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लिबास के आदाब Libas/libaas k adaab, fazeelat hindi-shiya/shia

लिबास के आदाब और आरास्तगी ए लिबास की फ़ज़ीलत 
मोतबर हदीस में इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से नक़्ल है कि ख़ुदा वंदे आलम अपने किसी बंदे को नेमत अता फ़रमाए और उस नेमत का असर उस पर ज़ाहिर हो तो उस को ख़ुदा का दोस्त कहेगें और उस का हिसाब अपने परवरदिगार का शुक्र अदा करने वालों में होगा और अगर उस पर कोई असर ज़ाहिर न हो तो उसे दुश्मने ख़ुदा कहेगें और उस की हिसाब क़ुफ़राने नेमत करने वालों में होगा।

दूसरी हदीस में आप से नक़्ल किया गया है कि जब अल्लाह तआला किसी बंदे को नेमत अता फ़रमाए तो वह इस बात को दोस्त रखता है कि उसे नेमत का असर उस बंदे पर ज़ाहिर हो और वह (अल्लाह) देखे।

हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) से नक़्ल है कि मोमिन के लिये ज़रूरी है कि वह अपने बरादरानी ईमानी के लिये ऐसी ही ज़ीनत करे जैसी उस बैगाने के लिये करता है जो चाहता हो कि उस शख़्स को उम्दा तरीन लिबास में अच्छी शक्ल या सरापे में देखे।

बसनदे मोतबर साबित है कि हज़रते अली बिन मूसा रेज़ा (अ) गर्मी के मौसम में बोरिये पर बैठा करते थे और जाड़े में टाट पर और जब घर में होते तो मोटे झोटे कपड़े पहना करते थे  मगर जब बाहर जाते तो अल्लाह की नेमत के इज़हार के लिये ज़ीनत फ़रमाते थे यानी अच्छा लिबास पहनते थे।

हज़रत इमाम सादिक़ (अ) से नक़्ल है कि हक़ तआला ज़ीनत और नेमत के ज़ाहिर करने को दोस्त रखता है और ज़ीनत के तर्क करने और बदहाली के इज़हार को दुश्मन और इस बात को पसंद करता है कि अपने नेमत का असर अपने बंदे इस तरह देखे कि वह नफ़ीस (अच्छी) पोशाक पहने, ख़ुशबू लगाये, मकान को आरास्ता रखे, घर का सेहन कूड़े करकट से साफ़ रखे और सूरज डूबने से पहले चिराग़ रौशन कर दे कि इससे पैसों की कमी मिटती है और रोज़ी बढ़ती है।

हज़रते अमीरुल मोमिनीन (अ) से मंक़ूल है कि हक़ तआला ने एक ऐसी गिरोह भी पैदा किया है जिन पर अपनी ख़ास शफ़क़त (मेहरबानी) की वजह से रोज़ी तंग कर दी है और दुनिया की मुहब्बत उन के दिलों से उठा ली है वह लोग उस आख़िरत की तरफ़ जिस की तरफ़ ख़ुदा ने उन को बुलाया है, मुतवज्जे हैं और पैसों की कमी और दुनिया की मकरुह बातों पर सब्र करते हैं और न मिटने वाली नेमत अल्लाह ने उन के लिये तैयार की है उसका इश्तेयाक़ रखते हैं उन्होने अपनी जान ख़ुदा की मरज़ी हासिल करने के लिये दे डाली है उन का अंजाम शहादत है जब वह आलमे आख़िरत में पहुचेगें तो हक़ तआला उन से ख़ुश होगा और जब तक इस आलम में हैं जानते हैं कि एक दिन सब को मौत आना है इस लिये सिर्फ़ आख़िरत के लिये इंतेज़ाम करते रहते हैं, सोना चांदी जमा नही करते, मोटा झोटा कपड़ा पहनते हैं, थोड़ा खाने पर क़नाआत करते हैं और जा कुछ बचता है वह ख़ुदा की राह में दे डालते हैं कि यह अमल उन के लिये आख़िरत में काम आये, वह नेक लोगों के साथ ख़ुदा के लिये दोस्ती रखते हैं और बुरे लोगों के साथ ख़ुदा की मुहब्बत में दुश्मनी रखते हैं वह हिदायत के रास्ते के चिराग़ और आख़िरत में मिलने वाली नेमतों से मालामाल हैं।

