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aqwale masoomeen Aqwaal -e- maasoomeen a.s. hindi shia

2011-07-16

151. बुद्धिमान होने की सब से बड़ी दलील, अच्छी तदबीर व उपाय है।
152. सब से अच्छी राय उस इन्सान की है जो स्वयं को मशवरा देने वाले की राय से मुक्त न समझता हो।
153. सब से बड़ा दान व सखावत, हकदारों तक उनके हक पहुंचाना है।
154. सब से बड़ा दुख व तकलीफ़, उस चीज़ में मेहनत करना है जिस से तुम्हें कोई फ़ायदा न हो।
155. सब से बड़ी बुराई, दूसरों की उस बुराई को पकड़ना है जो स्वयं में भी पाई जाती है।
156. सब से अधिक नुक़्सान में वह लोग हैं जो हक़ बात कहने की ताक़त रखते हुए, हक़ बात न कहें।
157. सब से अधिक कंजूस वह लोग हैं जो सलाम करने में कंजूसी करें।
158. नीच से कोई चीज़ माँगना, मौत से भी अधिक कठिन है।
159. सब से अधिक बुद्धिमान इन्सान वह है जो अपनी बुराइयों को देखे और दूसरों की बुराइयों को न देखे।
160. सब से अच्छा सदाचार यह है कि इन्सान अपनी हद में रहे और उस से बाहर न निकले।
161. सब से अच्छा जीवन उसका है जो उस पर प्रसन्न रहे, जो उसे अल्लाह ने दिया है।
162. नर्मी के साथ बात करना और ऊँची आवाज़ में सलाम करना इबादतों में से है।
163. यह दिल बर्तन (के समान) हैं और इन में सब से अच्छा बर्तन वह है जिस में नेकियां अधिक आयें।
164. मोमिन की खुशी उसके चेहरे पर, उसकी ताक़त उसके दीन में और उसका ग़म उसके दिल में होता है।
165. दिल, बदन की तरह थक जाते हैं, उन्हें खुश करने के लिये नया ज्ञान व बुद्धिमत्ता तलाश करो।
166. सब से अच्छी नेकी छिपा कर सदका देना, माँ बाप के साथ भलाई करना और सिला –ए- रहम (रिश्तेदारों के साथ मेल जोल से रहना) करना है।
167. लोगों को सदाचार की ज़रुरत, सोने चांदी से अधिक है।
168. तुम से लोगों की ज़रुरतों का जुडा होना, तुम्हारे लिए अल्लाह की नेमत है, उसे अच्छा समझो और उस से दुखी न हो वर्ना वह निक़मत में बदल जायेगी। (निक़मत शब्द हर प्रकार की बुराई को सम्मिलित है)
169. अगर तुम अल्लाह से मोहब्बत करते हो तो अपने दिल से दुनिया की मोहब्बत निकाल दो।
170. अगर तुम गुनाहों से पाक हो जाओ तो अल्लाह तुम से मोहब्बत करेगा।
171. अगर तुम अल्लाह की आज्ञा का पालन करो तो वह तुम्हें निजात (मुक्ति) देगा और तुम्हारे ठिकाने को अच्छा बना देगा।
172. मरने के बाद, तुम्हें तुम्हारे उन कार्यों के अलावा कोई चीज़ फायदा नहीं पहुंचायेगी जो तुम ने आगे भेज दिये हैं अतः नेक कामों को तुम अपना तोशा बना लो। (यात्रा के दौरान काम आने वाली हर चीज़ को तोशा कहते हैं, यहाँ पर इस बात की ओर इशारा किया गया है कि परेलोक की यात्रा के लिए अच्छे कार्यों को इकठ्ठा करो ताकि वह इस यात्रा में तुम्हारे काम आयें।)
173. बुद्धिमान वह है जो अपने तजुर्बों से शिक्षा ले।
174. दुश्मन को दुश्मन इस लिये कहा जाता है, क्योंकि वह तुम्हारे ऊपर अत्याचार करता है, अतः जो तुम्हें तुम्हारी बुराइयाँ बाताने से बचे, वह तुम्हारा दुश्मन है क्योंकि उसने तुम पर अत्याचार किया है।
