेरत दोनों को इकठ्ठा करने की चाहत आत्मा का एक धोखा है।
327. (उचित) कार्यों के बिना ऊँचे स्थान की इच्छा, मूर्खता है।
328. हम अहले बैत का तरीक़ा मध्य क्रम को अपना और हमारी सुन्नत विकास करना है।
329. ज़बान का ज़ख्म, भाले के जख्म से अधिक दर्द दायक होता है।
330. अपनी आत्मा को हवस की गंदगी से पाक करो, ऊँचे दर्जे पाओ।
331. कमज़ोर पर ज़ुल्म करना, सब से बुरा ज़ुल्म है।
332. किसी अयोग्य के साथ भलाई करना, भलाई पर ज़ुल्म है।
333. यतीमों और बेवा औरतों पर ज़ुल्म करने से विपत्तियाँ आती है और नेमत वालों से नेमतें छीन ली जाती हैं।
334. आख़ेरत के लिये काम करो, ताकि दुनिया ज़लील हो कर तुम्हारे पास आये।
335. गंभीरता के साथ रहो क्यों कि गंभीरता सब से अच्छी शोभा है।
336. सुख दुख में अल्लाह का शुक्र करते रहो।
337. हँस मुख रहो, क्योंकि हँस मुखी दोस्ती का जाल है।
338. (बुराईयों से) पाक साफ़ भाईयों (दोस्तों) के साथ रहो, क्योंकि वह खुशियों में शोभा और विपत्तियों में सहायक होते हैं।
339. जितना खर्च होता है, अल्लाह की तरफ़ से उतनी ही मदद मिलती है।
340. अल्लाह के लिये भाई चारे का संबंध स्थापित करने से, निस्वार्थ मोहब्बत होती है।
341. मशवरा देने वाले का काम सही राय देने की कोशिश करना है, उस पर सफ़लता की ज़िम्मेदारी नहीं है।
342. एक के बाद एक कठिनाई पड़ने की स्थिति में इन्सान के गुण व श्रेष्ठता प्रकट होती हैं।
343. दोस्ती व भाई चारे की लाज रखने वालों की परख कठिनाई के समय होती है।
344. तुरंत बात कहने के समय मर्दों की बुद्धियों को परखा जाता है।
345. पारसाओं की पारसाई, हवस और मज़े के समय प्रकट होती है।
346. अपने अन्दर दूसरों को चीज़ देने और ज़िद न करने की आदत डालो, तुम्हारे ऊपर सुधार व इस्लाह वाजिब है।
347. नीच लोगों की आदत, अच्छाई का जवाब बुराई से देना है।
348. मुझे आश्चर्य है उन लोगों पर जो देखते हैं कि हर दिन उनकी उम्र व जान कम हो रही है, परन्तु वह फिर भी मरने के लिये तैयार नहीं होते।
349. मुझे आश्चर्य है उन लोगों पर जो बीमारी के डर से (अनुचित चीज़ें) खाने पीने से बचते हैं, परन्तु दर्द दायक अज़ाब के डर से गुनाह से नहीं बचते !।
350. मुझे आश्चर्य है उन लोगों पर जो अपने से ऊपर वाले लोगों से भलाई की अम्मीद रखते हैं, वह अपने से नीचे वालों को किस तरह वंचित करते हैं।
351. ज्ञान के अनुरूप कार्यों का न होना, बिना फल के पेड़ के समान है। अर्थात अगर ज्ञान के अनुरूप कार्य न हों तो ज्ञान का कोई लाभ नही है।
352. अपने बच्चों को नमाज़ सिखाओ और जब वह बालिग हो जायें तो उनसे नमाज़ के बारे में पूछ ताछ करो।
353. आशिक की आँखें, माशूक की बुराईयों को नहीं देखतीं और उसके कान उसकी बुराई को नहीं सुनते।
354. अपने गुनाहों को स्वीकार करने वाला गुनहगार, उस आज्ञाकारी से अच्छा है जो अपने कार्यों पर गर्व करता है।
355. समस्त लोगों के साथ न्याय पूर्वक व्यवहार करो और मोमिनों से त्याग के साथ।
356. ग़द्दारी की अन्तिम सीमा, अपने पक्के दोस्त को धोखा देना और प्रतिज्ञा को तोड़ना है।
357. सब से बड़ी पारसाई, स्वयं को बुरी नज़र से रोकना है।
358. अपनी आदतों को बदलो ताकि आज्ञा पालन तुम्हारे लिये सरल हो जाये।
359. हँसी मज़ाक़ की अधिकता, गंभीरता को खत्म कर देती है।
360. दुनिया में होने वाले परिवर्तनों में शिक्षाएं (निहित) हैं।
