Go to content Go to menu
 


shia, shiyat, sheeyat/ islaam, islam, islamic hindi haider alam

shiya (shia) aur islam (islaam) hindi
शिया और इस्लाम
क़ुरआने करीम इस्लाम के अलावा किसी अन्य धर्म को इस अर्थ मे मान्यता नही देता। जैसे कि क़ुरआने करीम के सूरए आलि इमरान की आयत न. 19 में वर्णन हुआ कि “इन्ना अद्दीना इन्दा अल्लाहि अलइस्लाम” अनुवाद--अल्लाह के समक्ष केवल इस्लाम धर्म ही मान्य है।


इस्लाम का शाब्दिक अर्थ “समर्पण” है। और क़ुरआन की भाषा में इसका अर्थ “अल्लाह के आदेशों के सम्मुख समर्पित”होना है। यह इस्लाम शब्द का आम अर्थ है।


क़ुरआने करीम इस्लाम के अलावा किसी अन्य धर्म को इस अर्थ मे मान्यता नही देता। जैसे कि क़ुरआने करीम के सूरए आलि इमरान की आयत न. 19 में वर्णन हुआ कि “इन्ना अद्दीना इन्दा अल्लाहि अलइस्लाम” अनुवाद--अल्लाह के समक्ष केवल इस्लाम धर्म ही मान्य है।
इस्लाम की दृष्टि में इस बात का महत्व है कि इस पवित्र आस्था में विश्वास रखते हुए नेक कार्य किये जाये। अर्थात केवल अपने आपको इस आस्था से सम्बन्धित कर देना ही पर्याप्त नही है।
सूरए बक़रा की आयत न. 62 में वर्णन हो रहा है कि “ इन्ना अललज़ीना आमनू व अल लज़ीना हादू व अन्नसारा व अस्साबिईना मन आमना बिल्लाहि व अलयौमिल आखिरि व अमिला सालिहन फ़लहुम अजरुहुम इन्दा रब्बिहिम वला खौफ़ुन अलैहिम वला हुम यहज़नूना” अनुवाद--- केवल दिखावे के लिए ईमान लाने वाले लोगो, यहूदी, ईसाइ व साबिईन [हज़रत यहिया को मान ने वाले] में से जो लोग भी अल्लाह और क़ियामत पर वास्तविक ईमान लायेंगे और नेक काम करेंगे उनको उनके रब (अल्लाह) की तरफ़ से सवाब (पुण्य) मिलेगा और उनको कोई दुखः दर्द व भय नही होगा।
परन्तु इन सब बातों के होते हुए भी वर्तमान समय में दीने मुहम्मद (स.) ही इस्लाम का मूल रूप है। अन्य आसमानी धर्म केवल दीने मुहम्मदी से पूर्व ही अपने समय में इस्लाम के रूप में थे, जो अल्लाह की इबादत ओर उसके सामने समर्पण की शिक्षा देते थे।
जैसे कि क़ुऱाने करीम के सूरए बक़रह की आयत न. 133 में वर्णन होता है कि “अम कुन्तुम शुहदाआ इज़ हज़र याक़ूबा अलमौतु इज़ क़ाला लिबनीहि मा तअबुदूना मिन बअदी क़ालू नअबुदु इलाहका व इलाहा आबाइका इब्राहीमा व इस्माईला व इस्हाक़ा इलाहन वाहिदन व नहनु लहु मुस्लीमूना ”
अनुवाद---- क्या तुम उस समय उपस्थित थे जब याक़ूब की मृत्यु का समय आया ? और उन्होंने अपनी संतान से पूछा कि मेरे बाद किसकी इबादत करोगे ? तो उन्होने उत्तर दिया कि आपके और आपके पूर्वजो इब्राहीम, इस्माईल व इस्हाक़ के अल्लाह की जो एक है और हम उसी के सम्मुख समर्पण करने वाले हैं।)
इसी प्रकार इस्लामें मुहम्मदी (स.) पूर्व के समस्त आसमानी धर्मों की सत्यता को भी प्रमाणित करता है। जैसे कि क़ुरआने करीम के सूरए बक़रा की आयत न. 136 में वर्णन होता है कि
“ क़ूलू आमन्ना बिल्लाहि व मा उन्ज़िला इलैना व मा उन्ज़िला इला इब्राहीमा व इस्माईला व इस्हाक़ा व यअक़ूबा वल अस्बाति वमा ऊतिया मूसा व ईसा वमा ऊतिया अन्नबीय्यूना मिन रब्बिहिम, ला नुफ़र्रिक़ु बैना अहादिम मिनहुम व नहनु लहू मुस्लिमूना।”
अनुवाद--- ऐ मुस्लमानों तुम उन से कहो कि हम अल्लाह पर और जो उसने हमारी ओर भेजा और जो इब्राहीम, इस्माईल, इस्हाक़, याक़ूब और याक़ूब की संतान की ओर भेजा गया ईमान ले आये हैं। और इसी प्रकार वह चीज़ जो मूसा व ईसा और अन्य नबीयों की ओर भेजी गयी इन सब पर भी ईमान ले आये हैं। हम नबीयों में भेद भाव नही करते और हम अल्लाह के सच्चे मुसलमान (अर्थात अल्लाह के सम्मुख समर्पण करने वाले) हैं।
इसी आधार वह लोग जिनको इस्लाम के वास्तविक मूल तत्वों के बारे में नही बताया गया या जिनको बताया गया परन्तु वह समझ नही सके, जिसके फल स्वरूप वह हक़ (इस्लाम) से दूर ही रहे इस्लामी दृष्टिकोण से क्षम्य हैं।
इस्लाम वह धर्म है जिसका वादा सभी आसमानी धर्मों ने किया
जैसे कि क़ुरआने करीम के सूरए हज की 78वी आयत में अल्लाह ने कहा है कि “ व जाहिदू फ़िल्लाहि हक़्क़ा जिहादिहि, हुवा इजतबाकुम वमा जआला अलैकुम फ़िद्दीनि मिन हरजिन, मिल्लता अबीकुम इब्राहीमा हुवा सम्माकुमुल मुस्लिमीना मिन क़ब्लु व फ़ी हाज़ा लियकूनुर्रसूलु शहीदन अलैकुम व तकूनू शुहदाअ अलन्नासि, फ़अक़िमुस्सलाता व आतुज़्ज़काता व आतसिमु बिल्लाहि, हुवा मौलाकुम फ़ा नेमल मौला व नेमन्नसीर।”
अनुवाद--- और अल्लाह के बारे में इस तरह जिहाद करो जो जिहाद करने का हक़ है उसने तुम्हे चुना है और (तुम्हारे लिए) दीन में कोई सख्ती नही रखी है यही तुम्हारे दादा इब्राहीम का दीन है अल्लाह ने तुमको इस किताब में और इससे पहली (आसमानी) किताबों में मुसलमान के नाम से पुकारा है। ताकि रसूल तुम्हारे ऊपर गवाह रहे और और तुम लोगों के आमाल (अच्छे व बुरे काम) पर गवाह रहो अतः अब तुम नमाज़ स्थापरित करो और ज़कात दो और अल्लाह से सम्बन्धित हो जाओ वही तुम्हारा मौला(स्वामी) है और वही सबसे अच्छा मौला(स्वामी) और सहायक है।
इस्लाम अन्तिम धर्म के रूप


अर्थात इस्लाम अन्तिम आसमानी धर्म है जो हज़रत मुहम्मद स. के द्वारा समपूर्ण मानव जाती के लिए भेजा गया है। तथा इस्लाम का संविधान अनंतकाल तक अल्लाह पर ईमान, उसकी इबादत और उन समस्त चीज़ों को जो अल्लाह एक इंसान के जीवन में चाहता है दर्शाता रहेगा।
मानव जाति हज़रत मुहम्मद स. के पैगम्बर पद पर नियुक्ति के समय तक इतनी सक्षम व योग्य हो गया थी कि अल्लाह के पूर्ण दीन (इस्लाम) को ग्रहण कर सके और उसको अल्लाह के प्रतिनिधियों से समझ कर अनंतकाल तक अपना मार्ग दर्शक बनाये।
इस्लाम की शिक्षाऐं किसी विशेष स्थान या वर्ग विशेष के लिए नही हैं बल्कि इस्लाम क़ियामत (प्रलय) तक सम्पूर्ण मानव जाती के लिए मार्ग दर्शक है। क्योंकि इस्लाम ने मानव जीवन के समस्त संदर्भों पर ध्यान दिया है। अतः इस्लाम इतनी व्यापकता पाई जाती है कि मानव को समाजिक या व्यक्तिगत स्तर पर, भौतिक व आत्मिक विकास के लिए जिन चीज़ों की आवश्यक्ता होती हैं वह सब चीज़े इस में उपलब्ध है।