175. जिस चीज़ ने इंसानों को ज्ञान प्राप्ति से रोका है, वह यह है कि बहुतसे देखते हैं कि अपने अपने इल्म पर अमल करने वाले अर्थात अपने ज्ञान पर क्रियान्वित होने वाले कम हैं।
176. नौजवान का दिल उस ज़मीन के समान है जिस में अभी खेती न की गई हो अतः उस में जो कुछ डाला जायेगा वह उसे ही स्वीकार कर लेगा।
177. जब कोई नेकी करो तो उसे छिपा लो।
178. जब तुम से कोई भलाई करे तो उसे याद रखो।
179. जब बुद्धी पूर्ण हो जाती है तो बातें कम हो जाती हैं।
180. जब मुस्तहब चीज़ें, वाजिब चीज़ों को नुक्सान पहुंचाने लगें तो उन्हें छोड़ दो।
181. जब बुरे काम व गुनाह खुले आम होने लगते हैं तो बरकत ख़त्म हो जाती है।
182. जब आलिम को देखो तो उसकी सेवा करो।
183. जब तुम में से कोई नमाज़ के लिये खड़ा हो तो इस तरह नमाज़ पढ़े जैसे वह उसकी आखरी नमाज़ है।
184. जब आँख हवस की तरफ़ देखती है तो दिल उसके नतीजे को देखने से अंधा हो जाता हैं।
185. जब किसी मज़लूम को देखो तो ज़ालिम के मुक़ाबले में उसकी मदद करो।
186. अगर बुज़ुर्गी व सम्मान चाहतें हो तो हराम काम से दूर हो जाओ।
187. जब अल्लाह किसी बन्दे का आदर करता है तो उसे अपनी मोहब्बत में व्यस्त कर देता है।
188. जब किसी उच्चता पर पहुंचो तो अपने से नीचे के जाहिलों के बारे में न सोचो, बल्कि अपने से ऊपर वाले आलिमों का अनुसरण करो।
189. जब तुम किसी में कोई अख़लाकी बुराई देखो तो स्वयं को उस जैसी बुराईयों से दूर रखो।
190. जब अल्लाह किसी बन्दे की भलाई चाहता है तो उसके दिल में क़िनाअत (कम को अधिक समझना) डाल देता है और उसकी बीवी को नेक बना देता है।
191. जब अल्लाह किसी बन्दे का सुधार व भलाई चाहता है तो उसके दिल में कम बोलने, कम खाने, कम सोने की बात डाल देता है।
192. जब किसी काम का इरादा करो तो उसके बुरे नतीजे से बचो।
193. जब कोई सवाल पूछो तो समझने व जानने के लिये पूछो, दूसरों का इम्तेहान लेने के लिये नहीं।
194. जब तुम कोई चीज़ लिखो तो उस पर मोहर लगाने से पहले उसे एक बार फिर पढ़ कर देख लो क्योंकि तुम अपनी बुद्धी पर मोहर लगा रहे हो।
195. अगर स्वयं को सुधारना चाहते हो तो मयानारवी (न कम न अधिक) से खर्च करो, जो मिले उस पर खुश रहो और इच्छाओं को कम कर दो।
196. अच्छे व्यवहार से मोहब्ब्त मज़बूत होती है।
197. इन्साफ से बरकतें दोगुनी हो जाती हैं।
198. दुआ से, विपत्तियाँ दूर होती हैं।
199. अच्छे अखलाक से जीवन आनंन्दायक बनता है।
200. स्वास्थ सही होता है जो खाने के मज़े का एहसास होता है।
201. इल्म का फल, अच्छे अमल से मिलता है, अच्छी बातों से नहीं।
202. तौबा से गुनाह धुल जाते हैं।
203. कठिन परिश्रम के द्वारा ऊँचे पद और सदैव का आराम प्राप्त करो।
204. अवसर से फ़ायदा उठाओ, इससे पहले कि उसके हाथ से निकल जाने के बाद अफ़सोस करो।
205. जल्दी करो, उस ग़ायब के आने से पहले जिसका इन्तेज़ार हो रहा है।