युसुफ़ बिन इब्राहीम से रिवायत है कि मैं हज़रत अबी अब्दिल्लाह (अ) की ख़िदमत में जाम ए ख़ज़ पहन कर गया और अर्ज़ की कि हज़रत जामा ए ख़ज़ के लिये क्या इरशाद फ़रमाते हैं? हज़रत ने फ़रमाया कोई हरज नही है क्यों कि जिस वक़्त हज़रते इमाम हुसैन (अ) शहीद हुए जाम ए ख़ज़ ही पहने हुए थे और जिस वक्त जनाबे अमीर (अ) ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास को ख़वारिजे नहरवान से गुफ़्तगू के भेजा तो वह उम्दा से उम्दा पोशाक पहने हुए थे  और आला दरजे की खुशबू से मुअतत्तर थे और अच्छे से अच्छे घोड़े पर सवार थे जब ख़वारिज के बराबर पहुचे तो उन्होने कहा कि तुम तो बहुत नेक आदमी हो फिर यह ज़ालिमों का सा लिबास क्यों पहने हो?  और ऐसे घोड़े पर क्यों सवार हो? आप ने यह आयत पढ़ी कुल मन हर्रमा ज़ीनतल लाहिल लती अखरज ले इबादे वत तय्यबाते मिनर रिज़्क। (कह दो कि अल्लाह ने हराम की है वह ज़ीनत जो उस की इताअत से रोके औप पाक है वह रिज़्क़ जो अल्लाह ने अपने बंदों के लिये ज़मीन से पैदा किया है।) आँ हज़रत (स) ने इरशाद फ़रमाया है कि उम्दा कपड़ा पहनो और ज़ीनत करो क्यों कि यह अल्लाह को पसंद है और वह ज़ेबाइश (सजावट) को दोस्त रखता है मगर यह ज़रुरी है कि वह हलाल की वजह से हो।

मोतबर हदीस में वारिद हुआ है कि सुफ़याने सूरी जो सूफ़ी शेखों में से है मस्जिदुल हराम में आया और जनाबे इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ) को देखा कि क़ीमती कपड़े पहुने हुए बैठे हैं तो अपने दोस्तों से कहने लगा वल्लाह मैं उन के पास जाकर इस लिबास के बारे में उन्हे सरज़निश (मना) करता हूँ यह कहता हुआ आगे बढ़ा और क़रीब पहुच कर बोला: ऐ फ़रज़ंदे रसूले ख़ुदा, ख़ुदा की क़सम न कभी प़ैग़म्बरे ख़ुदा (स) ने ऐसे कपड़े पहने और न आप के आबा व अजदाद (बाप-दादा) में से किसी ने, हज़रत ने फ़रमाया कि जनाबे रसूले ख़ुदा के ज़माने में लोग तंगदस्त थे यह ज़माना दौलतमंदी का है और नेक लोग ख़ुदा की नेमतों के सर्फ़ (ख़र्च) करने में ज़्यादा हक़दार हैं और उसके बाद वही आयत जिस का अभी ज़िक्र हो चुका है तिलावत फ़रमाई और इरशाद फ़रमाया कि जो अतिया ख़ुदा का है गो उस के सर्फ़ करने में सब से ज़्यादा हक़दार हम हैं मगर ऐ सूरी, यह लिबास जो तू देखता है मैं ने फ़क़त इज़्ज़ते दुनिया के लिये पहन रखा है फिर उस कपड़े का दामन उठा कर उसे दिखाया कि नीचे वैसे ही मोटे कपड़े थे और इरशाद फ़रमाया कि यह मोटे कपड़े मेरे नफ़्स के लिये हैं और यह नफ़ीस लिबास इज़्ज़ते ज़ाहिरी के लिये। उस के बाद हज़रत ने हाथ बढ़ा कर सुफ़ियाने सूरी का जुब्बा (लम्बा कुर्ता) खींच लिया वह उस पुरानी गुदड़ी के नीचे नफ़ीस लिबास पहने हुए था, आप ने फ़रमाया वाय हो तुझ पर ऐ सुफ़ियान, यह नीचे का लिबास तूने अपने नफ़्स को ख़ुश करने के लिये पहन रखा है और ऊपर की गुदड़ी लोगों को फ़रेब देने के लिये।