इस्लाम की शिक्षाऐं
इस्लाम की शिक्षाओं को इन तीन भागो में विभाजित किया जा सकता हैक- एतिक़ादाती (आस्था से सम्बंधित)
ख- अखलाक़ियाती (सदाचार से सम्बंधित)
ग- फ़िक़्ही (धर्म निर्देशों से सम्बंधित)
इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं कि नबी ने कहा है कि ज्ञान केवल तीन हैं आयाते मुहकिमह (आस्थिक), फ़रिज़ाए आदिलह (सदाचारिक) और सुन्नतुन क़ाइमह(फ़िक़्ह = धार्मिक निर्देश)
[उसूले काफ़ी 1/32]
“ एतिक़ादात” (धार्मिक आस्थाऐं) धर्म के मूल भूत तत्वों और अन्य शिक्षाओं का आधार हैं। इस्लाम धर्म की आस्थाऐं भी अन्य आसमानी धर्मों की तरह तौहीद नबूवत व मआद हैं।
क- तौहीद अर्थात अद्वैतवाद या एक इश्वरवादिता में विश्वास
ख- नबूवत अर्थात अल्लाह द्वारा भेजे गये नबीयों(प्रतिनिधियों) पर विश्वास
ग- मआद अर्थात इस संसार के जीवन की समाप्ति के बाद परलोकिय जीवन पर विशवास।
क- तौहीद (अद्वैतवाद या एक इश्वरवाद)
यह धर्म की आधारिक शिक्षा है यह अल्लाह के एक होने पर ईमान के बाद अल्लाह की पूर्ण रूप से इबादत के साथ पूरी होती है। इस्लाम ने मानव की उतपत्ति का मुख्य उद्देश केवल इबादत को ही माना है।
जैसे कि क़ुरआने करीम के सूरए ज़ारियात की आयत न. 56 में वर्णन हुआ कि “मा ख़लक़्तुल जिन्ना वल इंसा इल्ला लियअबुदूना।”
अनुवाद -- मैंने जिन्नों और इंसानों को केवल इबादत के लिए पैदा किया है। अर्थात मानव की उतपत्ति का उद्देश्य केवल इबादत है।
इस्लाम केवल उतपत्ति में ही अद्वैतवाद[1] का ही समर्थक नही है बल्कि रबूबियत तकवीनी[2] और रबूबियत तशरीई[3] मे भी अद्वैतवाद का समर्थक है।
अल्लाह की रबूबियते तशरीई के काऱण नबूवत की आवश्यक्ता पड़ती है क्योंकि संचालन का कार्य आदेशों व निर्देशों के बिना नही हो सकता और इन आदेशों व निर्देशो को इंसानों तक पहुँचाने के लिए प्रतिनिधि की आवश्यक्ता है। इस्लाम में इन्ही प्रतिनिधियों को नबी (पैगम्बर) कहा जाता है।
ख- नबूवत
अर्थात उन नबियों के अस्तित्व पर विश्वास रखना जो “वही” व इलहाम के द्वारा इंसानों के लिए अल्लाह से संदेश पाते हैं। यहाँ पर “वही” से तात्पर्य वह संदेश है जो विशेष शब्दों के रूप में नबियों की ज़बान व दिल पर जारी (विद्यमान) होता है।
परन्तु नबियों पर “वही” व “इलहाम” शब्दों के बिना भी हुआ है। इस्लामी विधान में इस प्रकार के संदेशों (बिना शब्दों के प्राप्त होने वाले संदेशों ) को हदीसे क़ुदसी कहा जाता है।
हदीसे क़ुदसी अल्लाह का एक ऐसा संदेश है जो अल्लाह के शब्दों में प्राप्त न हो कर मानव को नबी के शब्दों में प्राप्त हुआ है। यह संदेश क़ुरान के विपरीत है क्योंकि क़ुरआन के शब्द व आश्य दोनों ही अल्लाह की ओर से है।


प्रत्येक धर्म में “वही” एक आधारिक तत्व है। और वह धर्म जिसके नबी पर की गयी “वही” बाद की उलट फेर से सुरक्षित रही वह धर्म “इस्लाम” है। तथा अल्लाह ने इस सम्बन्ध में प्रत्य़क्ष रूप से वादा किया है कि वह क़ुरआन के संदेश को सुरक्षित रखेगा। जैसे कि क़ुराने करीम के सूरए हिज्र की आयत न. 9 में वर्णन हुआ है कि
“इन्ना नहनु नज़्ज़लना अज़्ज़िक्रा व इन्ना लहु लहाफ़िज़ून”
अनुवाद-- हमने ही इस क़ुरान को नाज़िल किया है (आसमान से भेजा है) और हम ही इसकी रक्षा करने वाले हैं।
इतिहास भी इस बात का साक्षी है कि क़ुरआन में कोई फेर बदल नही हुई है। और इसी प्रकार हदीसें भी इस विषय पर प्रकाश डालती हैं।


वर्णन योग्य बात यह है कि इस्लाम भी अन्य आसमानी धर्मों की तरह(उन धर्मों को छोड़ कर जिनमें फेर बदल कर दी गयी है) नबीयों को मासूम मानता है। और “वही” को इंसानों तक पहुँचाने के सम्बंध मे किसी भी प्रकार की त्रुटी का खण्डन करता है।
जैसे कि क़ुरआने करीम के सूरए नज्म की आयत न. 3 और 4 में वर्णन होता है कि
“व मा यनतिक़ु अनिल हवा इन हुवा इल्ला वहीयुन यूहा।”
अनुवाद--वह (नबी) अपनी मर्ज़ी से कोई बात नही कहता वह जो भी कहता है वह “वही” होती है।
क़ुरआन एक आसमानी किताब है और इसमें वह सब चीज़े मौजूद हैं जिनका इस्लाम वर्णन करता है। इस किताब में उन चीज़ों का भी वर्णन है जो इस समय मौजूद हैं और उन चीज़ों का भी वर्णन है जो भविषय में पैदा होंगी। परन्तु मानव के कल्याण के लिए आवश्यक है उन समस्त चीज़ो के बारे में ज्ञान प्राप्त करे जो वर्तमान में मौजूद हैं या जो भविषय में पैदा होंगी।
क़ुरआन जिन चीज़ों का वर्णन करता है उनके सम्बंध में कभी एक शिक्षक के रूप मे शिक्षा देता है और जो मानव नही जानते उनको सिखाता है। जैसे कि क़ुरआने करीम के सूरए निसा की आयत न. 113 में वर्णन हुआ है कि-
“ व अनज़लल्लाहु अलैकल किताबा वल हिकमता व अल्लमका मा लम तकुन तअलम, व काना फ़ज़लुल्लाहि अलैका अज़ीमन। ”
अनुवाद--- अल्लाह ने आप पर किताब व हिकमत (बुद्धिमत्ता) को उतारा और आप जिन चीज़ों के बारे में नही जानते थे उन सब का ज्ञान प्रदान किया। और आप पर अल्लाह की बहुत बड़ी अनुकम्पा है।
और कभी एक सचेत करने वाले के रूप में मानव की प्रकृति में छिपी हुई चीज़ों को मानव के सम्मुख प्रस्तुत करता है, और उसको निश्चेतना से बाहर निकालता है। जैसे कि क़ुरआने करीम के सूरए अंबिया की आयत न. 10 मे वर्णन होता है कि--
“लक़द अनज़लना इलैकुम किताबन फ़ीहि ज़िक्रु कुम, अफ़ला तअक़िलून।”
अनुवाद-- हमने तुम्हारी ओर एक किताब भेजी जिसमें तुम्हारे लिए चेतना है, क्या तुम इतनी भी अक़्ल नही रखते।
मनुष्यों की आत्मा की शुद्धि व प्रशिक्षण भी नबियों की एक ज़िम्मेदारी है। और यह भी “वही” से ही सम्बंधित है। जैसे कि क़ुरआने करीम के सूरए अलबक़रा की आयत न. 151 में वर्णन हुआ है कि “कमा अरसलना फ़ीकुम रसूलन मिनकुम यतलू अलैकुम आयातिना व युज़क्किकुम व युअल्लिमुकुमुल किताबा वल हिकमता व युअल्लिमुकुम मा लम तकुनू तअलमून।”