361. स्थितियों के बदलने पर मर्दों के जौहर पहचाने जाते हैं।
362. तंगी के समय, दोस्त की ओर से होने वाली सहायता का पता लगता है।
363. हक़ की पाबन्दी से खुशी नसीब होती है।
364. नसीहत से दिल चमकते हैं।
365. जिसने अपने आज के कार्यों को सुधार कर, कल की ग़लतियों का बदला चुकाया, वह सफल हो गया।
366. जिसने वफ़ादारी का वेश धारण किया और अमानत का कवच पहना, वह सफल हो गया। अर्थात जिसने वफादारी और अमानतदारी को अपनाया वह सफल हो गया।
367. बादशाह की श्रेष्ठता शहरों को आबाद करने में है।
368. जिसने अपने दुशमनों से नसीहत चाही उसने मूर्खता की।
369. कभी कभी इंसान को ज़िद के नतीजे में वह मिलता है, जिसकी उसे ज़रूरत नही होती।
370. बुराईयाँ इतनी फैल गईं हैं कि अब बुराईयों से शर्म कम हो गई है।
371. निरन्तर चलते रहने वाला कम कार्य, उस अधिक कार्य से अच्छा है, जिससे तुम उकता जाओ।
372. आदमी का महत्व उसकी हिम्मत के अनुरूप होता है और उसके कार्यों का महत्व उसकी नीयत के अनुसार होता है।
373. यह कहना कि "मैं नही जानता हूँ।" स्वयं आधा ज्ञान है।
374. अच्छे लोगों से मिलो ताकि तुम भी उन्हीं जैसे बन जाओ और बुरे लोगों से दूर रहो ताकि उनसे अलग रह सको।
375. जीवन अच्छी योजना से आरामदायक बनता है और उसे अच्छे प्रबंधन से प्राप्त किया जा सकता है।
376. हर ऊँचे पद (मान सम्मान) वाले से ईर्ष्या की जाती है।
377. हर इंसान अपने जैसे इंसान की तरफ़ झुकता है।
378. बद अख़लाक़ी (दुष्टता) के अतिरिक्त हर बीमारी का इलाज है।
379. ज्ञान के अलावा हर चीज़ ख़र्च करने से कम होती है।
380. जिस चीज़ का प्रचार करना सही न हो, वह अमानत है, चाहे उसके छिपाने का आग्रह भी न किया गया हो।
381. बहुत सी कठिनाईयाँ प्यार मोहब्बत से हल हो जाती हैं।
382. ऐसे बहुत से लोग हैं जो काम करने में आज कल करते रहते हैं, यहाँ तक कि उन पर मौत हमला कर देती है।
383. उसके विचार किस तरह साफ़ हो सकते हैं, जिसका पेट हमेशा भरा रहता हो?!
384. उस उम्र से किस तरह खुशी मिल सकती है, जिसमें हर पल कमी होती रहती है ?
385. वह इबादत का मज़ा कैसे चख सकता है जो स्वयं को हवस से न रोक सकता हो ?!
386. वह दूसरों को कैसे सुधार सकता है, जिसने स्वयं को न सुधारा हो ?!
387. वह अल्लाह से मोहब्बत का दावा कैसे कर सकता है, जिसके दिल में दुनिया की मोहब्बत बस गई हो?!
388. डरने के लिए, बालों का सफ़ेद होना काफ़ी है।
389. आदमी की श्रेषठता के लिए यही काफ़ी है कि स्वयं को अपूर्ण माने।
390. आदमी की होशिआरी के लिए यही काफ़ी है कि वह अपनी बुराइयों को जानता हो।
391. आदमी की मूर्खता के लिए बेमौक़े हँसना काफ़ी है।
392. जो (लोग) दुनिया में बच गये हैं, उनकी जानकारी के लिए वह काफ़ी हैं जो दुनियाँ से चले गये हैं।
393. आदमी की लापरवाही के लिए यही काफ़ी है कि वह अपनी ताक़त को काम में न आने वाली चीज़ों में व्यय कर दे।
394. अधिक मज़ाक़, रौब को ख़त्म कर देता है।
396. अधिक क्रोध, क्रोधी को अपमानित करा देता है और उसकी बुराइयों को प्रकट कर देता है।
397. दानी बनो, लेकिन व्यर्थ ख़र्च करने वाले न बनो।
398. तुम उस काम में व्यस्त रहो जिसके बारे में तुम से पूछ ताछ की जायेगी।
399. पीड़ित के सहायक और अत्याचारी के दुश्मन बनो।
400. जब किसी चीज़ को प्राप्त करना चाहो तो उच्च हिम्मत से काम करो और जब किसी चीज़ पर अधिपत्य जमा लो तो अपनी सफला में महानता का परिचय दो।