हदीसे मोतबर में अब्दुल्लाह बिन हिलाल स मंक़ूल है कि मैं ने जनाबे इमाम रेज़ा (अ) की ख़िदमत में हाज़िर हो कर अर्ज़ किया कि लोगों को वह लोग बहुत ही अच्छे मालूम होते हैं जो फीका सीठा तो खाना खायें. मोटा झोटा कपड़ा पहनें और टूटे फूटे हाल में बसर करें, हज़रत ने इरशाद फ़रमाया कि ऐ अब्दुल्लाह, क्या तू यह नही जानता कि जनाब युसुफ़ (अ) पैग़म्बर भी और पैग़म्बर ज़ादे भी। इस के बा वजूद दीबा की क़बाएं पहनते थे जिस में सोने के तार बुने होते थे, आले फ़िरऔन के दरबार में बैठते थे, लोगों के मुक़द्देमात तय करते थे मगर लोगों को उन के लिबास से कुछ ग़रज़ न थी। बस वह यह चाहते थे कि अदालत में इंसाफ़ करे। इस लिये कि इस अम्र का लोगों के मामले से लिहाज़ा होना चाहिये वह सच कहने वाले हों, जिस वक़्त  वादा करें उसे पूरा करें और मामेलात में अदालत यानी इंसाफ़ करें बाक़ी ख़ुदा ने जो हलाल किया है उसे किसी पर हराम नही फ़रमाया है और हराम को चाहे वह थोड़ा हो या बहुत हलाल नही किया फिर हज़रत ने वही आयत जिस का ज़िक्र हो चुका है तिलावत फ़रमाई। बाक़ी हदीसें इस फ़स्ल के मुतअल्लिक़ हमने ऐनुल हयात में ज़िक्र की हैं।

उन कपड़ों का बयान जिनका पहनना हराम है

मर्दों के लिये ख़ालिस रेशम के और ज़रतार (चमकीले तारों वाले) कपड़े पहनने हराम हैं और ऐहतियात इस में हैं कि टोपी और जेब वग़ैरह (यानी वह लिबास जो शर्मगाह छुपाने के लिये इस्तेमाल नही होता) भी हरीर (रेशमी) कपड़े का न हो और ऐहतियात यह चाहती है कि अजज़ा ए लिबास जैसे सन्जाफ़ (झालर, गोट) और मग़ज़ी (कोर पतली गोट) भी ख़ालिस रेशम की न हो और बेहतर यह है कि रेशम के साथ जो चीज़ मिली हुई हो वह मिस्ल कतान (एक क़िस्म का कपड़ा) या ऊन या सूत वग़ैरा के हो और उस की मिक़दार कम हो, यह भी ज़रुरी है कि मुर्दा जानवर की खाल का इस्तेमाल न हो चाहे उस की बग़ावत हो गई हो। यही उलमा में मशहूर है नीज़ उन हैवानात का पोस्त न होना चाहिये जिन पर तज़किया जारी नही होता जैसो कुत्ता वग़ैरह और जिन हैवानात का गोश्त हराम है मुनासिब है कि उन की खाल और बाल और ऊन और सींग और दांत वग़ैरह कुल अजज़ा (हिस्से) नमाज़ के वक़्त से इस्तेमाल न हों। समूर (लोमड़ी की तरह का एक जानवर जिस की खाल से लिबाल बनाया जाता है जिसे समूर कहते हैं।), संजाब (एक तरह का सहराई जानवर है जिस की खाल से कपड़ा बनाते हैं।) और ख़ज़ (एक क़िस्म का दरियाई चौपाया है।) के बारे में इख़्तिलाफ़ है और एहतियात इस में हैं कि इज्तेनाब करे गो बिना बर अज़हर संजाब व ख़ज़ में नमाज़ जायज़ है। बेहतर यह है कि जो कपड़े हराम जानवरों के ऊन के कपड़ों के ऊपर या नीचे भी पहने हों उन में भी नमाज़ न पढ़े कि शायद उन में बाल चिपक कर रहे गये हों।