206. अपनी जवानी से, बुढ़ापे से पहले और अपनी सेहत से, बीमारी से पहले फायदा उठाओ।
207. मर्द का, अपने रिशतेदारों के साथ भलाई करना, (एक प्रकार का) सदका हैं।
208. बंदे का अल्लाह से डर कर रोना, गुनाहों को खत्म कर देता है।
209. सुबह सवेरे कमाने खाने के लिये निकलो, सुबह के काम में बरकत होती है और मशवरा करो क्योंकि मशवरे में सफलता है।
210. अपने माँ बाप के साथ भलाई करो ताकि तुम्हारी औलाद तुम्हारे साथ भलाई करे।
211. तुम्हारे और नसीहत के बीच ग़फ़लत व अचेतना के पर्दे हैं।
212. किसी ऐसे (इंसान) के साथ भलाई करना जो उस भलाई के महत्व को न जानता हो, उस भलाई को बर्बाद करना है।
213. बन्दा अल्लाह से ख़ालिस नीयत के साथ क़रीब होता है।
214. ज्ञान की पूर्णता, उसके अनुसार कार्य करना है।
215. गुनाह को छोटा समझना, गुनाह करने से भी बड़ा (गुनाह) है।
216. कुरआन की आयतों पर चिंतन करो और उससे शिक्षा (नसीहत) लो क्योंकि वह बहुत अधिक शिक्षाएं देने वाला हैं।
217. मुर्ख की बात का जवाब न देना ही उसका सब से अच्छा जवाब है।
218. सब से दोस्ती करो, वह कठिन समय में तुम्हारे काम आयेंगे।
219. (किसी काम का) इरादा करने से पहले अच्छी तरह विचार करो, उसे शुरु करने से पहले मशवरा करो और काम में हाथ डालने से पहले उसके परिणाम पर ध्यान दो।
220. आती हुई सर्दी से बचो और जाती हुई सर्दी को गले से लगाओ, क्योंकि सर्दी शरीर के साथ वही करती है जो पेड़ की डालियों के साथ करती है, शुरु में उन्हें सुखा देती है और अंतिम समय में उन्हें हरा भरा बना देती है।
221. ग़लती देख कर आँख बन्द कर लो और दूसरे की ग़लती को अनदेखा कर दो ताकि तुम्हारा मान सम्मान बढ़े।
222. अच्छे काम में जल्दी करना, अच्छाई को बढ़ाना है।
223. जिस चीज़ को अपनी उम्र के पहले हिस्से में बर्बाद किया है उसे आखरी हिस्से में पूरा कर लो ताकि लौटते समय (अर्थात मौत के वक्त) सफल बन सको।
224. दूर दर्शिता का परिणाम, सुरक्षित रहना है।
225. पाक दामन रहने का नतीजा, सुरक्षा है।
226. इन्केसारी (दूसरों के सम्मुख स्वयं को छोटा समझना) का नतीजा, मोहब्बत है।
227. अनुभव का परिणाम, उचित चुनाव है।
228. क़िनाअत (निस्पृहता) का परिणाम, कमाने खाने में मध्य क्रम को अपनाना और माँगने को बुरा समझना है।
229. तीन चीज़ों से नहीं शर्माना चाहिये : मेहमान की आव भगत से, बाप और उस्ताद के आदर में अपनी जगह से खड़े होने से और अपना अधिकार माँगने से चाहे वह कम ही हो।
230. तीन चीज़े अपने मालिक की बुद्धिमत्ता पर तर्क करती हैं : दूत, पत्र और उपहार।
231. तीन चीज़ें मोहब्बत का कारण बनती हैं : अच्छा अख़लाक़, विनम्रता और दूसरों के सामने स्वयं को छोटा समझना।
232. मोमिन व मुत्तकीन की भलाई को हमेशा नज़र में रखो।
233. ज्ञानियों के पास बैठो ताकि तुम्हारा ज्ञान बढ़े।
234. (इस दुनिया में) ख़त्म होने वाली चीज़ों को दान कर दो (ताकि आख़ेरत में) उनके बदले में कभी खत्म न होने वाली चीज़े पाओ।