अनुवाद--जिस तरह हमने तुम्हारे पास तुम्ही में से एक पैगम्बर भेजा जो तुम्हारे सामने हमारी आयतों को पढ़ता है, तुम्हारी आत्माओं को पवित्र करता है और तुमको किताब व हिकमत (बुद्धि मत्ता) की शिक्षा देता है और वह सब कुछ बताता है जो तुम नही जानते।
शायद इंसानों के दिलों में संतोष पैदा करना भी आत्मा के प्रशिक्षण के अन्तर्गत ही आता है जैसे कि क़ुरआने करीम ने इस ओर संकेत भी किया है। क़ुरआने करीम के सूरए अलहूद की आयत न.120 में वर्णन होता है कि—
“व कुल्लन नक़ुस्सु अलैका मिन अम्बाइर्रुसुलि मा तुसब्बितु बिहि फ़ुआदका।”
अनुवाद-- और हम आप के (सामने) पराचीन रसूलों की घटनाओं का वर्णन कर रहे हैं ताकि तुम्हारे दिल में संतोष पैदा हो जाये।
शिक्षा व सचेत करने के अन्तर्गत ज्ञान के तीनों क्षेत्रों अक़ाईद (आस्था) अख़लाक़ (सदाचार) फ़िक़्ह (धर्म निर्देश) आ जाते हैं। और मानव इन तीनो क्षेत्रों में ही अल्लाह की अनुकम्पा का इच्छुक है।
अल्लाह स्वयं भी इंसान का आदर करता है और इसके आदर का आग्रह भी करता है। जैसे कि क़ुरआने करीम के सूरए अलइसरा की आयत न. 70 में वर्णन होता है कि“ लक़द कर्रमना बनी आदमा व हमलनाहुम फ़िल बर्रि वल बहरि व रज़क़नाहुम मिनत्तय्यिबाति व फ़ज़्ज़लनाहुम अला कसीरिम मिम मन ख़लक़ना तफ़ज़ीलन।”
अनुवाद-- और हम ने मानव जाती को को आदर प्रदान किया और उनको पानी व पृथ्वी पर चलने के लिए सवारियाँ तथा पवित्र भोजन प्रदान किया और बहुतसे प्राणी वर्गों पर उनको वरीयता दी।
यह सब उन गुणों के कारण है जो मानव की रचना में छिपे हुए हैं। और इन गुणों में सर्व श्रेष्ठ गुण यह है कि मानव में संसार की वास्तविकता को समझने और परखने की शक्ति पायी जाती है।
जैसे कि क़ुरआने करीम के सूरए अलक़ की आयत न. 1-5 में वर्णन हुआ है कि “इक़रा बिस्मि रब्बिका अल्लज़ी ख़लक़ * ख़लाक़ल इंसाना मिन अलक़ *इक़रा व रब्बुकल अकरम * अल्लज़ी अल्लमा बिल क़लम * अल्लमल इंसाना मा लम याअलम।”
अनुवाद-- उस अल्लाह का नाम ले कर पढ़ो जिसने पैदा किया। उसने इंसान को जमे हुए ख़ून से पैदा किया। पढ़ो और तुम्हारा पालने वाला (अल्लाह) बहुत करीम (दयालु) है। जिसने क़लम (लेखनी) के द्वारा शिक्षा दी। और इंसान को वह सब कुछ बता दिया जो वह नही जानता था।
परन्तु यह सब होते हुए भी इंसान अल्लाह की सहायता का इच्छुक है। ताकि मूर्खता व घमंड की खाई में न गिर सके। अल्लाह ने इंसान की प्रधानता से सम्बंधित क़ुरआन की उपरोक्त वर्णित आयात का वर्णन करने फौरन बाद कहा कि—
“कल्ला इन्नल इंसाना लयतग़ा * अन राहु इसतग़ना * ”
अनुवाद-- निःसन्देह इंसान सरकशी करता है। वह अपने बारे में यह विचार रखता है कि उसे किसी चीज़ की आवश्यक्ता नही है।
बाद में वर्णित यह दोनों आयते इंसान की कमज़ोरी की ओर संकेत करती है। और क़ुरआने करीम की अन्य आयतें इंसान के सम्बंध में इस प्रकार वर्णन करती हैं।
“ इन्नहु काना ज़लूमन जहूलान ” (सूरए अहज़ाब आयत न.72)
अनुवाद--वह बहुत ज़ालिम व जाहिल था।
“ इन्नल इंसाना लज़लूमुन कफ़्फ़ारुन”(सूरए अल इब्राहीम आयत न.34)
अनुवाद--इंसान ज़ालिम व शुक्र न करने वाला है।
“ काना अल इंसानु अजूलन” (सूरए अल असरा आयत न. 11)
अनुवाद-- इंसान बहुत जल्दबाज़ था।
“ व ख़ुलिक़ल इंसानु ज़ईफ़न” (सूरए अन्निसा आयत न.28)
अनुवाद--इंसान को कमज़ोर पैदा किया गया है।
“ इन्नल इंसाना ख़ुलिक़ा हलूअन” (सूरए अल मआरिज आयत न. 19)
अनुवाद--निःसन्देह इंसान को लालची पैदा किया गया है।
------------------------------------------------------------------------------------
[1] उतपत्ति में अद्वैतवाद अर्थात इस बात में आस्था होना कि इस संसार का रचियता एक है और वह रचियता ऐसा है जिसकी ज़ात मे किसी प्रकार का संमिश्रण नही है। ।
[2] रबूबियत तकवीनी अर्थात इस बात मे आस्था होना कि अल्लाह ने इस संसार को उतपन्न करके सवतन्त्र नही छोड़ है बल्कि इस संसार की समस्त प्रक्रियाओं में अल्लाह का इरादा विद्यमान।
[3] रबूबियते तशरीई अर्थात इस बात में आस्था होना कि अल्लाह ने इंसान को पूर्ण अधिकार प्रदान किया है, परन्तु उसकी जीवन शैली को क़ानून के द्वारा संचालित करता है। और यह केवल उसका ही अधिकार है कि वह मानव को पूर्ण रूप से संचालित करने के लिए आदेश व निर्देश जारी करे।

  दौरे हाज़िर में इमामिया फ़िरक़ा मुसलमानों का बड़ फ़िरक़ा है, जिसकी कुल तादाद मुसलमानों की तक़रीबन एक चौथाई है और इस फ़िरक़े की तारीख़ी जड़ें सदरे इस्लाम के उस दिन से शुरु होती हैं कि जिस सूर ए बय्यनह की यह आयत नाज़िल हुई थी: (सूर ए बय्यना आयत 7) बेशक जो लोग ईमान लाये और अमले सालेह अंजाम दिया वही बेहतरीने मख़लूक़ हैं। चुनाँचे जब यह आयत नाज़िल हुई तो रसूले ख़ुदा (स) ने अपना हाथ अली (अ) के शाने पर रखा उस वक़्त असहाब भी वहाँ मौजूद थे और आपने फ़रमाया: ऐ अली, तुम और तुम्हारे शिया बेहतरीने मख़लूक़ हैं। इस आयत की तफ़सीर के ज़ैल में देखिये, तफ़सीरे तबरी (जामेउल बयान), दुर्रे मंसूर (तालीफ़, अल्लामा जलालुद्दीन सुयुती शाफ़ेई), तफ़सीरे रुहुल मआनी तालीफ़ आलूसी बग़दादी शाफ़ेई। इसी वजह से यह फ़िरक़ा जो कि इमाम जाफ़रे सादिक़ (अ) की फ़िक़ह में उनका पैरोकोर होने की बेना पर उनकी तरफ़ मंसूब है। शिया फ़िरक़े का नाम से मशहूर हुआ। 2. शिया फ़िरक़ा बड़ी तादाद में ईरान, इराक़, पाकिस्तान, हिन्दुस्तान, में ज़िन्दगी बसर करता है, इसी तरह उस की एक बड़ी तादाद खाड़ी देशों तुर्की, सीरिया (शाम), लेबनान, रूस और उससे अलग होने वाले बहुत से नये देशों में मौजूद हैं, नीज़ यह फ़िरक़ा यूरोपी मुल्कों जैसे इँगलैंड, फ़्रास, जर्मनी और अमेरिका, इसी तरह अफ़्रीक़ा के मुमालिक और मशरिक़ी एशिया में भी फ़ैला हुआ है, उन मक़ामात पर उनकी मस्जिदें और इल्मी, सक़ाफ़ती और समाजी मराकिज़ भी हैं। 