नाबालिग़ बच्चे के वली यानी मालिक के लिये मुनासिब है कि उन को तला व हरीर पहनने से मना करे क्यों कि बसनद मोतबर जनाबे रिसालत मआब (स) से मंक़ूल है कि आप ने हज़रत अली से फ़रमाया ऐ अली, सोने की अंगूठी हाथ में न पहना करो कि वह बहिश्त में तुम्हारी ज़ीनत होगी और जाम ए हरीर न पहनना कि वह बहिश्त में तुम्हारा लिबार होगा।

दूसरी हदीस में फ़रमाया कि जाम ए हरीर न पहनो किहक़ तआला क़यामत के दिन उस के सबब जिल्द (खाल) को आतिशे जहन्नम में जलायेगा।

लोगों ने हजरत इमाम जाफरे सादिक़ (अ) से दरयाफ़्त किया कि क्या यह जायज़ है कि हम अपने अहल व अयाल (बीवी बच्चों) को सोना पहनायें? इरशाद फ़रमाया हां। अपनी औरतों और लौडियों को पहनाओ मगर नाबालिग़ लड़कों को न पहलाओ।

दूसरी हदीस में वारिद है कि आँ हज़रत ने फ़रमाया मेरे वालिद हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ) अपने बच्चों और औरतों को सोने चांदी के ज़ेवर पहनाते थे और उस में कोई हरज नही है।

मुमकिन है किइस हदीस में बच्चों से मुराद बेटियां हों और यह भी हो सकता है कि नाबालिग़ लड़के भी इसमें शामिल हों मगर ऐहतेयाते यह है कि लड़कों को सोने को ज़ेवर न पहनायें।

रूई, ऊन और कतान के कपड़े पहनने के बयान में
सब कपड़ो में अच्छा कपड़ा सूती है मगर ऊनी कपड़े को बारह महीने पहनना और अपनी आदत बना लेना मकरूह है। हाँ कभी कभी न होने के सबब से या सर्दी दूर करने की ग़रज़ से पहनना बुरा नही है चुनांचे बसनदे मोतबर हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) से मंक़ूल है कि रूई का कपड़ा पहनो कि वह जनाबे रसूले ख़ुदा और हम अहले बैत की पोशिश हैं और हज़रत रसूले ख़ुदा (स) बग़ैर किसी ज़रुरत के ऊनी कपड़ा नही पहनते थे।

दूसरी हदीस में हज़रते इमाम सादिक़ (अ) से मंक़ूल है कि ऊनी कपड़ा बे ज़रुरत नही पहनना चाहिये।

दूसरी रिवायत में हुसैन बिन कसीर से मंक़ूल है वह कहता है कि मैंने हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) को देखा कि मोटा कपड़ा पहने हुए हैं और उस के ऊपर ऊनी कपड़ा, मैंने अर्ज़ की क़ुरबान हो जाऊँ क्या आप लोग पशमीने का कपड़ा पहनना मकरुह जानते थे? हज़रत ने इरशाद फ़रमाया कि मेरे वारिद और इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) ऊनी कपड़ा पहना करते थे मगर जब नमाज़ के लिये खडे होते तो मोटा सूती कपड़ा पहने होते थे और हम भी ऐसा ही करते हैं।

मंक़ूल है कि हज़रत रसूले ख़ुदा (स) ने फ़रमाया पाँच चीज़ें मरत वक़्त तक मैं तर्क नही करूंगा, अव्वल ज़मीन पर बैठ कर ग़ुलामों के साथ खाना खाना, दूसरा क़ातिर पर बेझूल के सवार होना, तीसरे बकरी को अपने हाथ से दुहना, चौछे बच्चों को सलाम करना, पांचवें ऊनी कपड़े पहनना।