235. तुम उसके पड़ोस में रहो, जिसकी भलाई तो तुम तक पहुँचे परन्तु उसकी बुराई तुम से दूर रहे।
236. ज्ञान की सुन्दरता उसका प्रसारण और उसका फल उस पर क्रियान्वित होना है, उसकी सुरक्षा उसे किसी योग्य के हवाले करना है।
237. सारी मर्दांगी इस में है कि जिसे खुले आम करने में शर्माते हों उसे छुप कर भी न करो।
238. अच्छा गुमान, दिल का चैन और दीन की सलामती है।
239. अच्छा व्यवहार, भाई चारे को बढ़ाता है।
240. अच्छाई की ओर बढ़ना, सुधार की निशानी है।
241. अतिशयोक्ति व प्रशंसा को पसंद करने की स्थिति, शैतान के लिए सब से अच्छा मौक़ा है।
242. सफलता की मिठास, सब्र की कड़वाहट को मिटा देती है।
243. नेमतों का बाक़ी रहना, सिला ए रहम में (निहित) है।
244. मर्द का अपनी आत्मा से शर्माना, ईमान का नतीजा है।
245. तुम्हारा सब से अच्छा माल वह है जो तुम्हारे मान सम्मान की रक्षा करे।
246. सब से अच्छी हँसी, मुस्कुराहट है।
247. मशवरा करने के लिये सब से अच्छे लोग : बुद्धिमान, ज्ञानी, अनुभवी और दूरदर्शी लोग हैं।
248. सब से अच्छे भाई वह हैं जो अपने भाईयों से अधिक उम्मीदें न रखते हों और कामों में सख्ती न करते हों।
249. तुम्हारा सब से अच्छा भाई वह है जो नेक कामों की तरफ़ दौडता हो और तुम्हें भी उन की तरफ़ खैंचता हो और नेक कामों का हुक्म देता हो और उनको करने में तुम्हारी मदद करता हो।
250. सब से अच्छी चीज़ जो बाप औलाद के लिये विरसे में छोड़ते हैं, अदब है।
251. कामों में बीच का रास्ता अपनाओ, जो बीच का रास्ता अपनाता है, उसका खर्च कम हो जाता है।
252. तुम्हें जो कोई भी बुद्घिमत्ता दे, ले लो, यह देखो कि क्या कह रहा है यह न देखो कि कौन कह रहा है।
253. सब से अच्छे काम, उम्मीद और डर का बराबर (एहसास) है।
254. जो हक़ का विरोध करे उसका विरोध करो और वह जिस पर राज़ी हो, उसे उसी पर छोड़ दो।
255. लोगों से इस प्रकार व्यवहार करो कि अगर तुम मर जाओ तो वह तुम पर रोयें और अगर तुम ग़ायब हो जाओ तो वह तुम से मिलने की इच्छा करें।
256. सीने का ईर्ष्या व कीनेः से खाली होना, बन्दे की भाग्यशालिता है।
257. एक साथ रहने से छुपी हुई आदतें सामने आ जाती है।
258. लोगों से मोहब्बत करो ताकि उनके उपद्रव से सुरक्षित और उनकी बुराइयों से बचे रहो।
259. जो चीज़ तुम्हारे काम न आये, उसे छोड़ दो और जो चीज़ तुम्हें मुक्ति दे उस में व्यस्त हो जाओ।
260. अल्लाह की याद, शैतान को दूर करती है।
261. सदाचारी और कोशिश करने वाले के अतिरिक्त कोई भी अपने उद्देश्य की चोटी को नहीं छू पाता।
262. करीम, वह है जिस का अखलाक अच्छा हो, हर नेमत के लिये उचित हो और सिल ए रहम करता हो।
263. बुरे लोग यह चाहते हैं कि लोगों की बुराइयां आम हो जायें ताकि उन्हें अपनी बुराइयों के बारे में और अधिक बहाना मिले।
264. अल्लाह रहमत करे उस मर्द पर जो अपने महत्व को पहचाने और अपनी हद से आगे न बढ़े।