3. इस फ़िरक़े के लोग अगरते मुख़्तलिफ़ मुल्कों, क़ौमों और रंग व नस्ल से ताअल्लुक़ रखते हैं लेकिन इसके बावजूद अपने दीगर मुसलमान भाईयों के साथ बड़े प्यार व मुहब्बत से रहते हैं और तमाम आसान या मुश्किल मैदानों में सच्चे दिल और इख़लास के साथ उनका तआवुन करते हैं और यह सब अल्लाह के इस फ़रमान पर अमल करते हुए इसे अंजाम देते हैं: (सूर ए हुजरात आयत 10) मोमिनीन आपस में भाई भाई हैं। या इस क़ौले ख़ुदा पर अमल करते हैं: नेकी और तक़वा में एक दूसरे की मदद करो। (सूर ए मायदा आयत 2) और अल्लाह के रसूल (अ) के इस क़ौल की पाबंदी करते हुए: 1. (मुसनदे अहमद बिन हम्बल जिल्द 1 पेज 215) मुसलमान आपस में एक दूसरे के लिये एक हाथ की तरह हैं। या आपका यह क़ौल उन के लिये मशअले राह है: 2. मुसलमान सब आपस में एक जिस्म की तरह हैं। (अस सहीहुल बुख़ारी, जिल्द 1 किताबुल अदब पेज 27) 4. पूरी तारीख़े इस्लाम में दीने ख़ुदा और इस्लामी उम्मत के देफ़ाअ के सिलसिले में इस फ़िरक़े का एक अहम और वाज़ेह किरदार रहा है जैसे उसकी हुकुमतों, रियासतों ने इस्लामी सक़ाफ़त व तमद्दुन की हमेशा ख़िदमत की है, नीज़ इस फ़िरक़े के उलामा और दानिशवरों ने इस्लामी मीरास को ग़नी बनाने और बचाने के सिलसिले में मुख़्तलिफ़ इल्मी और तजरूबी मैदानों में जैसे हदीस, तफ़सीर, अक़ायद, फ़िक़ह, उसूल, अख़लाक़, देराया, रेजाल, फ़लसफ़ा, मौऐज़ा, हुकुमत, समाजियात, ज़बान व अदब बल्कि तिब व फ़िज़िक्स किमीया, रियाज़ियात, नुजूम और उसके अलावा बहुत हयातियाती उलूम के बारे में लाख़ों किताबें तहरीर करके इस सिलसिले में बहुत अहम किरदार अदा किया है बल्कि बहुत से उलूम की बुनियाद रखने वाले उलामा इसी फ़िरक़े से ताअल्लुक़ रखते हैं। [1] 5. शिया फ़िरक़ा मोअतक़ीद है कि ख़ुदा अहद व समद है, न उसने किसी को जना है और न उसे किसी ने जन्म दिया है और न ही कोई उसका हमसर है और उससे जिस्मानियत, जेहत, मकान, ज़मान, तग़य्युर, हरकत, सऊद व नुज़ूल वग़ैरह जैसी सिफ़तें जो उसकी सिफ़ाते कमाल व जलाल व जमाल के शायाने शान नही हैं, उनकी नफ़ी करता है। और शिया यह अक़ीदा रखते हैं कि उसके अलावा कोई मअबूद नही, हुक्म और तशरीअ (शरीयत के क़ानून बनाना) सिर्फ़ उसी के हाथ में है और हर तरह का शिर्क चाहे वह ख़फ़ी हो या जली एक अज़ीम ज़ुल्म और न बख़्शा जाने वाला गुनाह है। और शियों ने यह अक़ायद: अक़्ले मोहकम (सालिम) से अख़्ज़ किये है, जिनकी ताईद व तसदीक़ किताबे ख़ुदा और सुन्नते शरीफ़ा से भी होती है। और शियों ने अपने अक़ायद के मैदान में उन हदीसों पर तकिया नही किया है जिन में इसराईलियात (जाली तौरेत और इंजील) और मजूसीयत की घड़ी हुई बातों की आमेज़िश है, जिन्होने अल्लाह तआला को इंसान की तरह माना है और वह उसकी तशबीह मख़लूक़ से देते हैं या फ़िर उसकी तरफ़ ज़ुल्म व जौर और लग़व व अबस जैसे अफ़आल की निस्बत देते हैं, हालाँकि अल्लाह तआला उन तमाम बातों से निहायत बुलंद व बरतर है या यह लोग ख़ुदा के पाक व पाक़ीज़ा मासूम नबियों की तरफ़ बुराईयों और कबीह बातों की निस्बत देते हैं। 6. शिया अक़ीदा रखते हैं कि ख़ुदा आदिल व हकीम है और उसने अदल व हिकमत से ख़ल्क़ किया है, चाहे वह जमाद हो या नबात, हैवान हो या इंसान, आसमान हो या ज़मीन, उसने कोई शय अबस नही ख़ल्क़ की है, क्योकि अबस (फ़ुज़ूल या बेकार होना) न तंहा उसके अदल व हिकमत के मनाफ़ी है बल्कि उसकी उलूहीयत से भी मनाफ़ी है जिसका लाज़िमा है कि खु़दा वंदे आलम के लिये तमाम कमालात का इस्बात किया जाये और उससे हर क़िस्म के नक़्स और कमी नफ़ी की जाये। 7. शिया यह अक़ीदा रखते हैं कि ख़ुदा वंदे आलम ने अदल व हिकमत के साथ इब्तेदाए ख़िलक़त से ही उसकी तरफ़ अंबिया और रसूलों को मासूम बना कर भेजा और फिर उन्हे वसीअ इल्म से आरास्ता किया जो वही के ज़रिये अल्लाह की जानिब से उन्हे अता किया गया और यह सब कुछ बनी आदम की हिदायत और उसे उसके गुमशुदा कमाल तक पहुचाने के लिये था ता कि उसके ज़रिये से ऐसी ताअत की तरफ़ भी उसकी रहनुमाई हो जाये जो उसे जन्नती बनाने के साथ साथ परवरदिगार की ख़ुशनूदी और उसकी रहमत का मुसतहिक़ क़रार दे और उन अंबिया व मुरसलीन के दरमियान आदम, नूह, इब्राहीम, मूसा, ईसा और हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा (स) सबसे मशहूर हैं जिनका ज़िक्र क़ुरआने मजीद में आया है या जिन के असमा और हालात हदीसों में बयान हुए हैं। 8. शियों का अक़ीदा है कि जो अल्लाह की इताअत करे, उसके अवामिर को नाफ़िज़ करे और ज़िन्दगी के हर शोअबे में उसके क़वानीन पर अमल करे वह निजात याफ़ता और कामयाब है और वही मदह व सवाब का हक़दार है, चाहे वह हबशी ग़ुलाम ही क्यो न हो और जिसने अल्लाह की नाफ़रमानी की और उसके अवामिर को न पहचाना और अल्लाह के अहकाम के बजाए दूसरों के अहकाम के बंधन में बंध गया, वह मज़म्मत, हलाक शुदा और घाटा उठाने वालों में से है, चाहे वह क़रशी सैयद ही क्यो न हो जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) की हदीसे शरीफ़ में आया है। शिया अक़ीदा रखते हैं कि सवाब व सज़ा मिलने की जगह क़यामत का दिन है। जिस दिन हिसाब व किताब, मीज़ान व जन्नत व जहन्नम सबके सामने होगें और यह मरहला बरज़ख़ और आलमे क़ब्र के बाद होगा, नीज़ अक़ीद ए तनासुख़ जिसके मुनकेरीने क़यानत क़ायल हैं, उसको शिया बातिल क़रार देते हैं क्योकि अक़ीद ए तनासुख़ से क़ुरआने करीम और हदीसे पाक की तकज़ीब लाज़िम आती है। 9. शिया अक़ीदा रखते हैं कि अंबिया व मुरसलीन की आख़िरी फ़र्द और उन सबसे अफ़ज़ल नबी हज़रत मुहम्मद बिन अबदुल्लाद बिन अब्दुल मुत्तलिब हैं, जिन्हे ख़ुदा वंदे आलम ने हर ख़ता व लग़जिश से महफ़ूज़ रखा और हर गुनाहे सग़ीरा व कबीरा से मासूम क़रार दिया है चाहे वह क़बले नबुव्वत हो या बादे नबुव्वत, तबलीग़ का मरहला हो या कोई और काम हो और उनके ऊपर क़ुरआने करीम नाज़िल किया ता कि वह इंसानी ज़िन्दगी के लिये एक हमेशा बाक़ी रहने वाले क़ानून और दस्तूरुल अमल क़रार पाये। पस रसूले इस्लाम (स) ने रिसालत की तबलीग़ की और अमानत व सदाक़त व इख़लास के साथ लोगों तक पहुचा दिया और इस अहम और क़ीमती रास्ते में हर मुम्किन कोशिश की, शिया हज़रात के यहाँ रसूले इस्लाम की शख़्सियत, आपके ख़ुसूसियात, मोजिज़ात और आपके हालात से मुतअल्लिक़ सैकड़ों किताबें मौजूद हैं। बतौरे नमूना देखिये: किताब अल इरशाद तालीफ़ शेख मुफ़ीद, आलामुल वरा, आलामुल होदा, तालीफ़ तबरसी, मौसूआ (मोअजम) बिहारुल अनवार, तालीफ़ अल्लामा मजलिसी और मौजूदा दौर की मौसूअतुर रसूलिल मुस्तफ़ा, तालीफ़ मोहसिन ख़ातेमी। 