इन सब हदीसों का ख़ुलासा और जमा करने का तरीक़ा यह है कि अगर मोमिनीन शाल और पशमीने को अपना शिआर (आदत) क़रार दें और इस कपड़े के पहनने का सबब अगर यह हो कि वह औरों से मुमताज़ रहें तो यह क़ाबिले मज़म्मत है। हां, अगर क़नाअत या ग़रीबी की वजह से या सर्दी दूर करने के लिये ऊनी कपड़ा पहनें तो कोई हरज नही है, और मेरे इस क़ौल की ताईद उस हदीस से होती है जो हज़रते अबूज़रे ग़फ़्फ़ारी से मंक़ूल है कि हज़रते रसूले ख़ुदा (स) ने फ़रमाया कि आख़िरे ज़माना में एक गिरोह ऐसा पैदा होगा जो जाड़े और गर्मी में पशमीना ही पहन करेगें और यह गुमान करेगें कि इस कपड़ों की वजह से हमें औरों पर बरतरी और रूतबा हासिल हो मगर इस गिरोह पर आसमान और ज़मीन के फ़रिश्ते लानत करेगें।

हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) से मंक़ूल है कि जाम ए कतान पैग़म्बरों की पोशिश है।

हज़रते इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ) स मंक़ूल है कि कतान पहनने से बदन फ़रबा होता है।

दूसरी हदीस में आया है कि हज़रत अली बिन हुसैन (अ) जाम ए ख़ज़ हजार या पांच सौ दिरहम का ख़रीदते थे और जाड़े में उसे पहनते थे जब जाड़ा ख़त्म हो जाता था तो उसे बेच कर क़ीमत को सदक़े में निकाल देते थे।
 

उस लिबास के पहनने का बयान जो औरतों और काफ़िरों के लिये मख़सूस है
मर्दों के लिये औरतों का मख़सूस लिबास जैसे मक़ना, महरम (अंगिया) बुरक़ा वग़ैरह पहनना हराम है इसी तरह औरतों के लिये मर्दों का मख़सूस लिबास पहनना हराम है जैसे टोपी, अम्मामा, क़बा वग़ैरह और काफ़िरों का मख़सूस लिबास जैसे जुन्नार या अंग्रेज़ी टोपियाँ वग़ैरह मर्द औरत किसी के लिये जायज़ नही है।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ) से मंक़ूल है कि औरत के लिये मर्द की शबीह बनना जायज़ नही है क्यो कि जनाबे रसूले ख़ुदा (स) ने उन पर मर्दों पर जो औरतों की शबीह बने और उन औरतों पर जो मर्दों की शबीह बनें लानत की है।

हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ) से रिवायत है कि ख़ुदा ए अज़्ज़ा व जल ने अपने पैग़म्बरों में से एक पैग़म्बर को वही भेजी कि मोमिनों से कह दो कि मेरे दुश्मनों के साथ खाना न खायें और मेरे दुश्मनों के से कपड़े न पहनें और मेरे दुश्मनों की रस्म व रिवाज को न बरतें वरनायह भी मेरे दुश्मनों के जैसे हो जायेगें।

अमामा बाँधने के आदाब
सर पर अम्मामा बाँधना सुन्नत है और तहतुल हनक बाँधना सुन्नत है और अम्मामे का एक रुख़ आगे की तरफ़ और दूसरा पीछे की तरफ़, मदीने के सादात के तर्ज़ पर डाल लेना सुन्नत है। शेख़े शहीद अलैहिर्रहमा ने फ़रमाया है कि खड़े हो कर अम्मामा बाँधना सुन्नत है।

जनाबे रसूले ख़ुदा सल्ललाहो अलैहे व आलिही वसल्लम से मंक़ूल है कि अम्मामा अरबों का ताज है जब वह अम्मामा छोड़ देगें तो ख़ुदा उन की अज़मत खो देगा।

हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से मंक़ूल हैं कि जो शख़्स अम्मामा सर पर बाँधे और तहतुल हनक न बाँधे और फिर ऐस दर्द में मुबतला हो जाये जिस की दवा मुम्किन न हो तो उस को चाहिये कि ख़ुद को मलामत करे।

हज़रत इमाम रेज़ा अलैहिस सलाम से मंक़ूल है कि जनाबे रसूले ख़ुदा (स) ने अम्मामा बाँधा और उस का एक सिरा आगे की तरफ़ डाला और दूसरा पीछे की तरफ़ और हज़रत जिबरईल ने भी ऐसा ही किया।

हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस सलाम से मंक़ूल है कि बद्र के फ़रिश्तों के सर पर सफ़ेद अम्मामे थे और उन के पल्ले छुटे हुए थे।

हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) से मंक़ूल है कि जनाबे रसूले ख़ुदा (स) जनाबे अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम के सरे मुबारक पर अपने दस्ते हक़ परस्त से अम्मामा बाँधा और एक सिरा अम्मामे का आगे की तरफ़ लटका दिया दूसरा कोई चार उंगल कम पीछे की तरफ़ फिर इरशाद फ़रमाया जाओ और आप चले गये फिर फ़रमाया आओं चुंनाचे अप हाज़िर ख़िदमत हुए और फ़रमाया वल्लाह, फ़रिश्तों के ताज इसी शक्ल के हैं।

फ़िक़ा ए रिज़वी में मज़कूर है कि जिस वक़्त अम्मामा सर पर बाँधे तो यह दुआ पढ़े, बिस्मिल्लाहि अल्ला हुम्मा अरफ़ा ज़िकरी व आला शानी व अइज़नी बे इज़्ज़तेका व अकरमनी बे करमेका बैना यदैक व बैना ख़ल्क़ेक़ा अल्ला हुम्मा तव्वजनी बेताजिल करामते वल इज़्ज़े वल क़ुबूले। (अल्लाह के नाम से शुरु करता हूँ या अल्लाह मेरा नाम बुलंद कर, मेरा रुतबा बढ़ा और तेरी इज़्ज़त का वास्ता मेरा इज़्ज़त में इज़ाफ़ा कर, और अपने करम से अपनी मख़्लूक़ में मेरा इकराम ज्यादा कर, या अल्लाह करामत व इज़्ज़त और क़बूलियत का ताज मुझे पहना।)

मकारिमे अख़लाक़ में किताबे निजात से नक़्ल किया है कि यह दुआ पढ़े, अल्ला हुम्मा सव्वमनी बे सीमा इल ईमाने व तव्वजनी बे ताजिल करामते व क़ल्लिदनी हबलुल इस्लामे वला तख़्ला रिबक़ताल ईमाने मिन उनक़ी। (या अल्लाह ईमान की निशानी से मेरी शिनाख़्त हो, और मुझे बज़ुर्गी का ताज इनायत किया जाये, तस्लीम व रेज़ा का क़लादा मेरी गर्दन में पड़ा रहे और रिश्त ए ईमान आख़िरी वक़्त तक मुन्क़ता न हो।)

और कहा है कि अम्मामा खड़े हो कर बाँधना चाहिये।

जनाबे रसूले ख़ुदा (स) के पास कई क़िस्म की टोपियाँ थी जो पहना करते थे।

उन लंबी लंबी टोपियों के बारे में जिन को हरतला कहते हैं यह वारिद है कि उन का पहनना यहूदियों का लिबास है और उलामा का क़ौल है कि मकरूह है।

बाज़ अहादीस से ज़ाहिर होता है कि टोपी के नीचे के किनारे को ऊपर की तरफ़ मोड़ लेना मकरुह है।

हज़रत रसूले ख़ुदा (स) से मंक़ूल है कि जिस ज़माने में मेरी उम्मत में तुर्की टोपियाँ पहनने का रिवाज ज़्यादा होगा ज़िना भी उन में ज़्यादा हो जायेगा। तुर्की टोपियों से ज़ाहिरन क़ादूक़ और बकताशी और उसी की जैसी टोपियाँ मुराद हैं।