265. अल्लाह रहमत करे उस इंसान पर जो हक़ (सत्यता) को ज़िन्दा करे और बातिल (असत्य) को मौत के घाट उतार दे, अत्यचार को मिटाये और न्याय को फैलाये।
266. श्रेष्ठता की जड़ गुस्से पर कंट्रोल करना और हवस को मारना है।
267. लोगों से दुश्मनी करना, मूर्खता की जड़ है।
268. मोहब्बत से काम लेना, सियासत की जड़ है।
269. बहुत सी दोस्तियाँ दिखावटी होती है।
270. बहुत सी बातें, नेमत को रोक देती हैं।
271. बहुत सी बातों का जवाब, चुप रहना है।
272. बहुत से नसीहत करने वाले ऐसे हैं जो खुद को गुनाहों से नहीं रोकते।
273. जो तुम से दूर रहना चाहता है, उस से मिलना अपमान है।
274. अपनी आत्मा को इस दुनिया की शोभाओं से दूर रखना, बुद्धी का परिणाम है।
275. काम करने से पहले सोचो, ताकि गलतियों से बच सको।
276. वह इंसान अपमानित होने पर राज़ी हो गया, जिसने अपनी परेशानियों को दूसरों पर प्रकट कर दिया।
277. हर इंसान की राय उसके अनुभव के अनुसार होती है।
278. आदमी का स्वयं से राज़ी होना, कम बुद्धी की दलील है।
279. खूब सूरती की ज़कात, पाक दामन रहना है।
280. ज्ञानी की ग़लती, किश्ती के टूटने के समान है, वह स्वयं भी डूबती है और दूसरों को भी डुबाती है।
281. अधिक कंजूसी, बहादुरी को ख़त्म और भाई चारे को ख़राब कर देती है।
282. वफा, मोहब्बत का कारण बनती है।
283. प्रफुल्लता, मोहब्बत का कारण बनती है।
284. दुआ, मोमिन का हथियार है।
285. पाक दामनी के द्वारा अपनी जान की रक्षा करो और अपने बीमारों का सदक़े से इलाज करो।
286. न्याय पर आधारित सियासत के तीन स्तम्भ हैं, दूर दर्शिता के साथ नर्मी, न्याय को अंतिम सीमा तक पहुंचाना, और मध्य क्रम में लोगों को धन देना अर्थात न बहुत कम न अत्याधित।
287. घर (खरीदने) से पहले पड़ोसी के बारे में पूछ ताछ करो।
288. लोगों के साथ मोहब्बत से रहो ताकि सुरक्षित रहो और आख़ेरत के लिये काम करो ताकि तुम्हें ग़नीमत मिले।
289. ज़िन्दगी का आराम, प्यार मोहब्बत में है।
290. जो गुनाह तुम्हें ग़मगीन कर दे, वह उस नेकी से अच्छा है जो तुम में घमंड पैदा कर दे।
291. दिल के ग़ाफ़िल होते हुए, कानों से सुनने का कोई फ़ायदा नहीं है।
292. तुम्हारा राज़, तुम्हारा कैदी है, अगर तुम ने उसे खोला तो तुम उसके कैदी बन जाओगे।
293. बुरा अखलाक ज़िन्दगी के लिए कठिनाई और जान के लिए अज़ाब है।
294. दोस्ती व मोहब्बत को दिलों से पूछो, क्योंकि दिल ऐसा गवाह हैं जो रिशवत नहीं लेते।
295. मोमिन का शुक्र, उसके कार्यों से प्रकट होता है।
296. सब से बुरा इंसान वह हैं जो किसी मजबूरी को क़बूल नही करता और गलतियों को माफ नहीं करता।
297. सब से बुरा काम वह है, जिस से तुम अपनी आख़ेरत बर्बाद कर लो।
298. सब से बुरा इंसान वह है, जो स्वयं को दूसरों से अच्छा समझे।
299. सब से बुरा इंसान वह हैं, जो इस बात की परवाह न करें कि लोग उसे गुनाहगार के रूप में देखें।
300. तुम्हारा सब से बुरा दोस्त वह है, जिसकी वजह से तुम किसी मुसिबत में फँस जाओ।