10. शियो का अक़ीदा है कि क़ुरआने करीम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) पर हज़रत जिबरईल (अ) के ज़रिये नाज़िल हुआ, जिसे कुछ बुज़ुर्ग सहाबा ने रसूले इस्लाम (स) के दौर में आपके हुक्म से जमा और मुरत्तब किया। जिन में सरे फ़ेहरिस्त हज़रत अली बिन अबी तालिब (अ) है, इन हज़रात ने बड़ी मेहनत और मशक़्क़त के साथ उसको लफ़्ज़ व लफ़्ज़ याद किया और उसके हुरुफ़ व कलेमात नीज़ सूरह व आयात की तादाद भी मुशख़्ख़स व मुअय्यन कर दी, इस तरह यह एक के बाद दूसरी नस्ल तक मुन्तक़िल होता आ रहा है और आज मुसलमानों के तमाम फ़िरक़े रात व दिन उसकी तिलावत करते हैं, न उसमें कोई ज़ियादती हुई और न ही कोई कमी, यह हर क़िस्म की तहरीफ़ व तबदीली से महफ़ूज़ है, शिया हज़रात के यहाँ इस बारे में भी मुतअद्दिद छोटी और बड़ी किताबें मौजूद हैं। [2] 11. शिया अक़ीदा रखते हैं कि जब हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) की वफ़ात का वक़्त क़रीब हुआ तो आपने हज़रत अली (अ) को तमाम मुसलमानों की रहबरी के लिये अपना ख़लीफ़ा और लोगों के लिये इमाम के तौर पर मंसूब किया ता कि अली (अ) उनकी सियासी क़यादतऔर फ़िक्री रहनुमाई फ़रमाएँ और उनकी मुश्किलों को हल करें, उनके नुफ़ूस का तज़किया करें और उनकी तरबीयत करें और यह सब ख़ुदा के हुक्म से मक़ामे ग़दीरे ख़ुम में रसूल (स) की हयात के आख़िरी दौर और आख़िर हज के बाद, उन मुसलमान हाजियों के दूर तक फैले मजमें अंजाम पाया, जो आपके साथ उसी वक़्त हज करके वापस आ रहे थे, जिनकी तादाद बाज़ रिवायात के मुताबिक़ एक लाख तक पहुचती है और उस मुनासिबत पर कई आयते नाज़िल हुईं। [3] उसके बाद नबी ए अकरम (स) ने अली (अ) के हाथों पर लोगों से बैअत तलब की, चुनाँचे तमाम लोगों ने बैअत की और उन बैअत करने वालों में सबसे आगे मुहाजेरीन व अंसार के बुज़ुर्ग और मशहूर सहाबा थे मज़ीद तफ़सील के लिये देखिये: किताब अल ग़दीर, जिस में अल्लामा अमीनी ने मुसलमानों के तफ़सीरी और तारीख़ी मसादिर व मआख़िज़ से इस वाक़ेया को नक़्ल किया है। 12. शियों का अक़ीदा है कि चूँकि रसूले अकरम (स) के बाद इमाम की ज़िम्मेदारी वही है जो नबी की होती है जैसे उम्मत की क़यादत व हिदायत, तालीम व तरबीयत, तबयीने अहकाम और उनकी मुश्किलात का हल करना, नीज़ समाजी अहम उमूर का हल करना, लिहाज़ा यह ज़रुरी है कि इमाम और ख़लीफ़ा ऐसा होना चाहिये कि लोग उस पर भरोसा और ऐतेबार करते हों ताकि वह उम्मत तो अम्न व अमान के साहिल तक पहुचा सके, पस इमाम तमाम सलाहियतों और सिफ़ात में नबी जैसा होना चाहिये। जैसे (इस्मत और वसीअ इल्म) क्योकि इमाम के फ़रायज़ भी नबी की तरह होते हैं। अलबत्ता वही और नबुव्वत के अलावा, क्योकि नबुव्वते हज़रते मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह पर ख़त्म हो गई, आप ही ख़ातिमुल अँबिया ए वल मुरसेलीन हैं, नीज़ आपका दीन ख़ातिमुल अदयान और आपकी शरीयत ख़ातिमुश शरीया और किताब ख़ातिमुल कुतुब है, न आपके बाद कोई नबी और न आपके दीन के बाद कोई दीन और इसी तरह न आपकी शरीयत के बाद कोई शरीयत आयेगी। (शियों के पास इस मैदान में भी मुतअद्दिद और मुख़्तलिफ़ ज़ख़ीम, फ़िक्री और इस्तिदलाली किताबों मौजूद हैं।) 13. शियों का अक़ीदा है कि उम्मत को सीधी राह पर चलाने वाले मासूम क़ायद और वली की ज़रुरत इस बात की मुक़तज़ी और तलबगार है कि रसूल के बाद इमामत और ख़िलाफ़त का मंसब सिर्फ़ अली पर ही न ठहर जाये बल्कि क़यादत के इस सिलसिले को तवाल मुद्दत तक क़ायम रहना ज़रुरी है ता कि इस्लाम की जड़ें मज़बूत और उसकी बुनियादें महफ़ूज़ हो जायें और जो ख़तरात उसके उसूल और क़वायद ही को नही बल्कि हर इलाही अक़ीदे और ख़ुदाई निज़ाम के सामने मुँह खोले खड़े हैं उनसे उसको बचाया जा सके और उसके लिये तमाम आईम्मा (मुख़्तलिफ़ और मुतद्दिद दौर में उम्मत की रहबरी करके अपनी सीरत, तजुरबात और महारत का) ऐसा अमली नमूना और प्रोग्राम पेश कर सकें जिस की मदद से तमाम हालात में बाद में चलती रही। 14. शिया अक़ीदा रखते हैं कि नबी ए अकरम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) ने इसी सबब और इसी बुलंद पाया हिकमत की बेना पर अल्लाह के हुक्म की ख़ातिर अली (अ) के बाद गयारह इमाम मुअय्यन फ़रमाये। लिहाज़ा हज़रत अली (अ) को मिला कर कुल बारह इमाम है। जैसा कि उनकी तादाद के बारे में नबी ए अकरम (स) की हदीसों में वज़ाहत के अलावा तज़किरा भी है कि उन सब का ताल्लुक़ क़बील ए क़ुरैश से होगा। जैसा कि सही बुख़ारी व सही मुस्लिम में मुख़्तलिफ़ अल्फ़ाज़ के साथ इस मतलब की तरफ़ इशारा किया गया है। अलबत्ता उन के असमा और ख़ुसूसियात का तज़किरा नही है: बुख़ारी और मुस्लिम दोनो ने रसूले ख़ुदा (स) रिवायत नक़्ल की है कि आपने फ़रमाया: बेशक दीने इस्लाम उस वक़्त तक ग़ालिब, क़ायम और मज़बूत रहेगा जब तक इस में बारह अमीर या बारह ख़लीफ़ा रहेगें, यह सब क़ुरैश से होगें। (बाज़ नुस्खों में बनी हाशिम भी आया है और कुतुबे सिहाहे सित्ता के अलावा दूसरी क़ुतुबे फ़ज़ायल व मनाक़िब व शेयर व अदब में उन हज़रात के असमा भी मज़कूर है।) यह हदीसें अगरचे आईम्म ए इसना अशर (जो कि इमाम अली (अ) और औलादे अली (अ) हैं) के बारे में नस्स नही हैं लेकिन यह तादाद उसी पर मुनतबिक़ होती है जो शिया अक़ीदा रखते हैं और उसकी कोई तफ़सीर नही हो सकती मगर सिर्फ़ वही जो शिया कहते हैं। [4] 15. शियों का जाफ़री फ़िरक़ा यह अक़ीदा रखता है कि आईम्म ए इसना अशर (बारह इमामों) से