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इस्लाम की हुकूमत, islam ki hukoomat akhir me (hindi shia matter)

2011-07-11

इस्लाम की हुकूमत और कुफ्र का ख़ात्मा

कुरआने करीम ने तीन जगहों पर वादा किया है कि ख़ुदा वन्दे आलम इस्लाम को पूरी दुनिया पर ग़ालिब करेगा।

ھُوَ الَّذِی اٴَرْسَلَ رَسُولَہُ بِالْہُدَی وَدِینِ الْحَقِّ لِیُظْہِرَہُ عَلَی الدِّینِ کُلِّہِ وَلَوْ کَرِہَ الْمُشْرِکُونَ

 वह ख़ुदा वह है जिसने अपने रसूल को हिदायत और दीने हक़ के साथ भेजा ताकि अपने दीन को तमाम धर्मों पर ग़ालिब बनाये चाहे मुशरेकिन को कितना ही नागवार क्यों न हो।

 जबकि इस हक़ीक़त में कोई शक नही है कि अल्लाह का वादा पूरा होकर रहता है, वह कभी भी वादा ख़िलाफ़ी नही करता, जैसे क़ुराने करीम में फ़रमाया है:

اِنَّ اللهَ لَا یُخْلِفُ الْمِیْعَاد

बेशक अल्लाह वादे के खिलाफ अमल नहीं करता।

लेकिन यह बात रौशन है कि लगातार कोशिश के बावजूद भी पैग़म्बरे इस्लाम (स.) और अल्लाह के वली (अ. स.) अब तक ऐसी मुबारक तारीख नहीं देख पाए हैं।

अतः तमाम मुसलमान ऐसे दीन का इन्तेज़ार कर रहे हैं। यह एक ऐसी हक़ीक़ी तम्न्ना है जो अइम्मा मासूमीन (अ. स.) के कलाम में मौजूद है।

 इसी लिए उस वली ए ख़ुदा की हुकूमत में(اشھد ان لا الہ الا الله“ ) का नारा बुलन्द होगा जो तौहीद का परचम है और اشهد ان محمد رسول اللهकी आवाज़ जो इस्लाम का अलम है हर जगह लहराता हुआ नज़र आयेगा और किसी भी जगह कुफ़्र व शिर्क का वजूद बाकी न रहेगा।

 हज़रत इमाम मुहम्मद बाकिर (अ. स.) ने निम्न लिखित आयत की व्याख्या में फरमायाः

 وَقَاتِلُوہُمْ حَتَّی لاَتَکُونَ فِتْنَةٌ وَیَکُونَ الدِّینُ كله للهِ

और तुम लोग उन कुफ्फार से जिहाद करो यहाँ तक कि फित्ने का वजूद बाक़ी न रहे।

 इस आयत की तावील अभी तक नहीं हुई है और जब हमारा क़ाइम क़ियाम करेगा और जो इंसान उनके ज़माने को पायेगा वह इसकी तावील को अपनी आँखों से देखेगा।

 बेशक उस ज़माने में दीने मोहम्मदी (स.) वहाँ तक पहुँच जायेगा, जहाँ तक रात का अँधेरा पहुँचता है और पूरी दुनिया में फैल जायेगा। उस वक़्त ज़मीन से शिर्क का नाम व निशान मिट जायेगा, जैसे कि ख़ुदा वन्दे आलम में वादा फरमाया है।

 लेकिन पूरी दुनिया में इस्लाम का फैलाव,इस्लाम की सच्चाी व वास्तविक्ता की वजह से होगा। क्योंकि हज़रत इमाम महदी (अ. स.) के ज़माने में इस्लाम की सच्चाई बहुत स्पष्ट हो जायेगी और इस्लाम सभी को अपनी तरफ आकर्षित कर लेगा और सिर्फ वही लोग बाकी बचेंगे जो ईर्ष्या व दुश्मनी के शिकार होंगे। उस वक़्त हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की न्याय फैलाने वाली तलवार उनके सामने आयेगी और यही ख़ुदा वन्दे आलम का बदला होगा।

 इस बारे का आखरी नुक्ता यह है कि अक़ीदे की यह एकता (यानी सभी का मुसलमान हो जाना) हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत के ज़माने में पेश आयेगी और यह मौक़ा विश्वव्यापी समाज की स्थापना के लिए बहुत उचित होगा। उस वक़्त पूरी दुनिया अकीदे में इसी एकता और एकेश्वरवाद के क़ानून को क़बूल करेगी और उसकी छत्र छाया में अपने व्यक्तिगत और सामाजिक संबंध इसी एक अक़ीदे से प्राप्त होने वाली कसौटी के आधार पर व्यवस्थित करेंगे। इस वर्णन के अनुसार एक अक़ीदे व एक दीन के झंडे के नीचे जमा होना उस वक़्त की एक वास्तविक ज़रुरत होगी जो हज़रत इमाम महदी (अ. स.) की हुकूमत में पूरी होगी।