मुराद हज़रत अली बिन अबी तालिब जो रसूल (स) के चचा ज़ाद भाई और अपकी बेटी फ़ातेमा ज़हरा (स) के शौहर हैं। और हसन व हुसैन हैं (जो अली व फ़ातेमा के बेटे और रसूले इस्लाम (स) के नवासे हैं।) ज़ैनुल आबेदीन अली बिन हुसैन (अस सज्जाद) उसके बाद: इमाम मुहम्मद बिन अली (अल बाक़िर) इमाम जाफ़िर बिन मुहम्मद (अस सादिक़) इमाम मूसा बिन जाफ़र (अल काज़िम) इमाम अली बिन मूसा (अर रिज़ा) इमाम मुहम्मद बिन अली (अल जवाद अत तक़ी) इमाम अली बिन मुहम्मद (अल हादी) इमाम हसन बिन अली (अल असकरी) इमाम मुहम्मद बिन हसन (अल महदी अल मौऊद अल मुन्तज़र (अ))[5] यही वह अहले बैत (अ) है जिन्हे रसूले ख़ुदा (स) ने अल्लाह के हुक्म से इस्लामी उम्मत का क़ायद क़रार दिया, क्योकि यह तमाम ख़ताओं और गुनाहों से पाक और मासूम हैं, यही हज़रात अपने जद के वसीअ इल्म के वारिस हैं, उनकी मवद्दत और पैरवी की हुक्म दिया गया है जैसा कि ख़ुदा ने इरशाद फ़रमाया है: (सूर ए शूरा आयत 23) ऐ रसूल, आप कह दीजिये कि मैं तुम से इस तबलीग़े रिसालत का कोई अज्र नही चाहता अलावा इस के कि मेरे अक़रबा से मुहब्बत करो। (सूर ए तौबा आयत 119) ऐ ईमानदारों, तक़वा इख़्तियार करो और सच्चों के साथ हो जाओ। देखिये कुतबे हदीस व तफ़सीर और फ़ज़ायल में फ़रीक़ैन के नज़दीक जो सहीह और दूसरी किताबें हैं। 16. शिया जाफ़री फ़िरक़ा अक़ीदा रखता है कि यह आईम्म ए अतहार वह हैं जिनके दामन पर तारीख़ न कोई ख़ता लिख सकी और न किसी ग़लती को साबित कर सकी, न क़ौल में न अमल में, उन्होने अपने ढेरों उलूम के ज़रिये उम्मते मुस्लिमा की ख़िदमत की है, और अपनी अमीक़ मारेफ़त, सालिम फ़िक्र के ज़रिये अक़ीदा व शरीयत, अख़लाक़ व आदाब, तफ़सीर व तारीख़ और मुस्तक़बिल के लायेह ए अमल को सही जेहत अता की है और हर मैदान में इस्लामी सक़ाफ़त को महफ़ूज़ कर दिया है जैसे उन्होने अपने कौ़ल और अमल के ज़रिये चंद ऐसे मुनफ़रिद और मुमता़ज़, नेक सीरत और पाक किरदार मर्दों और औरतों की तरबीयत की है, जिनके फ़ज़्ल व इल्म और हुस्ने सीरत के सब लोग क़ायल हैं। और शिया ऐतेक़ाद रखते हैं कि अगर चे (यह बहुत अफ़सोस का मक़ाम है) उम्मते इस्लामिया ने उनको सियासी क़यादत से दूर रखा लेकिन उन्होने फिर भी अक़ायद के उसूलों और शरीयत के क़वायद व अहकाम की हिफ़ाज़त करके अपनी फ़िक्री और समाजी ज़िम्मेदारी को बेहतरीन तरीक़े से अदा किया है। चुनाँचे मिल्लेत मुस्लिमा अगर उन्हे सियासी क़यादत का मौक़ा देती जिसे रसूले इस्लाम (स) ने ख़ुदा के हुक्म से उन्हे सौपा था तो यक़ीनन इस्लामी उम्मत सआदत व इज़्ज़त और अज़मते कामिला हासिल करती और यह उम्मत मुत्तहिद व मुत्तफ़िक़ व मुतवह्हिद रहती और किसी तरह का शिक़ाक़, इख़्तिलाफ़, नज़ाअ, लड़ाई, झगड़ा, क़ुश्त व कुश्तार और ज़िल्लत व रुसवाई का न देखना पड़ती। इस सिलसिले में किताब अल इमाम सादिक़ वल मज़ाहिबिल अरबआ की तीन जिल्दें और दूसरी किताबें देखी जा सकती हैं। 17. शिया अक़ीदा रखते हैं कि मज़कूरा वजह और अक़ायद की किताबों में पाई जाने वाली नक़्ली व अक़ली कसीर दलीलों की बेना पर अहले बैत (अ) की पैरवी वाजिब है और उनके रास्ते और तरीक़े को अपनाना ज़रुरी है क्योकि उन्ही का तरीक़ा वह तरीक़ा है जिसे उम्मते के लिये रसूल (स) ने मुअय्यन फ़रमाया और उन से तमस्सुक का हदीसे सक़लैन (जो मुतवातिर है) हुक्म देती है जैसा कि रसूले ख़ुदा (स) ने इरशाद फ़रमाया है: जिसे सही मुस्लिम और दीगर दसियों मुस्लिम उलामा व मुहद्देसीन ने हर सदी में नक़्ल किया है। देखिये, रिसाल ए हदीसे सक़लैन (मुवल्लेफ़ा वशनवी) जिसकी तसदीक़ अज़हर शरीफ़ ने तीस साल पहले की थी। और गुज़श्ता अंबिया की हयात में भी ख़लीफ़ा और वसी बनाने का यही तरीक़ा था। देखिये, इसबातुल वसीया, मुवल्लेफ़ा मसऊदी और फ़रीक़ैन की दीगर कुतुबे हदीस व तफ़सीर व तारीख़। 18. जाफ़री शिया अक़ीदा रखते हैं कि उम्मते इस्लामिया (अल्लाह उसको अज़ीज़ रखे) पर यह वाजिब है कि वह उन उमूर में तहक़ीक़ और बहस व मुबाहिसा करे लेकिन किसी पर सब्ब व शत्म, इल्ज़ाम व तोहमत और किसी को डराये और धमकाये बिना और तमाम इस्लामी फ़िरक़ों के उलामा व मुफ़क्केरीन पर लाज़िम है कि वह इल्मी इजतेमा शिरकत करें और सफ़ा व इख़लास के साथ गुफ़तुगू करें और अपने शिया मुसलमान भाईयों के उन नज़रियात पर ग़ौर व ख़ौज़ करे जिन पर वह क़ुरआन, सही मुतवातिर सुन्नत, तारीख़ी मुहासिबा (दलीलों) और रसूल और आँ हज़रत (स) के बाद के सियासी व समाजी के मुताबिक़ इस्तिदलाल पेश करते हैं। 19. और शिया अक़ीदा रखते हैं कि सहाबा और जो लोग रसूल (स) के साथ थे चाहे वह औरत हों या मर्द, उन्होने इस्लाम की बड़ी ख़िदमत की है, नशरे इस्लाम की राह में अपनी जान व माल की क़ुर्बानी दी है लिहाज़ा तमाम मुसलमानों पर वाजिब है कि उन का ऐहतेराम करें और उनकी गराँ क़द्र ख़िदमात का ऐतेराफ़ करें। लेकिन उसका मतलब यह भी नही कि तमाम सहाबा (बतौरे मुतलक़) आदिल थे और उनके बाज़ आमाल व नज़रियात, तंक़ीद और ऐतेराज़ से मा फ़ौक़ हैं क्योकि सहाबा भी बशर हैं और उनसे भी ग़लती और भूल चूक होती है, चुनाँचे तारीख़ में यह बात मौजूद है कि उन में बाज़ हज़रात राहे मुस्तक़ीम से दूर हो गये थे, यहाँ तक कि कुछ लोग ख़ुद आँ हज़रत (स) के दौर में ही आपके रास्ते से दूर हो गये बल्कि क़ुरआने मजीद ने अपनी बाज़ आयतों और सूरों में जैसे सूर ए मुनाफ़ेकून, अहज़ाब, हुजरात, तहरीम, फ़त्ह, मुहम्मद और तौबा में इस बात की तसरीह की है। लिहाज़ा बाज़ सहाबा हज़रात के आमाल पर जायज़ और मुहज़्ज़ब अंदाज़ में तंक़ीद करना हरगिज़ा कुफ़्र का सबब नही क़रार पा सकतास क्योकि कुफ़्र व ईमान का मेयार वाज़ेह है और उन दोनो का महवर व मर्कज़ रौशन है और वह तौहीद व रिसालत और ज़रुरियाते दीन जैसे वुजूबे नमाज़, रोज़ा, हज, शराब और जुए का हराम होना जैसी चीज़ों को मानना और उसका इंक़ार करना है, अलबत्ता क़लम और ज़बान को बदतमीज़ी और भोन्डी बातों से महफ़ूज़ रखना ज़रुरी है, क्योकि यह बातें एक मुहज़्ज़ब मुसलमान जो सीरते ख़ातिमुन नबी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) पर अमल पैरा है उस के लिये ज़ेब नही देती, बहरहाल इसके वाबजूद अकसर सहाबा सालेह और मुसलेह थे, जो लायक़े ऐहतेराम और मुसतहिक़्क़े इकराम हैं। लेकिन इसके बावजूद सहाबा को जरह व तादील (आदिल या ग़ैर आदिल साबित करने) के क़वायद पर इस लिये तौला जाता है ताकि सही और क़ाबिले ऐतेमाद सुन्नत से वाक़िफ़ियत हासिल हो जाये, क्योकि हम जानते हैं कि रसूले ख़ुदा (स) के जाने के बाद आपकी तरफ़ बहुत ज़्यादा क़िज़्ब व बोहतान मंसूब है। (जैसा कि यह बात तमाम लोग जानते हैं और ख़ुद रसूल (स) ने इस बात की वाक़े होने की ख़बर भी दी थी) और इस बात के बारे में दोनो तरफ़ के उलामा हज़रात ने भी अहम किताबें लिखी हैं जैसे सुयूती और इब्ने जौज़ी वग़ैरह, ताकि वह हदीसें जो वाक़ेयन रसूले ख़ुदा (स) से सादिर हुई हैं उनके दरमियान और जो हदीसें गढ़ कर आपकी तरफ़ मंसूब की गई हैं उनके दरमियान इम्तियाज़ पैदा हो सके। 20. शिया, इमाम महदी मुन्तज़र (स) के वुजूद का अक़ीदा रखते हैं, क्यो कि इस बारे में कसीर रिवायात रसूले इस्लाम (स) से नक़्ल हुई हैं कि वह औलादे फ़ातेमा (अ) से होगें और इमाम हुसैन (अ) के नवें बेटे हैं, क्योकि इमाम हुसैन (अ) के आठवे बेटे (आठवी पुश्त) इमाम हसन असकरी (अ) हैं जिन की वफ़ात 260 हिजरी में हुई और आपको खु़दा ने सिर्फ़ एक बेटा इनायत किया था जिसका नाम मुहम्मद था चुनाँचे आप ही इमाम मेहदी (अ) हैं जिनकी कुनियत अबुल क़ासिम है। [6] आपको मोवस्सक़ मुसलमानों को देखा है और आपकी विलादत, ख़ुसूसियात और इमामत नीज़ आपकी इमामत पर आप के वालिद की तरफ़ से नस्स की ख़बर दी है, आप अपनी विलादत के पाँच साल बाद लोगों की नज़रों से ग़ायब हो गये, क्योकि दुश्मनों ने आपको क़त्ल करने का इरादा कर लिया था लेकिन ख़ुदा वंदे आलम ने आपको इसलिये बचा कर रखा है ता कि आख़िरी ज़माने में अदल व इंसाफ़ पर मबनी इस्लामी हुकूमत क़ायम करें और ज़मीन को ज़ुल्म व फ़साद से पाक करे दें, जो कि ज़ुल्म व जौर से भरी होगी। और यह कोई अज़ीब व ग़रीब बात नही है कि आपकी उम्र इस क़दर तूलानी कैसी होगी? क्योकि क़ुरआने मजीद इस वक़्त भी हज़रते ईसा (अ) के ज़िन्दा होने की ख़बर दे रहा है, जबकि उनकी विलादत को 2008 साल हो चुके हैं, इसी तरह हज़रते नूह (अ) अपनी क़ौंम में 950 साल ज़िन्दा रहे और अपनी क़ौम को अल्लाह की तरफ़ दावत देते रहे और हज़रते ख़िज़्र (अ) भी अभी तक ज़िन्दा है क्योकि अल्लाह तआला हर शय पर क़ादिर है, उसकी मशीयत पूरी होने वाली है, जिसे कोई टाल नही सकता। क्या उसने हज़रत युनुस (अ) के बारे में यह नही फ़रमाया कि (सूर ए साफ़्फ़ात आयत 143, 144) अगर वह तसबीह करने वालों में से न होते तो रोज़े क़यामत तक उसी के पेट में रह जाते। चुनाँचे अहले सुन्नत के अकसर बुज़ुर्ग और जलीलुल क़द्र उलामा इमाम मेहदी (अ) की विलादत और उनके वुजूद के क़ायल हैं और उन्होने उनके औसाफ़ व वालेदैन के नाम का ज़िक्र किया है जैसे अ. अब्दिल मोमिन शबलन्जी अपनी किताब नुरुल अबसार फ़ी मनाक़िबे आले बैतिन नबीयिल मुख़्तार में। आ. इब्ने हजर हैसमी मक्की शाफ़ेई ने अपनी किताब अस सवाएक़े मोहरेक़ा में कहते हैं अबुल क़ासिम मुहम्मह अल हुज्जह की उम्र उनके वालिद की वफ़ात के वक़्त पाँच साल की था कि लेकिन ख़ुदा ने इसी सिन में आपको हिकमत अता की और उनका नाम क़ायम मुन्तज़र है। इ. क़ंदूज़ी हनफ़ी बलख़ी ने अपनी किताब यनाबिउल मवद्दत में इसका तज़िकरा किया है जो दौराने ख़िलाफ़ते उस्मानिया तुर्की में (आस्ताना) से छपी है। ई. सैयद मुहम्मद सदीक़ हसन कंनौजी बुख़ारी ने अपनी किताब अल एज़ाआ लेमा काना वमा यकूनो बैना यदेईस साआ में इसे लिखा है। यह हैं मुतक़द्देमीने उलामा के अक़वाल और मुतअख़्ख़ेरीन में से डाक्टर मुस्तफ़ा राफ़ेई ने अपनी किताब इस्लामुना में लिखा है, चुनाँचे जब उन्होने मसअल ए विलादत की बहस की है कि तो बड़ी तूल व तफ़सील के साथ बहस की है और इस बारे में उन तमाम ऐतेराज़ात और शुबहात के जवाब दिये हैं जो इस मक़ाम पर ज़िक्र किये जाते हैं। 21. जाफिर फ़िरक़े वाले लोग नमाज़ पढ़ते हैं, रोज़ा रखते हैं और अपने माल में से ज़कात व ख़ुम्स अदा करते हैं और मक्क ए मुकर्रमा जा कर एक बार बतौरे वाज़िब हज्जे बैतुलल्लाहिल हराम करते हैं और इसके अलावा भी मुसतहब हज्ज व उमरा अदा करते रहते हैं और नेकियों की तरफ़ दावत देते हैं और बुराईयों से रोकते हैं, और अवलिया ए ख़ुदा व रसूल से मुहब्बत करते हैं और ख़ुदा व रसूल के दुश्मनों से दुश्मनी करते हैं और अल्लाह की राह में हर उस काफ़िर व मुशरिक से जिहाद करते हैं जो इस्लाम के ख़िलाफ़ ऐलाने जंग करता हो और उस हाकिम से जंग करते हैं, जो क़हर व ग़लबे के ज़रिये उम्मते मुसलिमा पर मुसल्लत हो गया हो और दीने इस्लाम (जो दीने हनीफ़ और हक़ है) की मुवाफ़िक़त करते हुए तमाम इक़्तेसादा, समाजी और घरेलू कामों और मशग़लों में मसरुफ़ रहते हैं, जैसे तिजारत, इजारा, निकाह, तलाक़, मीरास, तरबीयत व परवरिश, रज़ाअत और हिजाब वगै़रह और इस सब चीज़ों के अहकाम को इज्तेहाज के ज़रिये हासिल करते हैं, जिन्हे मुत्तक़ी और परहेज़गार उलामा, किताब, सही सुन्नत और अहले बैत साबित शुदा हदीसों और अक़्ल व इजमा के ज़रिये इस्तिम्बात करते हैं। 22. और शिया अक़ीदा रखते हैं कि तमाम यौमिया फ़रायज़ के अवक़ात मुअय्यन हैं, और यौमिया नमाज़ के लिये पाँच वक़्त हैं, फ़ज्र, ज़ोहर, अस्र, मग़रिब और एशा और अफ़ज़ल यह है कि हर नमाज़ को उसके मख़सूस वक़्त में अंजाम दिया जाये, मगर यह कि नमाज़े ज़ोहर व अस्र और नमाज़े मग़रिब व एशा को जमा करके पढ़ा जा सकता है, क्योकि रसूले ख़ुदा (स) ने किसी उज़्र, मरज़, बारिश और सफ़र के बग़ैर इन दो नमाज़ों को एक साथ पढ़ा था, जैसा कि सही मुस्लिम वग़ैरह में नक़्ल हुआ है, और यह उम्मते मुस्लिमा की सहूलत के लिये किया गया है, ख़ास तौर से हमारे ज़माने में एक फ़ितरी और आम बात है। 23. शिया भी दूसरे मुसलमानों की तरह अज़ान देते हैं, अलबत्ता जब जुमल ए हय्या अलल फ़लाह आता है तो उसके बाद हय्या अला खै़रिल अमल भी पढ़ते हैं, क्योकि रसूले ख़ुदा (स) के दौर में यह हिस्सा आज़ान में कहा जाता था लेकिन बाद में हज़रत उमर ने अपने इज्तेहाद की बेना पर यह इल्लत बताते हुए कि चूँकि इससे मुसलमान जिहाद करने से रुक जायेगें उसको अज़ान से हज़्फ़ कर दिया, उनका कहना था कि मुसलमान इससे यह समझ बैठेगें कि नमाज़ ही बेहतरीने अमल है लिहाज़ा जिहाद की तरफ़ फिर कोई रग़बत नही करेगा, इस लिये इसे अज़ान में हज़्फ़ कर दिया जाये तो बेहतर है। जैसा कि अल्लामा क़ौशजी अशअरी ने अपनी किताब शरहे तजरीदुल ऐतेक़ाद में और अल मुन्सिफ़ में, कंदी, कंजुल उम्माल में मुत्तक़ी हिन्दी वग़ैरह ने इसे नक़्ल किया है इस के अलावा उमर ने एक और जुमले का इज़ाफ़ा कर दिया। अस सलातों ख़ैरुन मिन नौम, जबकि यह जुमला रसूले इस्लाम (स) के ज़माने में नही था। देखिये, कुतुबे हदीस व तारीख़। जबकि इबादत और उसके मुक़द्दमात इस्लाम में शारेअ के अम्र और उसके इज़्म पर मौक़ूफ़ हैं यानी शरीयत में हर अमल के लिये क़ुरआन और सुन्नत से नस्से ख़ास या नस्से आम मौजूद हो, और अगर किसी अमल की नस्स न हो तो वह अमल मरदुद और बिदअत हैं जिसे उसके अंजाम देने वाले के मुँह पर मार दिया जायेगा, क्योकि इबादत में किसी चीज़ की ज़ियादती या कमी मुमकिन नही है, बल्कि तमाम शरई उमूर में किसी की ज़ाती राय का कोई दख़ल नही है, अलबत्ता शिया हज़रात जो अशहदो अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह के बाद अशहदो अन्ना अलीयन वलीयुल्लाह कहते हैं तो यह उन रिवायात की बेना पर है जो रसूले ख़ुदा (स) और अहले बैत (अ) से नक़्ल की गई हैं, और उनमें यह तसरीह मौजूद है कि मुहम्मद रसूलुल्लाह कहीं ज़िक्र नही हुआ या बाबे जन्नत पर नही लिखा गया मगर उसके साथ अली वलीयुल्लाह ज़रुर था और यह जुमला इस बात की अक्कासी करता है कि शिया अली (अ) को नबी भी नबी समझते चे जाय कि वह आपकी रुबूबियत या उलूहीयत का अल अयाज़ो बिल्लाह अक़ीदा रखते हों, लिहाज़ा तौहीद व रिसालत की शहादत के बाद तीसरी शहादत (अलीयन वलीयुल्लाह) कहना जायज़ है इस उम्मीद में कि यह भी मतलूबे परवरदिगार हो। अलबत्ता इसको ज़ुज़ और वुजूब के क़स्द से अंजाम न दे, यही शियों के अकसर उलामा का फ़तवा है। लिहाज़ा यह ज़ियादती बग़ैर क़स्दे ज़ुज़ईयत के अंजाम दी जायेगी, जैसा कि हमने कहा है लिहाज़ा यह ऐसा नही है कि शरअ में उसकी कोई अस्ल न हो, इसलिये यह बिदअत है। 24. और शिया जमीन या मिट्टी या कंकड़ के टुकड़ों और पेड़ पौधों वग़ैरह पर सजदा करते हैं और दरी, क़ालीन या चादर कपड़े और खाई जाने वाली चीज़ों और ज़ेवरात पर सजदा नही होता, क्योकि इस सिलसिले में बड़ी तादाद में शिया व सुन्नती किताबों में हदीसें मौजूद हैं, क्योकि रसूले ख़ुदा (स) का तरीक़ा यह था कि आप मिट्टी और ज़मीन पर सजदा करते थे बल्कि आप मुसलमानों को भी यही हुक्म देते थे, चुनाँचे एक दिन जनाबे बेलाल ने अपने अम्मामे की कोर पर जला देने वाली गर्मी से बचने की बेना पर सजदा किया तो रसूल इस्लाम (स) ने बेलाल के अम्मामे को पेशानी से अलग कर दिया और फ़रमाया: ऐ बेलाल, अपनी पेशानी को ज़मीन पर रखो। इसी तरह की हदीस सुहैब और रबाह के बारे में नक़्ल की गई है, जब आपने फ़रमाया: ऐ सुहैब और ऐ रबाह अपनी पेशानी को ज़मीन पर रखो। देखिये, सही बुखारी व कंज़ुल उम्माल या अल मुसन्नफ़, तालीफ़ अब्दुल रज़्ज़ाक़ अस सनआनी, या अस सुजूद अलल अर्ज़, तालीफ़ काशिफ़ुल ग़िता। और नबी ए अकरम (स) ने उस जगह यह इरशाद फ़रमाया (जैसा कि सही बुख़ारी वग़ैरह में आया है) मेरे लिये ज़मीन को मस्जिद और ताहिर व मुतह्हर बनाया गया है। और फिर मिट्टी पर सजदा करना और पेशानी को ज़मीन पर रखना यही ख़ुदा के सामने सजदा करने का सबसे मुनासिब तरीक़ा है, क्योकि मअबूद के सामने यही ख़ुशू और ख़ुज़ू का सब से अच्छा तरीक़ा है, इसी तरह ख़ाक पर सजदा करना इंसान को उसकी असल्म हक़ीक़त की याद दिलाता है कि वह उसी से पैदा हुआ है, क्या ख़ुदा वंदे आलम ने नही फ़रमाया: (सूरए ताहा आयत 55) इसी ज़मीन से हमने तुम्हे पैदा किया है और इसी में पलटा कर ले जायेगें और फिर दोबारा उसी में से निकालेगें। बेशक सजदा ख़ुज़ू की आख़िरी हद का नाम है और ख़ुशू की आख़िरी मंज़िल मुसल्ले (जानमाज़) फ़र्श, कपड़े और क़ीमती जवाहर पर सजदा करके हासिल नही होती, बल्कि बदल की अशरफ़ तरीन जगह यानी पेशानी को पस्त तरीन जगह यानी मिट्टी पर रखे। [7] अलबत्ता उस मिट्टी को पाक होना चाहिये, उसी तहारत की ताकीद की बेना पर शिया लोग अपने साथ मिट्टी का ढेला (यानी सजदा गाह वग़ैरह) रखते हैं और बाज़ अवका़त यह मिट्टी तबर्रुक के तौर पर मुक़द्दस तरीन जगह से लेते हैं जैसे ज़मीने कर्बला, जिस में फ़रज़ंदे रसूल हजरत इमाम हुसैन (अ) शहीद कर दिये गये, जैसा कि बाज़ सहाबा मक्के के कंकड़ और पत्थर वग़ैरह को सफ़र में सजदे के लिये अपने साथ रखते थे। [8] अलबत्ता शिया इस पर इसरार नही करते हैं और न ही इस चीज़ पर हमेशा ज़रुरी समझते हैं बल्कि वह हर पाक मिट्टी और पत्थर के ऊपर बिना किसी इशकाल और तरद्दुद के सजदा करते हैं, जैसे मस्जिदे नबवी और मस्जिदुल हराम के फ़र्श और वहाँ पर लगे हुए पत्थर। इसी तरह शिया नमाज़ में अपने दाहिने हाथ को बाये हाथ पर नही रखते। (हाथ नही बाँधते) क्योकि रसूले इस्लाम (स) ने नमाज़ में यह काम अंजाम नही दिया और यह बात क़तई नस्से सरीह से साबित नही है, यही वजह है कि सुन्नी मालिकी हज़रात भी यह फ़ेल अंजाम नही देते। [9] 25. शिया फ़िरक़ा वुज़ू में दोनो हाथों को ऊपर की तरफ़ से कोहनियों से उँगलियों के सिरे तक धोते हैं और उसके बर ख़िलाफ़ नही करते क्योकि यह तरीक़ा उन्होने अपने इमामों स